Tuesday, May 30, 2017

जन सरोकार से जुड़ी कला ही वास्तविक होती है

कानपुर ।गुरुवार, 25 मई को इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन इप्टा के स्थापना दिवस के मौके पर मजदूर सभा भवन ग्वालटोली में गोष्ठी आयोजित की गयी। गोष्ठी में इप्टा कानपुर के संयोजक / वरिष्ठ रंगकर्मी डा. ओमेन्द्र कुमार ने कहाकि जन सरोकार से जुड़ी कला ही वास्तविक है। बड़े ही फक्र का अवसर है कि 25 मई 1943 को मुंबई में गठित इंडियन पीपुल्स थिएटर एसो. अपनी स्थपना के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रही है।
इप्टा के स्थापना सम्मेलन में देश भर से रचनाधर्मी जुड़े थे। अध्यक्षीय भाषण में प्रो. हीरेन मुखर्जी ने आह्वान किया, ‘‘लेखक और कलाकार आओ, अभिनेताओ और नाटककार, तुम सारे लोग, जो, हाथ या दिमाग से काम करते हो, आओ और अपने आपको स्वतन्त्रता और सामाजिक न्याय का एक नया वीरत्वपूर्ण समाज बनाने के लिए समर्पित कर दो।‘‘

 उन्होंने बताया कि हिन्दी में इप्टा को भारतीय जन नाट्य संघ, असम व पश्चिम बंगाल में भारतीय गण नाट्य संघ, आन्ध्र प्रदेश में प्रजा नाट्य मंडली के नाम से जाना  गया। इसका सूत्र वाक्य है ‘पीपुल्स थियेटर स्टार्स द पीपुल’ - जनता के रंगमंच की असली नायक जनता है। संगठन का प्रतीक चिन्ह सुप्रसिद्ध चित्रकार चित्त प्रसाद की कृति नगाड़ावादक है, जो संचार के सबसे प्राचीन माध्यम की याद दिलाता है। इप्टा की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर भारत सरकार ने विशेष डाक टिकट जारी किया था। इप्टा कानपुर में हरबंस सिंह, प्रो. रामनाथ मिश्रा, डा. हेमलता स्वरुप, पुरषोत्तम लाल कपूर, ललित मोहन अवस्थी, वेद प्रकाश कपूर, राधेश्याम मेहरोत्रा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उल्लेखनीय है कि 1981 में रंगकर्मी डा. ओमेन्द्र कुमार ने कानपुर में इप्टा का पुर्नगठन किया था और 1988 तक वह इप्टा कानपुर के महासचिव भी रहे।

प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव डा. आनन्द शुक्ला ने कहाकि इप्टा का इतिहास भारत के जन संस्कृति आन्दोलन का अभिन्न अंग है। देश के स्वाधीनता संग्राम तथा अन्तर्राष्ट्रीय फासीवाद विरोधी संघर्ष से इसके सूत्र जुड़े थे । 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ का लखनऊ में पहला सम्मेलन, 1940 में कलकत्ता में यूथ कल्चरल इंस्टीट्यूट की स्थापना, 1941 में बंगलौर में श्रीलंकाई मूल की अनिल डिसिल्वा द्वारा पीपुल्स थियेटर का गठन, उन्हीं के सहयोग से 1942 मुंबई में इप्टा का उदय, देश के विभिन्न भागों में प्रगतिशील सांस्कृतिक  जत्थों, नाट्य दलों का निर्माण- जनपक्षीय संस्कृति के वाहक कहीं संगठित तो कहीं स्वतः स्फूर्त ढंग से जुड़ रहे थे। पीपुल्स थियेटर नाम वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने सुझाया था जो रोम्यां रोलां की जन नाट्य संबंधी अवधारणाओं तथा इसी नाम की पुस्तक से प्रभावित थे ।

बंगाल के भीषण अकाल ने प्रगतिशील लेखकों, कलाकारों को बहुत उद्वेलित किया। 1942 में ही गायक विनय राय के नेतृत्व में बंगाल कल्चरल स्क्वैड अकाल पीड़ितों के प्रति संवेदना जगाने और उनके लिए आर्थिक सहायता इकट्ठा करने को निकल पड़ा। वामिक जौनपुरी के गीत ‘भूखा है बंगाल ‘ व अन्य गीतों- नाटिकाओं के साथ देश के विभिन्न भागों में कार्यक्रम प्रस्तुत किये । दल में संगीतकार, प्रेमधवन, ढोलक वादक दशरथ लाल , गायिका रेखा राय, अभिनेत्री उषा दत्त आदि शामिल थे। इससे प्रेरित होकर आगरा कल्चरल स्क्वैड व अन्य सांस्कृतिक दल बने। यह आवश्यकता महसूस की जाने लगी कि इस प्रकार के सांस्कृतिक समूहों का राष्ट्रीय स्तर पर कोई संगठन बने। इन संस्कृति कर्मियों को एक मंच पर लाने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव पी.सी.जोशी ने प्रमुख भूमिका निभाई ।

पी डब्ल्यू ए के अध्यक्ष प्रो. खान अहमद फारुक ने बताया कि इप्टा की प्रथम राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष, श्रमिक नेता एम.एन. जोशी , महामंत्री अनिल डी सिल्वा, कोषाअध्यक्ष ख्वाजा अहमद अब्बास, संयुक्त मंत्री विनय राय और के. डी. चांडी चुने गये थे। राष्ट्रीय समिति व प्रान्तीय संगठन समितियों में बंबई, बंगाल, पंजाब, दिल्ली, यूपी, मालाबार, मैसूर, मंगलूर, हैदराबाद, आंध्रा, तमिलनाडु, कर्नाटक के अग्रणी कलाकार व विभिन्न जन संगठनों के प्रतिनिधि थे । इस सम्मेलन के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपना संदेश भेजा था । बाद के सम्मेलनों के लिए श्रीमती सरोजनी नायडु ( जो इप्टा के कार्यक्रमों में सक्रिय रूचि लेती थीं) और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा देश-विदेश की अन्य प्रमुख हस्तियों ने भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित कीं। इप्टा के दूसरे और तीसरे राष्ट्रीय सम्मेलन क्रमशः 1944 और 1945 में मुंबई में ही हुए। चौथा अधिवेशन 1946 में कोलकता में, पांचवा 1948 में अहमदाबाद में, छठा 1949 में इलाहबाद में, सातवां 1953 में मुंबई में आयोजित किया गया । इस अवधि में अन्ना भाऊ साठे, ख्वाजा अहमद अब्बास, वल्ला थोल, मनोरंजन भट्टाचार्य, निरंजन सेन, डॉ. राजा राव, राजेन्द्र रघुवंशी, एम नागभूषणम, बलराज साहनी, एरीक साइप्रियन, सरला गुप्ता, डॉ. एस सी जोग, विनय राय, वी.पी. साठे, सुधी प्रधान, विमल राय, तेरा सिंह चंन, अमृतलाल नागर, के. सुब्रमणियम, के. वी. जे. नंबूदिरि, शीला भाटिया, दीना गांधी (पाठक), सुरिन्दर कौर, अब्दुल मालिक, आर. एम. सिंह, विष्णुप्रसाद राव, नगेन काकोति, जनार्दन करूप, नेमीचंद्र जैन, वेंकटराव कांदिकर, सलिल चौधरी, हेमंग विश्वास, अमरशेख आदि इप्टा की सांगठनिक समितियों में प्रमुख थे।

