Wednesday, March 29, 2017

' मुग़ले आज़म ' के संस्मरण

-महेंद्र नेह
मित्रो , आज विश्व रंगमंच दिवस पर आपको रंगमंच के शिखर पुरुष प्रथ्वीराज कपूर के साथ तीन दिन तक निरंतर रहने , सीखने और उनके अनुभवों की साझेदारी का जो अवसर मिला , उसके कुछ संक्षिप्त अंश सुनाना चाहूँगा .

हुआ यूं कि मेरे नाट्य गुरू डॉ. बृज वल्लभ मिश्र की नियुक्ति कोटा में 1968 में निर्मित रिवॉल्विंग थियेटर - श्रीराम रंगमंच पर निर्देशक के पद पर होगयी . उनसे अपनी पसंद के कुछ कलाकार लाने को कहा गया तो वे मथुरा से मुझे तथा आगरा से सुरेन्द्र मोहन भाटिया को ले गए .

मिश्राजी के बड़े भाई गोपाल मुनि धार्मिक फिल्मों के साथ पृथ्वी थियेटर के भी प्रमुख कलाकार थे . बृज वल्लभ जी भी फिल्मों में काम करते थे , बाकी समय पापा जी के पास रंगमंच पर .......

कोटा में नियुक्ति होने पर मिश्राजी ने पापा जी से मंच देखने का आग्रह किया. उन्होंने इन शर्तों पर अपनी स्वीकृति दी कि वे कोई पब्लिक शो नहीं देंगे और केवल मंच के कलाकारों के साथ रहेंगे , मंच के अन्दर किसी अन्य को आने की अनुमति भी नहीं होगी . ऐसा ही हुआ .

प्रथ्वीराज जी अक्स़र मंच पर पालथी मार कर बैठ जाते और कहते मैं बूढा बैल हूँ , लेकिन वह बैल नहीं ,जिसने प्रथ्वी को अपने सींगों पर उठा रखा है . खूब हंसाते . नित्य एक घंटा सितार बजाते , एक दिन कहा - आओ , आज मैं आपलोगों को सितार सुनाता हूँ . उन्होंने सितार बजाने में पूरी ऊर्जा लगा दी , पसीने पसीने होगये ....हमसे पूछा कैसा लगा ? हमने कहा बहुत अच्छा , खूब तालियाँ भी बजाईं , वे बोले -क्या खाक अच्छा ? मै सितार बजा रहा था और अन्दर अन्दर रो रहा था ...अब कितना जियूँगा ? हद से हद ८-१० वर्ष , लेकिन फिर भी इस जीवन में रवि शंकर तो नहीं बन पाऊंगा .

उन्होंने एक और दुर्लभ सस्मरण सुनाया -पृथ्वी थियेटर के कलाकारों का ग्रुप किसान व् पठान नाटक लेकर लम्बी यात्राओं पर निकला हुआ था . एक दिन उनकी आवाज़ अचानक बंद होगई . हर संभव इलाज करा ने पर भी कोई लाभ न हुआ. आयोजकों ने कहा आज के शो के टिकिट बाँटें या नहीं ? उन्होंने इशारे से हाँ कर दी , मुख्य भूमिका पापा जी की ही थी . परदा उठने का समय हो गया , सभी ने कहा कि शो के केंसिल होने की घोषणा कर दें , पापाजी ने कहा रुको , मैं मेरे आराध्य शिव से आज्ञा लेलूँ ...उसके बाद उन्होंने परदा खोलने का इशारा कर दिया , मंच पर पहुंचते ही आवाज़ लौट आई , शानदार शो हुआ और परदा गिरते ही आवाज़ फिरसे बंद ! बोले - अगले दिन मुझे राज कपूर ने बंबई बुलाकर गले का ऑपरेशन कराया और फिर मेरे गले से वह भर्राई हुई आवाज़ निकली , जिसे आप लोगों ने' मुग़ले आज़म ' में सुना है , मेरी ओरिजनल आवाज़ फिर कभी वापस न आ सकी .......

