Wednesday, May 23, 2018

जबलपुर में इप्टा की राष्ट्रीय समिति की बैठक संपन्न

जबलपुर में इप्टा की राष्ट्रीय समिति की बैठक
 इप्टा की स्थापना का यह 75वां वर्ष है। इस अवसर पूरे देश में इप्टा और सम्बद्ध संगठनों द्वारा कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इसी उपलक्ष्य में पटना में 27 से 31 अक्टूबर 2018 तक इप्टा की 75वीं वर्षगांठ को मनाने के लिए एक भव्य उत्सव आयोजित हो रहा है। इस उत्सव को योजनाबद्ध तरीके से आयोजित करने हेतु और उसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हेतु भारतीय जननाट्य संघ इप्टा की नेशनल कमेटी की मीटिंग जबलपुर में 19-20 मई को आयोजित की गई।
इस महत्वपूर्ण बैठक हेतु इप्टा के महासचिव राकेश व वेदा राकेश 15 मई को ही जबलपुर आ गये। 17 मई को उड़ीसा से सुशांत महापात्र व कृष्णप्रिया मिश्रा पहुंच गये। 18 मई की सुबह से प्रतिनिधियों का आना शुरू हो गया। आसाम से प्रमोद भुइंया और उनकी पत्नी इला सुबह 5 बजे पंहुच गये। मुम्बई से नवीन नीरज दोपहर को पंहुचे। झारखंड से शैलेन्द्र कुमार, उपेन्द्र और शीतल भी दोपहर को पंहुच गये। दोपहर को वायुयान से केरल से उपाध्यक्ष टी वी बालन और एन बालाचन्द्रन पंहुचे। 18 मई की ही शाम को कर्नाटक के साथी शणमुख स्वामी और रामाकृष्णा पंहुच गये। कोलकाता से साथी अभिताभ चक्रवर्ती भी पंहुच गये। रायगढ़ से अजय व उषा आठले रात तक जबलपुर पंहुच गये। 18 मई की शाम आजमगढ से लोककलाकार बैजनाथ यादव व चंडीगढ से बलकार सिद्धू, कंवलनैन सिंह सेखों और डा स्वराज संधू पंहुचे। 19 की सुबह दो बजे पटना से तनवीर अख्तर, संजय, फिरोज, संजीव कुमार और आसिफ पंहुच गये। 19 की सुबह दिल्ली से मनीष श्रीवास्तव, अमिताभ पांडेय, नूर ज+हीर और मलांचा चक्रवर्ती, जयपुर से इप्टा के अध्यक्ष रणबीर सिंह जी, अशोकनगर से हरिओम राजौरिया, पंजाब से इंदरजीत सिंह, जगदीश सिंह, सरबजीत कौर और प्रो डा अमन भोगल, आगरा से भावना जितेन्द्र रघुवंशी, ज्योत्सना रघुवंशी, दिलीप रघुवंशी, मुक्तिकिंकर, रायबरेली से संतोष डे, छतरपुर से शिवेन्द्र शुक्ला, भिलाई से राजेश श्रीवास्तव, मणिमय मुखर्जी, तेलंगाना से लक्ष्मीनारायण, जेकब, उत्तराखंड से वी के डोभाल, इंदौर से विनीत तिवारी और विजय दलाल, शहडोल से वी के नामदेव, रीवां से डा विद्याप्रकाश और चन्द्रशेखर व रायपुर से निसार अली पंहुचे।
19 की सुबह से ही उत्सव का सा माहौल बन गया था। देश के चारों कोनों से पंहुचे प्रतिनिधि 17 प्रदेशों व केन्द्रशासित राज्यों से इस बैठक में सदस्यगण आए। इसी से इस बैठक के महत्व का पता चलता है। चाय नाश्ते के दौर के बीच में सभी एक दूसरे से हालचाल जानते रहे। सभी की चिंताएं एक सी थीं।
19 मई की सुबह 10.30 बजे राष्ट्रीय समिति की बैठक प्रारंभ हुई। मंच पर इप्टा के अध्यक्ष रणबीर सिंह, उपाध्यक्षगण तनवीर अख्तर, हिमांशु राय, टी वी बालन,अमिताभ चक्रवर्ती और महासचिव राकेश आसीन थे। महासचिव राकेश ने प्रारंभिक उद्बोधन देते हुए देश के सांस्कृतिक हालात पर बातचीत की और बैठक का एजेंडा बताया। इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय समिति की जबलपुर बैठक के मेजबान हिमांशु राय ने सभी प्रतिनिधियों का स्वागत किया और आशा व्यक्त की कि यह बैठक एक यादगार बैठक होगी। इसमें लिए गए निर्णय हमारे भविष्य की दिशा और कार्यक्रम तय करने में सफल होंगे। इस अवसर पर रायपुर से आए निसार अली ने आम आदमी की पीड़ा को व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ी में नाचा गम्मत का एक अंश प्रस्तुत किया।
