Sunday, August 6, 2017

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के 25 वर्ष : दिल्ली में 3 दिवसीय नाट्य समारोह


10 अगस्त, 2017 : नाटक "गर्भ" शाम 6.30 बजे “मुक्तधारा ऑडिटोरियम” (गोल मार्किट , भाई वीर सिंह मार्ग नई दिल्ली -1)य में होगा !

नाटक “गर्भ” मनुष्य के मनुष्य बने रहने का संघर्ष है.नाटक मानवता को बचाये रखने के लिए मनुष्य द्वारा अपने आसपास बनाये (नस्लवाद,धर्म,जाति,राष्ट्रवाद के) गर्भ को तोड़ता है. नाटक समस्याओं से ग्रसित मनुष्य और विश्व को इंसानियत के लिए, इंसान बनने के लिए उत्प्रेरित करता है ..क्योकि खूबसूरत है ज़िन्दगी !

11 अगस्त, 2017 : नाटक “अनहद नाद - अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स ” शाम 6.30 बजे का “मुक्तधारा ऑडिटोरियम” में मंचन

नाटक “अनहद नाद - अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स ” कलात्मक चिंतन है, जो कला और कलाकारों की कलात्मक आवश्यकताओं,कलात्मक मौलिक प्रक्रियाओं को समझने और खंगोलने की प्रक्रिया है। क्योंकि कला उत्पाद और कलाकार उत्पादक नहीं है और जीवन नफा और नुकसान की बैलेंस शीट नहीं है इसलिए यह नाटक कला और कलाकार को उत्पाद और उत्पादिकरण से उन्मुक्त करते हुए, उनकी सकारात्मक,सृजनात्मक और कलात्मक उर्जा से बेहतर और सुंदर विश्व बनाने के लिए प्रेरित और प्रतिबद्ध करता है ।

कलाकार :अश्विनी नांदेडकर, योगिनी चौक, सायली पावसकर,कोमल खामकर,तुषार म्हस्के

12 अगस्त, 2017, नाटक :“न्याय के भंवर में भंवरी” का सुबह 11 बजे म ल भारतीय ऑडिटोरियम (Alliance Francaise de Delhi,लोधी रोड़) में मंचन

नाटक “न्याय के भंवर में भंवरी” शोषण और दमनकारी पितृसत्ता के खिलाफ़ न्याय, समता और समानता की हुंकार है !
कलाकार : बबली रावत

लेखक और निर्देशक : मंजुल भारद्वाज
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काल को चिंतन से गढ़ा और रचा जाता है.चिंतन आपके भीतर से सृजित होकर वैश्विक क्षितिज को पार कर विश्व में जीता है.कला मनुष्य को मनुष्य बनाती है. कलात्मक चिन्तन ही मनुष्य के विष को पीने की क्षमता रखता है.1990 के बाद का समय दुनिया के लिए ‘अर्थहीन’ होने का दौर है.ये एकाधिकार और वर्चस्ववाद का दौर है.विज्ञान के सिद्धांतों का तकनीक तक सीमित होने का दौर है. आज खरीदने और बेचने का दौर है. मीडिया का जनता की बजाए सत्ता की वफ़ादारी का दौर है.ऐसे समय में ‘जनता’ को अपने मुद्दों के लिए ‘चिंतन’ और सरोकारों के एक मंच की जरूरत है. ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ रंग सिद्धांत 12 अगस्त,1992 से जनता के सरोकारों का ‘चिंतन मंच’ बनकर कर उभरा है और आज अपने ‘रंग दर्शन’ के होने के 25 वर्ष पूर्ण कर रहा हैं. इन 25 वर्षों में ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ ने गली, चौराहों, गावों, आदिवासियों, कस्बों और महानगरों से होते हुए अपनी वैश्विक उड़ान भरी है और वैश्विक स्वीकार्यता हासिल की है.
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के सिद्धांत
1. ऐसा रंगकर्म जिसकी सृजनशीलता विश्व को मानवीय और बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो ।
2. कला , कला के लिए ना होकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करे । लोगों के जीवन का हिस्सा बने ।
3. जो मानवीय जरूरतों को पूरा करे और अपने आप को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में उपलब्ध कराये ।
4. जो अपने आप को बदलाव के माध्यम के रूप में ढूंढे । अपने आप को खोजे और रचनात्मक बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाये ।
5. ऐसा रंगकर्म जो मनोरंजन की सीमाएँ तोड़कर जीवन जीने का ज़रिया या पद्धति बने ।
(“थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत का सूत्रपात सुप्रसिद्ध रंगचिंतक, "मंजुल भारद्वाज" ने 12 अगस्त 1992 में किया और तब से उसका अभ्यास और क्रियान्वयन भारत और वैश्विक स्तर पर हो रहा है।)

आज विकास या विकास के नाम पर प्रकृति के विनाश के दौर में मनुष्य का मनुष्य बने रहना एक चुनौती है. नाटक “गर्भ”, “अनहद नाद – Unheard Sounds of universe” और “न्याय के भंवर में भंवरी” के माध्यम से आपको अपने अंदर के इंसान की आवाज़ सुनाने के लिए देश की सत्ता के केंद्र “दिल्ली” में 10,11 और 12 अगस्त 2017 को 3 दिवसीय ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस - नाट्य उत्सव’ का आयोजन हो रहा है. आपकी सार्थक और रचनात्मक सहभागिता की अपेक्षा. क्योंकि ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ रंग सिद्दांत के अनुसार ‘दर्शक’ पहला और सशक्त ‘रंगकर्मी’ है !

मंजुल भारद्वाज लिखित एवम् निर्देशित और अश्विनी नांदेडकर, योगिनी चौक, सायली पावसकर,कोमल खामकर,तुषार म्हस्के अभिनीत प्रसिद्ध नाटक “गर्भ” और “अनहद नाद –अनहर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स” का मंचन  क्रमशः 10 और 11 अगस्त, 2017 को शाम 6.30 बजे “मुक्तधारा ऑडिटोरियम” (गोल मार्किट , भाई वीर सिंह मार्ग नई दिल्ली -1) में होगा !
जबकि 12 अगस्त को सुबह 11.00 बजे, मंजुल भारद्वाज लिखित और निर्देशित, जानी मानी रंग अभिनेत्री बबली रावत अभिनीत नए नाटक “न्याय के भंवर में भंवरी” का प्रीमियर  म ल भारतीय ऑडिटोरियम (लोधी एस्टेट , लोधी रोड, नई दिल्ली – 3) में होगा !
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“Theatre of Relevance”-25 years of theatrical philosophy
10, 11, 12 August 2017
"3-days theatre festival in Delhi"

Epoch is created and wrought through contemplation. Contemplation, being generated from within you and crossing global horizons, survives in the world.  Art make humans human. Artistic process & reflection alone possesses the capacity of soaking human poison. The period after 1990 has been an era of “Irrelevance” for the world. This has been a period of monopoly and dictatorship. A period of limiting the principles of science to technology alone. Today is the period of buying and selling. A period where media instead of being faithful to the people, is faithful to thy masters & rulers. In these threatening times, the “people” needs ‘contemplation’ for their issues and a platform for their concerns. ‘Theatre of Relevance” theatrical philosophy’ has evolved as a ‘contemplation platform’ for public concerns since 12th August, 1992 and it is completing 25 years of its theatrical philosophy today. In these 25 years, ‘Theatre of Relevance’ has appropriated its global flight via streets, squares, villages, tribes, towns, and cities and has gained global acceptance.

