Tuesday, April 30, 2013

Events in May 2013

May 1:
International Workers' Solidarity Day
Balraj Sahni's Birth Centenary

Kerala Children Theatre  Meet:Valedictory
Lucknow(U.P.): Play "Makadjaal"(Rakesh)

May 1-5:
Patna(Bihar) :
27th Patna City IPTA Conference

Mumbai IPTA's Annual Theatre Festival 
at Prithvi Theatre

May 1-25:
Ashok Nagar(M.P.);
Children Theatre Workshop

May 2-31:
Drama Workshops in 26 Districts

May 4 : 
Play "Sabun ki Tikiya'

May 4-5:
Film Festival(Awam ka Cinema)

May 5-25: 
Bhilai(C.G.) 17th Theatre Camp for Children & Yong Generation

May 15-June 6:
38th Little IPTA Summer Camp

May 18:
"Ek rahin Raja aur..."(Badal Sircar & Manoo Bhandari)

May 25:
People's Culture Day:
70 Years of IPTA's Foundation-Programs @ All centres

May 31-June 15: 
Children Theatre Workshop

Balraj & Bhishma : Brothers in Political Theatre

Sahmat (Safdar Hashmi Memorial Trust), a Delhi based progressive cultural organisation which aims “to evaluate the life and work of those who were involved in the creative field in the cause of social transformation,” held a three-day symposium in Delhi in 2011. The monograph Balraj and Bhisham Sahni: Brothers in Political Theatre is the outcome of the symposium intended to celebrate the centenaries of two of the illustrious sons Balraj Sahni in 2013 and Bhisham Sahni in 2015. It is a concise biography of the two artists in two short sections, besides a foreword and a section carrying condensed biographical notes.

The first essay written by Kalpana Sahni, daughter of Bhisham Sahni, recalls the major incidents that took place in the lives of the two brothers while the second essay by P.C. Joshi, the first general secretary of the Communist Party of India, deals only with Balraj’s life. A distinct transformation took place in the life of Balraj when he was introduced to IPTA (Indian People’s Theatre Association). He was planning to plunge headlong into the national struggle, but now he saw that the best way open for him would be to get into active involvement with IPTA and thereby pursue his mission. IPTA was formed in 1942 as a cultural wing of the undivided Communist Party of India the objective of which was to endorse, support and encourage leftist consciousness.

The IPTA put up on improvised platforms in street corners, in by-lanes, public open grounds and areas where people congregated the plays which addressed current issues such as poverty of the have-nots, current events such as communal violence in sensitive areas, exploitation by the colonists, famine etc., with the intention of articulating social evils contaminating our country, thus encouraging social change. At a time when pubic performances ostensibly dealt with the world of fantasy, make-believe and mythology, IPTA was like a breath of fresh air. Hungry masses craved for this new-found art. “It was simple, direct, socially involved dramatic activity with the avowed aim of serving a social purpose.” In a sense it was the theatre of the people, by the people and for the people. In the case of Balraj political and artistic involvement became one and the same. In this journey he had many likeminded friends: K.A. Abbas, Mulk Raj Anand, Prithviraj Kapoor, Chetan Anand, Dev Anand. Balraj courted arrest while he participated in the communist party-led demonstration. With the change in the policy of the communist party which did not want its funds to be diverted to the theatre and also forced the theatre group to toe its party line, the IPTA lost its base. It was a blow for Balraj who could never recover for he never wished that the theatre should remain a platform to propagate a particular creed.

Balraj had a gurukul type of education. His English education later helped him acquire western liberal enlightenment. Later his life at Santiniketan under the guidance of Rabindranath Tagore helped him develop humanism and still later his work in Gandhiji’s Nai Tailim scheme and life at Sewagram, Wardha led him on to creative service for the people. He was highly talented both in the theatre and in writing and so he worked in the cultural field. In the three fields of literature, theatre and cinema he attained boundless fame. He always wished to go back to Punjab, his native roots but could not live there for long. He acted in 125 films in his career extending to 25 years and more. He passed away in 1973, the day after he finished dubbing for Garam Hawa acclaimed by critics as his best. His interest in theatre ran parallel to his career in films. He was a prolific writer in Hindi, Punjabi and English. P.C. Joshi’s words in 1974 are the most appropriate tribute that can be paid to Balraj: “Such is the glory and tragedy of the most honest and dedicated socialist intellectuals today. Balraj’s life and work are an inspiration, and his sad end a lesson for all progressive and socialist intellectuals, and much more for historically progressive organisations like the Communist Party of India as well as for the Indian National Congress.” Written in simple, forceful prose, the monograph is a factual record of the purposeful life of two of the renowned sons of India.

(M.S. Nagarajan, was formerly Head of Department of English, Madras University)

Courtesy :The Hindu

Friday, April 26, 2013

एक मई से अशोकनगर में बाल नाट्य कार्यशाला

प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) की अशोकनगर इकाई बच्चों में सांस्कृतिक अभिरुचि के परिष्कार तथा अपसंस्कृति के बिरुद्ध जन सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना हेतु बाल नाट्य कार्यशाला का आयोजन करने जा रही है | पच्चीस दिवसीय इस नाट्य कार्यशाला की शुरूआत दिनांक 1 मई 2013 से स्थानीय नेहरू पार्क में होने जा रही है | इस कार्यशाला में 12 से 18 आयु वर्ग समूह के बच्चे नाटक,  नृत्य , संगीत , थियेटर गेम्स , चित्रकला , मंचीय उपकरण निर्माण , जनगीत जैसे अनेक कलारूपों का अभ्यास लगातार पच्चीस दिनों तक प्रातः 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक नेहरू पार्क में करेंगे | 