इसके पश्चात् एजेंडे पर बिन्दुवार विचार शुरू हुआ जिसमें बहुत से संगठनात्मक फैसले लिए गए और जिम्मेदारियां सौंपी गई। यह प्रयास किया जा रहा है कि 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर भारत के सांस्कृतिक इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली शख्सियतों पर मोनोग्राफ प्रकाशित किए जाएं। इप्टा के सेन्ट्रल स्क्वैड के सदस्यों, इप्टा के जन्म से लेकर अबतक महत्वपूर्ण योगदान देने वाले कलाकारों, साहित्यकारों को इस तरह स्मरण किया जाए। इप्टा के इतिहास में देश के विभिन्न प्रदेशों और शहरों में किए गये कामों का भी दस्तावेजीकरण किया जाए। हर प्रदेश की इप्टा का इतिहास लिखा जाए।
पटना में होने वाले सम्मेलन की तैयारियों पर विस्तार से चर्चा हुई। उसका एक प्रारंभिक खाका तनवीर अख्तर ने प्रस्तुत किया जिस पर अनेक सुझाव आए। यह भी तय किया गया कि इप्टा से सहमति रखने वाले देश के सभी साहित्यकारों, कलाकारों, चि+त्रकारांे, संगीत व गायन, लोककलाओं के कलाकारों व फिल्म व टी वी से जुड़े कलाकारों, निर्देशकों फोटोग्राफर्स, फिल्मकार सभी को सम्मेलन में ससम्मान आमंत्रित किया जाए ताकि इप्टा का एक उदार और व्यापक स्वरूप बन सके। विभिन्न विधाओं पर केन्द्रित कार्यक्रम व सम्मेलन आयोजित किए जाने की संभावनाओं पर विचार हुआ।
19 मई को विवेचना ने राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। विषय था - आज का समय और रंगकर्म की चुनौतियां। इस विषय पर इप्टा के महासचिव राकेश (लखनऊ), वरिष्ठ रंगकर्मी तनवीर अख्तर (पटना) व शैलेन्द्र कुमार (पलामू,झारखंड), साहित्यकार व रंगकर्मी नूर ज+हीर (दिल्ली ) और इप्टा के अध्यक्ष श्री रणवीर सिंह (जयपुर) ने अपने विचार व्यक्त किए। इसमें देश भर से आए रंगकर्मियों ने शिरकत की।
19 मई को रात्रि को भोजन के उपरांत देर रात तक अनौपचारिक चर्चाएं चलती रहीं। गायन और नृत्य भी होता रहा। उधर इप्टा के पदाधिकारी दूसरे दिन की कार्यवाही पर बात करते रहे।
20 मई की सुबह 10 बजे से सत्र आरंभ हुआ। इसमें इप्टा के प्रकाशनों, पटना के उत्सव की तैयारियों पर चर्चा हुई। विभिन्न प्रदेशों ने पटना में जाने वाले प्रतिनिधियों की संख्या और प्रस्तुत किए जाने वाले कार्यक्रमों के बारे में बताया।
इप्टा की वेबसाइट, स्क्रिप्ट बैंक, आदि पर विस्तार से चर्चा हुई। इप्टा के पटना उत्सव के प्रचार प्रसार पर काफी बातचीत हुई। इसमें मुम्बई से पधारे नवीन नीरज ने नेशनल कमेटी सदस्यों को वेबसाइट और फिल्म निर्माण व अन्य के बारे में विस्तार से समझाया। इनका उपयोग किस तरह से किया जाए इस पर बात हुई।
दोपहर तीन बजे अध्यक्ष रणवीर सिंह व महासचिव राकेश द्वारा नेशनल कमेटी की बैठक के सफल आयोजन हेतु विवेचना,जबलपुर का आभार व्यक्त किया गया। सभी सदस्यों का जिन्होंने लंबी दूरी तय करके प्रचंड गर्मी में यात्रा कर इस बैठक में शिरकत की उसके लिए आभार व्यक्त किया गया। यह आशा व्यक्त की गई कि भारतीय जननाट्य संघ ( इप्टा ) भविष्य में खूब विस्तारित और प्रसारित होगा। पटना का उत्सव बेहद सफल होगा। सभी सदस्य इसकी तैयारियों में जुट जाएं।
अंत में इंदौर सम्मेलन के पश्चात् दिवंगत दुनिया और देश की महत्वपूर्ण हस्तियों को श्रद्धांजलि अर्पित कर दो मिनट का मौन रखा गया और भारतीय जननाट्य संघ की नेशनल कमेटी की 19 व 20 मई 2018 को जबलपुर में आयोजित बैठक समाप्त हुई।
विवेचना जबलपुर के लिए यह गौरव की बात थी कि जबलपुर को इप्टा की नेशनल कमेटी मीटिंग के लिए चुना गया। विवेचना की ओर से इसे सुव्यवस्थित तरीके से आयोजित किया गया। रहने खाने व बैठक की व्यवस्थाएं पूर्णतः व्यवस्थित रहीं। सभी मेहमानों ने जबलपुर में बिताये समय का खूब आनंद लिया। अच्छी चर्चाएं हुईं। जबलपुर की इस बैठक के आयोजन में हिमांशु राय, वसंत काशीकर, बदरीश पांडे, साहिल सेठी, रितिक गौतम और अजय धाबर्डे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नए संदर्भों के साथ 'हवालात'