Principles of Theatre of Relevance
1.    A Theatre that commits its creative excellence to make the world more “Better & Humane”.
2.    That is relevant to the context of the society and owes its social responsibility, not to Art just for the Art sake.
3.    Which caters to human needs and provide itself as a platform for             expression.
4.    Which explores itself as a medium of change/development.
5.    That comes out from the ' limits of entertainment ' to a way of living.

(“Theatre of Relevance” was conceived by famous artistic contemplator “Manjul Bhardwaj” on August 12, 1992 and since then it is practiced and implemented at Indian and at international level.)

Today in the era of the destruction of nature in the name of development, it is a challenge for humans to be human. A 3-day ‘Theatre of Relevance-Theatre festival’ is being organised at the epi-centre of power of the country , “Delhi”, on August10, 11 and 12, 2017 to connect you with  your inner human sound through the medium of the plays “Garbh”, “Anhad Naad- Unheard Sounds of Universe” and  “Nyaya ke Bhanwar me Bhawari”. Your meaningful and constructive engagement is expected. Because according to ‘Theatre of Relevance’ philosophy, audience is the first & foremost theatre person.

Famous plays “Garbh” and “Anhad Naad-Unheard Sounds of Universe” written and directed by Manjul Bharadwaj and starring Ashwini Nandedkar, Yogini Chowk, Sayali Pawaskar, Komal Khamkar, Tushar Mahske would be staged on 10 and 11th of August, 2017 respectively at 6.30 pm at “Muktadhara Auditorium” (Gol Market, Bhai Vir Singh Marg, New Delhi-01).

While on 12 August at 11.00 am, a new play “Nyaya ke Bhanwar me Bhawari” written and directed by Manjul Bharadwaj and starring well-known theatre actress Babli Rawat would be premiered at “M L Bhartia Auditorium”(Lodhi Estate, Lodhi Road, New Delhi -03).

Friday, August 4, 2017

ग़ज़ल दो संस्कृतियों का मिलन है

- हरेराम समीप 
'विकल्प' साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था, फरीदाबाद द्वारा महाकवि तुलसीदास और महान कथाकार प्रेमचन्द जयंती के अवसर पर पुस्तक लोकार्पण, चर्चा का आयोजन 'आर्य समाज सेक्टर 7 के सभागार में किया गया, जिसकी अध्यक्षता अलवर से पधारे हिन्दी के प्रख्यात आलोचक एवं कवि डाक्टर जीवन सिंह 'मानवी' ने की. श्री हरेराम समीप की दो पुस्तक- 'समकालीन हिन्दी ग़ज़लकार एक अध्ययन' तथा 'आँखें खोलो पार्थ' दोहा संग्रह के लोकार्पण के उपरांत अलवर से पधारे गजलकार व समीक्षक श्री विनय मिश्र ने अपने बीज वक्तव्य की शुरुआत दोहा संग्रह के शीर्षक दोहे की विस्तृत व्याख्या से की, दोहा था-

कुरुक्षेत्र है ये नया फिर है नया यथार्थ 
शत्रु खड़ा है सामने आँखें खोलो पार्थ 

इसके बाद पिछले चालीस वर्षों में हुए हिन्दी ग़ज़ल के विकास और हिंदी ग़ज़ल आलोचना के महत्वपूर्ण बिन्दुओं और उपलब्धियों का उल्लेख किया जिसमें अस्सी के दशक में प्रकाशित 'शब्द कारखाना पत्रिका' के ग़ज़ल विशेषाक में नचिकेता जी के ४२ पृष्ठीय आलेख को ऐतिहासिक और एक मील का पत्थर बताया, जिसकी टिप्पणियाँ आज भी प्रासंगिक हैं. ग़ज़ल आलोचना की महत्वपूर्ण पुस्तकों में डा शिवशंकर मिश्र की एक प्रमाणिक पुस्तक 'हिंदी ग़ज़ल की भूमिका' के महत्व की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उससे अच्छी किताब अभी दूसरी नहीं है. उन्होंने श्री ज्ञानप्रकाश विवेक की दो आलोचना पुस्तकों- हिन्दी ग़ज़ल की विकास यात्रा और हिन्दी ग़ज़ल-दुष्यंत के बाद और डॉ. सायमा बानो के शोधग्रन्थ 'हिन्दी ग़ज़ल पहचान और परख' के योगदान का भी उल्लेख किया . श्री नचिकेता के सम्पादन में आये ग़ज़ल संग्रह 'अष्टछाप' तथा पिछले वर्ष आए ''अलाव' पत्रिका के समकालीन ग़ज़ल आलोचना विशेषांक का भी ज़िक्र किया और लोकार्पित पुस्तक 'समकालीन हिन्दी ग़ज़लकार एक अध्ययन' के महत्व पर बात की. उन्होंने कहा कि इस ग्रन्थ में हिन्दी के 25 चर्चित ग़ज़लकारों की रचनाधर्मिता पर विस्तार से अध्ययन किया गया है साथ ही यह सलाह भी दी कि इन ग़ज़लों की समीक्षा के साथ यदि इन्हीं ग़ज़लकारों की दस दस ग़ज़लों का संग्रह भी आए तो एक समग्र जानकारी पाठकों के सामने उपलब्ध हो जाएगी .

कार्यक्रम का संचालन करते हुए कोटा से पधारे प्रसिध्द संस्कृतिकर्मी एवं गीतकार श्री महेंद्र नेह ने हिन्दी ग़ज़ल की जनधर्मिता और वर्तमान परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा करते हुए श्री हरेराम समीप के जीवन और लेखन की जानकारी दी और उनकी कुछ चर्चित रचनाओं से उपस्थित श्रोताओं को परिचित कराया और उनके रचनात्मक सरोकारों को उजागर किया. गाज़ियाबाद से पधारे श्री अवधेश कुमार सिंह ने लोकार्पित दोहा संग्रह 'आँखें खोलो पार्थ' पर अपनी समीक्षा पढ़ी और डाक्टर भावना शुक्ल ने समीप के रचनाकर्म पर अपनी बात रखी.