हबीब के शहर मे तनवीरी प्रस्तुति

 - Akhter Ali 
रायपुर, 27 मार्च. 

निसार अली का रंगमंच केवल मनोरंजन का रंगमंच नही बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वाह भी रहा है, नाटक के माध्यम से संदेश भी जाता है ताे यह अतिरिक्त उपलब्धि है जाे आज इप्टा रायपुर की प्रस्तुति के बाद निसार अली के हिस्से मे आई | रंगमंच दिवस आैर मुकितबाेध जन्म शताब्दी के संयुक्त अवसर पर मुक्तिबाेध जी के दाेनाे पुञाे की मौजूदगी मे यह नाटक देखना सुखद अनुभूति रहा |

निसार काफ़ी समय से छत्तीसगढ़ की लाेकशैली नाचा गम्मत पर गंभीरता पूर्वक काम कर रहे है, यह वही शैली है जिसे हबीब तनवीर साहब ने अपनाया था आैर फिर रंगमंच का इतिहास गढ़ दिया |निसार का अंदाज़ हबीब तनवीर के अंदाज़ से मेल खाता दिखा, यह आलोचना नही प्रशंसा है, वही लय, वही सुर, वही इम्पराेवाईज़ेशन का तरीका, वही मंच के हर काेने का इस्तेमाल, बात अपनी पर तरीका दर्शकाे की पसंद का, कुल मिलाकर ब्रह्मराक्षस का शिष्य सीमित साधन मे अपना प्रभाव पूरी ताकत के साथ जमाने मे सफल रहा |

निसार पटकथा लेखन एवं निर्देशक के अतिरिक्त गुरु जी की भूमिका मे बेहद प्रभावशाली लगे, देह की भाषा, सीमित मूव्हमेंट, प्रभाव पूर्ण संवाद संप्रेषण, एक अनुभवी अभिनेता के तमाम गुणाे से लबरेज़ रहे निसार | अभिनय के लिहाज़ से शेखर शिखर पर रहे पर गुरू की पहली पदचाप से ही दर्शक उस पर निसार हाे गये |

नाटक - ब्रह्मराक्षस का शिष्य 
कहानी - मुक्तिबाेध
नाटय रूपांतरण एवं निर्देशक - निसार अली 
इप्टा रायपुर की प्रस्तुति |

कानपुर: विश्व रंगमंच दिवस पर गोष्ठी

कानपुर, 27 मार्च 17 । विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर आज अनुकृति रंगमंडल ने मजदूर सभा भवन ग्वालटोली में गोष्ठी आयोजित की। गोष्ठी को संबोधित करते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी डा. ओमेन्द्र कुमार ने कहा कि हर साल 27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस मनाया जाता है।1961 में अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संस्थान (आईटीआई), फ्रांस ने इसकी शुरुआत की थी। वैसे विश्व में सर्वाधिक प्राचीन भारतीय रंगमंच हैं, भरत मुनि ने देवताओं के मनोरंजन के लिए  लगभग 400 ईसा पूर्व पंचम वेद नाट्य शास्त्र की रचना की थी। 

उन्होंने कहाकि भरतमुनि रचित प्रथम नाटक का अभिनय, जिसका कथानक 'देवासुर संग्राम' था, देवों की विजय के बाद इन्द्र की सभा में हुआ था। नाट्य शास्त्र में के 37 अध्यायों में न नाट्य रचना के नियमों का आकलन किया गया है बल्कि अभिनेता रंगमंच और प्रेक्षक इन तीनों तत्वों की पूर्ति के साधनों का विवेचन होता है।

