Monday, June 25, 2018

प्रभाकर चौबे का कॉलम अब नहीं लिखा जाएगा

- ललित सुरजन

बीते सोमवार याने 18 जून को मैंने कहा- आज तुम्हारा कॉलम छपा है। अगले हफ्ते का कब लिखोगे। रायपुर के एम्स अस्पताल के आपातकालीन चिकित्सा कक्ष में रोगशैय्या पर पड़े उनका जवाब था- तुम्हारी तुम जानो। मैंने अपना काम कर दिया है। इतने सालों में एक बार भी नागा नहीं किया। उन्हें बोलने में तकलीफ हो रही थी, लेकिन तेवर वही थे। अगली सुबह बेटे जीवेश से कहा- पैन-कागज लाकर दो, कॉलम लिखना है। वे मौत से लड़ रहे थे। शायद जानते थे कि जीत नहीं पाएंगे, किंतु आखिरी साँस तक हार मानने के लिए तैयार नहीं थे। चंद दिनों की बीमारी में शरीर कमजोर हो गया था, दवाईयां चल रही थीं, जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे जीवन आगे बढ़ रहा था। ऐसे में कॉलम कहां से लिख पाते!

18 जून को प्रकाशित लेख उनका अंतिम लेख सिद्ध हुआ। इसे उन्होंने घर में ही बिस्तर पर लेटे-लेटे जीवेश के सहयोगी दुर्गेश को डिक्टेशन देकर लिखवाया था। इसके पहले के लेख हेतु छोटे बेटे आलोक को डिटेक्शन दिया था। ये प्रभाकर चौबे थे- सच्चे मायनों में कलम के सिपाही। वे यश के लिए, पद के लिए, धन के लिए नहीं लिखते थे। उनका एकमात्र मकसद था कि उनके विचार आम जनता तक पहुंचना चाहिए। लेखनी समाज के प्रति ऋण उतारने का माध्यम थी।

प्रभाकर चौबे देशबन्धु के प्रारंभ काल याने 1959 से ही अखबार के साथ जुड़ गए थे। यह रिश्ता उन्होंने जीवन भर कायम रखा। हरिशंकर परसाई का अस्सी प्रतिशत लेखन देशबन्धु में प्रकाशित हुआ तो प्रभाकर चौबे का पंचानवे प्रतिशत। साठ साल तो नहीं, लेकिन लगभग अठ्ठावन वर्षों तक प्रभाकर का लिखा देशबन्धु में प्रकाशित होता रहा- पत्र, कविताएं, व्यंग्य, लेख, कहानियां, उपन्यास, एकांकी, रिपोर्ताज, निबंध, गरज यह कि हर विधा में उन्होंने लिखा और खूब लिखा। परसाईजी की एक पुस्तक हँसते हैं, रोते हैं का शीर्षक उधार लेकर उन्होंने एक स्तंभ लिखा शुरू किया जो अनेक सालों तक सप्ताह में दो बार प्रकाशित होता रहा। 1988-89 में जबलपुर यात्रा के दौरान प्रभाकर और मैं नगर में प्रतिष्ठित समाजसेवी चिकित्सक डॉ. जे.एन. सेठ से मिलने गए। प्रभाकर चौबे का परिचय पाते ही वे उछल पड़े। अरे भाई, आपका कॉलम तो मैं नियमित रूप से पढ़ता हूं और सबको पढ़वाता हूं। यह थी एक पाठक की प्रथम परिचय में प्रतिक्रिया। ऐसे और भी अनुभव हैं।

एक रात रायपुर के रंगमंदिर से कोई नाटक देखकर हम लौट रहे थे। कोई पंद्रह साल पुरानी बात होगी। हम दोनों रिक्शे में बैठे बात करते चले आ रहे थे। अग्रसेन चौक पर रिक्शे से उतरे। चालक ने पूछा- सर! आप प्रभाकर चौबे हैं। हां में उत्तर मिला तो वह रिक्शे का किराया लेने से मना करने लगा। आपके लेख मैं हमेशा पढ़ता हूं। सोचता हूं कोई तो है जो हमारे जैसे गरीबों के बारे में लिखता है। वह पैसे लेने तैयार नहीं था। मैंने जबरन यह कहकर पैसे थमाए कि इनका किराया मत लेना, मेरा किराया तो ले लो। ये प्रभाकर चौबे थे- मन, वचन, कर्म से एक। जैसा सोचते थे, वैसा ही जीवन जीते थे और वैसा ही लिखते थे। कहीं कोई खोट नहीं, एकदम पारदर्शी सोच; लेकिन राग द्वेष से हीन, न किसी का चरित्र हनन किया, न ओछी टिप्पणी की और न कभी घटिया चुटकुलेबाजी। उनके जैसे बेलाग लिखने वाले लोग, और वह भी जीवन में कभी डगमग हुए बिना, हां, बिना डगमग हुए, हमारे बीच कितने हैं?

व्यंग्य का नियमित स्तंभ लिखते हुए एक समय प्रभाकर के मन में विचार आया।  व्यंजना के बजाय सीधी-सीधी बात कहने का समय आ गया है। उनका सोचना था कि व्यंग्य में अन्तर्निहित तमाम शक्ति के बावजूद लोक शिक्षण के लिए आवश्यक हो गया है कि पाठकों के सामने खुलकर मुद्दे रखे जाएं। इस तरह सोमवार को उनके नियमित स्तंभ की शुरूआत हुई। इस कॉलम का हमने कोई नाम नहीं दिया। लगभग बीस साल लगातार चलने के बाद अब यह स्तंभ सदा के लिए बंद हो गया है।

प्रभाकर चौबे की जन पक्षधरता इन लेखों में बहुत स्पष्टता के साथ व्यक्त होती है। सन् नब्बे के दशक से भारत में जिस तरह से नवसाम्राज्यवादी तथा नवपूंजीवादी ताकतों ने अपने पैर जमाना शुरू किए, उससे प्रभाकर स्वाभाविकत: क्षुब्ध थे। वे जान रहे थे कि उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण का लुभावना नारा देकर ये ताकतें भारत को अघोषित रूप से अपना उपनिवेश बनाने का षड़यंत्र रच रही हैं। देश का सत्ताधारी वर्ग जिस प्रकार लोभ, लालच में पड़ गया है, मदांध हो गया है, उसे भी वे ताड़ चुके थे। अपने साप्ताहिक स्तंभ में उन्होंने सरल-सुबोध भाषा में जनता को आगाह किया। वे एक तरफ रामचरित मानस की चौपाईयां उद्धृत करते थे तो अक्सर मुक्तिबोध की कविता पंक्तियों से अपने तर्क को पुष्ट कर लेख समाप्त करते थे।

