Tuesday, July 25, 2017

अपने अभिनय से फिर 'काल तुझसे होड़ है मेरी' लिख रहे हैं आलोक चटर्जी

-पवन करण
आज से लगभग दस—बारह बरस पहले 'तानसेन संगीत समारोह ग्वालियर' में पंडित जसराज के गायन में खोये हुए मुझे लगा जैसे आसमान की तरफ अपना मुंह उठाकर वे गा नहीं रहे बल्कि समय को चुनौती दे रहे हैं.....यही बात कल यहां नटसम्राट में आलोक चटर्जी को अभिनय करते देखकर तीब्रता से महसूस हुई...जैसे वे काल से होड़ ले रहे हों। 'काल तुझसे होड़ है मेरी' ये कविता प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह की है लेकिन आलोक चटर्जी को मंच पर देखकर लगता है जैसे वे इन दिनों अपने अभिनय की कलम से इसे पुन: लिख रहे हैं। नाटक समाप्त हो जाने के बाद आलोक चटर्जी से बात तो नहीं हो सकी मगर मिलाने के नाम पर उनका हाथ अपने हाथों में लेकर उनकी उस मिट्टी को टटोलने की इच्छा जरूर थी जिससे वे बने हैं

कोई अभिनेता अपने अभिनय से एक बेहद पीड़ादायी, संवेदनशील और मार्मिक नाट्य—कथानक पर खास तौर से खासी संख्या में सभागार में उपस्थित युवा दर्शकों को इस हद तक उन्मादित कर सकता है कि वे उसके अभिनय की प्रशंषा में बजने वालीं तालियों को क्रम न टूटने दें ये स्मृतिजन्य दृश्य भी कल यहां देखने को मिला। ऐसा मैंने दूसरी बार देखा...पहली बार तब जब जब इंदिरा गांधी आदिवासी कला संग्रहालय भोपाल में आगरा बाजार के मंचन के बाद मैंने तालियों की अटूट गड़गड़ाहट के बीच हबीब तनवीर को हाथ जोड़े खड़े देखा था।

कल सभागार में कई दर्शकों की आंखें भी झर रही थी। स्वयं के द्वारा अपने आसुओं को  ताली बजाते पकड़ा मैने भी । निसंदेह ये कथ्य से अधिक आलोक चटर्जी के अभिनय के प्रभाव से निकले थे। उर्दू के सम्मानीय शायर शकील ग्वालियरी का एक शेर है

बजा रहा था साज कोई बंद कमरे में
लरज रही थीं छतें सात आसमानों की
 
कल आलोक चटर्जी नाट्यमंदिर ग्वालियर में अपने अभिनय का साज बजा रहे थे और सभागार की छत ही नहीं दीवारें भी लरज रही थीं। लगा जैसे दर्शकों को ही नहीं सभागार की कुर्सियों, परदों और दीवारों को भी कई बरसों से इस बात की प्रतीक्षा थी कि उसके ग्रीनरूम से मेकअप कर आलोक चटर्जी मंच पर आयेगें और अपने अभिनय से उन्हें नया जीवन देकर चले जायेंगे। और कल ऐसा हुआ भी।

Wednesday, July 19, 2017

अशोकनगर में नाट्य-संगीत की प्रस्तुति और कार्यशाला का समापन

-सीमा राजोरिया
भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) की अशोकनगर इकाई ने पांच दिवसीय “ नाट्य – संगीत “ पर एकाग्र कार्यशाला का आयोजन किया और पांचवे दिन कार्यशाला के दरम्यान तैयार संगीत रचनायों का प्रदर्शन स्थानीय युवराज होटल के हॉल में किया गया | इस कार्यशाला का संचालन राष्ट्रीय नाट्यविद्यालयदिल्ली की रिपेटरी से जुड़े युवा रंगकर्मी मोहन सागर ने किया | इस कार्यशाला में संगीत और नाटक से जुड़े 20 से ज़्यादा युवतर प्रतिभागियों ने इतने कम समय में जो प्रस्तुति दी उसने  खचाखच भरे सभागार में बैठे दर्शकों को अभिभूत कर दिया |

 हिन्दी नाटकों में नाटक की एकरसता दूर करने , गति प्रदान करने , नाटक के सम्प्रेषण   में गीत संगीत का प्रयोग किया जाता है। इस संगीत की अपनी अलग प्रकृति होती है  | नाट्य संगीत की इस कार्यशाला में अपने नाट्य अनुभव से मोहन सागर ने कार्यशाला में गीत रचनायों पर इप्टा के कलाकारों के साथ अभ्यास किया और कार्यशाला के समापन पर इनका प्रदर्शन किया गया , जिसे देख दर्शक एक नये कला अनुभव से परिचित हुए |

 कार्यशाला में मोहन सागर के साथ कैलाश शर्मा , सिद्धार्थ , हर्ष और दिनेश योगी ने वाद्य यंत्रो के साथ संगत की और प्रतिभागी कलाकार आदित्य रूसिया , मयंक जैन , समीक्षा , अनुपम तिवारी , सत्यभामा ,  शिवानी , सौरभ , दीपिका , कबीर , दर्श , दिनेश , आयशा , सलोनी , रूपाली , , खुशी , अनुष्का , सृष्टि आदि कलाकारों ने सहभागिता की  | कार्यक्रम का संचालन पंकज दीक्षित ने किया और इप्टा अशोकनगर की अध्यक्ष सीमा राजोरिया ने रंग संगीत पर आधार वक्तव्य दिया | आयोजन की सफलता में रतनलाल , संजय माथुर , राजकुमार विश्वकर्मा आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही | शहर के लिए एक नये तरह की संगीत प्रस्तुति के साथ नाट्य – संगीत कार्यशाला का समापन हुआ |                  