रंगकर्मी कृष्णा सक्सेना ने बताया कि भरतमुनि ने नाट्य शास्त्र में रंगमंच अभिनेता अभिनय नृत्य गीत वाद्य, दर्शक, दशरूपक और रस निष्पत्ति से संबंधित सभी तथ्यों का विवेचन किया है। नाट्य शास्त्र के मुताबिक नाटक की सफलता केवल लेखक की प्रतिभा पर आधारित नहीं होती बल्कि विभिन्न कलाओं जैसे दृश्य रचना, वेशभूषा, संगीत, प्रकाश और कलाकारों के सम्यक के सहयोग से ही होती है।नाट्य कर्मी राजीव तिवारी ने कहाकि नाट्य के प्रमुख अंग चार हैं - वाचिक, सात्विक, आंगिक और आहार्य। उक्ति-प्रत्युक्ति की यथावत् अनुकृति वाचिक अभिनय का विषय है। 

विजयभान सिंह ने बताया कि नाटक का मुख्य उद्देश्य ऐहिक जीवन की नाना वेदनाओं से परिश्रांत जनता का मनोरंजन है। इसके प्रवर्तक स्वयं प्रजापति हैं जिन्होंने ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्ववेद से रस का परिग्रह कर सार्ववर्णिक पंचम वेद का प्रादुर्भाव किया। उमा महादेव ने सुप्रीत हो लोकानुरंजन के हेतु लास्य एवं तांडव का सहयोग देकर इसे संपूर्णता प्रदान की।

सुरेश श्रीवास्तव ने बताया कि संस्कृत भाषा महान कवि और नाटक कार कालीदास ने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की और उनकी रचनाओं में भारतीय जीवन और दर्शन के विविध रूप और मूल तत्व निरूपित हैं। कालिदास अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण राष्ट्र की समग्र राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले कवि माने जाते हैं और कुछ विद्वान उन्हें राष्ट्रीय कवि का स्थान तक देते हैं।
अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूतम, मालविकाग्निमित्रम कालिदास की प्रसिद्ध रचनाएं हैं। 

जौली घोष ने कहाकि कालिदास के परवर्ती कवि बाणभट्ट ने उनकी सूक्तियों की विशेष रूप से प्रशंसा की है। छठीं सदी ईसवी में बाणभट्ट ने अपनी रचना हर्षचरितम् में कालिदास का उल्लेख किया है। डा. ओमेन्द्र ने बताया कि कालिदास उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के समकालीन हैं और उनके नवरत्नों में से एक थे।
गोष्ठी में अनिल निगम, महेश चंद, सम्राट यादव, श्रषि, प्रशांत, योगेश, आकाश, सुनीत व विकास ने भी विचार रखे।

दुनिया एक रंगमंच है, मगर हम सब कठपुतलियां नहीं हैं

-बादल सरोज

वैसे तो बकौल विलियम शेक्सपीयर (फ़िल्म आनन्द से हिंदी में मशहूर हुआ संवाद ) "ये दुनिया एक रंगमंच है और हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियां हैं ।" मगर ये कुछ ज्यादा ही सरलीकरण है । दुनिया के बारे में बाकी फलसफा फिर कभी, अभी सिर्फ इतना कि हाँ, दुनिया एक खूब विशाल रंगमंच है, मगर हम सब इसकी कठपुतलियां नहीँ है । वे भी नहीं जिन्हें पक्का यकीन है कि उनकी डोर किसी ऊपरवाले के हाथों में हैं ।
दुनिया एक रंगमंच है और इसे जीने लायक बनाने में अन्य अनेक माध्यमों के साथ साथ रंगमंच की भी एक भूमिका है । 