मैं पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि प्रभाकर चौबे हिंदी साहित्य नहीं, बल्कि वाणिज्य के विद्यार्थी थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें इनकम टैक्स इंस्पैक्टर की नौकरी मिल गई थी। लेकिन यह नौकरी उन्हें उसी तरह रास नहीं आई, जैसे परसाईजी को महकमा-ए-जंगलात में नौकरी करना नहीं जंचा।  प्रभाकर ने स्वाधीनता संग्राम के दौरान स्थापित राष्ट्रीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया और समय आने पर शाला के प्राचार्य बने और उसी पद से सेवानिवृत्त हुए। प्रभाकर रिटायर हो चुके थे। देशबन्धु में उनका लेखन बदस्तूर चल रहा था।  तभी हमने 1996 में सांध्य दैनिक 'हाईवे चैनल' निकालने की योजना बनाई। मेरे अनुरोध पर प्रभाकर चौबे प्रदेश के इस प्रथम संपूर्ण सांध्यकालीन पत्र के संपादक बने।

उन्होंने पूरी तन्मयता और परिश्रम के साथ अठारह वर्षों से अधिक समय तक यह दायित्व निभाया। वे प्रतिदिन संपादकीय लिखते थे। उनकी पत्नी मालती भाभी 2005 में बीमार पड़ीं तो अस्पताल में उनके सिरहाने बैठकर भी वे अपना काम करते रहे। मुझे अगर ठीक याद है तो 7 सितम्बर 2005 याने जिस दिन भाभी की अंत्येष्टि हुई, सिर्फ उस दिन उन्होंने संपादकीय नहीं लिखा। अगले दिन से वे घर से लिखकर भेजते रहे, जबकि घर में रिश्तेदारों व मातमपुर्सी के लिए आने वालों का तांता लगा रहता था। कोई स्थितप्रज्ञ ही ऐसा कर सकता था!

प्रभाकर चौबे ने इस एकाग्रता, तन्मयता, कर्मनिष्ठा, दायित्वबोध का परिचय जीवन में हर मोड़ पर, हर समय दिया। वे अशासकीय शिक्षकों के संगठन म.प्र. माध्यमिक शिक्षक संघ के महासचिव थे। अध्यक्ष थे स्व. मुरलीधर गनौदवाले।  एक वामपंथी, एक धुर दक्षिणपंथी। लेकिन संगठन के प्रति दोनों ने जिम्मेदारी बहुत समझदारी और ईमानदारी के साथ निभाई। राजनीति को बीच में नहीं आने दिया। उन्होंने अपनी शाला में भी आंदोलन किए, लेकिन प्रबंधन के प्रति कटुता नहीं पाली।

राइस किंग सेठ नेमीचंद प्रबंध समिति के अध्यक्ष  थे, उन्होंने प्रभाकर चौबे को वरिष्ठता के सिद्धांत पर प्राचार्य नियुक्त किया। इस पद पर भी प्रभाकर ने न तो अपने दायित्व में कोताही की और न अपने सिद्धांतों से समझौता किया। उनके साथ काम करने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं कह सकता था कि प्रभाकर चौबे ने किसी से अन्याय किया हो, दुराव किया हो, पीठ पीछे बात की हो, काम ठीक से न किया हो। उनकी फितरत में यह सब नहीं था। दरअसल, वे कई मायनों में निस्पृह व्यक्ति थे। जिन जनसंगठनों में वे सक्रिय रहे, वहां वे पहले एक कार्यकर्ता थे, फिर नेता। पद के लिए साथियों को आगे कर दिया, फिर किसी ने मार्गदर्शन मांगा तो ठीक, नहीं तो अपन अपने घर में भले।

प्रभाकर ने जितना विपुल लेखन साठ वर्षों की अवधि में किया, हिन्दी में फिलहाल उसकी मिसाल मिलना असंभव प्रतीत होता है। विभिन्न विषयों पर लिखे संपादकीय व अन्य रचनाओं की संख्या दस हजार के आसपास होगी। यह भी कमाल की बात है कि उन्होंने देशबन्धु के अलावा और किसी पत्र-पत्रिका के लिए लेखन नहीं किया।  एक अखबार और एक लेखक अठ्ठावन साल तक साथ-साथ रहे, यह सचमुच एक विश्व रिकॉर्ड है। लेकिन न उनका लिखना, न देशबन्धु का उन्हें छापना रिकॉर्ड बनाने के उद्देश्य से था।  वे मुक्तिबोध और परसाई के परंपरा के लेखक थे। प्रभाकर जितना लिखते थे, उतना पढ़ते भी थे। उनकी रुचि समकालीन राजनीति, अर्थनीति, दर्शनशास्त्र, इतिहास इन तमाम विषयों में थी। साहित्य की विधाओं में उनकी अधिक रुचि कथा साहित्य पढ़ने में थी। पत्र-पत्रिकाओं में वे सबसे पहले कहानियां ही पढ़ते थे। कोई रचना पसंद आ जाए और रचनाकार का फोन नंबर उपलब्ध हो तो फोन करके बधाई देने में देरी या कंजूसी नहीं करते थे। इस तरह देश के कितने ही नए लेखकों को उन्होंने खासकर प्रोत्साहित किया। वे फिर मुझे बताते थे कि फलानी पत्रिका में फलाने की कहानी छपी है। तुम भी पढ़ लेना।

एक दिलचस्प तथ्य है कि मैंने जब कोई नई कविता लिखी तो सबसे पहले प्रभाकर को ही सुनाई। 1996 में एक रात अचानक मेरी नींद खुली और मैं सात साल बाद लंबे समय से अधूरी पड़ी एक कविता को पूरी करने के लिए टेबल पर बैठ गया। सुबह चार बजे कविता पूरी हुई। अब बेचैनी थी कि प्रभाकर को सुना दूं। सुबह छह बजे नहीं कि मैंने फोन खटखटा दिया। प्रभाकर नींद में ही थे। मैंने कहा- कविता सुनो। लंबी कविता थी। उन्होंने सुनी और सजग प्रतिक्रिया दी- अच्छी है लेकिन आखिरी पैरा में झोल है। मैं निराश हो गया। कहा- यार! इतने साल बाद कविता लिखी पर तुम उसे खारिज कर रहे हो। खैर, मैंने कविता को नए सिरे से पढ़ा। प्रभाकर की राय ठीक लगी। कविता को संशोधित किया। उन्हें दुबारा सुनाई। जब प्रभाकर का अनुमोदन मिल गया तो संतोष हुआ कि वाकई मैंने एक अच्छी कविता लिख ली है। 'तिमिर के झरने में तैरती अंधी मछलियां'  मेरी प्रिय कविता है और उसका श्रेय प्रभाकर को ही है।