इप्टा लखनऊ ने 23 मई को "जन एकता जन अधिकार आंदोलन "द्वारा आयोजित किसान,मजदूर एवं महिलाओं की रैली में 22 कैसरबाग में अपने नाटक "हवालात"का प्रदर्शन करते हुए प्लैटिनम जुबली कार्यक्रम श्रृंखला की शुरुआत की। प्रख्यात कवि एवं नाटककार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के इस नाटक को आज के सन्दर्भों से जोड़ा गया है। नाटक में भगवा सिंह,धर्मवीर एवं कसाब अली नामक तीन भटके हुए नवयुवक हैं जो गोरक्षा एवं हिन्दू तथा मुस्लिम कट्टरता के आधार पर इसलिए निर्दोष लोगों की हत्या करते हैं ताकि उन्हें प्रसिद्ध मिल सके इसलिए वोह एक महिला पुलिस दरोगा से हवालात ले जाने की गुहार लगाते हैं।बहुत सारी मनोरंजक एवं नाटकीय घटनाओं के बीच यह युवक अपने उद्देश्य में सफल नहीं होते हैं। नाटक में दरोगा के रूप में रजनी, तथा तीन नवयुवकों की भूमिकाये अनुज,शेखर तथा बबलू खान ने निभाईं हैं।नाटक का निर्देशन युवा रंगकर्मी इच्छाशंकर ने किया है।इस नाटक का प्रदर्शन 24 मई को शाम 5 बजे केनरा बैंक सर्किल ऑफिस गोमतीनगर तथा 25 मई इप्टा स्थापना दिवस के अवसर पर शाम 6.30बजे इप्टा कार्यालय 22 केसरबाग में होगा साथ ही युवा संगीतकार एवं गायक कमलाकांत के निर्देशन में जनगीतों की प्रस्तुति भी होगी।