पता नहीं भवभूति या कालिदास या डायोनेसुस या स्तानिस्लाव्स्की या ब्रेख्त या पिंग डायनेस्टी के जमाने की शैडो पपेट्री के संस्थापक/संस्थापिका क्या मानते थे, एक दर्शक के नाते हम जैसों के लिए रंगमंच है : मनोभावों और स्थितियों की अपेक्षाकृत कलात्मक प्रस्तुति/आवेगों और उद्वेगों का , इस मकसद से , व्यवस्थित और सायास प्रस्तुतीकरण ताकि जो दरअसल उस समय नहीं है उसे होता हुआ दिखाया जा सके/ रूपकों और बिम्बों और मुद्राओं और भंगिमाओं के जरिये ऐसा कथोपकथन जिसे अन्यथा समझाने के लिए न जाने कितने हजार शब्दों की आवश्यकता होती ।

और सबसे बढ़कर इन सबका आक्रोश की अभिव्यक्ति, विरोध, प्रतिरोध की कार्यवाही के रूप में इस तरह उपयोग कि पटकथा और संवाद लिखने वाले, बोलने वाले , कर दिखाने वाले के हाथ से निकल कर करोड़ों लोगों का कहा , बोला , किया बन जाए । नाटक की भाषा में बोलें तो ऐसा प्रॉम्पटर जिसे एक पूरा युग दोहराये । बुरे के विरोध में कमजोर से कमजोर की भागीदारी करवाने की ताकत । सफ़दर हाशमी के शब्दों में जब कोई दर्शक नुक्कड़ नाटक के किसी संवाद पर हँस रहा होता है, या किसी बात पर ताली बजा रहा होता है तब दरअसल वह खुद एक प्रतिरोध की कार्यवाही में शिरकत कर रहा होता है । 

70 के दशक में कलकत्ता में कुछ लाख लोगों के बीच उत्पल दत्त के नाटक - जो बांग्ला में था - को देखते हुए वे हिलोरें अनुभव की थीं जो एक साथ लाखों चेहरों पर कभी गुस्सा, कभी जोश, कभी संकल्प बिखेर जाती थीं । उनके बाद जिन दूसरे बड़े से मिले वे थे ब ब कारंथ जिन्हें किशोर से उन्मुक्त मन के साथ न जाने कितने रूपों में देखा कितनी भूमिकायें निबाहते देखा । तीसरे थे चरणदास चोर !! वन एंड ओनली हबीब तनवीर साब । हमारे अहद के कमाल के रंगकर्मी । जिनके लिए रंगमंच विचार भी था औजार भी था ।और विचार वही ज़िंदा रहते हैं जिनके लिए लोग मरने की हिम्मत रखते हैं । 

सफ़दर हाशमी ऐसे ही, हमारे लिए इस दौर के सबसे बड़े रंगकर्मी । जो अपनी शहादत से जन गण के रंगमंच को जीवन दे गए हैं । दधीचि की तरह अपनी हड्डियों का वज्र दे गए हैं । सफदर जो एक कमिटेड सर्जक थे और बहुमुखी दोस्त तथा आदर्श भी ।(निजी जीवन में रंगकर्म से वास्ता इससे भी ज्यादा गहरा है । जो ल म्बी दूरी तय करते करते क्लाइमेक्स में नीना Neena Sharma तक आया है जो खुद रंगकर्म से होते हुए राजनीतिक सहकर्मी और मित्र बनी।)

मानव समाज में नाटक की विधा का उदगम कब , कैसे, कहाँ से हुआ पता नहीं । मगर इतना पक्का पता है कि भाषा के आविष्कार से भी हजारों साल पहले किसी स्त्री ने किया होगा इसका पहला सरल और भदेस उपयोग : किसी रोते हुए बच्चे को मनाने के लिए आवाज निकाल कर, आँख मटकाते, मुंह बनाते हुए । किसी बड़े होते बच्चे को हाथों पैरों की मुद्राओं से नदी पार करना या पेड़ चढ़ना सिखाते हुए । किसी गुलाम ने निर्दयी मालिक की पीठ के पीछे उसकी नकल उतारते हुए बनाया होगा उसका मजाक - निकाली होगी कोई आवाज़ और अपने विरोध को कुछ इस तरह दी होगी परवाज़ । कही और देखते हुए, छुपते छुपाते हुए इशारों में दिया होगा अपने प्रिय को उलाहना या आमन्त्रण ।