साभार: देशबन्धु

lalitsurjan@gmail.com

Sunday, June 3, 2018

Friday, June 1, 2018

समय-समाज के सवालों से कटता रंगकर्म

-राजेश चन्द्र

अमेरिका जैसे देश में ब्लैक थियेटर मूवमेन्ट या 'अश्वेत रंग आन्दोलन' का एक समृद्ध और गौरवशाली इतिहास है, और उसके महत्व और प्रासंगिकता से इनकार करना सम्भव नहीं है। अपने देश में भी महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में दलित रंगमंच एक समानान्तर रंगमंच की तरह दशकों से मौजूद है और उसने अलग धाराओं के रंगमंच पर भी गुणात्मक रूप से काफी प्रभाव डाला है। हमारे यहां हिन्दी रंगमंच में लोग पढ़ते नहीं। अगर पढ़ते तो उन्हें पता होता कि भारत में दलित रंगमंच की शुरुआत सबसे पहले हिन्दी में ही हुई और यही से महाराष्ट्र होते हुए वह देश के दूसरे हिस्सों में पहुंचा। पेरियार ललई से लेकर माताप्रसाद और स्वामी अछूतानन्द हरिहर जैसे समर्थ नाटककारों और सामाजिक चिन्तकों ने दलित रंगमंच की मज़बूत बुनियाद रखी और उसे एक आन्दोलन का व्यापक स्वरूप दिया, सैकड़ों नाटक लिखे गये, गांव-गांव में दशकों तक उनके हज़ारों प्रदर्शन भी हुए, पर जातिवादी, सवर्णवादी और ब्राह्मणवादी इतिहासकारों एवं आलोचकों ने उनके योगदान को न सिर्फ़ अनदेखा किया, बल्कि उसकी कहीं शिनाख़्त तक नहीं होने दी। उनका यह भय समझ से परे नहीं है। इस भय का नज़ारा हमें आज भी ख़ूब होता रहता है, जब भी दलित रंगमंच की चर्चा छिड़ती है।

हिन्दी के रंगकर्मियों से अधिक कूपमंडूक रंगकर्मी शायद ही कहीं मिलें। उनका समय-समाज से, भारतीय भाषाओं के और विश्व साहित्य से, दर्शन और समाजशास्त्र की दुनिया में नित्य हो रहे बदलावों से कोई रिश्ता ही नहीं बनता। हाशिये के समाजों को लेकर दुनिया भर में कितना कुछ लिखा जा रहा है। पढ़ना-समझना चाहें तब न। आज कल इन्टरनेट पर भी दुनिया भर की सामग्री मौजूद है। ज्ञान की भूख होनी चाहिये। हम रात-दिन अनुदान लेने-निपटाने की फ़िक्र में रहेंगे तो दिमाग़ को नया कुछ भी जानने का अवकाश कहां मिलेगा! अपने इतिहाबोध से, परंपरा से, मनुष्यता की वैज्ञानिक वैचारिकी से, समाजशास्त्र और दर्शन से पीछा छुड़ा कर बाज़ार के अलावा और कहीं नहीं पहुंचा जा सकता।

विडम्बना देखिये कि जो रंगकर्मी या आलोचक जितना ही हमारे यहां स्थापित होता जाता है, वह जनता से, समय-समाज के सवालों से उतना ही कटता जाता है। अध्ययन से कोई नाता न रहे, तो समीक्षक की दृष्टि किसी नाट्य-प्रस्तुति के बाह्य आवरण में ही उलझ कर रह जाती है, वह उसके तड़क-भड़क में फंस जाता है और समीक्षक से प्रचारक की भूमिका में आ जाता है। कथ्य और उसकी वैचारिकी तक, उसके समाजशास्त्र और राजनीति तक जाने की वह ज़हमत ही नहीं उठाता। वरना किसी औसत और मूल्यहीन नाट्य प्रस्तुति के बारे में लिखते या बोलते हुए क्या कोई समीक्षक ऐसा कह सकता है कि जिसने यह नाटक नहीं देखा, उसका जीवन व्यर्थ हो गया ? नाटक और रंगमंच की दुनिया में एक से बढ़ कर एक सृजनात्मक उत्कृष्टताएं सामने आ रही हैं, आती रहती हैं, पर आपको जानकारी नहीं होगी तो आप ऐसे ही अनर्थकारी निष्कर्ष निकालते रहेंगे!

रंगकर्मी आज स्थापित कहां होना चाहता है? कहां पर मान्यता चाहता है? क्या जनता के बीच? नहीं। वह सारी कवायद करता है कि संस्कृति विभाग में, एनएसडी और अकादमियों में उसका दबदबा हो जाये, भारंगम तथा दूसरे महोत्सवों में उसका हर नाटक लग जाये, उसे किसी सरकारी कमिटि में रख लिया जाये, कोई पुरस्कार कहीं से भी और किसी भी तरह से मिल जाये बस! जनता से, दर्शकों से किसी रंगकर्मी को कोई सरोकार हो तो वह ग्रांट को ध्यान में रख कर नाटक क्यों चुने? महोत्सवों में झंडा गाड़ने की फिक्र में अपने काम से, विचारथारा से समझौता क्यों करे? सरकार और सरकारी संस्थानों का दरबार क्यों करे?