वरिष्ठ और चर्चित कवि श्री लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने दोहा संग्रह के अनेक दोहे पढ़ते हुए कहा कि इस संग्रह में जीवन से जुड़े अनेक विषय हैं, समीप की नजर बार बार पिछड़े और दुखीजनों की तरफ जाती है -

बचपन में जिसकी कलम वक्त ले गया छीन
बाल पेन वह बेचता बस में 'दस के तीन'

इसके बाद श्री बाजपेयी जी ने समकालीन ग़ज़ल परिदृश्य पर बहुत सार्थक विचार रखे. दुष्यंत के समय से अब तक हिंदी ग़ज़लकारों के सामने आती रहीं चुनौतियों पर स्वयं अपने अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी ग़ज़लें कहते हुए तब उन्हें उर्दू शायरों और हिन्दी कवियों की भीषण उपेक्षा मिलती थी, उनसे बेतुके सवाल किये जाते थे. इसके बावजूद हिंदी ग़ज़ल ने इतने कम समय में जो अपनी पुख्ता जमीन तैयार की है वैसी दुनिया के साहित्य की किसी विधा ने नहीं बनाई है . दुष्यंत की ग़ज़लों के प्रभाव से अब उर्दू ग़ज़ल का भी चेहरा बदल रहा है . ग़ज़ल की भाषा का भी कोई मसला नहीं रह गया है . उन्होंने कहा कि अब हिन्दी ग़ज़ल का एक ही लक्ष्य है और वह है हिन्दी ग़ज़ल की साहित्यिक मान्यता पाना. उन्होंने सवाल किया कि जब पंजाबी, गुजराती, मराठी और अन्य भाषाओँ में लिखी जाने वाली ग़ज़ल को भरपूर मान्यता मिल रही है तब हिंदी में ही उसकी उपेक्षा क्यों हो रही है, यह विचारणीय है.

समीप के दोहा संग्रह पर बात करते हुए जयपुर से पधारे प्रखर आलोचक श्री शैलेन्द्र चौहान ने कहा कि वही रचनाकार समाज में बढ़ती विरूपता का पर्दाफाश कर सकता है जिसके सरोकार समाज के वंचित, शोषित, दलित वर्ग के प्रति हैं वरना लेखन एक पाखंड से कम नहीं है. समीप अपनी रचनाओं में लगातार उन पर बात करने वाले रचनाकार हैं, इस दोहा संग्रह में भी उन्होंने संघर्षरत आमजन की बात की है और उसकी यूँ उम्मीद बंधाये रखी है-

उजड़ जाए तो गम नहीं उसको नहीं मलाल
चिड़िया अपना घोंसला बुन लेती हर साल

वरिष्ठ गजलकार व सम्पादक श्री रामकुमार कृषक ने तुलसी जयंती पर स्मरण करते हुए उनके रचना संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि जैसे कबीर ने समाज में प्रत्यक्ष संघर्ष करते हुए रचनाकर्म किया उसी तरह तुलसी ने लोकधर्मिता को अपने महाकाव्य के माध्यम से पुनर्स्थापित व पुनर्संस्कारित किया ठीक उसी तरह प्रेमचंद ने भी अपने समय के समाज का चित्रण करते हुए हमें सन्देश दिया कि रचनाकार में प्रतिरोध की चेतना मौजूद रहना बहुत जरुरी है और आज यह परम्परा कवि श्री हरेराम समीप तक जाती है जो अपनी रचनाओं में समय से प्रतिरोध करते हैं . हिन्दी ग़जल में उपस्थित इस प्रतिरोध के सन्दर्भ में वे दुष्यंत के एक मशहूर शेर का हवाला देते हैं - 

"तू किसी रेल सी गुजरती है ,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ" 

यह हवाला देते हुए वे कहते हैं कि लोग इस शेर को प्रेम के संदर्भ में देखते हैं जबकि यह कोई स्त्री या नारी नहीं है बल्कि दुष्यंत के रचनाकाल को देखें तो यह रेल वास्तव में तत्कालीन व्यवस्था है जो आम इंसान को जिसके संकट का अहसास करा रही है, पुल सा थरथराना यही है. इस तरह हिंदी ग़जल आज प्रतिपक्ष की भूमिका में अपने समय के सभी खतरे उठाने के लिए तैयार है. अर्थात हम कह सकते हैं कि भगतसिंह हिंदी ग़ज़ल की चेतना में मौजूद है. विकास के बीच गाँवों का जो क्षय हुआ है वहाँ बच्चे शहर आकर यहां झुग्गियों में रह रहे हैं, स्त्रियों पर अत्याचार , बाजारीकरण आदि ग़ज़ल के विषय बने हैं. राष्ट्रवाद का जो बाजारीकरण हुआ है वह भी ग़जल का विषय है. इस विडम्बनापूर्ण समय में हिन्दी ग़जल की जो आलोचना यात्रा शुरू हुयी है इसमें समीप शामिल हैं इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं .

कृषक जी के वक्तव्य के बीच सभा में उपस्थित कुछ विद्वानों ने प्रश्न उठाये कि साहित्यिक चर्चा में राजनीतिक विषय नहीं उठाने चाहिए थे, तभी अपने अध्यक्षीय भाषण में अलवर से पधारे आलोचक डॉ. जीवन सिंह ने इसी विषय पर केन्द्रित जो प्रभावपूर्ण और धाराप्रवाह वक्तव्य दिया कि सौ से अधिक उपस्थित श्रोता मंत्रमुग्ध हो कर तालियों से उनका समर्थन करने लगे. डॉ. जीवन सिंह ने कहा कि साहित्य जीवन की व्याख्या करता है और राजनीति उससे कभी अलग नहीं रही है. यह केवल नजरिये की बात है कि आप चीज़ों को किस तरह देखते हैं. उन्होंने तुलसीदास के एक दोहे से कहा कि जिस तरह के लोगों के बीच वह उसी तरह समझ लिया जाता है . साहित्य और राजनीति के अन्तर्सम्बन्धों पर उद्धरण देकर समझाते हुए आपातकाल में बाबा नागार्जुन की कविताओं का उल्लेख किया और कहा कि राजनीति कोई बुरी चीज़ नहीं है . अगर बुरी होती तो महात्मा गाँधी राजनीति में क्यों आते ? और भी लोग क्यों आते ? हिन्दी ग़ज़ल के बारे में उन्होंने कहा कि हिन्दी ग़ज़ल अपने समय से संवाद है . जो अन्तर्विरोध रहे हैं, जो परेशानियाँ रही हैं, जो दिक्कतें रही हैं ... ग़ज़ल उनसे सम्वाद करती है . ग़ज़ल तो दो संस्कृतियों का मिलन है, सामासिक संस्कृति का प्रतीक है... इस्लाम और हिन्दू धर्म मिला तो ग़ज़ल की रचना हुई. इसलिए यह बहुत बड़ी विधा है जो सामासिक संस्कृति से निर्मित हुई है .