रंगमंच यही सब सिखाता है । रंगमंच मनुष्य बनाता है ।इसलिये विश्वास है कि बाज़ार की किसी लिप्सा या मुनाफे की किसी हवस का शिकार होकर मरेगा नहीं रंगमंच : जरूरत हुयी तो एक बार फिर सुसज्जित और महंगे थिएटरों से नीचे उतरेगा । किसी गोंड या भील के गाँव, किसी मजदूर की बस्ती, किसी किसान के खलिहान, किसी महिला की आँखों में छुपे सपने की तरह बस जायेगा, फिर उभर कर आयेगा ।
क्योंकि 

दुनिया एक रंगमंच है, मगर हम सब कठपुतलियां नहीं है ।
(2017 के विश्व रंगमंच दिवस पर रंगमंच की हिफाज़त में खड़े, उससे जुड़े सभी परिचित मित्रों को शुभकामनायें- इस वर्ष मिली युवा रंगकर्मी सिग्मा Sigmaa Upadhyay के नाम थोड़ी सी एक्सट्रा भी )

जम्मू में नुक्कड़ नाटक 'वक्त कम, काम ज्यादा' की प्रस्तुति


Jammu. EK SATH RANG MANDAL today presented it's 239 th MONDAY THEATRE under MONDAY THEATRE SERIES with Vijay Malla ' new progressive nukkad" WAQET KUM KAAM ZIYADA" at pacca Talab Park near Rehari Chungi Jammu.

Time is limited and work is to be done within time is a big problem among young generation when they donot know what to do ? It is a big challenge for those who lack basic planning and Time Table in their day to day work. Romesh is a student has liking for sports also but unable to attend games as well as studies at a time. He thinks that if he will play games he can not do justice to his studies. He is surprised to see his friend Ashok who plays game as well gets good marks in studies. Every time he is getting good marks in exams and is also known as best sports man in the college.

Romesh decides to consult his grand father Triloki Nath who has retired as principal and was a good sportsman in his college days, Triloki nath, Romesh's grand father asks Romesh to give him details of his daily programme when he attends studies and when he needs to participate in games ?

But unfortunately Romesh could not make out the details of his time table . Now Triloki Nath explains Romesh that you can not get success without planning daily time table and fix time for every work .Triloki nath further explains him that unless and untill you will not chalkout your engagements of daily routine. He says, Sports is also important as education is, but it needs only balance of your timing.

Romesh is convienced and satisfied with such suggestions and decides to attend games and studies with planning and time table.This nukkad was an eye opener for our young students who can learn how to utilize their minimum time for maximum work. A large number of people witnessed this Nukkad ,
Actors who acted were Anuroop Pathania,Prabal Sharma,Qurat-Ul-ain,Raju Mad,Ashok Sharma,Ayush Sharma and Vijay malla.THIS NUKKAD WAS WRITTEN AND DIRECTED BY VIJAY MALLA AND ASSISTED BY ANUROOP PATHANIA

विश्व रंगमंच दिवस : इप्टा इंदौर द्वारा नाटकों का मंचन

इंदौर. विश्व नाट्य दिवस पर आज इप्टा की इंदौर इकाई द्वारा शहीद भवन इंदौर पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इप्टा इंदौर के बच्चों द्वारा जनगीत, पाश की कविता सबसे खतरनाक होता है..और श्री हरेप्रकाश उपाध्याय Hareprakash Upadhyayकी कविता.. आम जन के लिए.. की अभिनय प्रस्तुति की गयी। श्री गुलरेज के निर्देशन में नाटक-'नाटक तो होगा ही' और स्त्री उत्पीड़न पर केंद्रित 'मूक अभिनय' नाटिका प्रस्तुत की गयी। सुश्री सारिका श्रीवास्तव Sarika Shrivastavaके मार्गदर्शन में छोटे बच्चों द्वारा 'भगत सिंह के आखिरी बारह घंटों' के घटनाक्रम पर केंद्रित अभिनय पाठ किया गया। 