Monday, July 10, 2017

बशीरहाट और बालूचरी : बकलम नूर ज़हीर

-नूर ज़हीर 
दोस्तों,
कुछ अजीब सा घटा है मेरे साथ. पिछले महीने बशीरहाट को केन्द्रित करके मेरी एक कहानी "बालूचरी" कथादेश में छपी.
बशीरहाट मुझे मेरी सास ले जाती थी, हर दुर्गा पूजा से पहले. वे सब बहुओं, बेटियों, नाते रिश्तेदारों को देने के लिए तांत की साड़ियाँ खरीदती;
बशीरहाट में साड़ियाँ सस्ती भी मिलती और बहुत तरह की भी; आसपास के गाँवों में तांत का काम होता जो ज़्यादातर मुसलमान जुलाहे करते.
वहां के भाईचारे को देख और समझ कर कई साल बाद यह कहानी लिखी. पाठकों की प्रतिक्रिया मिलनी अभी ख़तम भी न हुई थी की खबर मिली की बशीरहाट जल रहा है और यह सम्भावना है की सारा बंगाल ही भड़क पड़े.
फिर यह भी खबर है की दंगे फ़ैलाने और साम्प्रदायिकता की आग लगाने में कुछ राजनीतिक गुटों का जो असल में देश दुश्मन ताकते हैं हाथ है और बशीरहाट के लोग मिलकर इसका विरोध भी कर रहे हैं और अपनापन बनाये रखने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.
जहाँ लोग मिलजुल कर रहते हैं, नफरतों को जड़ नहीं पकड़ने देते, गुड से ज़हर को काटते हैं वही मेरा बशीरहाट है, वही मेरा भारत है!
कहानी पढियेगा और बताइयेगा!
बालूचरी
करम अली को अपनी आँखों यक़ीन नहीं हो रहा था। उस जैसे ग़रीब तांती के दस्तरखान पर इतने पकवान! इतनी भेंट तो कभी किसी ने नहीं दी; शायद आजतक कोई गाहक, इतना अमीर नहीं आया जितना यह सामने बैठा खरीदार , जो एक हाथ से दाढ़ी सहला रहा था और दूसरे से तस्बीह फेर रहा था। इसे कैसे पता चला? किसने इसे खबर दी होगी ? सवाल दिल में आते ही अकरम अली ने ग़ुस्से से अपने बड़े बेटे शरीफुद्दीन की तरफ देखा जो बाप से आँखे चुराकर उस अरब शेख की चापलूसी में लगा हुआ था. वैसे सुलगते लोबान की खुशबू और नई बालूचरी साड़ी की खबर फैलते देर नहीं लगती. बशीरहाट में सभी जानते थे अकरम ने एक नई बालूचरी साड़ी तैयार की है, लेकिन इसकी खबर कलकत्ता और इस शेख तक पहुंचाने की क्या ज़रूरत थी?
अपनी ही लाइ हुई, आगे बढ़ी मिठाई की प्लेट को इशारे से इंकार करते हुए शेख ने मामूली मलमल में लिपटी हुई बालूचरी की तरफ हाथ बढ़ाया। अकरम अली ने ढंकी हुई साड़ी पर हाथ रखा। उसका सारा जिस्म जैसे झनझना उठा। कितनी आस से उसने इस साड़ी को करघे पर चढ़ाया था । सबसे नज़र बचाकर, अपनी बीवी के ज़ेवर बेचकर मुर्शिदाबाद गया था, रेशम के कोये खरीदने। उसने सोचा था खदीजा को तो मरे चार साल होने को आये, अब उसके ज़ेवर रखने से क्या फ़ायदा ? एक एक रेशम के कोये को उसने अपने सामने बंटवाया था और तार बनवाये थे. जब रेशम के धागे बन गए तब रंगाई में कितनी एहतियात बरती थी उसने। तभी तो ऊपर का मलमल हटाकर, पहली तह खुलते ही जैसे ही पल्लू सामने आया आसपास खड़े लोगो की सांस थम गई और शेख के मुंह से यक ब यक निकला "सुभांनल्लाह।" 
अकरम अली के तीनो बेटों की बांछे खिल गई --शेख़ फंस गया!
कांपते हाथों से अकरम अली ने साड़ी की एक एक परत खोलनी शुरू की। हर तह के साथ यादों का एक काफिला जुड़ा हुआ था -- नीले रंग पर उसने कितनी बहस की थी ---आकाश नील, समुन्दर नील, शंख नील या फिरोज़ी नील ! तंग आकर ग़ुलाम नबी रंगरेज़ ने कहा था---अरे बाबा मोर के पंखों में इतने नील होते हैं क्या?
अकरम अली हंस पड़ा था "अरे इतने नील नहीं होते तो मोर नाचता क्यों है ? क्या मोर बादल देखकर नाचता है? बेवकूफ, वो अपने रंग दिखाने लिए इतराता है!"
"तो नाचता मोर बनाना ज़रूरी है क्या?" ग़ुलाम नबी ने आगे हुज्जत की। 
"वाह ! जो नाचे न वह मोर काहे का, वह तो कौआ हुआ। " 
बालूचरी बनाना कोई ख़ाला जी का घर नहीं है इसीलिए बस दस या बारह साड़ियां ही बनाता है अकरम अली साल भर में। ज़्यादातर साड़ियां दुर्गा पूजा के लिए खरीदी जाती हैं। आस पास की सार्वजनिक पूजा कमिटियों से लेकर कलकत्ता तक की पूजा कमिटियों में होड़ लगी रहती है ; अकरम अली की बनाई बालूचरी हाथ लग जाए और पूजा में स्थापित होने वाली दुर्गा ठाकुर के रूप को चार चाँद लग जायें। पूजा पंडाल में आने वाले लोग भी झट पहचान जाते और एक दुसरे से कहते ---'अकरम अली तांती की साड़ी है ना ?' अकरम का सीना गर्व से फूल जाता I लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं दिल में एक काँटा सा चुभता रहता। उसने तो साड़ी माँ को बेचीं है। भेंट तो उस भक्त ने की जिसने उसके दाम चुकाए। फिर वह दिल को समझाता और वादा करता, एक साड़ी वह ऐसी बनाएगा जो अपने आप में एक मिसाल होगी; बेषकीमती! नायाब! कारीगरी और कला की ऐसी मिसाल जो खुद अकरम अली के हुनर को पार कर जाएगी, वह हाथ की नफासत उसमे दिखेगी जो कला का दर्जा पायेगी। वह साड़ी जो वह देवी को बेचेगा नहीं; देवी को भेंट करेगा ! 
ढब की आवाज़ से अकरम अली का ध्यान टूटा. सामने एक हज़ार के नोटों का बण्डल पड़ा था। जल्दी जल्दी तीन और बण्डल तख़्त पर गिरे. एक लाख से ज़्यादा साडी का दाम नहीं था। यह तो चार लाख थे। उसके दिल में एक टीस सी उठी। यही रुपये पांच साल पहले मिल गए होते तो खदीजा बच जाती। न उसकी जान बचा पाया न ही उसकी ख्वाहिश पूरी कर पाया। बेचारी दिल में बालूचरी पहनने की आस लिए इस दुनिया से चली गई। शेख ने एक और गद्दी उसकी तरफ बढ़ाई। उसके पास खड़ा उसका सेक्रेटरी बोला "यह तुम्हारी बख्शीश है, तुम्हारे हुनर और मेहनत की दाद दे रहे हैं शेख !"