नाट्य कार्यशाला में बच्चों के प्रशीक्षण के लिए इप्टा के स्थानीय कलाकारों के अलावा बाहर से भी कलाकारों को आमंत्रित किया किया जा रहा है | नाटक और लोकनृत्य के लिए इन्दिरा कला संगीत महाविद्धालय खैरागढ़ ( छत्तीसगढ़ ) से दो युवा कलाकार धीरज सोनी तथा मोहन सागर बीस दिन तक बच्चों के बीच रहेंगे | चित्रकला, फोटोग्राफी , पत्रकारिता ,लाइट , फिल्म स्क्रिप्ट राइटिंग जैसे विषयों पर व्याख्यान हेतु कार्यशाला के दरम्यान अनेक कलाकारों को आमंत्रित किया जा रहा है

भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) की अशोकनगर इकाई एकमात्र ऐसी संस्था है जो स्थानीय स्तर पर पिछले पच्चीस वर्षों से कला , संस्कृति और नाटक के क्षेत्र में लगातार काम कर रही है और इससे जुड़े कलाकारों ने अपने काम के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान रेखांकित की है | इप्टा ने बच्चों के लिए अभी तक आठ नाट्य कार्यशालाएं आयोजित की हैं जिसमें एक दर्जन से अधिक नाटक तैयार किए गए हैं |

इस नाट्य कार्यशाला का समापन आयोजन दिनांक 25 मई 2013 को स्थानीय माधव भवन में किया जायेगा | भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) की स्थापना का यह 70वाँ वर्ष है और इप्टा अशोकनगर की यह बाल नाट्य कार्यशाला उसी 70वें स्थापना वर्ष को समर्पित है |

Thursday, April 25, 2013

अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस , 29, अप्रैल, 2013

अंतर्राष्ट्रीय संदेश

लिन व्हाई मिन,
ताइवान के विश्वविख्यात नृत्य प्रशिक्षक

ईसा पूर्व 10वीं से 7वीं शताब्दी के बीच रचित चीनी कविताओं के संकलन ‘द बुक ऑफ़ सोंग्स’ के प्राक्कथन में कहा गया है : 

भावनाएं द्रवित हो बनते शब्द

जब शब्द नहीं होते अभिव्यक्त
हम आहों से कुछ कहते हैं
आहें भी अक्षम हो जायें
तब गीतों का माध्यम चुनते हैं
गीत नहीं पूरे पड़ते, तो अनायास
हमारे हाथ नृत्य करने लगते हैं
पाँव थिरकने लगते हैं.
नृत्य एक सशक्त अभिव्यक्ति है
जो धरती और आकाश से संवाद करती है.

हमारी खुशी हमारे भय और हमारी आकांक्षाओं को व्यक्त करती है.
नृत्य अमूर्त है फिर भी जन के मन के संज्ञान और बोध को परिलक्षित करता है
मनोदशाओं को और चरित्र को दर्शाता है.
संसार की बहुत सी संस्कृतियों की तरह ताइवान के मूल निवासी वृत्त  में नृत्य करते हैं.
उनके पूर्वजों का विश्वास था कि बुरा और अशुभ वृत्त के बाहर ही रहेगा.

हाथों की श्रंखला बनाकर वो एक दूसरे के स्नेह और जोश को महसूस करते हैं,
आपस में बांटते हैं और सामूहिक  लय पर गतिमान होते हैं.

और नृत्य समानांतर रेखाओं के उस बिंदु पर होता है 
जहाँ रेखाएं एक-दूसरे से मिलती हुई प्रतीत होती हैं.
गति और संचालन से भाव-भंगिमाओं का सृजन और ओझल होना एक ही पल में होता रहता है.
नृत्य केवल उसी क्षणिक पल में अस्तित्व में आता है.
यह बहुमूल्य है. यह जीवन का लक्षण है.

आज के डिजिटल युग में, भाव-भंगिमाओं की छवियाँ लाखों रूप ले लेती हैं.
वो आकर्षक होती है.

परन्तु ये नृत्य का स्थान नहीं ले सकतीं क्योंकि छवियाँ सांस नहीं लेती.
नृत्य जीवन का उत्सव है.

आइये, अपने टेलीविज़न बंद कीजिए, कंप्यूटर शट-डाउन करिये, और नृत्य करने को आईये.
अपने आप को उस श्रेष्ठ और सुन्दर वाद्य के माध्यम से अभिव्यक्त करिये, जो हमारा शरीर है.
नृत्य करने के लिए आइये और लय-स्पंदन की लहरों में लोगों के साथ खो जाइए.
उस बहुमूल्य और क्षणिक लम्हे को पकड़ लीजिए.
नृत्य के साथ जीवन का कीर्तिगान कीजिये उत्सव मनाइए.  

अनुवाद- अखिलेश दीक्षित

Tuesday, April 23, 2013

स्मरण रवि नागर : स्वप्न मरता नहीं

साथी रवि नागर की पहली पुण्य तिथि – 21, अप्रैल, 2013.