Monday, May 21, 2018

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक

-हनुमन्त किशोर

विवेचना जबलपुर द्वारा दिनांक १९ /५/२०१८ को गोपाल सदन ,दमोह नाका जबलपुर में 'आज का समय और रंगकर्म की चुनौतियां ' शीर्षक से राष्टीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया |

जिसकी अध्यक्षता भारतीय जन नाट्य  संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणवीर सिंह ने की |विषय प्रवर्तन संस्कृति कर्मी नूर ज़हीर ने किया | उन्होंने अपमी बात प्रतीक रूप में एक  कथा के  जरिये प्रस्तुत की | कथा जंगल के राजा शेर की है जिसकी शेरनी की सोने की अंगूठी उसके बेड रूम से चोरी हो जाती है | शेर चोर का पता लगाने के लिए जंगल के जीव जंतुओं को अपने दरबार में तलब करता है | हाथी-बन्दर-भालू -चीता सभी बड़े जानवर डरे सहमे से शेर के दरबार की तरफ चले जा रहे होते हैं कि पता नहीं शेर उनकी क्या दुर्गत करेगा .....वहीँ एक चूहा सबसे आगे नाचता गाता ..अलमस्त चला जा रहा होता ..किसी ने चूहे से पूछा "तुम्हे दूसरे जीवों की तरह डर नहीं लग रहा?'

चूहे ने जवाब दिया ...कि डर तो बाद की बात है ..पहले तो ख़ुशी इस बात की है शेर ने हमे इस काबिल तो समझा कि हम उसके बेड रूम में घुसकर उसकी शेरनी की अंगूठी चुरा सकते हैं .." नूर ज़हीर ने कहा कि आज का रंगकर्म पूरे परिदृश्य में भले लघुतम इकाई दिखाई दे रहा हो लेकिन यदि वह अपनी भूमिका सही ढंग से निभाता है तो वह कितना भी छोटा हो सत्ता के आगे मेटर करेगा ...और यही रंगकर्म की शक्ति और उसका औचित्य  है |

इप्टा के राष्टीय महा सचिव साथी राकेश ने चार्ल्स डिकेंस की 'ए  टेल  आफ टू सिटीज ' के रूपक के  माध्यम से समय की विडम्बना को परिभाषित किया जो एक साथ बुद्धिमत्ता और मूर्खता ..क्रान्ति और भ्रान्ति.. संघर्ष और सौदे  का चरम है | ब्रेख्त के गेलेलियो और शहीद भगत सिंह के ट्रायल  के हवाले से उन्होंने वैज्ञानिक और क्रांतिकारी चेतना के आत्म संघर्ष और बलिदान को व्याख्यायित करते हुये श् अपनी संस्कृतिक  यात्रा के निष्कर्ष साझा  किये |

शैलेन्द्र कुमार  ने  संस्कृति की स्वावलंबन की जगह संस्कृति  के अंतर अवलंबन को यथार्थ निरुपित  किया |शैलेन्द्र कुमार ने ग़ालिब के शेर ' आह को  चाहिए एक उम्र असर होने तक ..' को भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम १८५७ के परिप्रेक्ष्य में रखते हुए अपना वक्तव्य शुरू किया और फैज़ की  शायरी के हवाले से अपनी परिणति तक पहुंचाया |

पटना इप्टा के साथी तनवीर अख्तर ने रंगकर्मी को जनता की सुनने और जनता से सीखने के सूत्र को स्पष्ट करते हुए उस पर अमल की फौरी ज़रूरत पर बल दिया |

अध्यक्षीय उद्बोधन में राष्ट्रीय अध्यक्ष साथी रणवीर सिंह ने रंगकर्म की चुनोती को नाटककार की अनुपस्थिति से रेखांकित करते हुए नाटककार की वापसी की जरूरत बताई |
जयपुर के और राष्ट्रीय रंगकर्म को  विश्लेषित करते हुए रणवीर सिंह ने सांस्कृतिक नीति के विचलन को उद्घाटित किया |

संचालन विवेचना के हिमाशुं राय और आभार प्रदर्शन विवेचना के निर्देशक वसंत काशीकर ने किया |

हमारे समय की व्याख्या और समय के साथ रंगकर्म के समीकरण को समझने की दिशा में  यह गोष्ठी उपयोगी रही और लम्बे समय तक याद की जाती रहेगी .