"लेकिन मोहतरम, आपके देश में तो औरतें साड़ी पहनती नहीं। आप इसका क्या करेंगे ?"
शेख सवाल समझ कर मुस्कुराया "अगले महीने मेरी शादी है; हम लोगों में लड़की के लिए लड़के वालों की तरफ से अबाया भेजा जाता है। इस साड़ी को काटकर अबाया बनेगा; पल्लू से नक़ाब और ऊपर वाला हिस्सा। बहुत खूबसूरत लगेगा इसका अबाया; शायद हमारी बीवी इसे पहली रात को ही पेहेनना चाहे। "
"आप मेरी साड़ी पर कैची चलवाएंगे?"
"काटे बग़ैर तो बुर्का नहीं बन सकता।" शेख अपनी होने वाली बीवी के लिए बहुत से कीमती तोहफे खरीद रहा था। बंगाल की नायाब सोने की नक्काशी के ज़ेवर खरीदने कलकत्ता आया था। वहीं उसे इस साडी की खबर मिली थी और इसी की लालच में इतनी दूर बशीरहाट आया था। सौदा हो गया था अब बेकार बातों में वक़्त गवाना उसे खल रहा था.
अकरम अली खड़ा हो गया। सबको नज़र भरकर देखा और बोला "बुर्का तो तन ढंकने के लिए होता है। "
"सभी कपडा तन ढंकने के लिए होता है." शेख ने दुभाषिये के ज़रिये जवाब दिया।
"सभी का तो मैं नहीं जानता, साड़ी तन ढंकने के लिए नहीं होती."
"तो फिर किसलिए होती है ?" शेख ने तंज़ से सवाल किया।
"सदियों पहले इंसान जानवर की खाल और पेड़ की छाल से भी तन ढँक लेता था. इतना बेहतरीन सूत और रेशम, ऐसे ऐसे रंग, इतनी कारीगरी, ऐसे नमूने ईजाद करने की क्या ज़रूरत थी? नहीं शेख़ साड़ी तन ढंकने के लिए नहीं, जिस्म का हुस्न उभारने के लिए होती है। साड़ी पल्लू को आँचल करके सिर ढंकते हैं ताकि वह बार बार फिसले और काले बालों की घटा लहरा ये और उसमे खिंची हुई सीधी मांग जैसे बिजली का कौंधा ! पल्लू कंधे पर यूँ डाला जाता है ताकि बार बार ढलक जाये और सामने वाले की नज़रे गले से गुज़रती, छाती के उभार से होती, कमर के ख़म पर रूकती, नितम्बो की गोलाइयों पर से फिसलती धड़ाम से ज़मीन पर आ गिरे।”
कुछ समझकर कुछ न समझकर शेख हंसा "तुम तो तांती काम और शायर ज़्यादा मालूम होते हो। इसीलिए औरतों के पहनने की चीज़ बनाते हो , आशिकमिजाज जो ठहरे। "
"जी हाँ सुनते हैं पहले यूनान और रोम के मर्द भी साड़ी जैसा लिबास पहनते थे; लेकिन मर्दों का सीधा सपाट, लठ जैसा शरीर साडी की ताब क्या लाता ? मर्दों से साडी कबकी छूट गई, औरतें आजतक पेहेन रही हैं। "
"खैर वह सब मैं नहीं जानता , हाँ तुम्हारी साड़ी बेजोड़ है। मेरी बीवी इसका अबाया पहनकर बहुत खुश होगी। "
"मैं अपनी साड़ी आपको नहीं बेचूंगा! "
अकरम के छोटे से घर का आँगन खचाखच भरा हुआ था। बशीरहाट में कभी मर्सिडीज़ बेन्ज़ देखी नहीं गई थी। अंदर हो रही बातचीत को सब दम साधे सुन रहे थे। जैसे ही अकरम अली ने साड़ी न बेचने का ऐलान किया बाहर जमा भीड़ जैसे अचानक फट पड़ी; जितने मुह उतनी बात। एक पल को तो शेख़ भी हक्का बक्का रह गया फिर संभलते हुए बोला "क्या कीमत हमने काम लगाई है?"
अकरम कुछ पल चुप रहा फिर साड़ी पर हाथ फेर और उसे बहुत संभाल कर मलमल में लपेटते हुए बोला "यह साड़ी मेरी रूह है शेख साहब और रूह को काट फाड़ कर, टुकड़े टुकड़े नहीं किया जाता, सुइयाँ चुभाकर छलनी नहीं करते आत्मा को मोहतरम!"
"क्या कह रहे हो अब्बा ?" अकरम का दूसरा बेटा करीमुद्दीन बोला। "इतना पैसा तो हमने कभी देखा भी नहीं है!"
"चुप रह कूढ़ कहीं के. कितना तुझे अपना हुनर सिखाने की कोशिश की पर रहा तू जानवर का जानवर ही। तांत और रेशम आंकना तो दूर की बात तुझसे तो करघे पर बैठा भी नहीं जाता। आधे घंटे में ही कहता है 'हाय हाय मेरी कमर दुःख रही है ‘ अरे कमर तोड़े और आँखे फोड़े बिना कहीं बालूचरी बनती है ? "
"लेकिन बनाई तो बेचने के लिए है न?" शेख के सेक्रेटरी ने पूछा।
"आजतक जितनी साड़ियां बनाई सब बेचीं; यह नहीं बेचूंगा। यह साड़ी मैंने माँ दुर्गा के लिए बनाई है।”
"यह कौन हैं ?" शेख ने शायद माँ दुर्गा को कोई दूसरा, ज़्यादा मालदार गाहक समझा।
"अब्बा, देवी को पहनाई गई साड़ी भी तो बर्बाद ही होती है न। ठाकुर के साथ ही विसर्जन हो जाता है साड़ी का। "
ज़ोर की तड़ाक की आवाज़ आई और शमसुद्दीन गिरते गिरते बचा "खबरदार जो काफिरों जैसी बाते मुंह से निकाली। बेटी को सजा संवार कर ही तो ससुराल भेझा जाता है। मेरी बनाई हुई साड़ी पहनकर, दस दिन से बिझुड़े शिव को दुर्गा रिझाती है। तभी तो तप भांग होता है महातपस्वी का, सब मेरी बनाई हुई साड़ी के कारण ही तो। "
"इतनी साड़ियां एक साथ पहनती है देवी दुर्गा?' शरीफउद्दीन ने गाल सहलाते हुए पूछा।
"कितनी पहनती है, कैसे पहनती है, क्यों पहनती है यह तो देवी ही जाने। मैं बस इतना जानता हूँ की मेरी बनाई साड़ी बहुत पसंद करती है माँ, इसीलिए तो हर साल से बेहतर साड़ी बन जाती है, देवी माँ की दया से। "
शेख उठ खड़ा हुआ. ग़ुस्से से उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। "तुम मुसलमान होकर भी देवी देवता को मानते हो-----ताज्जुब है!"
अकरम अली के चेहरे पर न घुसा था, न नफरत , न नाराज़गी न हिकारत. एक मासूम सी ख़ुशी उसके चेहरे पर खेल रही थी, जैसी कोई बच्चा, अपने घर के रोशनदान में दिए चिड़िया के अण्डों में से बच्चे निकलते, बड़े होते और अंत में पहली उड़ान भरते देख रहा हो। मलमल में लिपटी बालूचरी साड़ी को अपने सीने से लगाते हुए वो पूरे ऐतमाद से बोला "आप इंसान होकर भी कला और फ़न का मर्म नहीं समझते ---ताज्जुब है!"