हिन्दी रंगमंच का बहुलांश आज भटकाव का शिकार है। पुनरुत्थानवादी विषयों वाले नाटक, मिथकों पर आधारित और वर्णवाद, ब्राह्मणवाद को प्रतिष्ठित करने वाले नाटक ज़्यादा हो रहे हैं क्योंकि इसके माध्यम से आप विशिष्ट वर्गों और सत्ताधारी वर्ग को साधना चाहते हैं। उनकी नज़र में आना चाहते हैं। ताक़त की दुनिया का हिस्सा होना चाहते हैं। रंगकर्मियों में सत्ताधारी राजनीतिक दल का भोंपू बनने की प्रवृत्ति पहले भी थी, पर इस बात का लिहाज़ रखा जाता था कि किसी फ़ासिस्ट, साम्प्रदायिक, मनुवादी, घृणा की राजनीति करने वाले और संविधान-विरोधी दल या संगठन से उनका कोई सम्बंध न रहे। आज तो इतनी बेहयाई चल रही है कि रंगकर्मी खुल कर घृणा और सामाजिक विभेद पैदा करने वाले दलों और संगठनों की शरण में दौड़ लगा कर पहुंचने की होड़ में हैं। ऐसा किसी वैचारिक कारण से नहीं बल्कि जल्दी से जल्दी धन और ऐश्वर्य के असीमित साधन इकट्ठा कर लेना ही उनका इकलौता मक़सद है। इसलिये वे भी बदलती सत्ता के साथ कदमताल करते हैं। सत्ता कांग्रेस की हुई तो कांग्रेस के साथ, भाजपा की हुई तो भाजपा के साथ. ये प्रवृत्तियां रंगमंच के लिये अत्यंत घातक सिद्ध हो रही हैं। केवल यह कह देने से कि रंगमंच पहले से ही दलित कला की हैसियत रखता है, या वंचितों का पक्षधर है, आज काम नहीं चलने वाला है। हमें यह भी देखना होगा कि तथाकथित वंचितों के पक्षधर रंगमंच में समाज के दलित, आदिवासी, पिछड़े, स्त्रियों की उपस्थिति कितनी है? यह उपस्थिति भागीदारी के तौर पर भी देखनी होगी और विषय के तौर पर भी। जो लोग रंगमंच की मुख्यधारा को संचालित-निर्देशित करते हैं, उनमें से कितने दलित हैं, कितने आदिवासी, कितनी स्त्रियां हैं? दलित और आदिवासी यदि विषय के तौर पर, चरित्र के तौर पर इस मुख्यधारा में आ रहे हैं तो उनका चित्रण किस तरह से किया जा रहा है? क्या उनके साथ बराबरी का व्यवहार हो रहा है? क्या उनके मुद्दों को ईमानदारी से और केन्द्रीयता के साथ लाया जा रहा है? उनके प्रति नाटककार, निर्देशक और अभिनेता का नज़रिया और बर्ताव कितना सम्मानपूर्ण है? क्या दलितों-वंचितों और आदिवासियों का हम हमेशा दीन-हीन, बेचारे के रूप में चित्रण करते हैं? क्या उनकी जीवन-स्थितियों के प्रति हम दया और करुणा का भाव प्रदर्शित कर रहे हैं? दलितों को आज आपकी दया और करुणा की ज़रूरत नहीं है। वे उस पर रात-दिन थूकते हैं। वे मानवोचित गरिमा और सम्मान चाहते हैं। बराबरी का हिस्सा और व्यवहार चाहते हैं। आप नहीं देंगे तो वे छीन लेंगे। अगर आपका रंगमंच उन्हें यह सब नहीं दे सकता तो दलितों के लिये आपका रंगमंच बेकार है। वे अपना रंगमंच बना रहे हैं और बना लेंगे। आप अपने ब्राह्मणवादी, सवर्णवादी और मर्दवादी रंगमंच की ख़ैर मनायें।

Thursday, May 31, 2018

हमारे साथी बलराज

* जावेद अख्तर खां

1 मई, 2018 को बलराज साहनी के जन्म के 105 साल पूरे हो जाएँगे. आज उनको हम एक बेहतरीन कलाकार और संवेदनशील इंसान के रूप में याद करते हैं. मानव-चरित्रों के संवेदनशील अंकन से ही उनकी अभिनय-कला इतनी ऊँचाई तक पहुँच सकी, लेकिन साथ ही उस अभिनय में एक बारीकी और गहराई भी है, जैसाकि ख़ुद बलराज साहनी ने लिखा है—‘अभिनय-कला में एक गहराई होनी चाहिए,’ और यह आती है गहरी मानवीय संवेदनशीलता और सक्रिय सामजिक संलग्नता से. इसलिए उनकी संजीदा-जीवंत अभिनय-कला या उनके ख़ुद के जीवन की सरगर्मी हमें धड़कती हुई कई मानव-ज़िंदगियों की ओर ले जाती है. धरती के लाल, हमलोग, सीमा, गर्म कोट, हीरा-मोती, भाभी, हक़ीक़त, काबुलीवाला, दो रास्ते, अनुराधा, वक़्त, संघर्ष, दो बीघा ज़मीन, गर्म हवा-जैसी फिल्मों में उनके अभिनय में ये ही मानव-ज़िंदगियाँ धड़कती हैं. बहुत कम ऐसे अभिनेता हैं, जो जितने अपने अभिनय की सूक्ष्मता-निखार-विविधता से जाने जाते हैं, उतने ही अपने लगावों से. इसलिए आज भी बलराज अपने अभिनय की सहजता-मार्मिकता के लिए जितनी शिद्दत से याद किए जाते हैं, उतनी ही शिद्दत से वे एक बेहतरीन और ज़िम्मेदार नागरिक और इंसान के तौर पर याद किए जाते हैं. यह ‘नागरिकता’ और ‘इंसानियत’ या व्यक्तित्व की यह भलमनसाहत, करोड़ों जन की पीड़ा से एकात्म होने की यह चाहत ही हमें उनके और ज़्यादा क़रीब ले जाती है. ऐसे व्यक्तित्व पर समय अपनी धूल नहीं डालता, बल्कि जैसे वह स्वयं उसको और निखार कर हमारे सामने ला देता है, ताकि हम यह याद रख सकें कि हम दरअसल किसके वारिस हैं. ‘दो बीघा ज़मीन’ में उनके अविस्मरणीय अभिनय के बारे जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने जवाब दिया—मुझ पर दुनिया को एक ग़रीब, बेबस आदमी की कहानी बताने की ज़िम्मेदारी डाली गई है, और मैं इस ज़िम्मेदारी को उठाने के योग्य होऊँ या न होऊँ, मुझे अपनी ऊर्जा का एक-एक क़तरा इस ज़िम्मेदारी को निभाने में ख़र्च करना चाहिए. जब किसी विदेशी फिल्म समीक्षक ने उनके अभिनय की अद्वितीयता पर यह टिप्पणी की कि ‘बलराज साहनी के अभिनय में एक जीनियस की छाप है’, तो बलराज ने कहा—यह जीनियस उस रिक्शेवाले की देन है.और जब किसी दूसरे समीक्षक ने यह टिप्पणी की कि ‘बलराज साहनी के चेहरे पर एक पूरी दुनिया दिखाई देती है’, उन्होंने पूरी विनम्रता से कहा—यह दुनिया उस रिक्शेवाले की थी. दरअसल यही बलराज साहनी के अभिनय की विरासत है.