 रंगकर्मी विजयभान सिंह ने कहाकि आठवें अखिल भारतीय सम्मेलन का आयोजन 23 दिसम्बर 1957 से 1 जनवरी 1958 तक दिल्ली के रामलीला मैदान में किया गया। यह ‘नटराज नगरी‘ में हुआ, जिसमें भारत भर से एक हजार कलाकारों ने भाग लिया । इसका उदघाट्न तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकष्ष्णन ने किया था । राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष सचिन सेन गुप्ता (कलकत्ता), उपाध्यक्ष विष्णुप्रसाद रावा, (गुवाहाटी), राजेन्द्र रघुवंशी (आगरा), के. सुब्रहण्यम (मद्रास), महासचिव निरंजन सेन (कलकत्ता) चुने गये । संयुक्त सचिव निर्मल घोष (कलकत्ता), राधेश्याम सिन्हा (पटना), डॉ. राजाराव (राजामुन्द्री, आंध्रा), मुहानी अब्बासी (मुंबई), कोषाध्यक्ष सजल राव चौधरी (कलकत्ता) बने ।

नाट्यकर्मी राजीव तिवारी ने कहाकि भारत में आधुनिक वृंद गायन (कोरस) का विकास इप्टा ने ही किया। पं. रविशंकर ने ‘ सारे जंहा से अच्छा..‘ (इकबाल) की संगीत रचना इप्टा के सेंट्रल कल्चरल ट्रूप (स्थापित 1944) के लिए की थी । विनय राय, सलील  चौधरी, नरेन्द्र शर्मा, हेमंग विश्वास, प्रेमधवन, नरेन्द्र शर्मा, साहिर लुधियानवी, शंकर शैलेन्द्र, मखदुम मुहीउद्दीन, शील, वल्लथोल, ज्योतिर्मय मोइत्रा, ज्योति प्रसाद अग्रवाल, भूपेन हजारिका, अनिल विश्वास आदि द्वारा विभिन्न भाषाओं में लिखित/संगीतबद्ध गीतों ने जन-संगीत को शुरू किया और परवान चढ़ाया।

युवा रंग कर्मी सिरीष सिन्हा ने कहाकि इप्टा ने भारतीय रंगमंच को नयी दिशा दी । डा. रशीद जहां, ख्वाजा अहमद अब्बास, अली सरदार जाफरी, टी. सरमालकर, बलवन्त गार्गी, जसवन्त ठक्कर, मामा वरेरकर, आचार्य अत्रे आदि के नाटकों ने यथार्थवादी रंगमंच की प्रतिष्ठा की। संगठन में बलराज साहनी, कैफी आजमी, ए के हंगल, शंभु मित्रा, हबीब तनवीर, भीष्म साहनी, दीना पाठक, राजेन्द्र रघुवंशी, आर. एम. सिंह, उत्पलदत्त, रामेश्वर सिंह कश्यप, शीला भाटिया आदि निर्देशक व अभिनेताओं का भी विशेष योगदान रहा।
नाट्यकर्मी कृष्णा सक्सेना ने कहाकि 1946 में इप्टा ने फिल्म   ‘धरती के लाल‘ का निर्माण भी किया। यह विजन भट्टाचार्य के नाटकों ‘नवान्न‘ व ‘अन्तिम अभिलाषा‘ पर  आधारित  थी । ख्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित इस फिल्म के संगीत निर्देशक पं. रविशंकर, नृत्य निर्देशक शान्ति वर्धन, गीतकार अली सरदार जाफरी व प्रेम धवन थे। विभिन्न भूमिकाओं में शंभु मित्रा, तृप्ति मित्र, बलराज साहनी दमयन्ती साहनी, उषा दत्त आदि व सैकड़ों किसान, विद्यार्थी व मजदूर थे। ऋत्विक घटक और इप्टा से जुड़े तमाम कलाकारों ने बाद में फिल्म के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनायी।

असित कुमार सिंह ने कहाकि इप्टा के व्यापक स्वरूप का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के चौबीस राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशो में इसकी पांच सौ से अधिक इकाइयां सक्रिय हैं। अशोक तिवारी, प्रताप साहनी ने भी विचार रखे।

गोष्ठी में मनोहर सुखेजा, संजय शर्मा, मीनाक्षी सिंह, राकेश कुमार सोनी, अक्षय, शुभि महरोत्रा, विकास राय व शिवम आर्या मौजूद रहे।⁠⁠⁠⁠

बारिश की बूंदों के बीच अशोकनगर के बच्चों ने खेले नृत्य और नाटक

- सीमा राजोरिया

शोकनगर | भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) की अशोकनगर इकाई द्वारा तेरहवीं बाल एवं किशोर नाट्य कार्यशाला का समापन आयोजन संस्कृति गार्डन में किया गया | इस आयोजन का उदघाटन गुना से पधारे जाने माने पत्रकार अतुल लुम्बा ने माइक से उद्घाटन की घोषणा करके किया | इप्टा अपनी स्थापना के 75 वें वर्ष में प्रवेश कर रही है और शुरूआत में ही आज़ादी के आन्दोलन से लेकर आजतक चल रहे इस प्रगतिशील रंग आन्दोलन की भूमिका पर चित्रकार पंकज दीक्षित ने संक्षिप्त वक्तव्य दिया | बच्चों को सत्येन्द्र रघुवंशी और ज्ञानवर्धन मिश्रा ने भी संवोधित किया | इस उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता रंगकर्मी सीमा राजोरिया ने की | इस अवसर पर एक वृहद प्रदर्शनी संस्कृति गार्डन के सभागार में लगाई गयी थी जिसमें पिछली नाट्य कार्यशालाओं में हुईं नाट्य प्रस्तुतियों और बच्चों की रंग सक्रियता को चित्रों के माध्यम से सिलसिलेवार प्रस्तुत किया गया था | इस प्रदर्शनी का उद्घाटन ग्वालियर से आये ज्ञानवर्धन मिश्रा ने किया | 6 से 28 मई तक चली इस नाट्य कार्यशाला में 12 से 18 आयु वर्ग के 50 से अधिक बच्चों ने भागीदारी की |