नूर ज़हीर 
फ़ोन : 9811772361

Wednesday, June 28, 2017

परमाणु रिसाव के ख़तरों से आगाह करती एक नाट्य प्रस्तुति

-सारिका श्रीवास्तव

इंदौर। 11 मई 2011 में जापान के फुकुशिमा में सुनामी के बाद टूटे परमाणु संयंत्र के विकिरण से तमाम दुष्प्रभाव हुए। जनहानि का पता चला नहीं या चलने नहीं दिया गया लेकिन परमाणु रिसाव के फलस्वरूप हजारों की संख्या में मारे गए समुद्री जीव-जन्तुओं ने तो ये राज खोला ही कि परमाणु विकिरण का क्या असर जीवन पर पड़ता है और यह कि अभी तक हमें उस पर काबू पाने के तरीके पता नहीं हैं। नतीजा यही है कि जब भी ऐसी दुर्घटना होती है तो समुद्री जल जीवों की तरह ही आम नागरिक ही निशाना बनते हैं। परमाणु विकिरण से होने वाले दुष्प्रभावों पर केन्द्रित 30 मिनिट की अवधि के माइम नाटक ‘‘एक मछली की कहानी’’ के जरिए कोलकाता से आये माइम कलाकार सुषान्त दास ने अदुभुत समा बाँधा। कुडनकुलम में लगाए जाने वाले परमाणु संयंत्र के विरोध में समुद्र पर आश्रित एवं अपनी जीविका चलाने वाले मछुआरों, नाविकों के विरोध, नेताओं की स्वार्थपरक राजनीति और अपनी ताकत के दम पर पुलिस द्वारा इस विरोध पर दमनात्मक कार्यवाही और समुद्री जीवजन्तुओं के ऊपर इससे पड़ने वाले दुष्प्रभाव को उन्होंने बहुत ही भावप्रवण तरीके से प्रस्तुत किया।

उनके शरीर की मुद्राएँ और अभिनय तथा सिर्फ़ मेकअप के सहारे अकेले ऐसे जटिल विषय पर बच्चों-बड़ों की दिलचस्पी कायम रखना आश्चर्यजनक था। बिना किन्हीं उपकरणों व संगीत आदि के पूरी तरह उनकी प्रस्तुति उन पर ही निर्भर रहती है। उनका संतुलन, भाव-भंगिमाएँ चकित कर देती हैं।

श्री सुषान्त दास कोलकाता के रविन्द्र भवन से 2004 के माइम कला के टॅापर रहे हैं। वे पिछले 15 वर्षों से एकल अभिनय के जरिए माइम द्वारा लोगों के बीच सामाजिक चेतना लाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने जनांदोलनों के विषयों को अपने नाटक का विषय बनाया है ताकि उनकी कला भी आंदोलन का एक हिस्सा बन सके।

उनकी यही प्रस्तुति उपस्थित दर्षकों की समझ को देखते हुए थोड़ी-बहुत रद्दोबदल के साथ इंदौर में 22 और 23 जून 2016 को तीन जगहों पर इंदौर इप्टा द्वारा आयोजित की गई। उन्होंने इंदौर इप्टा के किशोर और युवा कलाकारों को भी माइम के बारे में विस्तार से बताया।

स्टेट बैंक अॅाफ इंदौर यूनियन द्वारा चलाये जा रहे एक विद्यालय में 22 जून को सुषान्त द्वारा माइम की प्रथम प्रस्तुति इसी विद्यालय के बच्चों व शिक्षकों के मध्य दी गई। नर्सरी से कक्षा 12 तक के बच्चों के मध्य किए गए इस माइम के जरिए पर्यावरण प्रदूषण के जलजीवों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को बखूबी पेश किया गया। कॉमरेड आलोक खरे व स्कूल प्रशसन का इसमें उत्साहजनक सहयोग रहा।
इसी दिन शाम को पालदा स्थित कचड़ा बीनने वालों और दूसरों के घरों में काम करने वाली मेहनतकश महिलाओं के अधिकारों के लिए एकजुट करने वाले जनविकास केन्द्र की मेहनतकश महिलाओं और उनके बच्चों के मध्य भी उन्होंने प्रभावी प्रस्तुति दी। कृष्णार्जुन और फादर रॉय ने इस सभा को सफल बनाने में योगदान दिया।

रूपांकन के साथी अशोक दुबे, साथी शारदा बहन, अरविंद, घनश्याम, दीपिका, डोलू (रितिका), राज आदि के सहयोग से शंकरगंज, जिंसी में इप्टा के तत्वावधान में तीसरी प्रस्तुति की गई थी। कार्यक्रम का प्रारंभ करते हुए इंदौर इप्टा के सचिव अषोक दुबे ने उपस्थित लोगों को इंदौर में 2, 3 व 4 अक्टूबर को आयोजित होने वाले चौदहवें राष्ट्रीय सम्मेलन की जानकारी दी और कहा कि लगभग हर 15 दिन में इप्टा की ओर से इंदौर में की जा रहीं ये प्रस्तुतियाँ राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारियों का हिस्सा हैं और आगामी 22 जुलाई को अमृतलाल नागर की कहानियों पर मुम्बई के कलाकार नाटक प्रस्तुत करेंगे।

