Tuesday, April 10, 2012

असभ्यता का पुनर्पाठ


-मधुकर उपाध्याय 
यह लगभग मान लिया गया है कि जहां कृति होती है, विकृति भी वहीं रहती है। इस अवधारणा के साथ कि दरअसल दोनों में बहुत फासला नहीं होता और अंतर, अगर हो भी तो, बहुत बारीक होता है। अक्सर सिर्फ नजरिए का। जैसे कि विकृति स्वयं कृति हो और फर्क केवल दृष्टि में हो। उसकी स्थापना में नहीं। यानी कि उसके रेशे जब उलझे हुए दिखने लगें तो तात्कालिक रूप से असहज बनाने के बावजूद वे कई बार, और प्राय:, नएपन के दरवाजे खोलने को उद्यत दिखते हैं। यह संभावना बनाते हुए कि चक्रीय जीवनक्रम में एक न एक दिन उन्हें कृति की तरह स्वीकार कर लिया जाएगा। वही नए मानक होंगे। तब तक बने रहेंगे, जब तक कृति और विकृति दोनों अगला कदम बढ़ाने के लिए तैयार न हों। एक साथ। 

उन्हें साथ चलना होता है, हाथ में हाथ डाले, और घूम-फिर कर लौटना होता है। वहीं, जहां से उन्होंने चलना शुरू किया था। उनका साथ होना अनिवार्यता है। तयशुदा हकीकत की तरह कि एक की शिनाख्त के लिए दूसरे का होना जरूरी है। इस हद तक कि एक के गायब होने पर दूसरे की पहचान बिला जाने का खतरा हो। अपना डर, अपना संकोच एक विकट किस्म की आत्मीयता गढ़ता हो। दो निहायत विपरीत ध्रुवों के बीच। नएपन की ललक कृति-विकृति दोनों का स्वागत करने के लिए द्वार खोलती हो और नए संभावना-संसार में उनके दाखिल होते ही खिसक कर किसी अगले दरवाजे के पास जा खड़ी होती हो। अच्छी तरह जानते-समझते कि आज नहीं तो कल, वे आएंगे गलबहियां करते और दस्तक देंगे। 

यह अक्सर चिढ़ की आत्मीयता होती है। करीब-करीब उस तरह प्रगाढ़, जिसके नमूने आमफहम हों और उन्हें ढूंढ़ने के लिए किसी शोध की आवश्यकता न हो। हर जगह फैले-बिखरे। जीवन, समाज, भाषा, सरकार, पक्ष-विपक्ष और जो कुछ भी हमारे आसपास है। लेकिन इससे यह विवशता जन्म नहीं लेती कि उन्हें जस-का-तस स्वीकार कर लिया जाए। मान लिया जाए कि एक के लिए दूसरे को घर में जगह देना मजबूरी है। उनके आपसी रिश्ते जो हों, कृति के साथ खड़ा होना और अगले दरवाजे की ओर बढ़ना वह पुनर्पाठ है, जिसे हर कुछ समय बाद दोहराना होता है ताकि विलोम इतना बड़ा न हो जाए कि स्वयं को कृति घोषित करने की तानाशाही पर उतर आए। सिर्फ इतना डर भी असभ्यता और बर्बरता से लड़ने के लिए पर्याप्त है।

इस पुनर्पाठ की जद्दोजहद के नमूने इतने होंगे कि उन्हें सूचीबद्ध करने की कोशिश कभी कामयाब नहीं हो सकती। ऐसा प्रयास किया भी नहीं जाना चाहिए। इसलिए भी नहीं कि इसकी ऊब कहीं खुद रचनाकर्म से ध्यान न हटा दे। पर इसका विरोध जरूरी है। मकबूल फिदा हुसेन के चित्र हों या एके रामानुजन की तीन सौ रामायण, कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिनके पक्ष में खड़ा होना अपने पक्ष में खड़ा होना है। उनके विरोध के मूल में सांप्रदायिकता है तो ऐसे मामले भी कम नहीं हैं जहां तथाकथित विकास, सुविधा, जड़ता, अश्लीलता, सतहीपन या कुछ और कृति को लगभग धमकी देने के तेवर में नजर आते हैं। उसे खा जाने को खड़े होते हैं। डस लेने के लिए फन उठाए फुंफकारते हैं। 

विकृति सार्वभौमिक है। हर दौर में, हर जगह उपलब्ध। दुर्भाग्य से उसका अनिवार्य विरोध और चर्चा केवल कुछ ठिकानों पर महदूद होकर रह जाती है। या तब तक नहीं होती जब तक वह इतनी मुखर और चपल न हो जाए कि हमारे घर की सांकल पीटने लगे। छोटी-मोटी विकृतियों को विसंगति मान कर दरकिनार करने की प्रवृत्ति का खमियाजा भुगतने से बेहतर यही होगा कि उसे वहीं देखा, समझा और रोका जाए, जहां से उसे खाद-पानी मिलता है। वहां तफ्तीश करके उन्हें अपेक्षाकृत आसानी से काटा-छांटा जा सकता है। विकास जैसे सर्व-स्वीकार्य तर्क का खोखलापन आसानी से देखा जा सकता है। सुविधा-असुविधा को मामूली फेरबदल से सुलझाया जा सकता है।