बच्चों द्वारा कार्यक्रम के प्रारम्भ में जनगीतों की प्राभारी प्रस्तुति दी गयी , सबसे पहले गीतगार साहिर का गीत “ वह सुबह कभी तो आयेगी ... “ का गायन किया गया तथा दूसरे गीत ( सचिन साठे ) “ भगत सिंह तू ज़िंदा है ... “ का गायन बच्चों ने किया | इसके बाद लोक नृत्य की प्रस्तुति बच्चों ने दी |

बच्चों द्वारा फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी “ ठेस “ का प्रदर्शन आदित्य निर्मलकर के निर्देशन में किया गया | यह कहानी एक कलाकार के दुःख और उसके संवेदनात्मक भावजगत का जीवन्त चित्रण करती है | नाटक में संगीत , सेट और लाइट के प्रभाव उल्लेखनीय थे | संगीत और नृत्य के संयोजन ने नाटक की सम्प्रेषनीयता को बढाया | इस नाटक में अनुपम तिवारी , सौरव झा , रैना जैन , सलोनी शर्मा , रुपाली , ख़ुशी विश्वकर्मा , शिवानी शर्मा , संस्कार साहू , अजय शर्मा , दर्श दुबे , हर्ष चौबे , अनुष्का दुबे , संस्कार साहू , ओम साहू , यश साहू , नित्या माथुर , अर्पित समाधिया , आकाश श्रीवास्तव , दिनेश योगी , आयशा खान , कबीर राजोरिया आदि कलाकारों ने अभिनय किया | इसके बाद जब बच्चे दूसरे नृत्य की प्रस्तुति दे रहे थे तभी अचानक आई बरसात ने कार्यक्रम बाधित कर दिया पर दर्शकों ने बच्चों का उत्साह बढाया और लोगों के आग्रह पर गार्डन के हॉल में गद्दे बिछाए गए और बगैर ध्वनि और मंचीय प्रकाश के सामान्य प्रकाश में मुंशी प्रेमचंद की चर्चित कहानी पञ्च परमेश्वर का प्रदर्शन ऋषभ श्रीवास्तव के निर्देशन में किया गया | बरसात की वज़ह से अधूरे छूटे नृत्य का प्रदर्शन पुनः बच्चों ने किया | नृत्य संयोजन साक्षी मोरीवाल और ईवा भार्गव ने किया था | दूसरे नाटक में मेघा जैन ,आर्यन अरोरा, सुमित्रा रघुवंशी, कुश कुमार, ख़ुशी विश्वकर्मा, दिशा दुबे, आदित्य रघुवंशी, सोनाली, दीपाली ,सुन्दरम ,आदित्य रघुवंशी, दिव्यांश ,ध्रुव साहू ,देव विश्वकर्मा ,आकाश नरवरिया ,जयंत योगी आदि ने अपने अभिनय से जीवन्त बना दिया | देर रात तक खराव मौसम के वावजूद दर्शकों की भारी उपस्थिति ने शहर के नागरिकों ने संवेदनशीलता का परिचय दिया | कार्यक्रम वेहद सफल और यादगार रहा | 

Thursday, May 25, 2017

25 मई :जन संस्कृति दिवस के बहाने

-हनुमंत किशोर 

‘जो पुल बनाएंगे
वे अनिवार्यतः पीछे रह जाएंगे
सेनाएँ हो जाएंगी पार मारे जायेंगे रावण
जयी होंगे राम
जो निर्माता रहे
इतिहास में बंदर कहलायेंगे’ ...”अज्ञेय’’

“अज्ञेय” की इन पंक्तियों से बात शुरू करने पर कुछ लोग की पेशानी पर बल पड़ सकते हैं लेकिन इन पंक्तियों से सटीक कोई और पंक्ति जन संस्कृति दिवस की अहमियत को इंगित करने के लिए मेरे पास नहीं है |
25 मई भारतीय जन नाट्य संघ ,‘इप्टा’ का स्थापना दिवस है | जिसे देश भर में संस्कृति कर्मी जन संस्कृति दिवस के रूप में मनाते हैं | 

हालांकि आज संस्कृति पर जिस तरह से एक ख़ास वर्ग का फासीवादी प्रभुत्व स्थापित हो चुका है वहां संस्कृति की हटकर कोई भी विवेचना राष्ट्र द्रोही और संस्कृति द्रोही घोषित किये जाने के खतरे तक ले जा सकती है लेकिन राष्ट्र और संस्कृति दोनों को बचाने के लिए हर संस्कृति कर्मी को इस खतरे से टकराना ही होगा |

ठीक उसी तरह जिस तरह से आज से 75 बरस पहले “इप्टा” अपनी स्थापना के समय औपनिवेशिक सत्ता के उत्पीडन से टकराई थी | ‘इप्टा’ मात्र रंगकर्मियों , संगीतकारो , साहित्यकारों , कलाकारों का संगठन मात्र नहीं था बल्कि एक संगठन बतौर यह राष्ट्र और समाज की मुक्ति का स्वप्न भी था | 25 मई 1943 को मुम्बई में इप्टा की जब औपचारिक स्थापना की गई तब उस समय के कला और लेखन के क्षेत्र के आइकान समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता घोषित करते हुए “इप्टा” के आन्दोलन से जुड़े थे जैसे ख्वाजा अहमद अब्बास, पंडित रविशंकर, कैफी आजमी, ए के हंगल, साहिर लुधियानवी, दीना पाठक, विमल रॉय, मजरूह सुल्तानपुरी, शैलेन्द्र, शंभू मित्रा, होमी भाभा, बलराज साहनी, प्रेमधवन, सलिल चौधरी, चित्तो प्रसाद, हेमंत कुमार, उत्पल दत्त, रित्विक घटक, तापस सेन, उदयशंकर, आदि | एक आन्दोलन के रूप में इप्टा औपनिवेशिक शासन से आजादी के साथ सामाजिक और आर्थिक असमानता से भी आजादी का सवाल उठाते हुए देश की सांस्कृतिक फिज़ानव निमार्ण कर रही थी | अछूत और कलात्मक समझे जाने वाले विषय और लोग दोनों ही कला की दुनिया में केंद्र में स्थापित हो रहे थे | श्रम और श्रमिक की मंच पर प्रतिष्ठा हो रही थी कला और साहित्य का नया सौन्दर्य शास्त्र रचा जा रहा था | कला और मंच पर अभिजात्य की इजारेदारियां टूट रही थी | विपन्न, शोषित वर्ग जब कला का सृजन करता है उसमे एक द्रोह और दुःख होता है प्रतिशोध की धमक होती है | ‘इप्टा’ पुरानी संवेदना से अलग नये जमाने के स्वप्न और सम्वेदना से कला को आंदोलित कर रहा था। कला अपनी जकड़न से मुक्त होकर सम्भावना के नये क्षितिज तलाश रही थी |