इस मौके पर इंसानियत और सूफियाना रवायत को कव्वाली के जरिए देश-विदेशों तक पहुँचाने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मशहूर कव्वाल अहमद साबरी की पाकिस्तान के कराची में दिनदहाड़े हुई हत्या और बंगाल में इंसानियत के लिए आवाज बुलंद करने वाले ब्लॉगरों की हत्या की घोर निंदा और विरोध करते हुए अशोक दुबे ने कहा कि अहमद साबरी हों, दाभोलकर, पानसरे या कलबुर्गी हों वे हमारी आवाज, हमारे विचारों को कभी नहीं मार सकते क्योंकि वे पूरी फिजां में घुले हुए हैं। इंदौर इप्टा की ओर से अहमद साबरी को श्रृद्धांजली दी गई।

शान्ति एकजुटता समिति के संयोजक कॅामरेड पी.सी. जैन, इंदौर इप्टा अध्यक्ष विजय दलाल, अरविंद पोरवाल, अजय लागू, जयप्रकाश, इंदौर के नाट्यकर्मी सुशील गोयल, रवि और उनके साथी, शिल्पकार जितेन्द्र वेगड़, इप्टा के साथी पूजा सोलसे, महिमा सिंह, राज लोगरे, साक्षी और अंशुल सोलंकी के अलावा दस साल से लेकर सत्तर वर्ष की उम्र तक के लोग इस कार्यक्रम में उपस्थित थे।

कार्यक्रम के अंत में कॅामरेड पी.सी.जैन ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि हम शांति और अमन चाहने वाले लोग हैं जो पृथ्वी को खुशहाल रखना चाहते हैं। हजारों करोड़ रुपया परमाणु संयंत्र पर खर्च करने के बजाए भारत में लोगों को शिक्षा, रोजगार और अच्छा स्वास्थ्य उपलब्ध करवाना अधिक जरूरी है परंतु सरकार निजी स्वार्थ के चलते पूरे देश को फिर से विदेशियों के हाथ में सौंप रही है। लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे। कार्यक्रम का संचालन अशोक दुबे और सारिका श्रीवास्तव ने किया।

Saturday, June 24, 2017

अमेरिकी फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन की मख़मली गोद और जन नाट्य मंच

- राजेश चन्द्र

जन नाट्य मंच सफदर हाशमी की हत्या के बाद से ही एक सांस्कृतिक दोराहे पर खड़ा रहा है।  एक तरफ सफदर की जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन की परंपरा के संरक्षण का दबाव और दूसरी तरफ इलीट संस्कृति की ऐश्वर्यशाली जीवनशैली का व्यामोह उसे खींचता रहा है। सांगठनिक लोकतंत्र के सम्पूर्ण निषेध और पार्टी (सीपीआईएम) की दुर्भाग्यपूर्ण विफलताओं ने जनम को हमेशा इतनी सुविधा और स्पेस मुहैय्या कराया कि वह इस विरोधाभास को जीते हुए भी जनवादी भ्रम बनाये रख सके और अपनी इलीट लालसाओं की सम्पूर्ण तुष्टि का व्यापार गांठता रह सके। इस खींचतान का फ़ायदा इलीट सुधन्वा देशपांडे और माला हाशमी ने खूब उठाया है। एक तरफ उन्होंने रंगमंच के एनएसडी जैसे ब्राह्मणवादी और इलीटिस्ट संस्थान से एक साहचर्य और आदान-प्रदान का सम्बंध बनाये रखा ताकि दिल्ली और देश के इलीट सर्किल में उनकी स्वीकार्यता बनी रहे, और दूसरी तरफ पार्टी के बौद्धिक-सांस्कृतिक अकाल और सन्नाटे का चालाक दोहन करते हुए जनवादी हलकों में भी उनकी केन्द्रीयता क़ायम रहे। इस सुअवसर को मुफ़ीद और स्वर्णिम बनाने का एक भी अवसर उन्होंने गंवाया हो, इसका उदाहरण नहीं मिलेगा।

सफदर स्टूडियो बन जाने के बाद सुधन्वा ने अपनी निजी इलीट लालसाओं के अनुसार उसकी कार्यशैली विकसित की और खुद को अब तक उसका एकच्छत्र भाग्यविधाता बनाये रखा है। सफदर स्टूडियो उस मेहनतकश जनता के सहयोग से निर्मित हुआ है, जिसके लिये सफदर काम करते रहे, पर वह उस वर्ग की बख़्तरबंद आरामग़ाह बना हुआ है, जिसके ख़िलाफ़ लड़ते हुए सफ़दर ने शहादत दे दी। सुधन्वा और माला हाशमी ने उसे आम जनता की पहुंच और भागीदारी से मुक्त एक इलीट द्वीप की तरह विकसित किया है और इसका अहसास वहां जाकर कोई भी कर सकता है। सुधन्वा और माला हाशमी का दिल्ली के रंगजगत और यहां की सामान्य जनता से कोई सम्पर्क और जुड़ाव नहीं है और स्वाभाविक ही है कि वे जनता के किसी भी आन्दोलन और संघर्ष में शामिल नहीं दिखायी पड़ते। नुक्कड़ नाटक से तो वर्षों पहले उन्होंने किनारा कर लिया था, और सफदर की पुण्यतिथि और जयंती जैसी सालाना उत्सवधर्मिताओं का निर्वाह करने भर के लिये उन्होंने एनएसडी जैसे इलीट और ब्राह्मणवादी संस्थान में मुलायम कालीन के ऊपर चुनिन्दा दर्शकों के बीच बाबा आदम के ज़माने के कथित 'जनवादी नाटक' का उथला, प्राणहीन प्रदर्शन कर देने तक खुद को सीमित कर लिया है। दिल्ली की मलिन बस्तियों, कल-कारखानों की धूल फांकने के बजाय उन्होंने पिछले एक-डेढ़ दशक में अमेरिका और यूरोप के देशों में जाकर 'जनवाद' की अलख जगायी है! मकसद समझना इतना मुश्किल भी नहीं है। यह ऐसा ही है जैसे दिल्ली के एनजीओ सड़क के बच्चों को विदेश यात्रा पर ले जाते हैं, ताकि उनकी फटेहाली और दुर्दशा का प्रदर्शन कर 'डॉलर सहायता' जुटा सकें। सड़क के बच्चे दुबारा सड़कों पर छोड़ दिये जाते हैं। उनकी भूमिका यही समाप्त हो जाती है।