बलराज साहनी की विरासत का एहसास हमें और ज़्यादा ज़िम्मेदार बनाता है, अपनी अभिव्यक्ति की ईमानदारी के प्रति और सामाजिक ज़िम्मेदारी के प्रति भी. इसलिए उनकी विरासत या धरोहार केवल यह नहीं है कि ‘अभिनय-कला’ को कितनी बारीकी से प्रस्तुत किया जाए, यह अकेली ‘अभिनय की बारीकी’ उनकी विरासत की एकांगी समझ देती है. अभिनय की बारीकी हमें अब भी कई जगह देखने को मिल ही जाती है, रंगमंच से लेकर सिनेमा जगत में. संभव है, जैसाकि बलराज साहनी अपने सक्रिय जीवन-काल में स्वयं अनुभव करते थे और यह उन्होंने लिखकर बताया भी है कि उनसे बेहतरीन अभिनेता मौजूद हैं, आज भी कई समर्थ अभिनेता हमें दिख ही जाते हैं, लेकिन समय जिस तरह बलराज साहनी के अभिनेता-व्यक्तित्व को हमारे सामने और भी ज्यादा निखार कर सामने ला देता है, वह मौजूदा दौर में अभिनेता की कला और उसकी सामाजिक-राजनीतिक ज़िम्मेदारी को समझने में हमें और भी ज्यादा सजग बनाता है.

अपने साठ साल के जीवन में बलराज साहनी तैंतीस की उम्र में फिल्मों में आए. लेकिन इसके पहले उन्होंने जीवन का भरपूर अनुभव हासिल किया. अपनी जन्मस्थली रावलपिंडी से लाहौर, शिमला, कलकत्ता, शान्तिनिकेतन, लन्दन से बम्बई तक का सफ़र उतार-चढ़ाव से भरा था. समृद्ध व्यापार घराने में जन्मे बलराज ने फ़ाकाकशी के दिन भी देखे, आर्य समाज से कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों तक पहुँचे, वर्धा के आश्रम में गाँधी के निकट रहे, खादी पहनी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सान्निध्य में रहते शान्तिनिकेतन में अध्यापकी की, चार सालों तक लन्दन में बीबीसी के संवाददाता और उदघोषक रहे, ‘इप्टा’ के संपर्क में आकर वे मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट पार्टी के नज़दीक आए. पंजाबी उनकी मातृभाषा थी, संस्कृत उन्हें बचपन में घुट्टी में मिली, उर्दू उनकी सहज भाषा थी, अंग्रेज़ी नाटकों में वे स्कूल-कॉलेज के दिनों में अभिनय करते, बंगला उन्होंने शान्तिनिकेतन में सीखी और आख़िरी दिनों तक कई भाषाओँ को सीखने की उनकी ललक बनी रही. इस तरह वे एक बहुत बड़ी दुनिया से जुड़े. इस दुनिया में ग़ैर-बराबरी है, युद्ध है, नफ़रत और हिंसा है, साथ ही न्याय के लिए लड़नेवाले लोग भी हैं, जिनके साथ उन्होंने ख़ुद को जोड़ा. वे ग़रीबी, दुःख, लाचारी, विस्थापन में गुज़र कर रहे लोगों के क़रीब गए, यही वजह है कि वे ऐसे कलाकार बन सके. यही लगाव उन्हें गाँधी तक ले गया और वे ‘इप्टा’ का अंग बने. यही जज़्बा सिने-जगत के इस मशहूर कलाकार को सड़कों पर ले आया, जहाँ उन्होंने मानवता की खिदमत के लिए अपने कलाकार-साथियों के साथ अपने दामन फैलाए.

बलराज साहनी एक विलक्षण अभिनेता तो थे ही, वे एक गम्भीर लेखक-विचारक भी थे. शुरू में तो वे लेखन में ही पूरी तरह रम जाना चाहते थे, लेकिन तब शायद भारतीय सिनेमा का वह अध्याय अधूरा रहता, जो दरअसल यथार्थवादी-समाजवादी-नए सपनों का है. हिन्दी-अंग्रेजी में लेखन करते हुए जीवन के अंतिम दिनों में वे पूरी तरह पंजाबी भाषा में लेखन में रम गए थे. मेरा पाकिस्तानी सफ़रनामा, मेरा रूसी सफ़रनामा, गैरजज़्बाती डायरी, सिनेमा और स्टेज, मेरी फ़िल्मी आत्मकथा, एक सफ़र, एक दास्तान-जैसी पुस्तकें हिन्दी और पंजाबी दोनों भाषाओँ के साहित्य की निधियाँ हैं. उन्होंने ‘कुर्सी’, ‘क्या यह सच है, बापू’ जैसे कुछ नाटक भी लिखे, ‘बाज़ी’ जैसी चर्चित फिल्म का लेखन किया, इस तरह उन्होंने अपने लेखकीय व्यक्तित्व को पूरी तरह कभी दबने नहीं दिया. 

बलराज साहनी का रंगमंच, रेडियो और सिनेमा का लंबा अनुभव था, और उन्होंने एक सजग बुद्धिजीवी की तरह इन कला-माध्यमों की विशिष्टताओं को समझा था. अपने व्यावहारिक अनुभवों को समेटते हुए उन्होंने कई जगह व्याख्यान दिए, छोटे-बड़े कई लेख लिखे. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के दीक्षांत-समारोह में दिया गया उनका व्याख्यान तो उनकी प्रखर बौद्धिकता की एक नज़ीर ही है, कई ट्रेड यूनियन के मंच पर दिए उनके व्याख्यान उनकी प्रतिबध्दता की मिसाल हैं. इन व्याख्यानों-लेखों से गुज़रते हुए अपने समय के सर्वाधिक जागरूक संस्कृतिकर्मी की मेधा समझ में आती है और यह भी समझ आता है कि उनके अभिनय की गहराई का सम्बन्ध उनकी इस सजग बौद्धिकता से है. इसी सजग बौद्धिकता से वे अभिनय–कला की बारीकी को समझ सके, अपनी कमजोरियों को पहचानना सीखा, महान कलाकारों की क़द्र की, अपने अभिनय को निखारने के लिए श्रम किया, अभिनेता की सामाजिक-राजनीतिक भूमिका को समझा. इस आलेख में हम बलराज साहनी के इस पक्ष को भी समझने का प्रयास करेंगे.