आज भी ‘इप्टा’ की स्प्रिट वही है बकौल शबाना आजामी “इप्टा सिर्फ रंगमंच नहीं है विचार है। ऐसा विचार जो कला के माघ्यम से दुनिया को बदलना चाहती है।“

इसी विचार की पृष्ठ भूमि से जन संस्कृति दिवस की अवधारणा ने जन्म लिया है|

जन और संस्कृति दोनों एक दूसरे से असम्पृक्त होकर अपनी शक्ति और सम्भावना से स्खलित होते हैं |
दोनों की मुक्ति एक दूसरे में निहित है | जन की तरह संस्कृति भी जंजीरों में जकड़ी जाती है | उसे उसके मूल से विछिन्न कर कृत्रिम वातावरण में विकसित किया जाता है और वह विपणन का पण्य होकर उपभोक्ता तैयार करने की मशीन बना दी जाती है |

संस्कृति के छाते के नीचे उस समाज के समूचे सामाजिक आचार व्यवहार और मानक समाहित होते हैं इस तरह से हर संस्कृति के दो रूप हैं भौतिक और अधिभौतिक | भौतिक रूप में संस्कृति में समाज की समूची भौतिक उपलब्धियां शामिल है जिसे एक अर्थ में हम सभ्यता भी कहते हैं अधिभौतिक रूप में हमारे सभी जीवन मूल्य , कला, संगीत, साहित्य, दर्शन, धर्म , रीतिरिवाज, परम्पराएँ, पर्व विचार , आदर्श , आदि सम्मलित किये जा सकते हैं | इस तरह से यह हमारे जीने और सोचने का समग्र संकुल होकर हमारे देशकाल के मूर्त-अमूर्त की अभिव्यक्ति भी है |

संस्कृति जैसा कि अपने नाम से ही ध्वनित है बनायी हुई होती है | यह सामाजिक प्रक्रिया द्वारा अर्जित और निरंतर विकसित की जाती हैं | यह प्रकृति का विलोम नहीं तो उसका पूरक अवश्य रचती है | पीढ़ी दर पीढ़ी सामाजिक व्यवहार की विशिष्टताओं के रूप में इसका निगमन होता है। यह संचय , विकास और क्षरण में गतिमान रहते हुये हमारी सामाजिक सरंचना और वैयक्तिक जीवनपद्धति का व्यवस्थापन करती चलती है |आदिम रूप में इस तरह जन अपनी संस्कृति को रचते है और संस्कृति अपने जन को रचती है |

मैक्सिम गोर्की इसे ही लक्ष्य कर कहते हैं –‘संस्कृति की निर्मात्री जनता है |’

लेकिन आदिम समाज की टूटन के साथ जैसे जैसे वर्ग समाज का उदय होता है जन और संस्कृति का यह सीधा सरल सम्बन्ध टूटने लगता है और शासक वर्ग संस्कृति पर अपना वर्चस्व स्थापित करते हुए उसे अपने वर्गीय हितो का औजार तक बना डालता है | इस प्रक्रिया और आंतरिक संघर्ष में संस्कृति के दो छोर निर्मित हो जाते हैं एक पर आभिजात्य संस्कृति होती है तो दूसरे पर लोक संस्कृति | कालान्तर में मीडिया और जन संचार के माध्यमो ने संस्कृति का एक और स्वरूप विकसित किया जिसे लोकप्रिय संस्कृति यानी पापुलर कल्चर या पॉप कल्चर कहा गया | हमारे देश में इसकी ताज़ा मिसाल फ़िल्मी कल्चर है जिसने शादी –ब्याह,नाच-गाने के नये पैटर्न सर्व ग्राह्य बना दिये | मैथ्यू आर्नल्ड अपनी पुस्तक ‘कल्चर और एनार्की’ पुस्तक में पॉपुलर कल्चर को विद्यमान प्रमुख संस्कृति के संदर्भ में रेखांकित करते हुए पॉपुलर कल्चर के उदय को ब्रिटेन की उद्योग क्रांति या आर्थिक क्राति के संदर्भ में देखते हैं। वर्ष 1860 तक ब्रिटेन की संसद में वोट का अधिकार नगर के कुछ संभ्रान्त-कुलीन एवं शिष्ट लोगों को ही प्राप्त था लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के साथ मध्यवित्तीय वर्ग के महत्व एवं कामगार वर्ग के उदय के कारण इस व्यापक वर्ग ने भी ब्रिटेन संसद में वोट के अधिकार की मांग की। मैथ्यू आर्नल्ड इसके पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि इस वर्ग के पास पर्याप्त अनुभव नहीं है और इस अनुभवहीन, अपरिपक्व बौद्धिकता को यदि यह अधिकार मिलता है तो अराजकता की स्थिति संस्कृति में भी आ सकती है। अतः आर्नल्ड की कुलीन चेतना शिष्ट संस्कृति से बाहर की समस्त संस्कृति को ‘एनार्की’ के रूप में ही देख पाती है। मैथ्यू आर्नल्ड ही नहीं वरन् उस युग के सभी प्रतिष्ठित संस्थानों ने पॉपुलर कल्चर को शंका की दृष्टि से देखा।मैथ्यू अर्ल्नाल्ड से आगे जाकर वाल्टर बिन्जामिन पापुलर कल्चर के प्रतिरोधी प्रभाव को रेखांकित करते हैं | हम दक्षिण अमेरिकी और अफ्रीकी देशो में संगीत में ‘ब्लूज’ का जो उभार देखते है उसमे अश्वेतो की पीड़ा और प्रतिरोध सहज चिन्हित है | लोकप्रिय संस्कृति पर आरोपो के जवाब में वाल्टर बेंजामिन कहते हैं ‘पॉपुलर कल्चर जीवन का संस्कार करने वाली रही हैं, लोगों ने उसे और उसमें से बहुत कुछ चुना है। सब कुछ नकारात्मक होता तो लोग उसे आनंद का कारण न समझते।