जन नाट्य मंच ने अब इन्डिया फ़ाउन्डेशन फ़ॉर द आर्ट्स जैसी फ़ंडिंग एजेन्सी का दामन थाम लिया है, जो भारत में फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन और रॉकफ़ेलर फ़ाउन्डेशन के वैश्विक साम्राज्यवादी एजेन्डे को लागू कराने वाली प्रतिनिधि संस्था है। फ़ोर्ड और रॉकफ़ेलर जैसी संस्थाओं के कारनामे दुनिया भर के शिक्षित लोगों को मालूम हैं और उन्हें दोहराने की बहुत ज़रूरत नहीं महसूस होती। ये संस्थाएं अमेरिकी हितों के अनुरूप दुनिया में हिंसा, अशान्ति, उपद्रव और अराजकता फैलाने तथा वामपंथी आन्दोलनों को पनपने न देने की अपनी बेहतरीन उपलब्धियों के लिये विख्यात हैं। आज 23 जून है और आज ही जन नाट्य मंच और इन्डिया फ़ाउन्डेशन फ़ॉर द आर्ट्स के नये गठबंधन और वैचारिक साझेदारी की औपचारिक शुरुआत हो रही है। शाम को 7 बजे सफदर स्टूडियो में 'नुक्कड़ नाटक की एक शाम' का आयोजन है, जिसके लिये जनम ने लोगों को आमंत्रण बांटा है। यह जनपक्षधर रंगमंच का एक नया शिफ़्ट है, जिसका नेतृत्व एक बार फिर से जनम कर रहा है। यह उसका ऐतिहासिक कार्यभार जो है। हाल के वर्षों में जनम की सक्रियता इजरायल के खिलाफ नुक्कड़ नाटक के माध्यम से एक देशव्यापी प्रतिरोध विकसित करने को लेकर दिखायी पड़ी थी, जिसके बारे में सुनने में आता है कि उस अभियान के लिये जनम को फिलिस्तीन से भरपूर फंड मिला था और इस फंड का हिस्सा उसने देश के कई अन्य समानधर्मा संगठनों (खास तौर से पटना की प्रेरणा जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा) के साथ भी बांटा!

प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने 'विरोधी धारा का थियेटर' शीर्षक से अपने एक आलेख में कहा था कि, 'कला और संस्कृति का विकास तब तक होता है, जब तक वह धारा के विरुद्ध गतिमान रहती है। उसके साथ चल कर वह हमेशा कमज़ोर पड़ जाती है। शासक वर्ग की संस्कृति ने आज ऐसी व्यूह रचना कर ली है कि अब अगर लोकधर्मी या शोषित वर्ग की संस्कृति को पनपना है तो वह उसके विरोध में ही पनप सकेगी, वरना उसी संस्कृति का एक हिस्सा बन कर रह जायेगी।' सफदर हाशमी का जन नाट्य मंच आज वैश्विक पूंजी के सांस्कृतिक खेल का हिस्सा बन गया है। इस नये शिफ़्ट का इस्तक़बाल कीजिये!

(पोस्ट के साथ आज के कार्यक्रम का आमंत्रण और इन्डिया फ़ाउन्डेशन पर एक रपट का स्नैपशॉट है, जिसमें उसके फंडिंग स्रोतों का स्पष्ट विवरण दिया गया है। रपट का लिंक कमेन्ट बॉक्स में है।)

Tuesday, May 30, 2017

जन सरोकार से जुड़ी कला ही वास्तविक होती है

कानपुर ।गुरुवार, 25 मई को इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन इप्टा के स्थापना दिवस के मौके पर मजदूर सभा भवन ग्वालटोली में गोष्ठी आयोजित की गयी। गोष्ठी में इप्टा कानपुर के संयोजक / वरिष्ठ रंगकर्मी डा. ओमेन्द्र कुमार ने कहाकि जन सरोकार से जुड़ी कला ही वास्तविक है। बड़े ही फक्र का अवसर है कि 25 मई 1943 को मुंबई में गठित इंडियन पीपुल्स थिएटर एसो. अपनी स्थपना के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रही है।
इप्टा के स्थापना सम्मेलन में देश भर से रचनाधर्मी जुड़े थे। अध्यक्षीय भाषण में प्रो. हीरेन मुखर्जी ने आह्वान किया, ‘‘लेखक और कलाकार आओ, अभिनेताओ और नाटककार, तुम सारे लोग, जो, हाथ या दिमाग से काम करते हो, आओ और अपने आपको स्वतन्त्रता और सामाजिक न्याय का एक नया वीरत्वपूर्ण समाज बनाने के लिए समर्पित कर दो।‘‘

 उन्होंने बताया कि हिन्दी में इप्टा को भारतीय जन नाट्य संघ, असम व पश्चिम बंगाल में भारतीय गण नाट्य संघ, आन्ध्र प्रदेश में प्रजा नाट्य मंडली के नाम से जाना  गया। इसका सूत्र वाक्य है ‘पीपुल्स थियेटर स्टार्स द पीपुल’ - जनता के रंगमंच की असली नायक जनता है। संगठन का प्रतीक चिन्ह सुप्रसिद्ध चित्रकार चित्त प्रसाद की कृति नगाड़ावादक है, जो संचार के सबसे प्राचीन माध्यम की याद दिलाता है। इप्टा की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर भारत सरकार ने विशेष डाक टिकट जारी किया था। इप्टा कानपुर में हरबंस सिंह, प्रो. रामनाथ मिश्रा, डा. हेमलता स्वरुप, पुरषोत्तम लाल कपूर, ललित मोहन अवस्थी, वेद प्रकाश कपूर, राधेश्याम मेहरोत्रा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उल्लेखनीय है कि 1981 में रंगकर्मी डा. ओमेन्द्र कुमार ने कानपुर में इप्टा का पुर्नगठन किया था और 1988 तक वह इप्टा कानपुर के महासचिव भी रहे।

प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव डा. आनन्द शुक्ला ने कहाकि इप्टा का इतिहास भारत के जन संस्कृति आन्दोलन का अभिन्न अंग है। देश के स्वाधीनता संग्राम तथा अन्तर्राष्ट्रीय फासीवाद विरोधी संघर्ष से इसके सूत्र जुड़े थे । 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ का लखनऊ में पहला सम्मेलन, 1940 में कलकत्ता में यूथ कल्चरल इंस्टीट्यूट की स्थापना, 1941 में बंगलौर में श्रीलंकाई मूल की अनिल डिसिल्वा द्वारा पीपुल्स थियेटर का गठन, उन्हीं के सहयोग से 1942 मुंबई में इप्टा का उदय, देश के विभिन्न भागों में प्रगतिशील सांस्कृतिक  जत्थों, नाट्य दलों का निर्माण- जनपक्षीय संस्कृति के वाहक कहीं संगठित तो कहीं स्वतः स्फूर्त ढंग से जुड़ रहे थे। पीपुल्स थियेटर नाम वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने सुझाया था जो रोम्यां रोलां की जन नाट्य संबंधी अवधारणाओं तथा इसी नाम की पुस्तक से प्रभावित थे ।

