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Monday, October 26, 2015

अलविदा जुगल किशोर !!!

- वीर विनोद छाबड़ा 

अभी थोड़ी देर पहले ही लौटा हूं मित्र जुगल किशोर का विदा करके। जुगल मेरे ही नहीं लखनऊ के हर रंगकर्मी के मित्र थे। साहित्य प्रेमियों के मित्र थे। समाज कर्मियों के मित्र थे।जुगल किसी परिचय के मोहताज़ कभी नहीं रहे। उनका बोलता और हंसता हुआ चेहरा ही पर्याप्त होता था। कल शाम तक वो भले-चंगे थे। अचानक ही सीने में दर्द उठा। परिवारजन अस्पताल ले जा रहे थे कि रास्ते में ही.…

जुगुल किशोर से मेरी पहली मुलाक़ात कई साल पहले आकाशवाणी लखनऊ में हुई। मैं वहां बच्चों के कार्यक्रम में कहानी पाठ के लिए जाता था। कार्यक्रम संचालन में कई बार सुषमा श्रीवास्तव 'दीदी' के साथ जुगल 'भैया' जुगलबंदी करते होते थे। जुगल की मौजूदगी से राहत मिलती थी। उन दिनों प्रसारण लाइव होता था। कई बार कहानी पढ़ते-पढ़ते मैं कहीं अटक जाता या असहज हो जाता था तो जुगल भैया तुरंत कुछ न कुछ बोल कर संभाल लेते थे। 

आगे चले कर अनेक अवसरों पर स्टेज पर और स्टेज के पीछे देखा इनको। बहुत अच्छे अभिनेता ही नहीं बड़े दिल वाले थे। और प्रशिक्षक भी थे। भारतेंदु नाट्य अकादमी में प्रशिक्षक के रूप में कई साल तक रहे। इसके निदेशक का भी काम अरसे तक देखा। पिता, अंधा युग, राज, ताशों के देश में, जूलियस सीज़र, कंजूस, अंधेरे में, वासांसि जीर्णानि, बालकल विमन आदि दर्जनों नाटकों में काम किया। लखनऊ रंगमच ही नहीं दूसरे प्रदेशों में भी उन्होंने अपने अभिनय की छाप छोड़ी। उन्हें परफेक्शनिस्ट कहा जाता था। 


एक दिन मैंने उन्हें 'पीपली लाईव' में देखा। उसमें मुख्य मंत्री की भूमिका की थी उन्होंने। उन्होंने बताया था दबंग-२ में भी काम किया है। जब कभी मैं उन्हें देखता मुझे बड़ा गर्व होता था। अपने शहर लखनऊ के होनहार हैं। राजपाल यादव और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जैसे फ़िल्म आर्टिस्टों को भी अभिनय के गुर सिखाये।
साहित्यिक गोष्ठियों में वो जाना-माना चेहरा थे। सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति रहे। इप्टा के साथ साथ सांप्रदायिकता के विरुद्ध लड़ते रहे। 


लखनऊ मंच से उनका जाना बहुत बड़ा सदमा है। भारतेंदु नाट्य अकादमी और फिर गुलाला घाट पर उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए रंगकर्मियों, साहित्यकारों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जुटी भारी भीड़ इसका प्रमाण है। हर व्यक्ति व्यथित और शोक में डूबा हुआ। सबके पास उनका कोई न कोई यादगार लम्हा था। सबके पास कुछ न कुछ सुनाने को संस्मरण थे। शब्दों की कमी पड़ रही थी। महज़ ६१ साल के थे जुगल। यह भी जाने की कोई उम्र होती है। 


मैं जब भी उन्हें देखता मेरा मोबाईल कैमरा उनकी और देख कर बोलता था - शॉट प्लीज़। कई बार उन्हें सोच में डूबे देखा, किसी दृश्य को विसुलाईज़ करते हुए या किसी किरदार की काया में प्रवेश करने की कवायद करते हुए या पूरी तन्मयता से सुनते हुए। मैंने बिना बताये ही शॉट ले लिया। एक आध बार ध्यान भंग हुआ उनका। मुझे देख वो चौंके। फिर मुस्कुरा दिए। कमाल के अदाकार। 

सोचा, एक दिन उनसे कहूंगा - आपका चेहरा बहुत अच्छा है। एक दिन फोटो सेशन हो जाए। लेकिन अरमान दिल में रह गये। मुझे नहीं मालूम था कि एक दिन उनकी विदाई का शॉट भी लेना पड़ेगा। 
अलविदा जुगल जी। आपका जिस्म नहीं होगा। शो तो चलता ही रहेगा। लेकिन यह भी सच है कि रंगमंच पहले जैसा नहीं रहेगा। साहित्यिक गोष्ठियों में आपकी कमी बहुत खलेगी। 

२६-१०-२०१५

Friday, July 31, 2015

खामोश! कलाओं का ध्वंस जारी है.....