संचालन,संयोजन सुश्री सारिका श्रीवास्तव ने किया। विश्व नाट्य दिवस पर समकालीन परिदृश्य में रंग कर्म के महत्व पर श्री अरविन्द पोरवाल Arvind Porwalने संबोधित किया। आभार श्री विजय दलाल ने माना। इस अवसर पर सर्वश्री वसन्त शिन्त्रे, सुरेश उपाध्याय, अतुल लागू, ब्रजेश कानूनगो,चुन्नीलाल वाधवानी,कामना शर्मा, सहित अनेक इप्टा,प्रलेस के साथी और प्रबुद्धजन उपस्थित थे।
इसी अवसर के कुछ चित्र Vineet Tiwari और मित्रों के लिए ।

Sunday, March 26, 2017

World Theatre Day Message 2017 by Isabelle Huppert

So, here we are once more. Gathered again in Spring, 55 years since our inaugural meeting, to celebrate World Theatre Day. Just one day, 24 hours, is dedicated to celebrating theatre around the world. And here we are in Paris, the premier city in the world for attracting international theatre groups, to venerate the art of theatre. Paris is a world city, fit to contain the globes theatre traditions in a day of celebration; from here in France’s capital we can transport ourselves to Japan by experiencing Noh and Bunraku theatre, trace a line from here to thoughts and expressions as diverse as Peking Opera and Kathakali; the stage allows us to linger between Greece and Scandinavia as we envelope ourselves in Aeschylus and Ibsen, Sophocles and Strindberg; it allows us to flit between Britain and Italy as we reverberate between Sarah Kane and Prinadello. Within these twenty-four hours we may be taken from France to Russia, from Racine and Moliere to Chekhov; we can even cross the Atlantic as a bolt of inspiration to serve on a Campus in California, enticing a young student there to reinvent and make their name in theatre. 

Indeed, theatre has such a thriving life that it defies space and time; its most contemporary pieces are nourished by the achievements of past centuries, and even the most classical repertories become modern and vital each time they are played anew. Theatre is always reborn from its ashes, shedding only its previous conventions in its new-fangled forms: that is how it stays alive. 

World Theatre Day then, is obviously no ordinary day to be lumped in with the procession of others. It grants us access to an immense space-time continuum via the sheer majesty of the global canon. To enable me the ability to conceptualise this, allow me to quote a French playwright, as brilliant as he was discreet, Jean Tardieu: When thinking of space, Tardieu says it is sensible to ask “what is the longest path from one to another?”...For time, he suggests measuring, “in tenths of a second, the time it takes to pronounce the word ‘eternity’”…For space-time, however, he says: “before you fall asleep , fix your mind upon two points of space, and calculate the time it takes, in a dream, to go from one to the other”. It is the phrase in a dream that has always stuck with me. It seems as though Tardieu and Bob Wilson met. We can also summarise the temporal uniqueness of World Theatre day by quoting the words of Samuel Beckett, who makes the character Winnie say, in his expeditious style: “Oh what a beautiful day it will have been”. When thinking of this message, that I feel honoured to have been asked to write, I remembered all the dreams of all these scenes. As such, it is fair to say that I did not come to this UNESCO hall alone; every character I have ever played is here with me, roles that seem to leave when the curtain falls, but who have carved out an underground life within me, waiting to assist or destroy the roles that follow; Phaedra, Araminte, Orlando, Hedda Gabbler, Medea, Merteuil, Blanche DuBois….Also supplementing me as I stand before you today are all the characters I loved and applauded as a spectator. And so it is, therefore, that I belong to the world. I am Greek, African, Syrian, Venetian, Russian, Brazilian, Persian, Roman, Japanese, a New Yorker, a Marseillais, Filipino, Argentinian, Norwegian, Korean, German, Austrian, English – a true citizen of the world, by virtue of the personal ensemble that exists within me. For it is here, on the stage and in the theatre, that we find true globalization. 