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Tuesday, May 15, 2018

अस्‍सीवें साल में गिरीश कर्नाड


- रामचंद्र गुहा

अपनी पीढ़ी के ज्यादातर भारतीयों की तरह गिरीश कार्नाड को मैंने भी पहली बार श्याम बेनेगल की किसी फिल्म में ही देखा था। सामने देखना अलग ही अनुभव था, जब उन्हें दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अकेले बैठ भोजन करते देखा। यह 1990 की बात है। सब उन्हें देख रहे थे, पहचान रहे थे, फिर भी कोई उन्हें डिस्टर्ब नहीं कर रहा था। यह शायद उनके व्यक्तित्व का असर था।.
1995 में पत्नी सुजाता के साथ मैं बेंगलुरु आ गया। गिरीश कार्नाड भी पत्नी सरस के साथ यहीं रहते थे। एक कॉमन दोस्त ने परिचय कराया, तो मिलने-जुलने का सिलसिला चल पड़ा। हम ज्यादातर एक-दूसरे के घर पर ही मिलते। कार्नाड अपने शुरुआती क्लासिकल नाटकों से ही मिथकों और इतिहास का नया रूपाकार गढ़ते हुए रंगमंच में अभिनय अनुकूलन की मिसाल बन चुके थे। उन्होंने फिल्में कम कर दी थीं और रचनात्मकता के नए दौर में थे। लंदन के नेहरू सेंटर का निदेशक रहते हुए विश्व रंगमंच के श्रेष्ठतम से रूबरू हो रहे थे।
इसी दौरान हमने उनके दो चर्चित नाटक फ्लावर्स व ब्रोकेन इमेज देखे। ब्रोकेन इमेज दो ऐसी बहनों की प्रतिद्वंद्विता की कहानी थी, जिनमें से एक अंग्रेजी और दूसरी कन्नड़ लेखिका थी। नाटक ने साहित्य की दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी, जिसका दूसरा सिरा चर्चित लेखक यूआर अनंतमूर्ति तक जाता था। अनंतमूर्ति भाषा को लेकर बहुत सतर्क और सक्रिय थे। उन्हें लगता था कि भाषाई लेखकों को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता या अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीयों की अपेक्षा उन्हें कम भुगतान मिलता है। .
अनंतमूर्ति के साथ कार्नाड की तमाम असहमतियां थीं। एक बड़ा कारण शायद इनमें से एक का अतिशय भाषा आग्रह रहा हो, जबकि दूसरे के लिए यह लोकप्रियता का मामला था। अनंतमूर्ति की प्राय: राजनेताओं से करीबी और उनकी कथित राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी कार्नाड को अखरती थीं, जबकि उनकी महत्वाकांक्षा साहित्य और सौंदर्यशास्त्र था। .
मुझे लगता है कि अनंतमूर्ति के भीतर कन्नड़ के प्रति एक खास तरह की तड़प थी। कारवां पत्रिका के लिए अनंतमूर्ति के साथ साहित्य, राजनीति व कुछ अन्य मुद्दों पर अपना वह संवाद याद आ रहा है, जिसका आयोजन एक बड़े होटल में था। सवाल-जवाब का दौर शुरू हुआ। एकदम पीछे की कुरसियों से एक हाथ उठा। मैंने देखा कि यह तो कार्नाड हैं, जो न जाने कब आकर सबसे पीछे बैठ गए थे। लेकिन बुजुर्ग अनंतमूर्ति इतनी दूरी से उन्हें न पहचान सके। कार्नाड ने एक बहुत सधा हुआ सवाल किया (शुक्र है कि इसमें आक्रामकता नहीं थी), अनंतमूति मेरी ओर घूमे और गर्मजोश-आश्वस्ति के अंदाज में बोले - ‘गिरीश बैंडिडेयर!'(तो गिरीश भी आ गया)।.
अनंतमूर्ति की तुलना में कार्नाड प्राय: जुलूसों, नारेबाजी, नेताओं की सार्वजनिक निंदा-तारीफ या मांगपत्रों पर हस्ताक्षर करने से बचते हैं, लेकिन तमाम समकालीनों की अपेक्षा वह कहीं ज्यादा बहुजनवादी और सहिष्णु भारत के मुखर समर्थक हैं। अनंतमूर्ति की तरह उन्हें भी धार्मिक कट्टरता से नफरत है। जून 2017 में उत्तर भारत में अल्पसंख्यकों को मार देने की कुछ घटनाओं के बाद देश के तमाम हिस्सों की तरह बेंगलुरु में भी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के छात्रों ने टाउन हॉल की सीढ़ियों पर ‘नॉट इन माई नेम' जैसा प्रतिरोध आयोजित किया। भारी भीड़ वाले इस इलाके में कम से कम आधा किलोमीटर पहले गाड़ी पार्क करके ही विरोध मार्च तक पहुंचा जा सकता था। .
मेरे लिए तो ऐसे विरोध प्रदर्शन में शामिल होना सामान्य बात थी। लेकिन कार्नाड का घर काफी दूर है। शाम के वक्त कम से कम डेढ़ घंटे की ड्राइव तो करनी ही पड़ेगी। वह अस्सी के करीब पहुंच चुके थे। अस्वस्थ भी थे और हर वक्त एक छोटा सिलेंडर साथ लेकर चलना पड़ता था, जिससे जुड़ी पाइप नाक के रास्ते फेफड़ों तक ऑक्सीजन पहुंचाती थी। .
कोई सोच भी नहीं सकता था कि गिरीश कार्नाड इन हालत में वहां आएंगे। मैंने भी नहीं सोचा था। हम लोग खामोशी से खड़े थे कि अचानक कोई मेरे बाईं ओर आकर खड़ा हो गया। यह गिरीश कार्नाड थे। कार से उतरने के बाद उन्हें कम से कम दस मिनट तो पैदल चलना ही पड़ा होगा। वह भी इस हालत में। वह आए, खड़े हो गए और बगल वाले सज्जन का प्लेकार्ड हाथ में ले लिया। उन्हें अपने बीच देख पहली पंक्ति में खड़े कुछ मुस्लिम खासे उत्साहित व आश्वस्त दिखे- ‘तो, गिरीश सर भी आ गए'। उनके लिए तो वहां मौजूद हर हिंदू, मुसलमान या ईसाई का महत्व था, लेकिन इस शख्स का वहां होना उनके लिए बहुत खास बन गया। .
इस वर्ष की शुरुआत में मैं गिरीश के गृहनगर धारवाड़ गया। उनके प्रकाशक मनोहर ग्रंथ माला ने एक साहित्य उत्सव का आयोजन किया था। उत्सव के एक दिन पहले कार्नाड मुझे सुभाष रोड के एक पुराने मकान की दूसरी मंजिल पर अपने प्रकाशक के दफ्तर ले गए। यही वह जगह थी, जहां 50 से भी ज्यादा साल पहले वह अपने पहले, लेकिन बाद में बहुचर्चित नाटक ययाति की पांडुलिपि देने आए थे। तब से अब तक कार्नाड के सारे नाटक और उनकी बायोग्राफी मनोहर ग्रंथमाला ने ही प्रकाशित किए हैं। .
गिरीश कार्नाड न अपनी राजनीति का प्रदर्शन करते हैं, न देशभक्ति का। फिर भी वह अपने अंदाज में न सिर्फ गृहनगर के लिए समर्पित हैं, बल्कि देश-दुनिया पर भी पैनी नजर रखते हैं। मुझे तो दूसरा कोई नहीं दिखता, जिसे उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक के कला माध्यमों, मसलन- संगीत, साहित्य, नृत्य, लोक और दृश्य कलाओं के साथ ही अपनी गहन क्लासिकी परंपरा की भी इतनी पैनी समझ हो। वह कम से कम छह भारतीय भाषाओं में लिख, पढ़ और बोल सकते हैं।.
अगर उन्होंने अब तक ऐसी कोई किताब नहीं लिखी, तो इसका कारण उनके लिए मौलिक और रचनात्मक लेखन का ज्यादा महत्वपूर्ण होना है। उन्होंने कन्नड़ में अपनी आत्मकथा लिखी और प्रकाशित कराई, लेकिन अंग्रेजी अनुवाद से मना कर दिया। शायद वह नहीं चाहते कि मेरे जैसे तमाम लोग इसे पढ़ें, या शायद यह कि उनके मन में अब भी तमाम मौलिक विषय गूंज रहे होंगे, जिन्हें वह पहले पढ़ाना चाहते हों। .
इसी 19 मई को वह अपना अस्सीवां जन्मदिन मनाएंगे। हम प्रार्थना कर सकते हैं कि गिरीश कार्नाड जैसे महान इंसान दिमाग और शरीर से इतने स्वस्थ रहें कि हमारे सामने वे सारे नाटक आ सकें, जिनकी विषय-वस्तु उनके दिमाग में घूम रही है, जिन्हें वह लिखना और हम सब देखना चाहते हैं।
साभार -
https://www.livehindustan.com/…/story-ramchandra-guha-artic…