जैसा पहले कहा गया—बलराज साहनी ने रंगमंच, सिनेमा और रेडियो—तीनों माध्यम में काम किया, ख़ास तौर पर रंगमंच और सिनेमा में तो उन्होंने अपनी अभिनय-कला को बुलंदियों तक पहुँचा दिया. हालाँकि सिनेमा के सन्दर्भ में उन्हें इस बात का कई बार अफ़सोस रहा कि निर्देशन के क्षेत्र में वे अपनी सामाजिक जवाबदेही का काम ज़्यादा बेहतर तरीक़े से निभा सकते थे, लेकिन जिन दर्शकों-समीक्षकों ने फिल्मों में उनका अभिनय देखा है, उन्होंने हमेशा उनकी कला का बहुत ऊँचा मूल्यांकन किया है, साथ ही वे दर्शक-समीक्षक यह भी महसूस करते रहे हैं कि बलराज की अभिनय-कला विशिष्ट अंदाज़ की है, जिसका सम्बन्ध अपने समय और समाज से है. बलराज साहनी ने ख़ुद अपना मूल्यांकन जैसा भी किया हो (वे अपने काम के ख़ुद एक प्रखर आलोचक थे), सिने-दर्शकों के लिए वे आज भी सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति सजग एक संवेदनशील अभिनेता ही हैं. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि बलराज मानते थे कि कलाकर्म, चाहे वह रंगमंच की कला हो, या सिनेमा की कला, उसकी सचाई इस बात में निहित है कि वह (अभिनय) पूरी मेहनत से, पूरी आज़ादी और इस एहसास के साथ किया जाए कि इससे समाज को लाभ होगा. वे कहते हैं—हमारे पुरखों ने तो यहाँ तक कहा है कि जीना भी कला है और मरना उससे भी बड़ी कला है, बशर्ते कि मनुष्य गाँधी या भगत सिंह की तरह मर सके.  गाँधी, या भगत सिंह की तरह मरने का बलराज साहनी का आशय क्या है, यह अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है, दरअसल यह अपनी कला को निरंतर ऊँचे आदर्शों से जोड़े रखना ही है.

बलराज साहनी जानते थे कि भले ही सिने-जगत में अभिनेता ‘स्टार’ की छवि पा ले, किन्तु अंततः उसकी कला एक कला का नाम नहीं, बल्कि यह अनगिनत कलाओं के समूह का नाम है—वास्तव में फिल्म एक सामूहिक कला है, जिसमें हज़ारों विभिन्न कलाकार शरीक होते हैं. इसी तरह नाटक भी एक सामूहिक कला है. बलराज साहनी ने जो अनुभव अर्जित किया, उसने उन्हें इस नतीजे पर पहुँचाया कि बिना सामुदायिक बोध और भ्रातृत्व भाव के ये कलाएँ सृजनात्मक नहीं रह जातीं—फ़िल्म और नाटक दोनों की कामयाबी का रहस्य यही है कि कलाकारों ने किस हद तक मिलकर, ख़ुशी से, भ्रातृभाव से, कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है. ... नाटक मंडलियाँ अपने-आप में एक बिरादरी हैं. यह बिरादरी जितनी मज़बूत होगी, अपनी सामूहिक रचना और सामाजिक ज़िम्मेदारी को जितना ज़्यादा महसूस करेगी, उतना ही उसका काम सफल होगा.

अभिनय की सहजता और स्वाभाविकता, सजीवता, चरित्रांकन की स्पष्टता और सटीकता, यथार्थवादिता, कलात्मक संयम और संवेदनशीलता—ये अभिनेता बलराज साहनी की कुछ विशिष्टताएँ हैं. ‘अभिनय’ को लेकर उनकी कुछ मान्यताएँ बहुत स्पष्ट थीं. उनके छोटे भाई हिन्दी के मूर्द्धन्य कथाकार-नाटककार-अभिनेता भीष्म साहनी ने अपने संस्मरण में बताया है कि बलराज के आरंभिक स्कूल-कॉलेज के दिनों में उन्हें ऐसे प्रतिभावान अध्यापक मिले, जिन्होंने यह राह उन्हें दिखाई और वे आरम्भ से ही अभिनय की सहजता-स्वाभाविकता के क़ायल हो गए. अपने वक्तव्य और लेखन में बलराज साहनी बार-बार हैमलेट’ का वह संवाद ज़रूर उद्धृत करते, जिसमें हैमलेट अभिनेताओं को उनकी कला के बारे में बता रहा है—देखो, स्टेज पर खड़े होकर इस तरह बोलो कि सुनने वाले को रस आए, यह नहीं कि उनके कान फट जाएँ. तुम अभिनेता हो, ढिंढोरची नहीं. और देखो, हाथ को तलवार की तरह मार-मारकर हवा को मत चीरना. अभिनेता को चाहिए कि वह अपने मन को हमेशा क़ाबू में रखे, चाहे उसके अंदर भावनाओं के तूफ़ान क्यों न उठ रहे हों. जो अभिनेता अपनी भावनाओं को क़ाबू में रखकर उन्हें संयम से व्यक्त नहीं कर सकता, उसे चौराहे पर खड़ा करके चाबुक मारनी चाहिए. ... और देखो, फीके भी मत पड़ जाना. ‘अंडर एक्टिंग’ करना भी अच्छा नहीं होता. ख़ुद अपनी सूझ-बूझ को अपना उस्ताद बनाओ, और उसी के अनुकूल चलो. अपनी चाल-ढाल को, अपने संकेतों को शब्दों के अनुकूल बनाओ, और शब्दों को संकेतों के अनुकूल...  

‘रंगमंच’ और ‘सिनेमा’ के अभिनय की टेक्नीक के फ़र्क को बलराज बखूबी समझते थे, लेकिन दोनों का वास्तविक उद्देश्य, उनकी दृष्टि में, साधारण जन के जीवन में नयी उत्प्रेरणा लाना है, इसको लेकर वे बहुत स्पष्ट थे. वे यह मानते थे—सिनेमा जैसी शक्तिशाली कला को केवल व्यापारिक ढंग से इस्तेमाल किया जाए, तो बड़े ख़तरनाक नतीजे निकल सकते हैं. वे ‘टेक्नीक’ की दृष्टि से अत्यंत सजग अभिनेता थे. उनके हिसाब से रेडियो, रंगमंच और सिनेमा तीनों अलग-अलग माध्यम या साधन हैं. इन माध्यमों की विशिष्ट ‘टेक्नीक’ की जानकारी और उसे अभिनय में साधना हर अभिनेता की कलात्मक ज़िम्मेदारी है. अक्सर वे इसकी तुलना ‘निशाने पर वार करने वाले बम को ले जाने वाले साधन’ से करते, वे कहते, जैसे रॉकेट, हवाई जहाज़ या किसी और साधन से सही निशाने पर बम को पहुँचाया जाता है, बम अपने निशाने पर पहुँचकर फट जाता है, वैसे ही फिल्म, रंगमंच या रेडियो में किया जानेवाला अभिनय है, ‘साधन’ को तो समझना अनिवार्य है—अभिनेता जो कुछ रंगमंच पर करता है, अगर फिल्म के लिए उसे कैमरे के सामने हू-ब-हू दुहरा दे, तो उसका नतीजा अस्वाभाविक और हास्यास्पद होगा. अभिनेता स्वयं से कहेगा—मैं वही व्यक्ति हूँ, और मेरे हाव-भाव भी वही हैं, जो रंगमंच पर थे; लेकिन क्या बात है कि दर्शक पसंद नहीं कर रहे? इसका जवाब है कि फ़िल्म के लिए अभिनय करते समय सही निशाने पर पहुँचने के लिए उसे किसी दूसरे साधन का प्रयोग करना चाहिए था, और अभिनय-शैली को उसके अनुसार बदलना चाहिए था... बलराज साहनी ने ‘काबुलीवाला’ की भूमिका रंगमंच पर भी की, फ़िल्म में भी और रेडियो-नाटक में भी. उनका इन तीनों माध्यमों का भिन्न अनुभव बहुत महत्वपूर्ण है. हर बार माध्यम बदलते ही अभिनय-सम्बन्धी नई समस्याओं को सुलझाना पड़ता है. रंगमंच पर अभिनय करते समय सारे दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचे रखने के लिए अतिरिक्त शारीरिक सक्रियता की ज़रूरत होती है, फ़िल्म में रंगमंच की-सी हरकत अभिनय को बिगाड़ देती है, क्योंकि यहाँ उस अभिनेता को केवल कैमरा ही देख रहा होता है और, ...रेडियो-नाटकों में मैं हमेशा संवाद वाला कागज़ सामने रखकर ही बोला करता था. वह कागज़ मुझे श्रोताओं, स्टूडियो और वहाँ के साज़-सामान से निर्लिप्त रखता था. रंगमंच पर जो प्रभाव मैं अपनी शारीरिक हरकतों से पैदा करता था, संवाद वाला कागज़ सामने देखकर मैं वही प्रभाव अपनी आवाज़ द्वारा पैदा करने लगता था.