चित्रकार जतीन दास को यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि सहूलियत का खेल एक दिन उन्हें धकिया कर भिलाई के उस मुर्गा चौक से बाहर कर देगा, जिसे उन्होंने खुद गढ़ा था। पंद्रह साल पहले जतीन ने भिलाई इस्पात प्राधिकरण के आग्रह पर तीस फुट ऊंचा और तीस फुट के दायरे में फैला एक मुर्गा बनाया था, जो तब तक के अनाम एक गोलंबर का नाम ही बन गया। शहर उसी मुर्गे के किनारे गोल-गोल घूमते अपने घर पहुंच जाता था। कुछ लोग उसे देखने आते थे। रघु राय उसकी फोटो खींचते थे। मुर्गा चौक भिलाई की पहचान बन गया कि शहर की दूरियां वहां से नापी जाने लगीं। अचानक एक दिन किसी को वह बदरंग लगा और आनन-फानन में, कृति और कलाकार की परवाह किए बिना, असंवेदनशील ढंग से उसका नए सिरे से रंग-रोगन कर दिया गया। 

तब तक सहूलियत और विकास का तर्क नहीं था, पर पहुंचने ही वाला था। भिलाई बड़ा हो रहा था और मुर्गा उसे अखरने लगा था। विकृति ने तय पाया कि अब मुर्गा, मुर्गा चौक पर बांग नहीं देगा। वह चिड़िया है और उसे चिड़ियाघर में होना चाहिए। चौराहे पर नहीं। बस, पूरी कृति को एक दिन में उखाड़ दिया गया। ‘मैत्री गार्डन’ चिड़ियाघर पहुंचा दिया गया। स्थानीय तौर पर अखबारों के स्तर पर थोड़ा-सा विरोध हुआ, पर वह विकृति के इस हमले को रोक पाने के लिए सर्वथा नाकाफी था। वैसे भी बहस में कलाकार के मौलिक अधिकारों का हनन मुद्दा नहीं था। मुर्गा चौक सहूलियत का शिकार हो गया। विकास के नाम पर बलि। गो कि शुरू में अपनी नींद तोड़ने के लिए विकास ने खुद उसे अपने शहर बुलाया था। 

विकास का दंश नर्मदा और टिहरी ने झेला है।   तमाम उन छोटे गांवों और किसानों ने भी, जहां कुछ दिन बाद गंगा और यमुना एक्सप्रेस-वे बनेंगे। उनके अनगिनत छोटे पर अर्थपूर्ण स्मृति चिह्न- चौक-चौबारे, ठीहे, ‘हर्रे मामा’ और ‘बरम बाबा’- अगली पीढ़ी तक स्मृतियों से भी गायब हो जाएंगे। तब उनके पास क्या बचेगा? शायद कुछ नहीं। या शायद कुछ नया, जो उनका अपना नहीं होगा। वे कट चुके होंगे अपने अतीत से। इसलिए भी जतीन दास की कृति पर सुनियोजित हमला खतरनाक है। हुसेन और रामानुजन पर सांप्रदायिक ताकतों के हमले भयावह हैं, पर विकास की विकृति से लड़ना संभवत: उससे अधिक कठिन होगा, क्योंकि उसके पैरोकार ‘जनहित’ की जमीन पर खड़े दिखते हैं। दावा करते हैं। 

अगर विकास का अनिवार्य अर्थ विस्थापन है तो हम निश्चित तौर पर एक निहायत खतरनाक दौर में दाखिल हो चुके हैं। विकास आपको अचानक तर्कशून्य और संज्ञाशून्य बनाने की कुव्वत रखता है और यह हुआ तो किसी मूर्च्छित व्यक्ति की तरह हमें स्मृतियों से काट कर कहीं भी फेंका जा सकता है। उस वक्त, जब आंखें खुलें और होश आए, बहुत देर हो चुकी होगी और हमारे पास खड़े हो सकने लायक जमीन भी नहीं होगी। लोग चल रहे होंगे, कहीं पहुंचेंगे नहीं। स्मृति रेलगाड़ी की नहीं होती, उसमें यात्रा कर रहे लोगों की होती है। हवाई जहाज सपने नहीं देखता, हमें ही देखने होते हैं। वरना एक दिन विकास होगा, हम नहीं होंगे।

कृति और उसकी स्मृति बची रहे, यह जरूरी है। लेकिन वह बचे कैसे? स्वयं को स्मारकों के रूप में सुरक्षित करके या किताबों के हर्फ  बन कर? गीत-संगीत में? वह तो हर हाल में विकास की विकृति की आंखों में चुभेगी। विकृति को इसकी परवाह नहीं होती, उसके स्मारक नहीं होते। वे दिमाग में, सोच में रहती हैं। उनके लिए भौगोलिक सीमाएं मायने नहीं रखतीं। बल्कि आश्वस्ति का एक भाव रहता है कि उनकी जगह सुनिश्चित है। ठीक इसका उल्टा भी उतना ही सही है, पर पता नहीं क्यों कृति इतना आश्वस्त नहीं होती। कुछ संकोची प्रवृत्ति की। थोड़ा सहमी। किसी आशंकित सवारी की तरह सहयात्रियों को कनखियों से देखती। यह भी पता नहीं होता कि बगल की सवारी उतर जाएगी तो फिर कौन आ बैठेगा वहां।

जनसत्ता से साभार

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