Wednesday, May 2, 2018

अभिनय की बारीकियां सिखाता हुआ अभिनेता

आज हिंदुस्तान के हर शहर और कस्बे में नाट्य संस्थाए और रंगकर्मी मौजूद है | इन रंगमंच के अभिनेताओं में उत्साह तो अपने चरम पर है पर केवल उत्साह ही किसी को दक्ष अभिनेता नहीं बना देता और दक्षता प्रशिक्षण से आती है | अभिनेता का प्रशिक्षित होना इन दिनों के रंगमंच के लिए दिनो दिन आवश्यक होता जा रहा है | हर अभिनेता प्रशिक्षण संस्थान तक नहीं पहुच पाता है पर पहुचना चाहता है , प्रशिक्षित होना चाहता है पर उसके पास साधन नहीं है | ऐसे अभिनेताओं को निराश होने की कतई ज़रूरत नहीं है , घर बैठे वे अभिनय की बारिकिया सीख सकते है , अभिनेता चाहे रंगमंच का हो या फिल्म का आपका यह शिक्षक आपको इतना संवार देगा कि इस विधा में आप एक निपुण अभिनेता बन कर उभर सकते है | आप के रंग गुरु का नाम है " बलराज साहनी " |
मै यहाँ बात उनके जन्म स्थान , उनके संघर्ष , उनके लेखन की नहीं करूंगा जबकि बलराज जी हर विधा में निपुण थे , मै यहाँ उनके अभिनय की चर्चा करूँगा | एक अभिनेता के अभिनय की समीक्षा | जब बलराज साहनी जी अभिनय कर रहे थे तब उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि वे अभिनय सिखा भी रहे है | मैंने उन्हें मंच पर अभिनय करते नहीं देखा लेकिन उनकी बहुत सी फिल्मे देखी है जिसमे उनके निराले अंदाज़ चौकाते है और दिमाग में यह बात उभरती है कि यह आदमी तो अपने आप में अभिनय का प्रशिक्षण केंद्र है | इसे अभिनय करते देख अभिनय की बारिकियाँ सीखी जा सकती है |
अगर हम बलराज जी की फिल्म "वक्त" देखे तो उस एक ही फिल्म में बलराज साहनी जी के अभिनय में कई शेड नज़र आते है और एक ही बलराज साहनी एक ही फिल्म में तीन अलग अलग अभिनेता दिखाई देते  है | एक अतिउत्साह से लबरेज़ व्यापारी जो सफलता के मद में चूर है | इस फिल्म में बलराज जी ने आँखों से अभिनय किया था , उनकी आँखों से मानो कामयाबी टपक रही हो , उनकी आँखों में सफलता का घमंड आसानी से पढ़ा जा सकता था , फिर अगले ही क्षण जब वे दोस्तों की फरमाइश पर प्रेम गीत "ए मेरी ज़ोहरा जबी –तुझे मालूम नहीं " गाते है तो एक प्रेम में डूबे हुए आशिक नज़र आते है , यहाँ बलराज जी की आँखों में शोखियाँ और मस्ती देखी जा सकती है , एक ऐसा दिलफेक आशिक बन जाते है जिसे दीवाना मस्ताना कहा जाता है | उसके बाद जब उनका सब कुछ लुट जाता है तब उनकी आँखों में बेबसी , अकेलापन और बर्बादी की ऐसी दास्ताँ नज़र आती है कि दर्शक रो पड़ता है | बी.आर.चोपड़ा की इस फिल्म में बलराज जी ने यह साबित किया था कि अभिनय में आँखों का क्या योगदान होता है |
फिल्म नील कमल में बलराज साहनी जी ने वहीदा रहमान के पिता का रोल किया था जिसकी बेटी अपने ससुराल में परेशान है | बेटी का दुःख बाप के चेहरे पर बहुत ही कलात्मकता के साथ उन्होंने उतारा था | बलराज जी की हर फिल्म में अभिनय की शैली विकसित होती नज़र आती है | अगर हम एक छात्र की तरह उसे समझने का प्रयास करे तो उनके अन्दर ऐसी ऐसी बारीकियां नज़र आएगी जिन्हें एक नया अभिनेता आत्मसात कर ले तो उसे अपनी भूमिका समझने और उसे निभाने में बहुत हद तक मार्ग दर्शन मिल सकता है | बलराज साहनी के अभिनय को देखते समय अगर हम कुछ नोट्स तैयार करे तो वह इस प्रकार हो सकते है –
बलराज जी का अंदाज़ हमे यह बताता है कि अभिनय के दरमियान हमारा शरीर पूरी तरह नियंत्रित होना चाहिए , भाषा के लहजे में शालीनता का पुट होना बहुत आवश्यक है | उच्चारण में खोट तो स्वीकार हो ही नहीं सकती | बलराज जी की शाला में एक अभिनेता सबसे पहले यह समझता है कि उसे संवाद बोलने की ज़रा भी जल्दबाज़ी नहीं करनी है | पहले शरीर को तैयार करो , संवाद पहले तुम्हारी "बाड़ी लेंग्वेज" से कहे जायेगे , फिर तुम्हारी आँखे दर्शको से बात करेगी , फिर अपने सम्पूर्ण आकार को पात्र के प्रकार में ढाल लेने के बाद बारी आती है संवाद बोलने की |
संवाद बोलने के लिये बलराज जी का ध्वनी और प्रवाह कमाल का था | बात ऊँची आवाज़ में कहना तो कितनी ऊँची आवाज़ में कहना , धीमा बोलना है तो किस हद तक धीमा बोलना है ? हंसना है तो अधिक से अधिक कितना हंसना है , रोना है तो कम से कम कितना रोना है ? बलराज साहनी ने किसी भी फिल्म में बलराज साहनी की तरह नहीं बोला बल्कि अपनी हर फिल्म में उन्होंने उस पात्र की तरह कहा है जिसे वे परदे पर जी रहे थे | अगर मुस्कान से काम चल जाये तो खिलखिलाकर क्यों हसना और सिसकने भर से दर्द स्पष्ट हो जाये तो दहाड़े मार कर क्यों रोना ? यह फार्मूला था बलराज जी के अभिनय का जिसे हर अभिनेता को आत्मसात करना चाहिए | बलराज जी को अभिनय करते देखो तो यह भी महसूस होता है कि यह अभिनेता कभी भी पूरी तरह निर्देशक पर निर्भर नहीं रहा होगा | हर अभिनेता को अपनी तैयारी स्वयं करनी चाहिए जिस पर निर्देशक हल्की पालिश भर करेगा तभी अभिनेता खिल पाता है |
फिल्म धूल का फूल में बलराज जी का एक छोटे बच्चे के प्रति स्नेह ही फिल्म का कथानक था | जब बलराज जी ने कथावस्तु सुनी होगी तो उन्होंने ज़रूर पहले स्वयं को उस चरित्र को जीने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया होगा | इस फिल्म में अभिनय का नया ही अंदाज़ सामने आया था और वह था – कुछ नहीं बोल कर सब कुछ बोल देना , कुछ नहीं देख कर सब कुछ देख लेना , कुछ नहीं जान कर सब कुछ जान लेना , कुछ नहीं पाकर सब कुछ पा लेना और कुछ नहीं खो कर सब कुछ खो देना | इस फिल्म में उन्हें देख कर यह भी सीखा जा सकता है कि कैसे पात्र के अनुसार अपनी चाल निर्धारित करना |
बलराज साहनी ने अनेको बार सिर्फ अपने चलने के अंदाज़ से बदलाव लाया है | धूल का फूल और इज्जत में एक रईस आदमी के किरदार में सिर्फ उनकी चाल में ही एक भव्यता नज़र आती थी लेकिन जब हम उनकी फिल्म दो बीघा ज़मीन देखते है ,जिसमे वो गाँव छोड़ कर शहर जा रहे है और बैगराउंड में गीत " कोई निशानी छोड़ जा , कोई कहानी बोल जा , मौसम बीता जाये – मौसम बीता जाये " सुनाई देता है वह पूरा दृश्य बलराज जी के चलने के अंदाज़ पर ही फिल्माया गया था | फिल्म वक्त के लाला की भूमिका में शरीर में जो अकड़ नज़र आती है , वही शरीर दो बीघा ज़मीन में बीमार होने पर कैसा निढाल हो जाता है | अभिनय का यह अंतर फिल्म "दो रास्ते" और "हकीकत" में भी देखा और समझा जा सकता है |