-अखिलेश दीक्षित
प्रगतिशील जनगायक, संगीतकार इप्टा के 30 साल के साथी रवि नागर की पहली पुण्य तिथि, 21 अप्रैल, 2013 पर उन्हें गीत संगीत के माध्यम से याद किया गया | उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे प्रेक्षागृह में इप्टा और साझी दुनिया द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘स्वप्न मरता नहीं’ में रवि नागर के पुत्र अनादि नागर ने अपने पिता से सीखे हुए गीत ज़ेहरा निगाह की रचना ‘जबसे मैंने आँखे खोली’ मुक्तिबोध की कविता ‘मैं देखता क्या हूँ कि पृथ्वी के प्रसारों पर’ प्रस्तुत की | अनादि के साथ हारमोनियम पर श्री महेश्वर दयाल नगर और तबले पर रवि के अज़ीज़ मित्र अरुण भट्ट ने संगत की | इंडियन आइडियल से प्रसिद्ध हुए साथी कुलदीप ने ‘मैं मिटूंगा नहीं मेरे शहर की दीवारों’ गाया | अर्चना राज और रवि के शिष्य नीरज चतुर्वेदी ने अपनी प्रस्तुतिओं के माध्यम से रवि को श्रद्धांजलि दी | प्रसिद्द लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने भी निर्गुण व गजलें प्रस्तुत कीं | मालिनी के साथ गिटार पर राकेश आर्य, तबले पर अरुण भट्ट, ढोलक पर विनोद प्रसाद और की बोर्ड पर गुंजन मैसी ने संगत की |

इस अवसर पर विशेष तौर पर जोधपुर से आये रवि के साथी व मित्र जैपू खां लांगा और उनके साथियों ने अपने गीत-संगीत से पूरे प्रेक्षागृह को राजस्थानी रँग में रंग दिया | जैपू खां और साथियों ने लुम्बा-लुम्बा, म्हारो जंगल मंगल देस, जब देखूं वनरी लाल पीली अँखियाँ, मन लगो मेरो यार फकीरी में, केसरिया बालम, वैष्णव जन तो तेने कहिये, निंबूड़ा- निंबूड़ा और अन्य रचनायें सुनायीं | साथी दीपक कबीर और ऋषि ने रवि की रचनाओं की वीडियो रिकोर्डिंग दिखाई | डॉ. रूपरेखा वर्मा, विलायत जाफ़री, सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ, जुगल किशोर, नरेश सक्सेना, राकेश व अन्य रचनाकारों ने रवि को पुष्पांजलि दी | कर्यक्रम का संचालन रवि के अभिन्न मित्र रंगकर्मी आतमजीत सिंह ने किया |

इसे क्या सिर्फ़ इत्तेफाक ही कहा जायेगा कि रवि नागर ने इस संसार से 21, अप्रैल को विदा ली जिस दिन पकिस्तान में विरोध की संस्कृति की एक बहुत ही महत्वपूर्ण अलमबरदार गायिका इक़बाल बानो और ‘सारे जहाँ से अच्छा हिदोस्तान हमारा’, ‘लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी’ और ‘खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले’ जैसी मशहूर रचनायें करने वाले शायर डॉ. अल्लामा इक़बाल ने भी इस दुनिया को छोड़ने के लिए यही तारीख़ मुक़र्रर की | 21, अप्रैल, 2013 को अल्लामा इक़बाल की 75वीं , इक़बाल बानो की चौथी और साथी रवि नागर की पहली बरसी थी |

गौर तलब है कि रवि नागर के पहले गुरु पं. के. महावीर जी राजस्थान के ही थे जिनसे लता मंगेशकर, आशा भोंसले व अन्य कई सुप्रसिद्ध गायक समय समय पर तालीम लेते रहे | रवि के गाने के अंदाज़ में उस्ताद मेहदी हसन, अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन व कई प्रसिद्द गायकों का रंग देखा जा सकता है जिनकी जड़ें राजस्थान की हैं | उसके पूरे सांगीतिक वितान में राजस्थान की मिट्टी महकती है | रवि ने मुंबई में महावीर जी के घर पर रहकर उनसे विधिवत गुरु-शिष्य परम्परा के अंतर्गत शिक्षा ली |साथी रवि को कितने आयामों में याद किया जा सकता है ये तय करना बहुत मुश्किल है क्योंकि वो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे | मंच नाटक संगीत, नुक्कड़ नाटक का संगीत, एकल और समूह कत्थक नृत्य प्रस्तुतियाँ, नृत्य नाटिकाएं, जन आवाहन गीत, आधुनिक व प्रगतिशील छंद मुक्त कविताओं को संगीतबद्ध करना और गाना, ग़ज़ल, नज़्म, भजन, लोक संगीत, आदिवासी संगीत, बच्चों के लिए सांगीतिक रचनायें, ललित कलाओं में ध्वनित होते संगीत पर गहन मनन-चिंतन, टीवी, रेडियो रिकोर्डिंग, स्टूडियो रिकोर्डिंग और इन सब के साथ साहित्य का अध्ययन जैसे अनेक पक्ष हैं जो रवि के सम्रद्ध व्यक्तित्व को परिलक्षित करते रहेंगे |

धार्मिक नारों के ज़रिये उन्माद फैलाने के विरुद्ध रवि की प्रसिद्ध आवाहन गीत ‘ आज़ादी ही आज़ादी ’ आज सारे देश में विरोध का प्रतीक बन गया है जिसे पिछले वर्ष दिसंबर में दिल्ली में हुए समूहित बलात्कार और हत्या के विरोध में राष्ट्रपति भवन पर उमड़े जन सैलाब और हाल में ही एक पांच साल कि बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म के विरोध में एकत्रित जनता का मार्चिंग गीत भी यही ‘आजादी ही आज़ादी’ है जिसे रवि ने हिंदुस्तान के कोने-कोने तक पहुंचा दिया | साथी रवि नागर का ये आवाहन विरोध की रचनात्मक संस्कृति का प्रतिनिधि गीत है | रवि जैसे मौलिक संगीतकार-गायक, जुझारू रंगकर्मी, अदम्य जीवट से भरपूर और एक बहुत ही संवेदनशील व बेहतरीन इंसान को सही मायनों में श्रद्धांजलि तभी होगी जब आज के युवा संगीतकार, गायक, अभिनेता, जनांदोलनों से जुड़े साथी व अन्य विधाओं के से जुड़े युवा रचनाकार उनके पूरे जीवन और रचना संसार से प्रेरणा लेते रहें |

कार्यक्रम की कुछ अन्य तस्वीरें :

बच्चों को बिगाड़ने वाले पापा

-अजय आठले

(मुमताज भारती को छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य सम्मलेन में सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उनके सम्मान में पढ़ा गया प्रशस्ति लेख.)