‘फासीवादी संस्कृति और सेकूलर पॉप संस्कृति’ में सुधीश पचौरी एंजेला मैकरोवा के मार्फत लिखते हैं-‘पॉपुलर कल्चर उत्तर आधुनिक स्थितियों में उन आवाजों का कलरव है, जिन्हें आधुनिकतावादी महावृत्तान्तों में दबा दफना दिया था जो मूलतः साम्राज्यवादी और पितृसत्तात्मक थे।‘ यहाँ उच्च और निम्न का भेद जाता रहता है | लेकिन लोक प्रिय संस्कृति को लोक या जन संस्कृति समझना भूल होगी |

एडार्नो इसी पापुलर कल्चर को मॉस कल्चर में देखते है और इसके उस चरित्र को रेखांकित करते है जिसे सांस्कृतिक उद्योग की संज्ञा दी जाती है | ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया में यह सांस्कृतिक उद्योग खूब फलता –फूलता है और स्थानिकता को प्रतिगामी बताकर हटाता चलता है | स्थानीय और लोक संस्कृति को हीन ठहरा दिया जाता | 

आज बाज़ार की सर्वग्रासी लोलुपता से संस्कृति और कला भी नहीं बच सकी है | और उसने कला-संस्कृति को भी उपभोग का विषय बना दिया है | 

रेमंड विलियन जहाँ संस्कृति के सामाजिक आधारों और उसके उपभोगवादी चरित्र की मीमांसा करते हैं | वे बताते है कि उपभोक्ता वादी संस्कृति के प्रभुत्व से कला और काव्य भी विच्छिन्न (एलियनेशन) का शिकार हुए हैं और वे व्यापक सामाजिक प्रक्रिया से विच्छिन्न होकर उपभोग या आस्वाद की एक वस्तु बनकर रह गये हैं | वो धीरे से ‘आनर प्राइड’ में बदल जाती है और ‘विश करो डिश करो’ के इंद्रजाल में बदल जाती है |
वहीँ अन्तानियों ग्राम्शी ‘हेजीमनी’ की अवधारणा से यह बताते हैं कि किस तरह संस्कृति में लोक के जीवन मूल्य प्रभु वर्ग यानी एलीट क्लास के मूल्यों द्वारा विस्थापित कर दिए जाते हैं |


‘इप्टा’ उस संस्कृति की वाहक है जिसका असली नायक श्रमजीवी और समाज की मुक्ति के लिए संघर्षरत कलाकार ,बुद्धिजीवी है | इस संस्कृति में व्यक्तिवादी आग्रह नहीं सामूहिक चेतना है | ‘आई शेल ओवर कम ‘ को पीट सीगर जब ‘वी शेल ओवर कम’ बनाकर जन गीत बना देते हैं तो सर्व जन हिताय की यही सामूहिक चेतना अभिव्यक्त होती है | यहाँ कला विगत के विवेचन के साथ बेहतर भविष्य का आह्वान बन जाती है | जो समाज अपने विगत और भविष्य से प्रेम करता है वही अपनी संस्कृति से प्रेम कर सकता है और उसके लिए जोखिम भी उठा सकता है जैसा कहा जाता है – brave do not abandon their culture .

इस तरह जनता की संस्कृति के प्रतिरोधी तत्वों की पहचान कर जीवन विरोधी संस्कृति से मुकाबिला किये जाने की ज़रूरत है | इसके लिये संस्कृति कर्मी जनता की सामूहिक स्मृति में उतरता और उस स्मृति से प्रतिरोध रचना होगा | औपनेवेशिक , उपभोक्ता संस्कृति जहाँ स्मृति हीनता रचती है वहीँ जन संस्कृति स्मृति रचती है | जन संस्कृति अपनी जीवन शक्ति लोक और विचार से ग्रहण करती है लोक में आज भी दीपक बुझाया नहीं बढ़ाया जाता है |वहां नदी-वृक्ष-पहाड़ का मानवीयकरण है|

रात को वृक्ष को छूना मना है क्योंकि वह सोया होता है | पृथ्वी पर पाँव रखने से पहले पृथ्वी की क्षमा याचना की जाती है | लोक इस तरह अपनी संस्कृति में अपने परिवेश को जीवंत बनाकर संस्कृति को भी जीवंत इकाई बना देता है | लेकिन लोक के अपने अन्तर्विरोध भी हैं, अपना श्रेणीकरण और विभेद हैं | सामन्ती मूल्यों की प्रतिष्ठा है | जन संस्कृति इस श्रेणीकरण और विभेद का प्रतिवाद रचते हुए , प्रगतिशील मूल्यों को केंद्र में प्रतिष्ठित करती है | 

जन संस्कृति में कला का एक सामाजिक स्पेस है जिसमे सृजनात्मक आनन्द और सामाजिक सरोकार आपस में सम्पृक्त हैं |

सर्वग्रासी और एलियेनेट करने वाली संस्कृति के विरुद्ध सम्भावना सिर्फ इसी जन संस्कृति में निहित है और कलाकारों ,बुद्धिजीवियों , लेखकों के लिए जन संस्कृति दिवस का संदेश भी है | कम से कम आज के दिन तो बकौल मेक्सिम गोर्की पूछा जा सकता है –

“कला के कर्ण धारों
तुम किस ओर हो ?
फासीवादियों के साथ
या
फासिवादियों से लड़ने वालों के साथ |”

Monday, May 22, 2017

हास-परिहास की भाषिक संस्कृति

- शायक आलोक
क दृश्य यह है कि डेविड लेटरमैन एक छत से नीचे झाँक रहे हैं और कहते हैं कि अमेरिका में जेनरेटर तब चलता है जब बिजली के तार पर कोई पेड़ गिर गया हो. वे फिर यह भी कहते हैं भारत में इतने डीजल जेनरेटर हैं कि पूरे ऑस्ट्रेलिया को बिजली की आपूर्ति की जा सकती है. सौर ऊर्जा की विशिष्टता बताने के लिए वे कहते हैं कि देखो, मैं इसे छू सकता हूँ और कोई खतरा नहीं है. मैं अपना सर इसके नीचे रख सकता हूँ.