On World Theatre Day in 1964, Laurence Olivier announced that, after more than a century of struggle, a National Theatre has just been created in the United Kingdom, which he immediately wanted to morph into an international theatre, at least in terms of its repertoire. He knew well that Shakespeare belonged to the world. In researching the writing of this message, I was glad to learn that the inaugural World Theatre Day message of 1962 was entrusted to Jean Cocteau, a fitting candidate due to his authoring of the book ‘Around the World Again in 80 Days’. This made me realise that I have gone around the world differently. I did it in 80 shows or 80 movies. I include movies in this as I do not differentiate between playing theatre and playing movies, which surprises even me each time I say it, but it is true, that’s how it is, I see no difference between the two.
Speaking here I am not myself, I am not an actress, I am just one of the many people that theatre uses as a conduit to exist, and it is my duty to be receptive to this - or, in other words, we do not make theatre exist, it is rather thanks to theatre that we exist. The theatre is very strong. It resists and survives everything, wars, censors, penury. 

It is enough to say that “the stage is a naked scene from an indeterminate time” – all’s it needs is an actor. Or an actress. What are they going to do? What are they going to say? Will they talk? The public waits, it will know, for without the public there is no theatre – never forget this. One person alone is an audience. But let’s hope there are not too many empty seats! Productions of Ionesco’s productions are always full, and he represents this artistic valour candidly and beautifully by having, at the end of one of his plays, and old lady say; “Yes, Yes, die in full glory. Let’s die to enter the legend…at least we will have our street…”

World Theatre Day has existed for 55 years now. In 55 years, I am the eighth woman to be invited to pronounce a message – if you can call this a ‘message’ that is. My predecessors (oh, how the male of the species imposes itself!) spoke about the theatre of imagination, freedom, and originality in order to evoke beauty, multiculturalism and pose unanswerable questions. In 2013, just four years ago, Dario Fo said: “The only solution to the crisis lies in the hope of the great witch-hunt against us, especially against young people who want to learn the art of theatre: thus a new diaspora of actors will emerge, who will undoubtedly draw from this constraint unimaginable benefits by finding a new representation”. Unimaginable Benefits – sounds like a nice formula, worthy to be included in any political rhetoric, don’t you think?...

As I am in Paris, shortly before a presidential election, I would like to suggest that those who apparently yearn to govern us should be aware of the unimaginable benefits brought about by theatre. But I would also like to stress, no witch-hunt! 

Theatre is for me represents the other it is dialogue, and it is the absence of hatred. ‘Friendship between peoples’ – now, I do not know too much about what this means, but I believe in community, in friendship between spectators and actors, in the lasting union between all the peoples theatre brings together – translators, educators, costume designers, stage artists, academics, practitioners and audiences. Theatre protects us; it shelters us…I believe that theatre loves us…as much as we love it… 

I remember an old-fashioned stage director I worked for, who, before the nightly raising of the curtain would yell, with full-throated firmness ‘Make way for theatre!’ – and these shall be my last words tonight.

About the Author

Isabelle Huppert studied Russian at the National Languages and oriental Civilizations Institute whilst taking dramatic art classes at the School of la rue Blanche and the National Conservatory of Dramatic Art. She was the student of preeminent teachers Jean-Laurent Cochet and Antoine Vitez.