हम जब बलराज जी की पूरी फिल्म देख चुके हो और फिर दुबारा उस चरित्र और अभिनेता के बारे में विचार करे तो सबसे पहले ध्यान जाता है अभिनय करते समय उनका संयम | यह अभिनेता अपने को कितना संभाल कर प्रस्तुत करता था , कितना केल्कुलेट अंदाज़ होता था उनका | उनके संवादों की अदायगी में अनुशासन को समझा जा सकता है | यह संयम और अनुशासन यू ही नहीं आ जाता है , इसे बाकायदा अभ्यास के द्वारा अपनी आदत में पिरोया जाता है | इस तरह का संयम और अनुशासन एक अभिनेता के लिए गंभीरता पूर्वक सीखने का हुनर है |
बलराज साहनी जी का ज़िक्र हो और ज़िक्र न हो फिल्म गर्म हवा का तो फिर वह ज़िक्र , ज़िक्र हरगिज़ माना न जाएगा | इस फिल्म की चर्चा के बिना यह चर्चा मुकम्मल हो ही नहीं सकती | सथ्यू जी की यह बेमिसाल फिल्म में अभिनेताओं में ज़बरदस्त टक्कर थी | ए.के.हंगल, जलाल आगा ,युनुस परवेज़ ,फारूक शेख ने इस फिल्म में अपना सर्वश्रेष्ठ किया था | कैफ़ी आज़मी साहब ने बेहतरीन संवाद रचे थे और दी थी एक यादगार सूफी रचना "मौला सलीम चिश्ती – आका सलीम चिश्ती " | बेहद संवेदनशील विषय पर बनी यह फिल्म में बेहतरीन फ़ोटोग्राफ़ी के साथ एक और अहम् हिस्सा था बलराज साहनी का | इस फिल्म में तो उन्होंने बोला भी बहुत कम था , चला भी ज़्यादा नहीं था , उन्हें पूरा का पूरा दिखाया भी कम ही गया था | पर्दे पर बस एक चेहरा उभरता और वह तीन चार अल्फाज़ बोल हट जाता | हट जाता लेकिन देखने वालो के ज़हन में रह जाता , वहाँ से हटाये न हटता | वह चेहरा जिसमे उम्मीदों का दरिया था , निराशा का सूखा था , सच्चाई का भरोसा था , अपनों से खाया हुआ धोखा था | सथ्यू जी ने जो  फिल्म बनाई थी बलराज साहनी के अभिनय की ऊँचाइयों ने उसे क्लासिकल में तब्दील कर दिया था | फिल्म और थियेटर में अभिनय की शुरुआत करने वालो को बलराज साहनी की यह फिल्म जो यू ट्यूब पर उपलब्ध है उसे बार बार हज़ार बार देखनी चाहिए , यह अभिनेता आपका मार्ग दर्शक बन जाएगा और संवार देगा आपका भविष्य |

अखतर अली
आमानाका ,कुकुर बेडा
रायपुर ( छत्तीसगढ़ )
मो.न. 9826126781
ई मेल – akakhterspritwala@yahoo.co.in

Tuesday, April 10, 2018

राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस पर ‘प्रेम राग................रंगभूमि नाट्य समारोह’ कल से


इप्टा प्लैटिनम जुबली कार्यक्रम के तहत के त्याग, प्रेम, सहिष्णुता, भाईचारा और बंधुत्व के लिए प्रेम राग.....रंगभूमि नाट्य समारोह 12 अप्रैल से प्रेमचंद रंगशाला परिसर में प्रारंभ होगा। भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा)पटना और प्रेरणा (जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा) के संयुक्त तत्वावधान में पटना, रायपुर (छत्तीसगढ़) एवं मधुबनी की रंग संस्थाएँ 11 नाटकों, जनवादी गीतों और कविताओं की प्रस्तुति करेंगी। वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों के दरपेश जनसंवाद का आयोजन किया जायेगा, जिसे वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो० डेजी नारायण, प्रसिद्ध पत्रकार नासिरूद्दीन, वरीय चिकित्सक डाॅ० सत्यजीत और रंगकर्मी हसन इमाम उपस्थित दर्शकों से संवाद करेंगे।
प्रेमचंद रंगशाला परिसर में अस्थाई तौर पर निर्मित कविवर कन्हैया रंगभूमि पर 12 अप्रैल को सफदर हाशमी के 64वें जन्मदिवस के अवसर पर उन्हें याद करते हुए राजनन्दन सिंह के जो
गिरा से रंगभूमि नाट्य समारोह से शुरूआत होगी। वरिष्ठ संगीतकार सीताराम सिंह कैफी आजमी की नज़्म सोमनाथका गायन करेंगे। पटना इप्टा द्वारा समरेश बसु की कहानी पर आधारित एवं तनवीर अख्तर निर्देशित नाटक ख़ुदा हाफ़िज़की प्रस्तुति में होगी। प्रेरणा के द्वारा हसन इमाम लिखित एवं निर्देशित नाटक खोजत भये अधेड़का मंचन किया जायेगा। नव सांस्कृतिक विहान के कलाकारों के द्वारा जनगीतों की प्रस्तुति होगी और द आर्ट मेकर के कलाकार जनम दिल्ली के नाटक राजा का बाजाकी प्रस्तुति करेंगे। कोरस, पटना के द्वारा समता राय लिखित एवं निर्देशित नाटक मन की बातप्रस्तुत किया जाएगा।
13 अप्रैल को प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी के 45वें निधन दिवस के अवसर पर प्रेरणा द्वारा हसन इमाम के नाटक पोल खुला पोर पोरकर प्रस्तुति की जायेगी। धमार फाउण्डेशन के कलाकार रूबी खातुन निर्देशित नाटक हमें बोलने दोऔर द स्ट्रगलर्स द्वारा राहुल कुमार रवि के निर्देशन में सोल्डका मंचन होगा। मो0 जानी के निर्देशन में नाद, पटना के कलाकार जनतागिरीनाटक प्रस्तुत करेंगे।
14 अप्रैल को राहुल सांस्कृत्यायन के 55वें निधन दिवस एवं बाबा साहब भीम अंबेदकर के 127वें जन्मदिवस के अवसर पर रायपुर (छत्तीगढ़) इप्टा के कलाकार गम्मत शैली में टैच बेचैयानाटक की प्रस्तुति निसार अली के निर्देशन में करेंगे। मधुबनी इप्टा के द्वारा वागीश झा के व्यंग्य नाटक महाभारत एक्सटेंषनकी प्रस्तुति की जायेगी। कार्यक्रम का समापन पटना इप्टा के चर्चित नाटक समरथ को नहिं दोष गुसाईंके मंचन से होगा।
आयोजन की जानकारी देते हुए बिहार इप्टा के सचिव फीरोज़ अशरफ खाँ ने बताया है कि इप्टा की कोशिश साम्प्रादायिक-फासीवादी ताक़तों से आगाह करने की है और इन्हें शिकस्त देने के लिए आम जन को लामबंद करना है। दंगे की आग में झुलसने वाला सबसे पहले इंसान होता है उसके बाद ही उसकी कोई धार्मिक, जातिय पहचान होती है। विगत 3 अप्रैल 2018 से पटना के विभिन्न मुहल्लों में सांस्कृतिक अभियान चलाने के बाद पटना इप्टा का साझा आयोजन दरपेश है।

राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस पर ‘प्रेम राग................रंगभूमि नाट्य समारोह’ कल से


इप्टा प्लैटिनम जुबली कार्यक्रम के तहत के त्याग, प्रेम, सहिष्णुता, भाईचारा और बंधुत्व के लिए प्रेम राग.....रंगभूमि नाट्य समारोह 12 अप्रैल से प्रेमचंद रंगशाला परिसर में प्रारंभ होगा। भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा)पटना और प्रेरणा (जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा) के संयुक्त तत्वावधान में पटना, रायपुर (छत्तीसगढ़) एवं मधुबनी की रंग संस्थाएँ 11 नाटकों, जनवादी गीतों और कविताओं की प्रस्तुति करेंगी। वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों के दरपेश जनसंवाद का आयोजन किया जायेगा, जिसे वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो० डेजी नारायण, प्रसिद्ध पत्रकार नासिरूद्दीन, वरीय चिकित्सक डाॅ० सत्यजीत और रंगकर्मी हसन इमाम उपस्थित दर्शकों से संवाद करेंगे।
प्रेमचंद रंगशाला परिसर में अस्थाई तौर पर निर्मित कविवर कन्हैया रंगभूमि पर 12 अप्रैल को सफदर हाशमी के 64वें जन्मदिवस के अवसर पर उन्हें याद करते हुए राजनन्दन सिंह के जो
गिरा से रंगभूमि नाट्य समारोह से शुरूआत होगी। वरिष्ठ संगीतकार सीताराम सिंह कैफी आजमी की नज़्म सोमनाथका गायन करेंगे। पटना इप्टा द्वारा समरेश बसु की कहानी पर आधारित एवं तनवीर अख्तर निर्देशित नाटक ख़ुदा हाफ़िज़की प्रस्तुति में होगी। प्रेरणा के द्वारा हसन इमाम लिखित एवं निर्देशित नाटक खोजत भये अधेड़का मंचन किया जायेगा। नव सांस्कृतिक विहान के कलाकारों के द्वारा जनगीतों की प्रस्तुति होगी और द आर्ट मेकर के कलाकार जनम दिल्ली के नाटक राजा का बाजाकी प्रस्तुति करेंगे। कोरस, पटना के द्वारा समता राय लिखित एवं निर्देशित नाटक मन की बातप्रस्तुत किया जाएगा।
13 अप्रैल को प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी के 45वें निधन दिवस के अवसर पर प्रेरणा द्वारा हसन इमाम के नाटक पोल खुला पोर पोरकर प्रस्तुति की जायेगी। धमार फाउण्डेशन के कलाकार रूबी खातुन निर्देशित नाटक हमें बोलने दोऔर द स्ट्रगलर्स द्वारा राहुल कुमार रवि के निर्देशन में सोल्डका मंचन होगा। मो0 जानी के निर्देशन में नाद, पटना के कलाकार जनतागिरीनाटक प्रस्तुत करेंगे।
14 अप्रैल को राहुल सांस्कृत्यायन के 55वें निधन दिवस एवं बाबा साहब भीम अंबेदकर के 127वें जन्मदिवस के अवसर पर रायपुर (छत्तीगढ़) इप्टा के कलाकार गम्मत शैली में टैच बेचैयानाटक की प्रस्तुति निसार अली के निर्देशन में करेंगे। मधुबनी इप्टा के द्वारा वागीश झा के व्यंग्य नाटक महाभारत एक्सटेंषनकी प्रस्तुति की जायेगी। कार्यक्रम का समापन पटना इप्टा के चर्चित नाटक समरथ को नहिं दोष गुसाईंके मंचन से होगा।
आयोजन की जानकारी देते हुए बिहार इप्टा के सचिव फीरोज़ अशरफ खाँ ने बताया है कि इप्टा की कोशिश साम्प्रादायिक-फासीवादी ताक़तों से आगाह करने की है और इन्हें शिकस्त देने के लिए आम जन को लामबंद करना है। दंगे की आग में झुलसने वाला सबसे पहले इंसान होता है उसके बाद ही उसकी कोई धार्मिक, जातिय पहचान होती है। विगत 3 अप्रैल 2018 से पटना के विभिन्न मुहल्लों में सांस्कृतिक अभियान चलाने के बाद पटना इप्टा का साझा आयोजन दरपेश है।