ज की शब्दावली में कहें तो पेशे से ड्रेस डिजायनर मुमताज भारती उर्फ़ पापा अपने समय के बेहतरीन टेलर थे। पापा को कोट सिलने में महारत हासिल थी। उस ज़माने में जब कोट विशिष्ट लोग ही सिलवाने की हैसियत रखते थे पापा उनके कोट सिला करते थे और सार्वजनिक जीवन में बखिया भी उन्ही विशिष्ट जनो की उधेडा करते थे। ये अजीब अन्तर्विरोध था की सिलते भी वही थे और उधेड़ते भी वही थे। "तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही दवा देना" की तर्ज पर। उनकी इसी आदत पर कभी स्व. प्रमोद वर्मा जी ने उनपर एक कविता लिखी थी :

पापा , मै काटूँगा तुम सिलना
आओ हम दोनों मिलकर एक कोट बनायें
जिसे दुनिया को पहना सकें

अपने 75 वर्षीय जीवन में पापा ने बहुत से लोगों को बिगाड़ा। राजनीति से लेकर सांस्कृतिक मोर्चे पर नन्द कुमार साय पापा का शिष्य था और अपना राजनैतिक जीवन AISF से शुरू किया था। बाद में उसे अक्ल आ गयी, वह सुधर गया और आज वह BJP सांसद है। मगर बहुत से लोग नहीं सुधर पाए और अब सुधरने की उम्मीद भी नहीं है -अब आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमां होंगे?

पापा राजनैतिक और सांस्कृतिक दोनों ही मोर्चे पर लगातार सक्रिय रहे, जिसका खामियाजा यह हुआ की राजनैतिक लोग उन्हें संस्कृतिकर्मी मानते रहे और संस्कृतिकर्मी उन्हें राजनैतिक। पापा की कार्यशैली ही कुछ ऐसी रही। बादलखोल अभ्यारण्य के विरोध में चल रहे आन्दोलन, जिसका नेतृत्व मैडम मेरी कर रही थी पापा ने कविता लिखी थी:

मेडम मेरी मेडम मेरी
क्यों फिरती हो चोरी चोरी
जंगल जंगल झाडी झाडी
पगडण्डी से राज मार्ग तक
कहाँ नहीं है चर्चा तेरी

पापा स्वयं भी पगडंडियों के राही रहे हैं। राज मार्ग उन्हें कभी न भाया। यही कारण है की एक तीखापन उनके लेखों,उनकी कविताओं में तो दिखता ही है। उनके द्वारा बनाये चित्रों में भी दिखता है। पापा एक बेहतरीन चित्रकार भी हैं, पर उनके बारे में कहा जाता है की पापा यदि गुलाब की पंखुडियां भी बनायेंगे तो वह भी नुकीली और चुभने वाली होगी तथा लहूलुहान होने का डर बना रहेगा। हम लोग मजाक में कहते भी हैं की शायद यही कारण है की इतने वेलेंटाइन डे गुज़र गए और पापा किसी को गुलाब का फूल भी नहीं दे पाए । आज तक अविवाहित हैं और गाहे बगाहे अपना पसंदीद गीत गुनगुनाते हैं-मेरा जीवन कोरा कागज़ ,कोरा ही रह गया पापा अविवाहित जरूर हैं मगर उनका परिवार बहुत बड़ा है न जाने कितने लोगों के लिए वे कलेक्ट्रेट के चक्कर काटते ही रहते हैं न्याय दिलाने के लिये। 75 वर्ष की उम्र में भी पापा सार्वजनिक जीवन में आज भी सक्रिय हैं रायगढ़ के आसपास औद्योगिकीकरण के कारण हो रहे विस्थापन के विरोध में होने वाले हर आन्दोलन में पापा की सक्रिय भूमिका रहती है राजनीतिक जीवन से भले ही सन्यास ले लिया हो मगर सामाजिक जीवन में और सांस्कृतिक मोर्चे पर आज भी पापा युवाओं को बिगाड़ने के कार्य में सक्रिय हैं

75 वर्ष की उम्र में भी पापा सार्वजनिक जीवन में आज भी सक्रिय हैं। रायगढ़ के आसपास औद्योगिकीकरण के कारण हो रहे विस्थापन के विरोध में होने वाले हर आन्दोलन में पापा की सक्रिय भूमिका रहती है। राजनीतिक जीवन से भले ही सन्यास ले लिया हो, मगर सामाजिक जीवन में और सांस्कृतिक मोर्चे पर आज भी पापा युवाओं को बिगाड़ने के कार्य में सक्रिय हैं।

पापा ने रायगढ़ विधान सभा से चुनाव भी लड़ा था और तीसरे नंबर पर रहकर कांग्रेस को विजयी बनाया था-कांग्रेस वाले उनका उपकार माने या न माने अलग बात है। चुनाव के बाद चंदे से बचे पैसों से परिणामों के बाद एक भोज का आयोजन किया गया था, जिसे पापा ने नाम दिया था -पराजय का उत्सव। अपनी पराजय का उत्सव मनाना आसान नहीं होता उसके लिया पापा होना पड़ता है।