She received attention for her earliest film appearances in movies such as Les Valseuses by Bertrand Blier, Aloise by Liliane de Kermadec and Le Juge et l'Assassin by Bertrand Tavernier. For her performance in La Lentellière by Claude Goretta, she received the Best Hope Award from the British Academy of Film and Television (BAFTA). Her collaborative efforts with Claude Chabrol have enabled her to perform outstandingly across a number of film dramas, such as; comedy (Rien ne va plus), drama (Une affaire de femmes), and film noir (Merci pour le chocolat). Her deftness and deep understanding of acting have also enabled her to give life to roles in literary adaptations (Madame Bovary) and political fictions (L'Ivresse du pouvoir). She has received several awards for her performances under the direction of Claude Chabrol: the Interpretive Prize at the Cannes Film Festival for Violette Nozière, the Best Actress award at the Venice Film Festival for Une affaire de femmes, and at the Moscow Festival for Madame Bovary, as well as receiving the Interpretive Award and the César for Best Actress at Venice for her part in La Cérémonie.

She has worked with many high-profile directors and artists domestically such as Jean-Luc Godard, André Téchiné, Maurice Pialat, Patrice Chéreau, Michael Haneke, Raoul Ruiz, Benoit Jacquot, Jacques Doillon, Christian Vincent, Laurence Ferreira Barbosa, Olivier Assayas, Francois Ozon/Anne Fontaine Ionesco, Joachim Lafosse, Serge Bozon/Catherine Breillat, Guillaume Nicloux, and Samuel Benchetrit. Isabelle Huppert has also worked with major international directors such as Michael Cimino, Joseph Losey, Otto Preminger, the Taviani brothers, Marco Ferreri, Hal Hartley, David O'Russell, Werner Schroeter and Andrzej Wajda – as well as Rithy Panh, Brillante Mendoza, Joachim Sort and Hong Sang Soo.

The Venice Film Festival awarded her a Special Golden Lion of the Jury which recognized her entire career as well as her performance in Patrice Chéreau’s Gabriell.
She has also twice been awarded the prestigious Interpretive Award at the Cannes Film Festival (the second time for La Pianiste by Michael Hanake). Her involvement at Cannes has also seen her fulfill the role of juror and ceremonial mistress, and for the 62nd edition of the festival she was president of the jury.

In addition to cinema Isabelle Huppert has had a distinguished career in theatre, both in France and internationally. She plays under the direction of Bob Wilson (Orlando by Virginia Woolf/Quartett by Heiner Muller), Peter Zadek (Measure for Measure by William Shakespeare), Claude Régy, (4.48 Psychosis by Sarah Kane, Jeanne au bucher by Claudel). She also interprets Médée d'Euripide directed by Jacques Lassalle, notably at the Festival d'Avignon; Hedda Gabler by Henrik Ibsen directed by Eric Lacascade, and A Tramway based on Tennessee Williams’ work, directed by Krzysztof Warlikowski at the Théâtre de l'Odéon, which went on to have a successful European and World Tour. Other notable works include The Maids by Jean Genet, directed by Benedict Andrews, in which she appeared alongside Cate Blanchett at the Sydney Theatre Company and the New York City Centre as part of the Lincoln Center Festival; Les Fausses Condidences de Marivaux, directed by Luc Bondy, at the Théâtre de l'Odéon which again went on to have a successful European tour. This season, she has performed Phaedra(s) by Wajdi Mouawad, Sarah Kane and J.M. Coetzee, directed by Krzysztof Warlikowski, on a European and international tour.

In cinema, several of her films have recently been released, L’avenir by Mia Hansen Love, Tout de suite maintenant by Pascal Bonitzer and Elle by Paul Verhoeven (presented at the 2016 Cannes Film Festival), Souvenir by Bavo Devurne. In 2017 her fourth film with Michaël Haneke, Happy End, will be released, along with a project directed by Serge Bozon called Madame Hyde. She recently received several awards in the United States including the Gotham Award and the Golden Globe for Elle, a role which as lead her to be nominated for the Best Actress Oscar.

Isabelle Huppert is an Officer of the National Order of the Legion of Honor, an Officer of the National Order of Merit and a Commander in the Order of Arts and Letters.



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