अंत में हरेराम समीप और संस्था के सदस्यों ने प्रमुख विद्वानों का शाल उढ़ाकर अभिनन्दन किया और सभी का आभार व्यक्त किया . इस तरह कार्यक्रम में आज की हिन्दी ग़ज़ल तथा आधुनिक दोहा विधा पर एक सार्थक विमर्श सम्पन्न हुआ जिसमें श्री नीरज जी ( गजल शोध ग्रन्थ के प्रकाशक) भावना प्रकाशन दिल्ली , जबलपुर, नोएडा, दिल्ली और फरीदाबाद नगर के अनेक कवि कथाकार और लेखकों ने शिरकत की.
प्रस्तुति-
हरेराम समीप 
9871691313

Tuesday, July 25, 2017

अपने अभिनय से फिर 'काल तुझसे होड़ है मेरी' लिख रहे हैं आलोक चटर्जी

-पवन करण
आज से लगभग दस—बारह बरस पहले 'तानसेन संगीत समारोह ग्वालियर' में पंडित जसराज के गायन में खोये हुए मुझे लगा जैसे आसमान की तरफ अपना मुंह उठाकर वे गा नहीं रहे बल्कि समय को चुनौती दे रहे हैं.....यही बात कल यहां नटसम्राट में आलोक चटर्जी को अभिनय करते देखकर तीब्रता से महसूस हुई...जैसे वे काल से होड़ ले रहे हों। 'काल तुझसे होड़ है मेरी' ये कविता प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह की है लेकिन आलोक चटर्जी को मंच पर देखकर लगता है जैसे वे इन दिनों अपने अभिनय की कलम से इसे पुन: लिख रहे हैं। नाटक समाप्त हो जाने के बाद आलोक चटर्जी से बात तो नहीं हो सकी मगर मिलाने के नाम पर उनका हाथ अपने हाथों में लेकर उनकी उस मिट्टी को टटोलने की इच्छा जरूर थी जिससे वे बने हैं

कोई अभिनेता अपने अभिनय से एक बेहद पीड़ादायी, संवेदनशील और मार्मिक नाट्य—कथानक पर खास तौर से खासी संख्या में सभागार में उपस्थित युवा दर्शकों को इस हद तक उन्मादित कर सकता है कि वे उसके अभिनय की प्रशंषा में बजने वालीं तालियों को क्रम न टूटने दें ये स्मृतिजन्य दृश्य भी कल यहां देखने को मिला। ऐसा मैंने दूसरी बार देखा...पहली बार तब जब जब इंदिरा गांधी आदिवासी कला संग्रहालय भोपाल में आगरा बाजार के मंचन के बाद मैंने तालियों की अटूट गड़गड़ाहट के बीच हबीब तनवीर को हाथ जोड़े खड़े देखा था।

कल सभागार में कई दर्शकों की आंखें भी झर रही थी। स्वयं के द्वारा अपने आसुओं को  ताली बजाते पकड़ा मैने भी । निसंदेह ये कथ्य से अधिक आलोक चटर्जी के अभिनय के प्रभाव से निकले थे। उर्दू के सम्मानीय शायर शकील ग्वालियरी का एक शेर है

बजा रहा था साज कोई बंद कमरे में
लरज रही थीं छतें सात आसमानों की
 
कल आलोक चटर्जी नाट्यमंदिर ग्वालियर में अपने अभिनय का साज बजा रहे थे और सभागार की छत ही नहीं दीवारें भी लरज रही थीं। लगा जैसे दर्शकों को ही नहीं सभागार की कुर्सियों, परदों और दीवारों को भी कई बरसों से इस बात की प्रतीक्षा थी कि उसके ग्रीनरूम से मेकअप कर आलोक चटर्जी मंच पर आयेगें और अपने अभिनय से उन्हें नया जीवन देकर चले जायेंगे। और कल ऐसा हुआ भी।

Wednesday, July 19, 2017

अशोकनगर में नाट्य-संगीत की प्रस्तुति और कार्यशाला का समापन

-सीमा राजोरिया
भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) की अशोकनगर इकाई ने पांच दिवसीय “ नाट्य – संगीत “ पर एकाग्र कार्यशाला का आयोजन किया और पांचवे दिन कार्यशाला के दरम्यान तैयार संगीत रचनायों का प्रदर्शन स्थानीय युवराज होटल के हॉल में किया गया | इस कार्यशाला का संचालन राष्ट्रीय नाट्यविद्यालयदिल्ली की रिपेटरी से जुड़े युवा रंगकर्मी मोहन सागर ने किया | इस कार्यशाला में संगीत और नाटक से जुड़े 20 से ज़्यादा युवतर प्रतिभागियों ने इतने कम समय में जो प्रस्तुति दी उसने  खचाखच भरे सभागार में बैठे दर्शकों को अभिभूत कर दिया |

 हिन्दी नाटकों में नाटक की एकरसता दूर करने , गति प्रदान करने , नाटक के सम्प्रेषण   में गीत संगीत का प्रयोग किया जाता है। इस संगीत की अपनी अलग प्रकृति होती है  | नाट्य संगीत की इस कार्यशाला में अपने नाट्य अनुभव से मोहन सागर ने कार्यशाला में गीत रचनायों पर इप्टा के कलाकारों के साथ अभ्यास किया और कार्यशाला के समापन पर इनका प्रदर्शन किया गया , जिसे देख दर्शक एक नये कला अनुभव से परिचित हुए |

 कार्यशाला में मोहन सागर के साथ कैलाश शर्मा , सिद्धार्थ , हर्ष और दिनेश योगी ने वाद्य यंत्रो के साथ संगत की और प्रतिभागी कलाकार आदित्य रूसिया , मयंक जैन , समीक्षा , अनुपम तिवारी , सत्यभामा ,  शिवानी , सौरभ , दीपिका , कबीर , दर्श , दिनेश , आयशा , सलोनी , रूपाली , , खुशी , अनुष्का , सृष्टि आदि कलाकारों ने सहभागिता की  | कार्यक्रम का संचालन पंकज दीक्षित ने किया और इप्टा अशोकनगर की अध्यक्ष सीमा राजोरिया ने रंग संगीत पर आधार वक्तव्य दिया | आयोजन की सफलता में रतनलाल , संजय माथुर , राजकुमार विश्वकर्मा आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही | शहर के लिए एक नये तरह की संगीत प्रस्तुति के साथ नाट्य – संगीत कार्यशाला का समापन हुआ |                  