बलराज साहनी अभिनेता की अद्वितीयता के क़ायल नहीं थे. वे उन सारे कामों को ‘कला’ मानते थे, जो व्यक्तिगत ईमानदारी और सचाई से किये जाएँ, जिनको करते समय लगातार अपने कामों को सुधारने-ऊपर उठाने के लिए कड़े श्रम करने का जज़्बा हो और जो व्यापक मानव-समाज के लिए उत्प्रेरक हो—उनकी दृष्टि में तब ऐसा हर काम ‘कला’ है. वे ‘कलाकार जन्मजात होता है’ के सिद्धांत को सिरे से नकारते हैं—मैं आज तक जन्मजात कलाकार होने के सिद्धांत को मान नहीं सका हूँ. मैं इस सिद्धांत को न केवल अस्वीकार करता हूँ, बल्कि कलाकार के लिए बहुत हानिकारक मानता हूँ, क्योंकि यह उसे अहंकारी, आडंबर, आत्म-प्रदर्शन और आलस्य का शिकार बना देता है.

बलराज साहनी पर ‘समाजवाद’ का गहरा असर था. ‘इप्टा’ के आन्दोलन से जुड़ने के दौरान वे मार्क्सवादी विचारधारा और कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आए. रवीन्द्रनाथ ठाकुर, गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और भगत सिंह उनके आदर्श थे. यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व में गहरी मानवीयता-सादगी-ऊँचा आदर्श दीखता है. वे मानते थे कि कलाकारों में दोस्ती और बराबरी का रिश्ता होना चाहिए. यही वजह है कि फ़िल्मी जीवन की चमक-दमक और स्टारडम की छवि उनमें वितृष्णा जगाती, हालाँकि वे स्वयं उसका एक हिस्सा रहे थे, वे बार-बार यह प्रयास करते कि उन सैकड़ों छोटे-छोटे कलाकारों, टेक्नीशियनों, कामगारों से जुड़ सकें, जिनकी वजह से यह फ़िल्मी दुनिया कायम है. यह सबको मालूम है कि स्वतंत्रता-प्राप्ति के तुरंत बाद वे अपनी राजनीतिक-सामजिक-ट्रेड यूनियन गतिविधियों और ‘इप्टा’ से अपने सक्रिय जुड़ाव के कारण पुलिस की निगरानी में थे और ‘हलचल’ की शूटिंग उन्होंने अपनी गिरफ़्तारी के दिनों में की थी. आज़ादी के 25 साल बीत जाने के बाद भी गैर-बराबरी, भेद-भाव और साधारण जन के जीवन में अभाव-दुःख का बने रहना उन्हें बहुत विचलित करता—समाजवाद के दावे करनेवाली सरकार आज भी कलाकारों के साथ वैसा ही सलूक कर रही है, जैसाकि अंग्रेज़ों के ज़माने में होता था. हालाँकि कि वे खुद पं. नेहरू से अत्यधिक प्रभावित थे, एक स्थान पर तो उन्होंने लिखा है कि समाजवाद की उनकी अवधारणा हू-ब-हू वही है, जो पं. नेहरू की है. लेकिन, दरअसल वे एक जाग्रत मस्तिष्क वाले ऐसे कलाकार थे, जिसने कभी भी विचारधारा या व्यक्तित्व के प्रभाव में आस-पास के यथार्थ से आँखें नहीं मूँद लीं, उन्हें यदि अपनी राष्ट्रीय सरकार में कोई खोट नज़र आई, तो उसे अनदेखा कभी नहीं किया. एक समय तो उन्होंने ‘इप्टा’ की कम्युनिस्ट पार्टी पर निर्भरता की कठोर आलोचना की. वे इस मामले में बिलकुल स्पष्ट थे कि कलाकार को स्वाधीनचेता होना चाहिए और जनता के दुःख के नज़दीक होना चाहिए. आज़ादी के पच्चीस साल बाद की यह टिप्पणी उनकी आलोचना की धार को सामने लाती है—आज देश की सामाजिक अथवा राजनीतिक हालत बहुत ही ख़राब हो चुकी है. वे पहले के तूफ़ान ख़त्म हो चुके हैं. हर तरफ़ निराशा और किंकर्तव्यविमूढ़ता नज़र आती है. हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन की तमाम बुनियादी कमज़ोरियाँ सामने आ रही हैं. ...नाटक का उद्देश्य है, जनता का मार्ग-दर्शन. ऐसे समय में जबकि हमारे देश में भूख, ग़रीबी और शोषण का हाहाकार मचा हुआ है, किसी भी कलाकार को टेक्नीक के रेशमी खोल में बंद हो जाने का अधिकार नहीं है. ऐसा करके वह अपनी कला का अपमान करता है....