डेविड लेटरमैन नेशनल जियोग्राफिक के डाक्यूमेंट्री सीरिज ‘इयर्स ऑफ़ लिविंग डेंजरसली’ के लिए तब भारत में थे और जलवायु परिवर्तन व ऊर्जा के उपयोग पर भारत की दशा दिशा का आकलन कर रहे थे. प्रसिद्ध पूर्व टीवी होस्ट और कॉमेडियन डेविड लेटरमैन ने इस क्रम में प्रधानमंत्री मोदी का इंटरव्यू भी लिया था और इंटरव्यू के बाद कहा कि मैं उम्मीद कर रहा था कि वे आज रात मुझे यहीं रुक जाने को कहेंगे.

डोनाल्ड ट्रम्प के दावेदारी के तुरंत बाद डेविड ने एक मंच से यह टिप्पणी की – ‘’मैं सेवानिवृत हुआ ...मुझे कोई अफ़सोस नहीं है, मैं खुश था. मैं कुछ वास्तविक दोस्त बनाऊंगा. मैं आत्मतुष्ट था. संतुष्ट था. तृप्त था, और फिर कुछ दिन पहले डोनाल्ड ट्रम्प ने यह कह दिया है कि वे राष्ट्रपति पद के लिए खड़े हो रहे हैं. मुझसे जीवन की सबसे बड़ी भूल हो गई है.’’ इसी हफ्ते डेविड को ‘मार्क ट्वेन प्राइज़ फॉर अमेरिकन ह्यूमर’ दिया गया है.

प्रत्येक देश में हास-परिहास की अपनी भाषिक संस्कृति होती है जो अभिव्यक्ति के तरीके पर निर्भर होती है और यही उसे विशिष्ट बनाती है. अमेरिकी ह्यूमर के पितामह माने जाते प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने एक इंटरव्यू में कहा कि ‘’अमेरिकी हास-परिहास फ्रेंच, जर्मन, स्कॉच या अंग्रेज हास-परिहास से बिल्कुल अलग है. और यह अंतर अभिव्यक्ति के तरीके का अंतर है. भले इसकी उत्पत्ति अंग्रेज ह्यूमर से हुई है लेकिन अमेरकी ह्यूमर अनूठा है. सिद्धांततः जब कोई अंग्रेज लिखता है या कहानी सुनाता है तो हास्य बिंदु पर जोर देता है और विस्मयादी का प्रयोग करता है. कहानी कहने वाला अमेरिकी ऐसा नहीं करता. वह ह्यूमर से होने वाले प्रभाव से प्रकटतः बेपरवाह बना रहता है.

भारतीय परंपरा में हास-परिहास के दो अद्वितीय लोकचर्चित किरदार हुए. तेनाली राम और बीरबल. तेनाली राम राजा कृष्णदेव राय के दरबार के अष्टदिग्गजों में से एक थे और प्रसिद्ध कवि थे. लोक में उन्हें ‘विकट कवि’ के रूप में प्रतिष्ठा हासिल है जिसका ढीला ढाला अर्थ विदूषक या मसखरा है. राजा बीरबल अकबर के दरबार में थे और अपनी हाजिरजवाबी के लिए लोकचर्चित हुए. एक प्रकार से कह सकते हैं कि भारतीय परंपरा का ह्यूमर भाषाई सौष्ठव या अभिव्यक्ति के तरीके के बजाय सहज बुद्धि के त्वरित प्रयोग व वाकपटुता से अधिक प्रेरणा लेता रहा. यूँ भी भारतीय अभिव्यक्ति परंपरा में हाव-भाव अभिनय, बोलने या चुप रहने के तरीके और भाषा के इस्तेमाल के बजाय कहे गए ‘कंटेंट’ पर अधिक जोर रहता है.

एक कथा है कि नेहरु सीढियां उतरते लडखडा गए तो राष्ट्रकवि दिनकर ने उन्हें संभाला. नेहरु ने शुक्रिया कहा कि आपने संभाल लिया. दिनकर ने जवाब में कहा कि राजनीति जब भी लड़खड़ाएगी तब साहित्य उसे सहारा देगा. यह भारतीय ह्यूमर का एक क्लासिक उदाहरण है. एक और कथा में नेहरु संसद में देश को हौसला दे रहे थे कि चीन द्वारा हड़प ली गई भूमि में यूँ भी कुछ नहीं उगता. इस पर महावीर त्यागी ने तुरंत जवाब दिया कि आपके सर पर भी कुछ नहीं उगता तो क्या इसे किसी और को सौंप दिया जाए.

हास-परिहास में फोर्मेट की भी अपनी विशेष भूमिका व योगदान है. यह फोर्मेट भी कई स्तरों पर निर्मित होता है और फोर्मेट के भीतर कई दूसरे फोर्मेट देखे जा सकते हैं. परदे की कॉमेडी, साहित्यिक व्यंग्य, हास्य कविताएं, राजनीतिक कटाक्ष और रोजमर्रा के आम जीवन में प्रासंगिक लोककहावतों के साथ दर्शाया जाता हास-परिहास मूल में अलग अलग प्रवृतियों व प्रभाव को प्रकट करता रहा है. इनके बीच का अंतर निश्चय ही किसी बौद्धिक अवलंब के बिना पर देखा जा सकता है. एक ही फिल्म में कॉमेडियन, हीरो-हीरोइन और विलेन द्वारा प्रस्तुत हास-परिहास में एक साफ़ अंतर दीखता है. एक ही साहित्यिक व्यंग्य में लेखक के सवाल और किसी किरदार के जवाब से दो अलग तरह का ह्यूमर-इफेक्ट पैदा होता है.

मेरे हिसाब से भारतीय ह्यूमर का प्रतिनिधित्व एडिटोरियल पन्ने पर लिखने वाले हमारे कुछ स्तंभकार कर पाते हैं. कुछ प्रतिनिधित्व वरुण ग्रोवर एवं अन्य कुछ स्टैंडअप कॉमेडियन कर पाते हैं वरना यह ‘’आर्ट’’ हम कुछ तो जरुर खो रहे हैं.