Monday, July 10, 2017

बशीरहाट और बालूचरी : बकलम नूर ज़हीर

-नूर ज़हीर 
दोस्तों,
कुछ अजीब सा घटा है मेरे साथ. पिछले महीने बशीरहाट को केन्द्रित करके मेरी एक कहानी "बालूचरी" कथादेश में छपी.
बशीरहाट मुझे मेरी सास ले जाती थी, हर दुर्गा पूजा से पहले. वे सब बहुओं, बेटियों, नाते रिश्तेदारों को देने के लिए तांत की साड़ियाँ खरीदती;
बशीरहाट में साड़ियाँ सस्ती भी मिलती और बहुत तरह की भी; आसपास के गाँवों में तांत का काम होता जो ज़्यादातर मुसलमान जुलाहे करते.
वहां के भाईचारे को देख और समझ कर कई साल बाद यह कहानी लिखी. पाठकों की प्रतिक्रिया मिलनी अभी ख़तम भी न हुई थी की खबर मिली की बशीरहाट जल रहा है और यह सम्भावना है की सारा बंगाल ही भड़क पड़े.
फिर यह भी खबर है की दंगे फ़ैलाने और साम्प्रदायिकता की आग लगाने में कुछ राजनीतिक गुटों का जो असल में देश दुश्मन ताकते हैं हाथ है और बशीरहाट के लोग मिलकर इसका विरोध भी कर रहे हैं और अपनापन बनाये रखने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.
जहाँ लोग मिलजुल कर रहते हैं, नफरतों को जड़ नहीं पकड़ने देते, गुड से ज़हर को काटते हैं वही मेरा बशीरहाट है, वही मेरा भारत है!
कहानी पढियेगा और बताइयेगा!
बालूचरी
करम अली को अपनी आँखों यक़ीन नहीं हो रहा था। उस जैसे ग़रीब तांती के दस्तरखान पर इतने पकवान! इतनी भेंट तो कभी किसी ने नहीं दी; शायद आजतक कोई गाहक, इतना अमीर नहीं आया जितना यह सामने बैठा खरीदार , जो एक हाथ से दाढ़ी सहला रहा था और दूसरे से तस्बीह फेर रहा था। इसे कैसे पता चला? किसने इसे खबर दी होगी ? सवाल दिल में आते ही अकरम अली ने ग़ुस्से से अपने बड़े बेटे शरीफुद्दीन की तरफ देखा जो बाप से आँखे चुराकर उस अरब शेख की चापलूसी में लगा हुआ था. वैसे सुलगते लोबान की खुशबू और नई बालूचरी साड़ी की खबर फैलते देर नहीं लगती. बशीरहाट में सभी जानते थे अकरम ने एक नई बालूचरी साड़ी तैयार की है, लेकिन इसकी खबर कलकत्ता और इस शेख तक पहुंचाने की क्या ज़रूरत थी?
अपनी ही लाइ हुई, आगे बढ़ी मिठाई की प्लेट को इशारे से इंकार करते हुए शेख ने मामूली मलमल में लिपटी हुई बालूचरी की तरफ हाथ बढ़ाया। अकरम अली ने ढंकी हुई साड़ी पर हाथ रखा। उसका सारा जिस्म जैसे झनझना उठा। कितनी आस से उसने इस साड़ी को करघे पर चढ़ाया था । सबसे नज़र बचाकर, अपनी बीवी के ज़ेवर बेचकर मुर्शिदाबाद गया था, रेशम के कोये खरीदने। उसने सोचा था खदीजा को तो मरे चार साल होने को आये, अब उसके ज़ेवर रखने से क्या फ़ायदा ? एक एक रेशम के कोये को उसने अपने सामने बंटवाया था और तार बनवाये थे. जब रेशम के धागे बन गए तब रंगाई में कितनी एहतियात बरती थी उसने। तभी तो ऊपर का मलमल हटाकर, पहली तह खुलते ही जैसे ही पल्लू सामने आया आसपास खड़े लोगो की सांस थम गई और शेख के मुंह से यक ब यक निकला "सुभांनल्लाह।" 
अकरम अली के तीनो बेटों की बांछे खिल गई --शेख़ फंस गया!
कांपते हाथों से अकरम अली ने साड़ी की एक एक परत खोलनी शुरू की। हर तह के साथ यादों का एक काफिला जुड़ा हुआ था -- नीले रंग पर उसने कितनी बहस की थी ---आकाश नील, समुन्दर नील, शंख नील या फिरोज़ी नील ! तंग आकर ग़ुलाम नबी रंगरेज़ ने कहा था---अरे बाबा मोर के पंखों में इतने नील होते हैं क्या?
अकरम अली हंस पड़ा था "अरे इतने नील नहीं होते तो मोर नाचता क्यों है ? क्या मोर बादल देखकर नाचता है? बेवकूफ, वो अपने रंग दिखाने लिए इतराता है!"
"तो नाचता मोर बनाना ज़रूरी है क्या?" ग़ुलाम नबी ने आगे हुज्जत की। 
"वाह ! जो नाचे न वह मोर काहे का, वह तो कौआ हुआ। " 
बालूचरी बनाना कोई ख़ाला जी का घर नहीं है इसीलिए बस दस या बारह साड़ियां ही बनाता है अकरम अली साल भर में। ज़्यादातर साड़ियां दुर्गा पूजा के लिए खरीदी जाती हैं। आस पास की सार्वजनिक पूजा कमिटियों से लेकर कलकत्ता तक की पूजा कमिटियों में होड़ लगी रहती है ; अकरम अली की बनाई बालूचरी हाथ लग जाए और पूजा में स्थापित होने वाली दुर्गा ठाकुर के रूप को चार चाँद लग जायें। पूजा पंडाल में आने वाले लोग भी झट पहचान जाते और एक दुसरे से कहते ---'अकरम अली तांती की साड़ी है ना ?' अकरम का सीना गर्व से फूल जाता I लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं दिल में एक काँटा सा चुभता रहता। उसने तो साड़ी माँ को बेचीं है। भेंट तो उस भक्त ने की जिसने उसके दाम चुकाए। फिर वह दिल को समझाता और वादा करता, एक साड़ी वह ऐसी बनाएगा जो अपने आप में एक मिसाल होगी; बेषकीमती! नायाब! कारीगरी और कला की ऐसी मिसाल जो खुद अकरम अली के हुनर को पार कर जाएगी, वह हाथ की नफासत उसमे दिखेगी जो कला का दर्जा पायेगी। वह साड़ी जो वह देवी को बेचेगा नहीं; देवी को भेंट करेगा ! 
ढब की आवाज़ से अकरम अली का ध्यान टूटा. सामने एक हज़ार के नोटों का बण्डल पड़ा था। जल्दी जल्दी तीन और बण्डल तख़्त पर गिरे. एक लाख से ज़्यादा साडी का दाम नहीं था। यह तो चार लाख थे। उसके दिल में एक टीस सी उठी। यही रुपये पांच साल पहले मिल गए होते तो खदीजा बच जाती। न उसकी जान बचा पाया न ही उसकी ख्वाहिश पूरी कर पाया। बेचारी दिल में बालूचरी पहनने की आस लिए इस दुनिया से चली गई। शेख ने एक और गद्दी उसकी तरफ बढ़ाई। उसके पास खड़ा उसका सेक्रेटरी बोला "यह तुम्हारी बख्शीश है, तुम्हारे हुनर और मेहनत की दाद दे रहे हैं शेख !"