(इप्टा प्लैटिनम जुबली वर्ष के तहत पटना इप्टा और नटमंडप के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम "हमारे साथी बलराज" कार्यक्रम के दौरान चर्चा हेतु वरिष्ठ अभिनेता डॉ० जावेद अख़्तर खां (संपर्क:ई-मेल: javednatmandap@gmail.com)द्वारा प्रस्तुत आलेख। आलेख लखनऊ से प्रकाशित होने वाली पत्रिका। ....... से साभार प्रस्तुत। विस्तृत चर्चा देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें:https://www.youtube.com/watch?v=yQRmesWyoOk&t=1s)

Wednesday, May 30, 2018

मुंगेली की सड़कों पर बांस गीत की मधुर तान

-डॉ. दीपक पाचपोर
अपने गृहनगर मुंगेली के रास्तों पर मैं इसी 28 तारीख को भटक रहा था कि मुझे पंजूराम बरेठ मिल गए, जो घूम-घूमकर छत्तीसगढ़ का लोक वाद्य बांस बजाते हैं और उसकी धुन पर गाते भी हैं। यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। ज्यादातर इसका प्रचलन अब गांवों में सिमटकर रह गया है। यदुवंशियों की यह सदियों पुरानी परंपरा है पर संगीत के क्षेत्र में बॉलीवुड और पाश्चात्य तौर-तरीकों के अतिक्रमण ने इसे विलुप्ति की कगार पर पहुंचा दिया है। अब इस क्षेत्र में बहुत कम लोग रह गए हैं। किसी के मरने पर होने वाले दशगात्र या बच्चे के जन्म होने के छठवें दिन होने वाले छठी समारोह में बांस गीत के कलाकारों को आमंत्रित कर उनसे गायन व बांस बजवाया जाता है। पंजूराम को छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा में वर्षों से चली आ रही कंठी राऊत, अजमन-कईना, रमला-कईना की कथाएं कंठस्थ हैं। वे इन्हें ही गाकर और उस पर बांस पर धुनें छेड़कर सुनाते हैं। पंजूराम को इसमें महारत है और उन्हें सुनना स्वयं को लोक जीवन से आबद्ध करना है।
वैसे तो पंजूराम बिलासपुर के अचानकपुर (चकरभाठा) के हैं पर वे बचपन से ही अपने पिता जूठेरराम के साथ मुंगेली, तखतपुर, बिलासपुर और उसके आसपास के गांवों में बांस गीत सुनाकर अपना पेट पालते आए हैं। अब भी वे पिता के सौंपे बांस और उनकी कला विरासत को संभाल रहा है। उन्होंने अपने पुत्र अर्जुन (25 वर्ष) को भी यही कला सिखाई है और उसका भी यही पेशा है। उनका भरा-पूरा परिवार है।
वे बताते हैं कि उनके पिताजी भी मुंगेली की दुकानों और घरों में घूम-घूमकर बांस गीत बजाते थे और गाते थे। विशेषकर दीवाली और दशहरे में उनकी अच्छी कमाई होती थी। पर ज्यादातर लोक परंपराओं की तरह अब यह कला भी धीरे-धीरे कम हो रही है। अब तो गिने-चुने दुकानदार ही उन्हें पैसे देते हैं। अलबत्ता, गांवों में उन्हें ज्यादा काम मिल जाता है। दशगात्र और छठी में हैसियत के अनुसार हजार से दो हजार रूपये 24 घंटे में मिल जाते हैं। साथ में कुछ कपड़े और अनाज भी। उनका मानना है कि अब तो नए-नए उपकरणों के कारण प्रत्यक्ष या जीवंत गायन के कार्यक्रम काफी कम रह गए हैं। वे कहते हैं- “घर-घर मा आइस मोबाईल-टीवी, बिगड़िन मियां-बीवी”।
पंजूराम कहते हैं कि सरकार को इसे संरक्षित करने के लिए ठोस उपाय करने चाहिए वरना यह परंपरा और बहुत ही मधुर वाद्य यंत्र भी एक दिन लुप्त हो जाएगा। इसे बजाने वाले और इसकी धुन पर गाने वाले बचेंगे ही नहीं। चूंकि इससे आजीविका नहीं चलती इसलिए इसके कलाकारों को दूसरे काम करने पड़ते हैं। यह परंपरा पहले से कम होती जा रही है इसलिए बांस गायकों की आय भी लगातार घट रही है। नईं पीढ़ी तो इससे विमुख ही हो रही है। छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से कुछ प्रयास जरूर किए जा रहे हैं पर वे और बढ़ाए जाने होंगे। उन्होंने बताया कि इसे एक बार जो भी बजाना शुरू करता है उसके लिए जरूरी है कि उसका वह नियमित अभ्यास करता रहे वरना कई तरह की शारीरिक समस्याएं होने लगती हैं, विशेषकर सीने में दर्द या सांस लेने में दिक्कत होती है।
आवश्यकता है पंजूराम जैसे कलाकारों को ज्यादा से ज्यादा सुना जाए और उनकी आय कम से कम इतनी हो कि वे अपने परिवार और लोक वाद्य की इस समृद्ध विरासत को बचाए रख सकें।

शब्दांकन व फोटो: डॉ. दीपक पाचपोर

Tuesday, May 29, 2018

जन नाट्य रचना प्रक्रिया पर सीमा-हरिओम से बातचीत

इंदौर। सीमा और हरिओम राजोरिया  मध्य प्रदेश में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं। अशोकनगर जैसे एक छोटे से शहर में रहते हुए उन्होंने लगातारकरीब ढाई दशकों से इप्टा के आदर्शों के मुताबिक प्रगतिशील जनसंस्कृति के विकास में अपना सहभाग किया है। अशोकनगर इकाई ने पिछले २५ वर्षों में एक और दो महीने के १४ नाट्य शिविर  आयोजित किये हैं जिनसे हज़ारों नए रंगकर्मी तैयार हुए हैं और उनसे सैकड़ों गुना अधिक दर्शक नाटक के ज़रिये उच्चतर मानवीय मूल्यों और कलाओं से संस्कारित  हुए हैं।  वे और उनके साथी निरंतरता, प्रयोगधर्मिता और चुनौतीपूर्ण संस्कृतिकर्म के लिए जाने जाते हैं।

३१ मई, २०१८ को वे इंदौर में हमारे साथ होंगे और हम उनसे जन नाट्य आंदोलन के अनुभवों को, इस आंदोलन के समक्ष मौजूद चुनौतियों और संभावित समाधानों पर एक-दूसरे के  विचारों को साझा करेंगे। 

हरिओम नाट्य लेखक, निर्देशक, गायक और अभिनेता होने के साथ ही हिंदी के एक समर्थ समकालीन कवि के रूप में भी जाने जाते हैं। तो उनकी मौजूदगी का लाभ लेकर हम उनकी कविताएँ भी सुनेंगे। उनकी रचना प्रक्रिया पर बातचीत सुनते हुए नए रचनाकार लाभान्वित होंगे।

स्थान- कैनरिस आर्ट गैलरी, 577/1 -ए, महात्मा गाँधी मार्ग, ट्रेजर आइलैंड के सामने इंदौर।
समय - 31 मई, 2018 को शाम 6 से 9 तक।