बंगाल के भीषण अकाल ने प्रगतिशील लेखकों, कलाकारों को बहुत उद्वेलित किया। 1942 में ही गायक विनय राय के नेतृत्व में बंगाल कल्चरल स्क्वैड अकाल पीड़ितों के प्रति संवेदना जगाने और उनके लिए आर्थिक सहायता इकट्ठा करने को निकल पड़ा। वामिक जौनपुरी के गीत ‘भूखा है बंगाल ‘ व अन्य गीतों- नाटिकाओं के साथ देश के विभिन्न भागों में कार्यक्रम प्रस्तुत किये । दल में संगीतकार, प्रेमधवन, ढोलक वादक दशरथ लाल , गायिका रेखा राय, अभिनेत्री उषा दत्त आदि शामिल थे। इससे प्रेरित होकर आगरा कल्चरल स्क्वैड व अन्य सांस्कृतिक दल बने। यह आवश्यकता महसूस की जाने लगी कि इस प्रकार के सांस्कृतिक समूहों का राष्ट्रीय स्तर पर कोई संगठन बने। इन संस्कृति कर्मियों को एक मंच पर लाने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव पी.सी.जोशी ने प्रमुख भूमिका निभाई ।

पी डब्ल्यू ए के अध्यक्ष प्रो. खान अहमद फारुक ने बताया कि इप्टा की प्रथम राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष, श्रमिक नेता एम.एन. जोशी , महामंत्री अनिल डी सिल्वा, कोषाअध्यक्ष ख्वाजा अहमद अब्बास, संयुक्त मंत्री विनय राय और के. डी. चांडी चुने गये थे। राष्ट्रीय समिति व प्रान्तीय संगठन समितियों में बंबई, बंगाल, पंजाब, दिल्ली, यूपी, मालाबार, मैसूर, मंगलूर, हैदराबाद, आंध्रा, तमिलनाडु, कर्नाटक के अग्रणी कलाकार व विभिन्न जन संगठनों के प्रतिनिधि थे । इस सम्मेलन के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपना संदेश भेजा था । बाद के सम्मेलनों के लिए श्रीमती सरोजनी नायडु ( जो इप्टा के कार्यक्रमों में सक्रिय रूचि लेती थीं) और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा देश-विदेश की अन्य प्रमुख हस्तियों ने भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित कीं। इप्टा के दूसरे और तीसरे राष्ट्रीय सम्मेलन क्रमशः 1944 और 1945 में मुंबई में ही हुए। चौथा अधिवेशन 1946 में कोलकता में, पांचवा 1948 में अहमदाबाद में, छठा 1949 में इलाहबाद में, सातवां 1953 में मुंबई में आयोजित किया गया । इस अवधि में अन्ना भाऊ साठे, ख्वाजा अहमद अब्बास, वल्ला थोल, मनोरंजन भट्टाचार्य, निरंजन सेन, डॉ. राजा राव, राजेन्द्र रघुवंशी, एम नागभूषणम, बलराज साहनी, एरीक साइप्रियन, सरला गुप्ता, डॉ. एस सी जोग, विनय राय, वी.पी. साठे, सुधी प्रधान, विमल राय, तेरा सिंह चंन, अमृतलाल नागर, के. सुब्रमणियम, के. वी. जे. नंबूदिरि, शीला भाटिया, दीना गांधी (पाठक), सुरिन्दर कौर, अब्दुल मालिक, आर. एम. सिंह, विष्णुप्रसाद राव, नगेन काकोति, जनार्दन करूप, नेमीचंद्र जैन, वेंकटराव कांदिकर, सलिल चौधरी, हेमंग विश्वास, अमरशेख आदि इप्टा की सांगठनिक समितियों में प्रमुख थे।

 रंगकर्मी विजयभान सिंह ने कहाकि आठवें अखिल भारतीय सम्मेलन का आयोजन 23 दिसम्बर 1957 से 1 जनवरी 1958 तक दिल्ली के रामलीला मैदान में किया गया। यह ‘नटराज नगरी‘ में हुआ, जिसमें भारत भर से एक हजार कलाकारों ने भाग लिया । इसका उदघाट्न तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकष्ष्णन ने किया था । राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष सचिन सेन गुप्ता (कलकत्ता), उपाध्यक्ष विष्णुप्रसाद रावा, (गुवाहाटी), राजेन्द्र रघुवंशी (आगरा), के. सुब्रहण्यम (मद्रास), महासचिव निरंजन सेन (कलकत्ता) चुने गये । संयुक्त सचिव निर्मल घोष (कलकत्ता), राधेश्याम सिन्हा (पटना), डॉ. राजाराव (राजामुन्द्री, आंध्रा), मुहानी अब्बासी (मुंबई), कोषाध्यक्ष सजल राव चौधरी (कलकत्ता) बने ।

नाट्यकर्मी राजीव तिवारी ने कहाकि भारत में आधुनिक वृंद गायन (कोरस) का विकास इप्टा ने ही किया। पं. रविशंकर ने ‘ सारे जंहा से अच्छा..‘ (इकबाल) की संगीत रचना इप्टा के सेंट्रल कल्चरल ट्रूप (स्थापित 1944) के लिए की थी । विनय राय, सलील  चौधरी, नरेन्द्र शर्मा, हेमंग विश्वास, प्रेमधवन, नरेन्द्र शर्मा, साहिर लुधियानवी, शंकर शैलेन्द्र, मखदुम मुहीउद्दीन, शील, वल्लथोल, ज्योतिर्मय मोइत्रा, ज्योति प्रसाद अग्रवाल, भूपेन हजारिका, अनिल विश्वास आदि द्वारा विभिन्न भाषाओं में लिखित/संगीतबद्ध गीतों ने जन-संगीत को शुरू किया और परवान चढ़ाया।