"लेकिन मोहतरम, आपके देश में तो औरतें साड़ी पहनती नहीं। आप इसका क्या करेंगे ?"
शेख सवाल समझ कर मुस्कुराया "अगले महीने मेरी शादी है; हम लोगों में लड़की के लिए लड़के वालों की तरफ से अबाया भेजा जाता है। इस साड़ी को काटकर अबाया बनेगा; पल्लू से नक़ाब और ऊपर वाला हिस्सा। बहुत खूबसूरत लगेगा इसका अबाया; शायद हमारी बीवी इसे पहली रात को ही पेहेनना चाहे। "
"आप मेरी साड़ी पर कैची चलवाएंगे?"
"काटे बग़ैर तो बुर्का नहीं बन सकता।" शेख अपनी होने वाली बीवी के लिए बहुत से कीमती तोहफे खरीद रहा था। बंगाल की नायाब सोने की नक्काशी के ज़ेवर खरीदने कलकत्ता आया था। वहीं उसे इस साडी की खबर मिली थी और इसी की लालच में इतनी दूर बशीरहाट आया था। सौदा हो गया था अब बेकार बातों में वक़्त गवाना उसे खल रहा था.
अकरम अली खड़ा हो गया। सबको नज़र भरकर देखा और बोला "बुर्का तो तन ढंकने के लिए होता है। "
"सभी कपडा तन ढंकने के लिए होता है." शेख ने दुभाषिये के ज़रिये जवाब दिया।
"सभी का तो मैं नहीं जानता, साड़ी तन ढंकने के लिए नहीं होती."
"तो फिर किसलिए होती है ?" शेख ने तंज़ से सवाल किया।
"सदियों पहले इंसान जानवर की खाल और पेड़ की छाल से भी तन ढँक लेता था. इतना बेहतरीन सूत और रेशम, ऐसे ऐसे रंग, इतनी कारीगरी, ऐसे नमूने ईजाद करने की क्या ज़रूरत थी? नहीं शेख़ साड़ी तन ढंकने के लिए नहीं, जिस्म का हुस्न उभारने के लिए होती है। साड़ी पल्लू को आँचल करके सिर ढंकते हैं ताकि वह बार बार फिसले और काले बालों की घटा लहरा ये और उसमे खिंची हुई सीधी मांग जैसे बिजली का कौंधा ! पल्लू कंधे पर यूँ डाला जाता है ताकि बार बार ढलक जाये और सामने वाले की नज़रे गले से गुज़रती, छाती के उभार से होती, कमर के ख़म पर रूकती, नितम्बो की गोलाइयों पर से फिसलती धड़ाम से ज़मीन पर आ गिरे।”
कुछ समझकर कुछ न समझकर शेख हंसा "तुम तो तांती काम और शायर ज़्यादा मालूम होते हो। इसीलिए औरतों के पहनने की चीज़ बनाते हो , आशिकमिजाज जो ठहरे। "
"जी हाँ सुनते हैं पहले यूनान और रोम के मर्द भी साड़ी जैसा लिबास पहनते थे; लेकिन मर्दों का सीधा सपाट, लठ जैसा शरीर साडी की ताब क्या लाता ? मर्दों से साडी कबकी छूट गई, औरतें आजतक पेहेन रही हैं। "
"खैर वह सब मैं नहीं जानता , हाँ तुम्हारी साड़ी बेजोड़ है। मेरी बीवी इसका अबाया पहनकर बहुत खुश होगी। "
"मैं अपनी साड़ी आपको नहीं बेचूंगा! "
अकरम के छोटे से घर का आँगन खचाखच भरा हुआ था। बशीरहाट में कभी मर्सिडीज़ बेन्ज़ देखी नहीं गई थी। अंदर हो रही बातचीत को सब दम साधे सुन रहे थे। जैसे ही अकरम अली ने साड़ी न बेचने का ऐलान किया बाहर जमा भीड़ जैसे अचानक फट पड़ी; जितने मुह उतनी बात। एक पल को तो शेख़ भी हक्का बक्का रह गया फिर संभलते हुए बोला "क्या कीमत हमने काम लगाई है?"
अकरम कुछ पल चुप रहा फिर साड़ी पर हाथ फेर और उसे बहुत संभाल कर मलमल में लपेटते हुए बोला "यह साड़ी मेरी रूह है शेख साहब और रूह को काट फाड़ कर, टुकड़े टुकड़े नहीं किया जाता, सुइयाँ चुभाकर छलनी नहीं करते आत्मा को मोहतरम!"
"क्या कह रहे हो अब्बा ?" अकरम का दूसरा बेटा करीमुद्दीन बोला। "इतना पैसा तो हमने कभी देखा भी नहीं है!"
"चुप रह कूढ़ कहीं के. कितना तुझे अपना हुनर सिखाने की कोशिश की पर रहा तू जानवर का जानवर ही। तांत और रेशम आंकना तो दूर की बात तुझसे तो करघे पर बैठा भी नहीं जाता। आधे घंटे में ही कहता है 'हाय हाय मेरी कमर दुःख रही है ‘ अरे कमर तोड़े और आँखे फोड़े बिना कहीं बालूचरी बनती है ? "
"लेकिन बनाई तो बेचने के लिए है न?" शेख के सेक्रेटरी ने पूछा।
"आजतक जितनी साड़ियां बनाई सब बेचीं; यह नहीं बेचूंगा। यह साड़ी मैंने माँ दुर्गा के लिए बनाई है।”
"यह कौन हैं ?" शेख ने शायद माँ दुर्गा को कोई दूसरा, ज़्यादा मालदार गाहक समझा।
"अब्बा, देवी को पहनाई गई साड़ी भी तो बर्बाद ही होती है न। ठाकुर के साथ ही विसर्जन हो जाता है साड़ी का। "
ज़ोर की तड़ाक की आवाज़ आई और शमसुद्दीन गिरते गिरते बचा "खबरदार जो काफिरों जैसी बाते मुंह से निकाली। बेटी को सजा संवार कर ही तो ससुराल भेझा जाता है। मेरी बनाई हुई साड़ी पहनकर, दस दिन से बिझुड़े शिव को दुर्गा रिझाती है। तभी तो तप भांग होता है महातपस्वी का, सब मेरी बनाई हुई साड़ी के कारण ही तो। "
"इतनी साड़ियां एक साथ पहनती है देवी दुर्गा?' शरीफउद्दीन ने गाल सहलाते हुए पूछा।
"कितनी पहनती है, कैसे पहनती है, क्यों पहनती है यह तो देवी ही जाने। मैं बस इतना जानता हूँ की मेरी बनाई साड़ी बहुत पसंद करती है माँ, इसीलिए तो हर साल से बेहतर साड़ी बन जाती है, देवी माँ की दया से। "
शेख उठ खड़ा हुआ. ग़ुस्से से उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। "तुम मुसलमान होकर भी देवी देवता को मानते हो-----ताज्जुब है!"
अकरम अली के चेहरे पर न घुसा था, न नफरत , न नाराज़गी न हिकारत. एक मासूम सी ख़ुशी उसके चेहरे पर खेल रही थी, जैसी कोई बच्चा, अपने घर के रोशनदान में दिए चिड़िया के अण्डों में से बच्चे निकलते, बड़े होते और अंत में पहली उड़ान भरते देख रहा हो। मलमल में लिपटी बालूचरी साड़ी को अपने सीने से लगाते हुए वो पूरे ऐतमाद से बोला "आप इंसान होकर भी कला और फ़न का मर्म नहीं समझते ---ताज्जुब है!"