अब वे ज्यादा नहीं लिखते। अखबार में एक कॉलम लिखते थे। आनंद दुखदायी के नाम से अब नहीं लिख रहे हैं, मगर अब वे कार्टून बना रहे हैं स्थानीय अखबारों के लिए। शरीर अब थक चुका है, मगर तीखापन अब भी बरक़रार है और अभी भी सभ्य समाज को लहूलुहान करते हैं उनके कार्टून।

हमारे यहाँ जब सरकारों द्वारा किसी शिक्षक को इसलिए राष्ट्रपति पुरुस्कार दे दिया जाता है की उसने स्कूल न जाकर बहुत से बच्चों का भविष्य संवार दिया या साहित्य का पुरस्कार इसलिए दे दिया जाता है, क्योंकि उसने न लिखकर साहित्य की बड़ी सेवा की तब ऐसे में मुमताज भारती पापा को सम्मानित किया जाना उचित ही होगा, जिन्होंने कई पीढ़ियों के युवाओं को बिगाड़ने में अपने जीवन के 75 वर्ष लगा दिए।

पापा से कई बार हम कहते हैं कि "पापा आप विल-लिख जाएँ की आपका अंतिम संस्कार कैसे किया जाये नहीं तो हम परेशानी में पड़ जायेंगे। जीते-जी तो हमें बिगाड़ा ही जाने के बाद भी मुसीबत में डाल गए तो?" पापा कहते हैं, "चलो मै अपनी देह दान कर जाऊँगा मेडिकल कॉलेज को, पर कम्बखत वह भी तो नहीं बन रहा है!" तब सच कहता हूँ दोस्तों, मन ही मन हम मनाते हैं की ये कमबख्त मेडिकल कॉलेज न ही बने 25 साल और पापा शतायु हों, संघर्षरत रहे और बीच-बीच में गुनगुनाते रहें अपना पसंदीदा शेर:

बहुत मुश्किल है दुनिया का संवरना
ये तेरी जुल्फों का पेंचो ख़म नहीं है।

(लेखक वरिष्ठ रंगकर्मी व इप्टा की राष्ट्रीय कार्यसमिति में छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधि सदस्य है। उनसे athrat@rediffmail.com के जरिये संपर्क किया जा सकता है। डाक का पता है-अजय आठले, आठले हाउस, सिविल लाइन्स, रायगढ़, छत्तीसगढ़) 

Saturday, April 20, 2013

‘सामंती संस्कार से बढ़ी स्त्रियों के प्रति हिंसा’

कम्युनिस्ट नेता व स्वतंत्रता सेनानी महादेव नारायण टंडन की
पुण्यतिथि पर आयोजित संगोष्ठी में बोलते समीक्षक शकील सिद्दीकी
गरा। सामंती संस्कार हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों को पराजित करते रहे हैं। महिलाओं के प्रति सोच में आधुनिक परिवर्तन ही नहीं आया। आजादी के बाद से उनके खिलाफ 873 फीसदी हिंसा बढ़ी है। सम्मान से जीने का उनका बुनियादी अधिकार खतरे में है। यह कहना था प्रगतिशील हिंदी उर्दू समीक्षक शकील सिद्दीकी का, जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और कम्युनिस्ट नेता कामरेड महादेव नारायण टंडन की पुण्यतिथि पर आयोजित विचार गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।

‘स्त्रियों के प्रति हिंसा’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में सिद्दीकी जी ने कहा कि जरूरी है कि पुरुषों के साथ महिलाएं भी आजाद हों और समाज में बढ़ते अपराधों को रोकें। सांसद एसपी सिंह बघेल ने कहा कि सख्त कानून के साथ नैतिक मूल्यों की शिक्षा जरूरी है। स्त्रियों द्वारा स्त्रियों के प्रति अन्याय किया जाना उचित नहीं है। डा. अतुल सारस्वत, चौ. बदन सिंह, डा. शशि तिवारी, अरुण सोलंकी, सरोज गौरिहार ने कई मुद्दे उठाए। दयालबाग की शोध छात्रा नेहा शर्मा के हत्यारों को तुरंत पकड़े जाने और सख्त सजा दिलाए जाने के संबंध में सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी पास किया गया।

कार्यक्रम में बाल रोग चिकित्सक डा. जेएन टंडन, रमेश मिश्रा, चौ. उदयभान सिंह, गोविंद रजनीश, प्रो. वीके जैन, चौ. सुखराम सिंह, सोम ठाकुर, अमीर अहमद, रामस्वरूप दीक्षित, भारत सिंह, राजवीर सिंह राठौर, विजय शर्मा, नीतू दीक्षित ने कामरेड महादेव नारायण टंडन को श्रद्धांजलि अर्पित की। संयोजक जितेंद्र रघुवंशी ने राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन में उनके योगदान को याद किया।

स्रोत : अमर उजाला

Wednesday, April 17, 2013

छत्तीसगढ़ प्रलेस का तृतीय राज्य सम्मेलन 20 अप्रैल से

रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य प्रगतिशील लेख संघ का तृतीय राय सम्मेलन आगमी 20-21 अप्रैल को बिलासपुर में आयोजित किया जा रहा है । छ.ग. प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव प्रभाकर चौबे द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक इस दो दिवसीय सम्मेलन में चार सत्र होंगे। सम्मेलन का उद्धाटन सत्र 20 फरवरी को शाम 5:30 बजे बिलासपुर स्थित जाजोदिया धर्मशाला में होगा । राज्य सम्मेलन में प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव श्री अली जावेद विशेष रूप में उपस्थित रहेंगे । 