युवा रंग कर्मी सिरीष सिन्हा ने कहाकि इप्टा ने भारतीय रंगमंच को नयी दिशा दी । डा. रशीद जहां, ख्वाजा अहमद अब्बास, अली सरदार जाफरी, टी. सरमालकर, बलवन्त गार्गी, जसवन्त ठक्कर, मामा वरेरकर, आचार्य अत्रे आदि के नाटकों ने यथार्थवादी रंगमंच की प्रतिष्ठा की। संगठन में बलराज साहनी, कैफी आजमी, ए के हंगल, शंभु मित्रा, हबीब तनवीर, भीष्म साहनी, दीना पाठक, राजेन्द्र रघुवंशी, आर. एम. सिंह, उत्पलदत्त, रामेश्वर सिंह कश्यप, शीला भाटिया आदि निर्देशक व अभिनेताओं का भी विशेष योगदान रहा।
नाट्यकर्मी कृष्णा सक्सेना ने कहाकि 1946 में इप्टा ने फिल्म   ‘धरती के लाल‘ का निर्माण भी किया। यह विजन भट्टाचार्य के नाटकों ‘नवान्न‘ व ‘अन्तिम अभिलाषा‘ पर  आधारित  थी । ख्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित इस फिल्म के संगीत निर्देशक पं. रविशंकर, नृत्य निर्देशक शान्ति वर्धन, गीतकार अली सरदार जाफरी व प्रेम धवन थे। विभिन्न भूमिकाओं में शंभु मित्रा, तृप्ति मित्र, बलराज साहनी दमयन्ती साहनी, उषा दत्त आदि व सैकड़ों किसान, विद्यार्थी व मजदूर थे। ऋत्विक घटक और इप्टा से जुड़े तमाम कलाकारों ने बाद में फिल्म के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनायी।

असित कुमार सिंह ने कहाकि इप्टा के व्यापक स्वरूप का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के चौबीस राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशो में इसकी पांच सौ से अधिक इकाइयां सक्रिय हैं। अशोक तिवारी, प्रताप साहनी ने भी विचार रखे।

गोष्ठी में मनोहर सुखेजा, संजय शर्मा, मीनाक्षी सिंह, राकेश कुमार सोनी, अक्षय, शुभि महरोत्रा, विकास राय व शिवम आर्या मौजूद रहे।⁠⁠⁠⁠

बारिश की बूंदों के बीच अशोकनगर के बच्चों ने खेले नृत्य और नाटक

- सीमा राजोरिया

शोकनगर | भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) की अशोकनगर इकाई द्वारा तेरहवीं बाल एवं किशोर नाट्य कार्यशाला का समापन आयोजन संस्कृति गार्डन में किया गया | इस आयोजन का उदघाटन गुना से पधारे जाने माने पत्रकार अतुल लुम्बा ने माइक से उद्घाटन की घोषणा करके किया | इप्टा अपनी स्थापना के 75 वें वर्ष में प्रवेश कर रही है और शुरूआत में ही आज़ादी के आन्दोलन से लेकर आजतक चल रहे इस प्रगतिशील रंग आन्दोलन की भूमिका पर चित्रकार पंकज दीक्षित ने संक्षिप्त वक्तव्य दिया | बच्चों को सत्येन्द्र रघुवंशी और ज्ञानवर्धन मिश्रा ने भी संवोधित किया | इस उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता रंगकर्मी सीमा राजोरिया ने की | इस अवसर पर एक वृहद प्रदर्शनी संस्कृति गार्डन के सभागार में लगाई गयी थी जिसमें पिछली नाट्य कार्यशालाओं में हुईं नाट्य प्रस्तुतियों और बच्चों की रंग सक्रियता को चित्रों के माध्यम से सिलसिलेवार प्रस्तुत किया गया था | इस प्रदर्शनी का उद्घाटन ग्वालियर से आये ज्ञानवर्धन मिश्रा ने किया | 6 से 28 मई तक चली इस नाट्य कार्यशाला में 12 से 18 आयु वर्ग के 50 से अधिक बच्चों ने भागीदारी की |

बच्चों द्वारा कार्यक्रम के प्रारम्भ में जनगीतों की प्राभारी प्रस्तुति दी गयी , सबसे पहले गीतगार साहिर का गीत “ वह सुबह कभी तो आयेगी ... “ का गायन किया गया तथा दूसरे गीत ( सचिन साठे ) “ भगत सिंह तू ज़िंदा है ... “ का गायन बच्चों ने किया | इसके बाद लोक नृत्य की प्रस्तुति बच्चों ने दी |

बच्चों द्वारा फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी “ ठेस “ का प्रदर्शन आदित्य निर्मलकर के निर्देशन में किया गया | यह कहानी एक कलाकार के दुःख और उसके संवेदनात्मक भावजगत का जीवन्त चित्रण करती है | नाटक में संगीत , सेट और लाइट के प्रभाव उल्लेखनीय थे | संगीत और नृत्य के संयोजन ने नाटक की सम्प्रेषनीयता को बढाया | इस नाटक में अनुपम तिवारी , सौरव झा , रैना जैन , सलोनी शर्मा , रुपाली , ख़ुशी विश्वकर्मा , शिवानी शर्मा , संस्कार साहू , अजय शर्मा , दर्श दुबे , हर्ष चौबे , अनुष्का दुबे , संस्कार साहू , ओम साहू , यश साहू , नित्या माथुर , अर्पित समाधिया , आकाश श्रीवास्तव , दिनेश योगी , आयशा खान , कबीर राजोरिया आदि कलाकारों ने अभिनय किया | इसके बाद जब बच्चे दूसरे नृत्य की प्रस्तुति दे रहे थे तभी अचानक आई बरसात ने कार्यक्रम बाधित कर दिया पर दर्शकों ने बच्चों का उत्साह बढाया और लोगों के आग्रह पर गार्डन के हॉल में गद्दे बिछाए गए और बगैर ध्वनि और मंचीय प्रकाश के सामान्य प्रकाश में मुंशी प्रेमचंद की चर्चित कहानी पञ्च परमेश्वर का प्रदर्शन ऋषभ श्रीवास्तव के निर्देशन में किया गया | बरसात की वज़ह से अधूरे छूटे नृत्य का प्रदर्शन पुनः बच्चों ने किया | नृत्य संयोजन साक्षी मोरीवाल और ईवा भार्गव ने किया था | दूसरे नाटक में मेघा जैन ,आर्यन अरोरा, सुमित्रा रघुवंशी, कुश कुमार, ख़ुशी विश्वकर्मा, दिशा दुबे, आदित्य रघुवंशी, सोनाली, दीपाली ,सुन्दरम ,आदित्य रघुवंशी, दिव्यांश ,ध्रुव साहू ,देव विश्वकर्मा ,आकाश नरवरिया ,जयंत योगी आदि ने अपने अभिनय से जीवन्त बना दिया | देर रात तक खराव मौसम के वावजूद दर्शकों की भारी उपस्थिति ने शहर के नागरिकों ने संवेदनशीलता का परिचय दिया | कार्यक्रम वेहद सफल और यादगार रहा |