नूर ज़हीर 
फ़ोन : 9811772361

Wednesday, June 28, 2017

परमाणु रिसाव के ख़तरों से आगाह करती एक नाट्य प्रस्तुति

-सारिका श्रीवास्तव

इंदौर। 11 मई 2011 में जापान के फुकुशिमा में सुनामी के बाद टूटे परमाणु संयंत्र के विकिरण से तमाम दुष्प्रभाव हुए। जनहानि का पता चला नहीं या चलने नहीं दिया गया लेकिन परमाणु रिसाव के फलस्वरूप हजारों की संख्या में मारे गए समुद्री जीव-जन्तुओं ने तो ये राज खोला ही कि परमाणु विकिरण का क्या असर जीवन पर पड़ता है और यह कि अभी तक हमें उस पर काबू पाने के तरीके पता नहीं हैं। नतीजा यही है कि जब भी ऐसी दुर्घटना होती है तो समुद्री जल जीवों की तरह ही आम नागरिक ही निशाना बनते हैं। परमाणु विकिरण से होने वाले दुष्प्रभावों पर केन्द्रित 30 मिनिट की अवधि के माइम नाटक ‘‘एक मछली की कहानी’’ के जरिए कोलकाता से आये माइम कलाकार सुषान्त दास ने अदुभुत समा बाँधा। कुडनकुलम में लगाए जाने वाले परमाणु संयंत्र के विरोध में समुद्र पर आश्रित एवं अपनी जीविका चलाने वाले मछुआरों, नाविकों के विरोध, नेताओं की स्वार्थपरक राजनीति और अपनी ताकत के दम पर पुलिस द्वारा इस विरोध पर दमनात्मक कार्यवाही और समुद्री जीवजन्तुओं के ऊपर इससे पड़ने वाले दुष्प्रभाव को उन्होंने बहुत ही भावप्रवण तरीके से प्रस्तुत किया।

उनके शरीर की मुद्राएँ और अभिनय तथा सिर्फ़ मेकअप के सहारे अकेले ऐसे जटिल विषय पर बच्चों-बड़ों की दिलचस्पी कायम रखना आश्चर्यजनक था। बिना किन्हीं उपकरणों व संगीत आदि के पूरी तरह उनकी प्रस्तुति उन पर ही निर्भर रहती है। उनका संतुलन, भाव-भंगिमाएँ चकित कर देती हैं।

श्री सुषान्त दास कोलकाता के रविन्द्र भवन से 2004 के माइम कला के टॅापर रहे हैं। वे पिछले 15 वर्षों से एकल अभिनय के जरिए माइम द्वारा लोगों के बीच सामाजिक चेतना लाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने जनांदोलनों के विषयों को अपने नाटक का विषय बनाया है ताकि उनकी कला भी आंदोलन का एक हिस्सा बन सके।

उनकी यही प्रस्तुति उपस्थित दर्षकों की समझ को देखते हुए थोड़ी-बहुत रद्दोबदल के साथ इंदौर में 22 और 23 जून 2016 को तीन जगहों पर इंदौर इप्टा द्वारा आयोजित की गई। उन्होंने इंदौर इप्टा के किशोर और युवा कलाकारों को भी माइम के बारे में विस्तार से बताया।

स्टेट बैंक अॅाफ इंदौर यूनियन द्वारा चलाये जा रहे एक विद्यालय में 22 जून को सुषान्त द्वारा माइम की प्रथम प्रस्तुति इसी विद्यालय के बच्चों व शिक्षकों के मध्य दी गई। नर्सरी से कक्षा 12 तक के बच्चों के मध्य किए गए इस माइम के जरिए पर्यावरण प्रदूषण के जलजीवों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को बखूबी पेश किया गया। कॉमरेड आलोक खरे व स्कूल प्रशसन का इसमें उत्साहजनक सहयोग रहा।
इसी दिन शाम को पालदा स्थित कचड़ा बीनने वालों और दूसरों के घरों में काम करने वाली मेहनतकश महिलाओं के अधिकारों के लिए एकजुट करने वाले जनविकास केन्द्र की मेहनतकश महिलाओं और उनके बच्चों के मध्य भी उन्होंने प्रभावी प्रस्तुति दी। कृष्णार्जुन और फादर रॉय ने इस सभा को सफल बनाने में योगदान दिया।

रूपांकन के साथी अशोक दुबे, साथी शारदा बहन, अरविंद, घनश्याम, दीपिका, डोलू (रितिका), राज आदि के सहयोग से शंकरगंज, जिंसी में इप्टा के तत्वावधान में तीसरी प्रस्तुति की गई थी। कार्यक्रम का प्रारंभ करते हुए इंदौर इप्टा के सचिव अषोक दुबे ने उपस्थित लोगों को इंदौर में 2, 3 व 4 अक्टूबर को आयोजित होने वाले चौदहवें राष्ट्रीय सम्मेलन की जानकारी दी और कहा कि लगभग हर 15 दिन में इप्टा की ओर से इंदौर में की जा रहीं ये प्रस्तुतियाँ राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारियों का हिस्सा हैं और आगामी 22 जुलाई को अमृतलाल नागर की कहानियों पर मुम्बई के कलाकार नाटक प्रस्तुत करेंगे।

इस मौके पर इंसानियत और सूफियाना रवायत को कव्वाली के जरिए देश-विदेशों तक पहुँचाने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मशहूर कव्वाल अहमद साबरी की पाकिस्तान के कराची में दिनदहाड़े हुई हत्या और बंगाल में इंसानियत के लिए आवाज बुलंद करने वाले ब्लॉगरों की हत्या की घोर निंदा और विरोध करते हुए अशोक दुबे ने कहा कि अहमद साबरी हों, दाभोलकर, पानसरे या कलबुर्गी हों वे हमारी आवाज, हमारे विचारों को कभी नहीं मार सकते क्योंकि वे पूरी फिजां में घुले हुए हैं। इंदौर इप्टा की ओर से अहमद साबरी को श्रृद्धांजली दी गई।

शान्ति एकजुटता समिति के संयोजक कॅामरेड पी.सी. जैन, इंदौर इप्टा अध्यक्ष विजय दलाल, अरविंद पोरवाल, अजय लागू, जयप्रकाश, इंदौर के नाट्यकर्मी सुशील गोयल, रवि और उनके साथी, शिल्पकार जितेन्द्र वेगड़, इप्टा के साथी पूजा सोलसे, महिमा सिंह, राज लोगरे, साक्षी और अंशुल सोलंकी के अलावा दस साल से लेकर सत्तर वर्ष की उम्र तक के लोग इस कार्यक्रम में उपस्थित थे।

कार्यक्रम के अंत में कॅामरेड पी.सी.जैन ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि हम शांति और अमन चाहने वाले लोग हैं जो पृथ्वी को खुशहाल रखना चाहते हैं। हजारों करोड़ रुपया परमाणु संयंत्र पर खर्च करने के बजाए भारत में लोगों को शिक्षा, रोजगार और अच्छा स्वास्थ्य उपलब्ध करवाना अधिक जरूरी है परंतु सरकार निजी स्वार्थ के चलते पूरे देश को फिर से विदेशियों के हाथ में सौंप रही है। लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे। कार्यक्रम का संचालन अशोक दुबे और सारिका श्रीवास्तव ने किया।

Saturday, June 24, 2017

अमेरिकी फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन की मख़मली गोद और जन नाट्य मंच