भारतीय ह्यूमर का सबसे अधिक संक्रमण इन दिनों राजनीति व न्यूज़ मीडिया में देखने को मिल रहा है. वे जैसे किसी कुंठा से उत्पन्न होते हैं और किसी मनोविनोद के बजाय एक कड़वाहट छोड़ने पर समाप्त हो जाते हैं. संसद में कई बार किसी सदस्य के वक्तव्य में उत्कृष्ट ह्यूमर नजर आ जाता है लेकिन हमारे प्रधानमंत्री और हमारे सबसे बड़े प्रधानमंत्री उम्मीदवार ज्यादातर बार हल्के चुटकुले या चुभते कटाक्ष पर ही अपनी प्रतिभा समाप्त कर लेते हैं और बौद्धिक चर्या का मनोविनोद प्रस्तुत नहीं कर पाते.

अभिव्यक्ति का एक अन्य संकट ‘रेस्पोंसिबिलिटी’ का है. मुझे डा. पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक बात बेहद पसंद आई थी जो उन्होंने एक निजी संवाद में कही थी. उन्होंने कहा कि ‘सेन्स ऑफ़ ह्यूमर’ के साथ लेखक में या किसी भी प्रतिनिधि या व्यक्ति में ‘सेन्स ऑफ़ रेस्पोंसिबिलिटी’ भी अवश्य हो, तब असल आनंद है.

चर्चित कवि श्री मंगलेश डबराल को किसी किरदार की तरह रखते हुए अब मैं कुछ उदाहरण दूंगा :-

1. ह्यूमर : मंगलेश डबराल मुझसे तीन बार टकराए और तीनों बार एक ही तीन सवाल पूछे – कि मैं कैसा हूँ, कहाँ रहता हूँ, और क्या करता हूँ. तीनों बार उन्होंने मंच से मोबाइल, टॉर्च और पहाड़ तीन कविताएं सुनाई.
2. व्यंग्य : वे पहाड़ से कुछ कविताएं लिए आए थे, दिल्ली में बात नहीं बनी, इन दिनों वे फिर कविताओं के लिए पहाड़ की ओर ताक रहे हैं.
3. कटाक्ष : डबराल कैंप के कवियों में (कवयित्रियों में भी) बची रहे थोड़ी सी लज्जा.
4. फूहड़ता : वे थोड़े लंप (हिंदी और अंग्रेजी इनिशियल) किस्म के व्यक्ति हैं.
5. हास्य : वे श्री प्रभात रंजन से हिंदी में नाराज हुए और श्री वीरेन्द्र यादव से अंग्रेजी में उनकी शिकायत करने लगे.

Sunday, May 21, 2017

'नटसम्राट' वही जयंत कर सकता है, जिसके पास आलाेक हाे

- अख्तर अली 
रायपुर|  जयंत देशमुख जैसे कल्पनाशील निर्देशक आैर आलाेक चटर्जी जैसे सक्षम अभिनेता मंच पर हाे ताे दर्शकाे की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है, आपकाे बीस प्रतिशत अतिरिक्त चौकन्ना रहना हाेता है, वरना मंच पर अगले क्षण हाेने वाले चमत्कार से आप वंचित हाे जायेगे, लेखक दृारा गढ़े गये किरदार काे जिस अंदाज़ मे जयंत तराशते है, वह कशीदाकारी की तरह हाेता है, जयंत पाञ नही आभूषण गढ़ते है | 

कहा जाता है कि रंगमंच अभिनेता का माध्यम है लेकिन जयंत देशमुख तकनीशियनाे काे भी अभिनेता के समकक्ष खड़ा कर देते है, आैर वह भी एैसी महीन कारीगरी के साथ कि एैसी धारणा विकसित हाे जाती है कि तकनीशियन न हाे ताे पाञ अधूरा है | जयंत नेपथ्य काे मंच पर स्थापित करते है |

नट सम्राट भोपाल मे तैयार किया गया नाटक है | देश के रंगकर्म मे इन दिनाे भोपाल का नाम काफ़ी सम्मान से लिया जा रहा है, यह शहर रंगमंच की बड़ी मंड़ी के रूप मे उभर रहा है | संजय उपाध्याय का " आनंद रघुनंदन " , नज़ीर कुरैशी का "तुगलक" आैर अब जयंत देशमुख का "नट सम्राट " ने नाटय रसिकाे आैर रंग समीक्षकाे का ध्यान भोपाल पर केन्द्रित कर दिया है |


कमज़ाेर आलेख पर बेहतर काम नही किया जा सकता, अभिनेता सक्षम न हाे ताे निर्देशक उसके अंदर से क्या निकाल पायेगा ? नट सम्राट मे जयंत देशमुख के एक हाथ मे बेहद कसावट भरी स्कृप्ट है आैर दूसरे हाथ मे दक्ष अभिनेताओं की टाेली, दमखम वाला नेपथ्य अतिरिक्त बाेनस अंक है | इस तरह के नायाब हीरे माेती काे छाट कर जमा करने वाले जौहरी है जयंत देशमुख | नाटक की कास्टिंग उसका भविष्य तय कर देती है, काबिल निर्देशक इस दिन जितने चाैकन्ने हाेते है उतना ताे वे मंचन के दिन भी नही हाेते, क्याेकि मंचन के दिन तक ताे उनका काम खत्म हाे चुका हाेता है |


नट सम्राट का लेखन आदर्श नाटय लेखन है, क्याेकि कथ्य मे कसावट के साथ मंच के अनुरूप बेहतरीन शिल्प की गुंजाइश लेखक ने निर्देशक के लिये छाेड़ रखी है | दृश्याे की संरचना इस तरह की गई है जिसमे मंच का सौंदर्य कलात्मकता के साथ समा जाता है | 


एक रंगकर्मी के जीवन पर आधारित यह नाटय आलेख एक शाेक गीत है, एक मर्सिया है, हर अभिनेता इस भूमिका मे स्वीकार नही हाे सकता, इसके लिये वही अभिनेता चाहिये जिसके पास वर्षाे की साधना हाे | आज रायपुर मे आयाेजित चार दिवसीय रंग जयंत की प्रथम संध्या काे यह नाटक "नट सम्राट देखने का अवसर मिला | शिरवाडकर जी की कलम से निकला यह बहुचर्चित बहुप्रशंसित नाटक जिसका अनुवाद सच्चिदानंद जाेशी जी ने किया है, हिन्दी मे पहली बार किया जा रहा है , एैसा नही है कि किसी ने भी इसे करना नही चाहा हाेगा, लेकिन हर स्कृप्ट हर ड़ायरेक्टर नही कर सकता, इसे रंगमंच का वही जयंत कर सकता है जिसके पास आलाेक हाे |एक बात आैर जयंत आैर आलाेक की जाेड़ी काे जब तक सुभाष मिश्र जैसे आयाेजक नही मिले तब तक यह याञा पूर्ण नही हाेती |