20 अप्रैल को उद्धाटन के दिन दोपहर में "मनुष्य जीवन का स्वप्न और वैश्विक यथार्थ" विषय पर गोष्ठी का आयोजन रखा गया है। इसमें  डॉ. जय प्रकाश,  डॉ. उषा आठले व  डॉ. विजय गुप्त अपने आलेख रखेंगे।
अगले दिन 21 अप्रैल 2013 की सुबह 9.30 बजे से 12.30 दोपहर तक विचार सत्र का विषय होगा "नयी भूमिका की तलाश।" इसमें श्री रफीक खान,  श्री अशुतोष तिवारी व श्री गोरे लाल चंदेल अपने आलेख रखेंगे।

अपरान्ह 2 बजे से 5 बजे तक सांगठनिक सत्र इकाइयों की रिपोर्ट, महासचिव का प्रतिवेदन, एक्शन प्लान पर चर्चा प्रस्ताव, संगठन का पुनर्गठन व धन्यवाद ज्ञापन होगा।

उधर भिलाई से छत्तीसगढ़ इप्टा के महासचिव राजेश श्रीवास्तव ने जानकारी दी है कि 20 तारीख की संध्या प्रलेस के व्यस्त कार्यक्रम से समय निकाल कर छत्तीसगढ़ इप्टा की समस्त इकाइयों के सदस्य आपस में सांगठनिक चर्चा करेंगे। इस मीटिंग के लिये उनके द्वारा एक परिपत्र पहले ही जारी किया जा चुका है।

साथियों की सुविधा के लिये बिलासपुर में सम्पर्क नम्बर हैं - 
1. श्री नथमल शर्मा (अध्यक्ष) - 094255-30655
2. श्री शोभित वाजपेयी - 09425230007
3. श्री रफीक खान - 97701-78617

Monday, April 8, 2013

“Chaarvaak” in JNU's Annual Theatre Festival

IPTA JNU unit performed its latest play “Chaarvaak” on 1st April 2013 in JNU on the occasion of Annual Theatre Festival. The play was about the Chaarvaaka philoshophy and his struggle of life against the superstition in Hindu philosophy and against the patriarchy.

The play was watched by around 500 hundred audience with many professors and other respected guests. After the play audience gave a huge appreciation which shows the success of the play and gives us courage to do better in future.

IPTA JNU unit is also organized a musical evening with a group named “SWAANG” a progressive protest music group from Mumbai on 3rd April 2013. The group comprises many former IPTA JNU members.

The play Chaarvaak narrates the story of a philosophical tradition in India that has consistently challenged the epistemological foundations of the Vaidik tradition which justifies regressive systems of Varna (caste) and Patriarchy. It constructs a life story of Chaarvaak (a philosopher of Lokaayata tradition about whom very little is known) to outline the nexus between the religious apparatus and political institutions that create and sustain oppressive social systems. Through Chaarvaak’s confrontations with family, friends, religious leaders and politicians the play presents a scientific critique of the social, political and cultural system that has prevailed in India for hundreds of years and exposes its repressive and deceptive character often referred to as ‘inclusiveness’ and ‘tolerance’.

Saturday, April 6, 2013

आगरा में विश्व रंगमंच दिवस

गरा। आगरा की विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं की ओर से 26 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस तथा होली मिलन समारोह का साझा आयोजन स्थानीय हरियाली वाटिका में किया गया। इप्टा के राष्ट्रीय महामंत्री जितेन्द्र रघुवंशी ने दारियो फो के अंतरराष्ट्रीय संदेश का पाठ किया।

कार्यक्रम की शुरूआत दयालबाग विश्वविद्यालय की शोध छात्रा नेहा शर्मा को श्रद्वांजलि अर्पित करने के साथ हुई, जिसकी हाल में हत्या कर दी गयी थी। महिलाओं के सम्मान के प्रति चेतना जगाने व होली सादगी से मनाने का संकल्प लिया गया। वक्ताओं ने रंगकर्म की मौजूदा चुनौतियों पर चर्चा की। विविध सामयिक कार्यकमों की प्रस्तुति हुई। संयोजक अनिल जैन व प्रमोद सारस्वत, स्वागताध्यक्ष भारत भूषण व शिरोमणि सिंह थें। संचालन शिवेन्द्र मेहरोत्रा ने किया।

Friday, April 5, 2013

World Theatre Day at Kolkata

World Theatre Day was celebrated at Kolkata on 29 th March jointly by Indian People's Culture Association (IPCA) & other organizations.

A colourful procession took place from Kolkata-Hazra Road Crossing to Muktnamcha.It was followed by a meeting where the speakers from various groups spoke on present challenges before the contemporary theatre and the society.IPTA National Vice-President Samik Bandhyopadyaya initiated the delebrations and the other speakers included Chandan Sen,Usha Ganguly,Ashok Mukhopadhyaya.Pabitra Sarkar presided over the proceedings.

Short plays were also staged on the occasion including IPCA's play against fundamentalism dedicated to the Shabag movement of Bangladesh.