- राजेश चन्द्र

जन नाट्य मंच सफदर हाशमी की हत्या के बाद से ही एक सांस्कृतिक दोराहे पर खड़ा रहा है।  एक तरफ सफदर की जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन की परंपरा के संरक्षण का दबाव और दूसरी तरफ इलीट संस्कृति की ऐश्वर्यशाली जीवनशैली का व्यामोह उसे खींचता रहा है। सांगठनिक लोकतंत्र के सम्पूर्ण निषेध और पार्टी (सीपीआईएम) की दुर्भाग्यपूर्ण विफलताओं ने जनम को हमेशा इतनी सुविधा और स्पेस मुहैय्या कराया कि वह इस विरोधाभास को जीते हुए भी जनवादी भ्रम बनाये रख सके और अपनी इलीट लालसाओं की सम्पूर्ण तुष्टि का व्यापार गांठता रह सके। इस खींचतान का फ़ायदा इलीट सुधन्वा देशपांडे और माला हाशमी ने खूब उठाया है। एक तरफ उन्होंने रंगमंच के एनएसडी जैसे ब्राह्मणवादी और इलीटिस्ट संस्थान से एक साहचर्य और आदान-प्रदान का सम्बंध बनाये रखा ताकि दिल्ली और देश के इलीट सर्किल में उनकी स्वीकार्यता बनी रहे, और दूसरी तरफ पार्टी के बौद्धिक-सांस्कृतिक अकाल और सन्नाटे का चालाक दोहन करते हुए जनवादी हलकों में भी उनकी केन्द्रीयता क़ायम रहे। इस सुअवसर को मुफ़ीद और स्वर्णिम बनाने का एक भी अवसर उन्होंने गंवाया हो, इसका उदाहरण नहीं मिलेगा।

सफदर स्टूडियो बन जाने के बाद सुधन्वा ने अपनी निजी इलीट लालसाओं के अनुसार उसकी कार्यशैली विकसित की और खुद को अब तक उसका एकच्छत्र भाग्यविधाता बनाये रखा है। सफदर स्टूडियो उस मेहनतकश जनता के सहयोग से निर्मित हुआ है, जिसके लिये सफदर काम करते रहे, पर वह उस वर्ग की बख़्तरबंद आरामग़ाह बना हुआ है, जिसके ख़िलाफ़ लड़ते हुए सफ़दर ने शहादत दे दी। सुधन्वा और माला हाशमी ने उसे आम जनता की पहुंच और भागीदारी से मुक्त एक इलीट द्वीप की तरह विकसित किया है और इसका अहसास वहां जाकर कोई भी कर सकता है। सुधन्वा और माला हाशमी का दिल्ली के रंगजगत और यहां की सामान्य जनता से कोई सम्पर्क और जुड़ाव नहीं है और स्वाभाविक ही है कि वे जनता के किसी भी आन्दोलन और संघर्ष में शामिल नहीं दिखायी पड़ते। नुक्कड़ नाटक से तो वर्षों पहले उन्होंने किनारा कर लिया था, और सफदर की पुण्यतिथि और जयंती जैसी सालाना उत्सवधर्मिताओं का निर्वाह करने भर के लिये उन्होंने एनएसडी जैसे इलीट और ब्राह्मणवादी संस्थान में मुलायम कालीन के ऊपर चुनिन्दा दर्शकों के बीच बाबा आदम के ज़माने के कथित 'जनवादी नाटक' का उथला, प्राणहीन प्रदर्शन कर देने तक खुद को सीमित कर लिया है। दिल्ली की मलिन बस्तियों, कल-कारखानों की धूल फांकने के बजाय उन्होंने पिछले एक-डेढ़ दशक में अमेरिका और यूरोप के देशों में जाकर 'जनवाद' की अलख जगायी है! मकसद समझना इतना मुश्किल भी नहीं है। यह ऐसा ही है जैसे दिल्ली के एनजीओ सड़क के बच्चों को विदेश यात्रा पर ले जाते हैं, ताकि उनकी फटेहाली और दुर्दशा का प्रदर्शन कर 'डॉलर सहायता' जुटा सकें। सड़क के बच्चे दुबारा सड़कों पर छोड़ दिये जाते हैं। उनकी भूमिका यही समाप्त हो जाती है।

जन नाट्य मंच ने अब इन्डिया फ़ाउन्डेशन फ़ॉर द आर्ट्स जैसी फ़ंडिंग एजेन्सी का दामन थाम लिया है, जो भारत में फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन और रॉकफ़ेलर फ़ाउन्डेशन के वैश्विक साम्राज्यवादी एजेन्डे को लागू कराने वाली प्रतिनिधि संस्था है। फ़ोर्ड और रॉकफ़ेलर जैसी संस्थाओं के कारनामे दुनिया भर के शिक्षित लोगों को मालूम हैं और उन्हें दोहराने की बहुत ज़रूरत नहीं महसूस होती। ये संस्थाएं अमेरिकी हितों के अनुरूप दुनिया में हिंसा, अशान्ति, उपद्रव और अराजकता फैलाने तथा वामपंथी आन्दोलनों को पनपने न देने की अपनी बेहतरीन उपलब्धियों के लिये विख्यात हैं। आज 23 जून है और आज ही जन नाट्य मंच और इन्डिया फ़ाउन्डेशन फ़ॉर द आर्ट्स के नये गठबंधन और वैचारिक साझेदारी की औपचारिक शुरुआत हो रही है। शाम को 7 बजे सफदर स्टूडियो में 'नुक्कड़ नाटक की एक शाम' का आयोजन है, जिसके लिये जनम ने लोगों को आमंत्रण बांटा है। यह जनपक्षधर रंगमंच का एक नया शिफ़्ट है, जिसका नेतृत्व एक बार फिर से जनम कर रहा है। यह उसका ऐतिहासिक कार्यभार जो है। हाल के वर्षों में जनम की सक्रियता इजरायल के खिलाफ नुक्कड़ नाटक के माध्यम से एक देशव्यापी प्रतिरोध विकसित करने को लेकर दिखायी पड़ी थी, जिसके बारे में सुनने में आता है कि उस अभियान के लिये जनम को फिलिस्तीन से भरपूर फंड मिला था और इस फंड का हिस्सा उसने देश के कई अन्य समानधर्मा संगठनों (खास तौर से पटना की प्रेरणा जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा) के साथ भी बांटा!

प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने 'विरोधी धारा का थियेटर' शीर्षक से अपने एक आलेख में कहा था कि, 'कला और संस्कृति का विकास तब तक होता है, जब तक वह धारा के विरुद्ध गतिमान रहती है। उसके साथ चल कर वह हमेशा कमज़ोर पड़ जाती है। शासक वर्ग की संस्कृति ने आज ऐसी व्यूह रचना कर ली है कि अब अगर लोकधर्मी या शोषित वर्ग की संस्कृति को पनपना है तो वह उसके विरोध में ही पनप सकेगी, वरना उसी संस्कृति का एक हिस्सा बन कर रह जायेगी।' सफदर हाशमी का जन नाट्य मंच आज वैश्विक पूंजी के सांस्कृतिक खेल का हिस्सा बन गया है। इस नये शिफ़्ट का इस्तक़बाल कीजिये!

(पोस्ट के साथ आज के कार्यक्रम का आमंत्रण और इन्डिया फ़ाउन्डेशन पर एक रपट का स्नैपशॉट है, जिसमें उसके फंडिंग स्रोतों का स्पष्ट विवरण दिया गया है। रपट का लिंक कमेन्ट बॉक्स में है।)