जबलपुर में 10 जून को 'नटसम्राट' का मंचन

- वसंत काशीकर
बलपुर । 'नाट्य निरंतर' के अंतर्गत 10 जून 2017 को   जयंत देशमुख के निर्देशन मे 'नटसम्राट' नाटक का मंचन किया जाएगा । महाकोशल शहीद स्मारक  ट्रस्ट द्वारा विवेचना के सहयोग से जबलपुर में विवेचना थियेटर ग्रुप ( विवेचना जबलपुर  ) द्वारा यह  नई पहल शुरू की गई  है।  हर माह के दूसरे शनिवार को जबलपुर से बाहर की एक नाट्य प्रस्तुति हुआ करेगी।  इस योजना का नाम ’नाट्य निरंतर’ रखा गया है।

इसकी शुरूआत दिनेश ठाकुर स्मृति नाट्य प्रसंग के साथ अप्रैल 2017 माह में पूरी भव्यता से हुई हैं। इस कड़ी मे 13 मई शनिवार को शहीद स्मारक गोलबाजार के प्रेक्षागृह में प्रिज्म थियेटर सोसायटी दिल्ली के द्वारा विकास बाहरी के लेखन व निर्देशन में ’खिड़की’ नाटक का सफल मंचन किया गया। जबलपुर में विवेचना थियेटर ग्रुप के अथक प्रयासों के फलस्वरूप नाटक देखने वालों को एक बड़ा दर्शक वर्ग है जो टिकिट लेकर नाटक देखता है। दर्शकों को प्रतिमाह अतिथि प्रस्तुति दिखाने की इस योजना में नाममात्र मूल्य का प्रवेश पत्र रखा गया है जो शहीद स्मारक कार्यालय और विवेचना के हिमांशु राय, वसंत काशीकर और बांकेबिहारी ब्यौहार के माध्यम से प्राप्त किये जा सकते हैं।  10 जून को जयंत देशमुख के निर्देशन में ’नटसम्राट’ का मंचन इसी योजना के अंतर्गत होगा। इसमें विख्यात अभिनेता आलोक. चटर्जी मुख्य भूमिका में हैं।⁠⁠⁠⁠

वी वी शिरवाडकर मराठी नाटक नाटककार औऱ साहित्य का बड़ा नाम है । " कुसुमाग्रज " के नाम से ये विख्यात कवि हैं और इन्होंने मराठी कविता को एक पहचान दी । " विदूषक " , नट सम्राट "  ओर " मुख्यमंत्री " नाम से लिखे गए इनके नाटक देश भर में हर भाषा मे खेले गए ।  'नट सम्राट'  में एक वृद्ध कलाकार के जीवन संघर्ष , उलाहना , तिरस्कार और  उसकी त्रासदी को कवितामयी संवादों में पिरोकर लिखा है । 'नटसम्राट' में जहां हर कलाकार अपना प्रतिबिम्ब देखता है, वहीं  समाज के मन मे एक कलाकार के प्रति आदर और सहानुभूति के भाव जगाता है । नटसम्राट की भूमिका के लिए बहुत ही सशक्त अभिनेता का होना ज़रूरी है जिसके आंगिक ओर वाचिक अभिनय में निपुण होने के साथ अभिनय पर नियन्त्रण भी हो । आलोक चटर्जी नटसम्राट के मर्म को गहराई तक जाकर समझते हैं । रंगमंच का लंबा अनुभव नाटक के हर दृश्य में अभिनेता के व्यक्तिगत संघर्ष को एक एक कर खोल कर रख देता है , अभिनेता के लिए ये भूमिका करना यानी एक मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से गुजरना है। आलोक चटर्जी का मंच पर एक एक कदम ओर एक एक सांस नए अभिनेताओं के लिए एक सिलेबस है ,, उनकी स्पीच में तूफानी लहरों सी उठा पटक भी है गरज भी है और तालवाद्य भी है ,,, यही नहीं उनका मौन व  चेहरे के असहाय भावों से अपनी बात रखना अदभुत है ।

निर्देशक जयंत देशमुख तो हर बारीक चीज़ का रेखांकन करने से नहीं चूकते ये उनकी योग्यता भी है और शौक़ भी । जयंत देशमुख की छवि हमेशा से एक सेलिब्रिटी की रही है । रंगमंडल में रहते हुए भी शौकिया कलाकारों को सहयोग करके वो एक शुद्ध ज़मीनी कलाकार भी बने रहे । सेट, लाइट, अभिनय, वस्त्र, निर्देशन , पेंटिंग, रंग , कविता और संगीत हर चीज़ में जयंत देशमुख की समझ कमाल की है और ये सारी विधाए किसी ने उनपर थोपी नहीं ओर न ही मजबूरी में ओढ़ी गयी है अपितु स्वयं से आगे बढ़कर अर्जित  की हैं । यही कारण है कि सिनेमा में सक्रिय रहते हुए श्री जयंत देशमुख अपनी कला को रंगमंच के माध्यम से प्रदर्शित करते रहते हैं ।

Tuesday, May 16, 2017

"इप्टा" गुना की कार्यशाला में फिल्म अभिनेता महेंद्र सिंह रघुवंशी

गुना। भारतीय जन नाट्य संघ "इप्टा"की गुना इकाई के 17 बे बाल एवं युवा अभिनय कार्यशाला के 15वे दिन मुंबई से आये रंगकर्मी एवं फिल्म अभिनेता श्री महेंद्र सिंह रघुवंशी ने शिविर के बच्चों ,युवाओं से चर्चा की श्री रघुवंशी द्वारा इप्टा के आजादी के पूर्व से आजतक के सामाजिक योगदान को बताते हुए टी.व्ही.,सिनेमा एवं अन्य मिडिया के गिलेमर से आज के युवाओं में आये भटकाव ,नाटकों में दर्शकों की कमी के लिए जनता से सीधे संवाद हेतु समसमायक विषयों पर नुक्कड़ नाटक कर जनता को एक अच्छा दर्शक बनाया जा सकता है।

श्री रघुवंशी भारत भवन में कलाकार रह चुके हैं आपने कबीर,शांति, भारत एक खोज के कई एपिसोड में काम किया है । लगभग 15-20 फिल्म में काम किया है।उन्होंने नाट्य कला एवं अभिनय से सम्बंधित बच्चों के सवालों के जवाब देते हुए अपने छोटे से गाँव से मुंबई तक सफ़र को साझा किया।