-Amitava Chakraborti

इप्टा मथुरा ने मनाया विश्व रंगमंच दिवस व हिंदी रंगमंच दिवस

भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) मथुरा द्वारा 3 अप्रैल को हिंदी रंगमंच दिवस पर एक गोष्टी का आयोजन किया गया और बच्चों को नाट्य प्रशिक्षण दिया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ रंगकर्मी देवेन्द्र पाल ने हिंदी रंगमंच के सृजन  तथा उसकी आज की स्थिति के बारे मैं जानकारी दी।

श्रीमती प्रेमलता राजपूत ने कहा की आज हिंदी नाटक कम लिखे जा रहे है, लेकिन हमें आधुनिक शैली का प्रयोग कर वर्तमान समस्यायों की अभिव्यक्ति नाटक के जरिये करनी चाहिये व उन्हें आम जनमानस तक पहंचाना चाहिये। सौरभ बंसल ने कहा की आज नाटक नहीं हो पा रहे है ये आज के समय की बहुत बड़ी समस्या है। उन्होंने नाट्य विधा को बढ़ावा देने के लिए बच्चों को नाट्य प्रशिक्षण दिया और कहा की आगामी ग्रीष्म कालीन अवकाश पर 15 दिन की कार्यशाला का आयोजन किया जायेगा जिससे बच्चों को नाट्य विधा का ज्ञान हो सके।

प्रशिक्षण मैं मुख्य रूप से राहुल बघेल, संदीप कुमार, मनीष, अरुण, आकाश, भीम, रजत, अंकित, शिखर, देवेश, भूपेंद्र, नीरज, अतुल, आकाश शाक्य, सचिन, अंकुर, हर्ष महरा, राहुल, जतिन, शीतल, अंशिका, निधि, मैना, नीशा, प्रिया, सुरेन्द्र, चंद्रभान आदि  उपस्थित थे।

इससे पूर्व  मथुरा  " इप्टा " एवं स्वस्तिक रंगमंडल ने विश्व रंगमंच दिवस पर  रंग पर्व का उत्सव होली और रंगमंच दिवस कार्यक्रम एक साथ मनाया। रंगमंच दिवस प्रोग्राम में इप्टा मथुरा के रंगकर्मी और निर्देशक देवेन्द्र पाल, सचिव सौरभ बंसल, साजन चतुर्वेदी, अनिल स्वामी तथा स्वस्तिक रंगमंडल के वरिष्ठ रंगकर्मी तथा निर्देशक संदीपन नागर, डॉ. अजय नागर, सी. पी. शर्मा, जगदीश भाटिया, आदि ने अपने अपने विचार प्रस्तुत किये और रंगकर्मियों ने  कविता व लतीफों के साथ हास- परिहास का वातावरण पैदा किया ।अन्य रंगकर्मियों मैं प्रमुख रूप से थे कन्हैया उपाध्याय, देवेश कुमार, नीतू, आशुतोष गर्ग, रूपकिशोर, सुभाष सैनी, राहुल आदि मौजूद थे।

Wednesday, April 3, 2013

3 अप्रेल :हिंदी रंगमंच दिवस

भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने अपने निबन्ध 'नाटक'(1884)में लिखा कि "हिंदी भाषा में जो सबसे पहला नाटक खेल गया,वह (शीतला प्रसाद त्रिपाठी कृत) 'जानकी मंगल' था ." यह नाटक बनारस में चैत्र शुक्ल 11,सं 1925 अर्थात 3 अप्रेल 1868 को मंचित  हुआ था . 'इन्डियन मेल' में इसके  प्रथम अभिनय के विवरण का उल्लेख आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में भी किया है.इसी  आधार पर डा.शरद नागर ने ब्रिटिश म्यूजियम,लन्दन से 'एलेन्स इन्डियन मेल' के उक्त समाचार की प्रतिलिपि मंगायी और 'धर्मयुग' में प्रकाशित अपने लेख में इस तिथि की पुष्टि की .इसे प्रमाण मान कर 1968 में नागरी प्रचारिणी सभा,काशी  तथा हिंदी क्षेत्र की सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्थाओं ने हिंदी रंगमंच की शतवार्षिकी मनायी .यह बात अलग है कि  हिंदी की बोलियों में लोकनाट्य की परंपरा बहुत पुरानी है. 

(स्रोत : डा . अज्ञात का ग्रन्थ "भारतीय रंगमंच का विवेचनात्मक इतिहास",1978)

प्रस्तुति:जितेन्द्र रघुवंशी

Tuesday, April 2, 2013

'जूते का अविष्कार', 'डाकबाबू का पार्सल' और 'विटृठला'

मणिमय मुख़र्जी

इप्टा भिलाई ने मार्च में तीन महत्वपूर्ण आयोजन किये : 20 मार्च विश्व बाल एवं तरुण रंगमंच दिवस पर बच्चो का नाटक ,23 मार्च शहादत दिवस पर विचार गोष्ठी  एवं 27 मार्च -विश्व रंगमंच दिवस के उपलक्ष्य में 24 मार्च को दो नाटको का प्रदर्शन, क्योकि 27 को होली थी ।

'जूते का अविष्कार' का प्रभावी मंचन 
20 मार्च को लिटिल इप्टा के रंगकर्मियों ने विश्व बाल एवं तरुण रंगमंच दिवस के उपलक्ष्य में प्रसिद्ध लोक कथा ''जूते का अविष्कार '' का मंचन नीशू पाण्डे के निर्देशन में प्रस्तुत किया। नेहरु हाउस से.- 1 भिलाई के मुक्ताकाशी रंगमंच में उपस्थित दर्शको की अच्छी खासी संख्या ने मुक्त कंठ से बच्चो की प्रस्तुति की सराहना की । 

नाटक में राजा के चरित्र में चित्रांश श्रीवास्तव एवं रानी आरती ने अपनी अदभुत अभिनय-क्षमता का प्रदर्शन कर नाटक को और अधिक मनोरंजक बनाया। अन्य पात्रो में निकिता , अंकित , शैलेन्द्र , डेनिअल , रवि, बिट्टू , दीपेश , आशीष, मोना, श्रुति, विशाखा, नुपुर, अदिता, अंकिता, संगीता, अनीश, अन्नू आदि थे। नाटक के प्रारंभ में संस्था के रणदीप अधिकारी ने विश्व बाल एवं तरुण रंगमंच दिवस`में जारी मिखाइल मोरपुर्गो का संदेश का वाचन किया। उक्त दिवस पर बड़ी मात्रा में बच्चो ने रंगमंच से जुड़ने की अपनी तीव्र लालसा दिखाई जो निश्चय ही बहुत आशाजनक है ,जरूरत है उनकी इस इच्छा और लालसा को सही ढंग से संजोकर सकारात्मक और प्रगतिशील कला कार्यो में लगाया जाये ।

शहादत दिवस पर विचार गोष्ठी 
23 मार्च शहीदेआजम भगत सिंह ,राजगुरु ,सुखदेव की शहादत को याद करने इप्टा भिलाई ने एक विचार गोष्ठी का आयोजन नेहरु हाउस में किया। गोष्ठी का विषय ''आज का समय और भगत सिंह ''था । गोष्ठी में भिलाई की कई रंग संस्थाओ के युवा रंगकर्मियों ने भागीदारी की। 

मुख्य अतिथि एवं वक्ता इप्टा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री सुभाष मिश्र थे, जिन्होंने भगत सिंह के विचारो को बहुत ही रोचक और सरल ढंग से आज के सन्दर्भ से जोड़ते हुये युवाओ को अध्ययन करने और साहित्य पढने की भगत सिंह की लालसा के बारे में बताते हुये कहा की जेल में होने के वावजूद अपने मित्र को इंग्लैंड से पुस्तक भेजने हेतु पत्र लिखा करते थे। आज जब हम आजाद है सारी सुबिधाये है ,एक क्लिक में कुछ भी इंटरनेट पर देख सकते है फिर भी आज के युवा में अध्ययन के प्रति रूचि कम होती नजर आती है। उन्होंने युवाओ को उन्नत तकनीको का भरपूर उपयोग अपनी सकारात्मक सृजनशीलता को बढ़ाने और देश के विकास में लगाने का आव्हान किया .सुभाष जी ने कई संदर्भो में भगत सिंह द्वारा लिखे गये पत्रों का भी जिक्र किया । 

उक्त अवसर पर अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध कथाकार श्री लोकबाबू ,विशेष अतिथि प्रो. जयप्रकाश ने भी अपने उदगार व्यक्त किये। अतिथियों का स्वागत संस्था की अध्यक्षा श्रीमती सुचिता मुख़र्जी एवं सचिव नीशू पाण्डे ने किया। संचालन इप्टा के राष्ट्रीय सहसचिव राजेश श्रीवास्तव एवं आभार प्रदर्शन मणिमय मुख़र्जी ने किया। गोष्ठी के अंत में मुट्ठी संस्था के रंगकर्मियों ने गुलाम हेदर के निर्देशन में भगत सिंह नाटक के कुछ अंशो का पाठ किया .

विश्व रंगमंच दिवस में दो नाटको का मंचन
24 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस के उपलक्ष्य में नेहरु हाउस के मुक्ताकाशी रंगमंच में दो नाटको का प्रदर्शन किया गया। पहला नाटक इप्टा भिलाई की प्रस्तुति द्रोण वीर कोहली की कहानी पर आधरित 'डाकबाबू का पार्सल' था, जिसे लिखा और निर्देशित किया अशफाक खान ने। यह नाटक ग्रामीण युवकों का शहर और शहरी युवको का विदेश पलायन पर चिंता और प्रश्न खड़ा करता है।  

नाटक में रणदीप अधिकारी ,राजेश श्रीवास्तव ,मणिमय मुख़र्जी ,नीशू पाण्डे ,देवनारायण ,शैलेष कोडापे, जगन्नाथ ,राज ,गोविन्द ,भावना सिंह ,नीतू जैन ,सुचिता मुख़र्जी ,रोशन घडेकर ,किशोर, जागेश्वर ,चित्रांश डेनियल ,अनीष ,दीपेश ,अंकित ,पी ० वरुणा आदि ने अभिनय किया तथा भारत भूषण परगनिहा ,सुनील मिश्रा ,सुमय मुख़र्जी ने संगीत दिया। प्रकाश व्यवस्था शानिद अहमद ,अशफाक खान एवं विशेष सहयोग चारू श्रीवास्तव ,अजय शर्मा ,शिशिर श्रीवास्तव ने किया। नाटक की स्वाभाविक गति को दर्शको ने बहुत पसंद किया .

दूसरा नाटक के रूप में इप्टा की सहयोगी संस्था ''अंकुर ''ने विजय तेदुलकर के नाटक ''विट्ठ्ला ''का प्रदर्शन वल्देव सिंह पाटील के निर्देशन में किया।  नाटक में प्रेत बने वीर सिंह और विलास ने पूरे समय दर्शको को बांधे रखा। फेंटेसी में चलते इस नाटक ने भी दर्शकों का खूब मनोरजन किया। नाटक में सुलेमान खान ,महेश कुमार भारती ,सुमन ,एरिक ,जॉन ,अरविन्द ,राव आदि ने अपनी भूमिकाओ के साथ न्याय किया। कुल मिलाकर इप्टा भिलाई ने उक्त तीन कार्यक्रमों से न सिर्फ अपनी वल्कि भिलाई के रंगकर्म की भी सक्रियता बढाई .