सरकार ने जब पुणे के फिल्म संस्थान को बर्बाद करने के लिये अपने महान योद्धा को मोर्चे पर भेज रखा है तो वह रंगमंच को बख्श देने की दरियादिली की जेहमत भला क्यों उठाने लगी? फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्म के मोर्चे पर जहाँ ‘धर्मराज युधिष्ठिर’ को तैनात किया गया है, वहीं रंगमंच पर प्रहार करने के लिये कौरवों की सेना तैयार की गयी है जो ठेकेदार के भेस में आकर रवीन्द्र-मंच पर प्रहार करने में लगे हैं। सरकार दरअसल कला-संस्कृति को भगवा वस्त्र नहीं पहनाना चाहती, बल्कि उसे पूरी तरह से नंगा कर देना चाहती है ताकि वह बेआबरू होकर डूब मरे और उसके स्थान पर उनकी विचारधारा का परचम लहराया जा सके। वह कला और संस्कृति से जुड़े संस्थानों को ही बर्बाद नहीं कर रही है वरन् उनके आधारभूत ढाँचों पर भी चोट करने में लगी हुई है, ताकि बांस के अभाव में बंशी-वादन की कोई गुंजाइश न रहे। यह बात दीगर है कि हिंदुस्तान में चल रहे रंगकर्म के बड़े हिस्से को रंगमंच की कोई दरकार ही नहीं है पर सरकार अपनी ओर से इनकी जड़ों में मट्ठा डालने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती।

ताजा मामला जयपुर के रवीन्द्र भवन का है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जयपुर में इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणबीर सिंह ने  सत्र न्यायालय में स्थानीय रवींद्र में चल रहे पुनर्निमाण कार्य के विरूद्ध याचिका लगायी है और उनसे फोन पर मिली जानकारी के अनुसार कोर्ट ने अगली सुनवाई तक निर्माण कार्य को स्थगित रखने के लिये अंतरिम स्थगन आदेश जारी कर दिया है। न्यायालय के समक्ष दायर याचिका में श्री रणबीर सिंह ने आरोप लगाया है कि रवीन्द्र मंच के पुनर्निमाण का कार्य जिन हाथों को मंच के प्राधिकारियों ने सौंपा है, उनके पास थियेटर डिजाइन की कोई पृष्ठभूमि अथवा अनुभव नहीं है। यहाँ तक कि नये डिजाइन में लाइट और साउंड सिस्टम के लिये कोई व्यवस्था नहीं रखी गयी है। इतना ही नहीं,  ग्रीन रूम का जो प्लान नये नक्शे में तैयार किया गया है उसमें कलाकार के मंच तक सीधे पहुँचने की कोई व्यवस्था नहीं रखी गयी है।

गौरतलब है कि पुनर्निमाण का यह कार्य गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगौर की 150 वीं जयंती के मौके पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की सहायता परियोजना के तहत चलाया जा रहा है, लेकिन रिनोवेशन के नाम पर नियमों का उलंघन तथा उसके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ की जा रही है। नये थियेटर के निर्माण में तकनीकी खामियां हैं। इस पूरे रिनोवेशन कार्य में आर्कीटेक्ट नियमों का उलंघन किया गया है। रवीन्द्र मंच के रिनोवेशन एवं नये प्रेक्षागृह के निर्माण में भारत सरकार द्वारा एक कमेटी गठित की गई थी। इस कमेटी ने जो नक्शा अप्रूब्ड किया था उसे दर किनार कर रिनोवेशन का कार्य किया जा रहा है। टेण्डर प्रणाली भी शक के घेरे में है। वर्षों पुराने इस इस कल्चरल हब के मूल स्वरूप को -जो कि यहाँ की सांस्कृतिक विरासत और धरोहर है - तहस नहस किया जा चुका है।

जयपुर के रंगकर्मियों का आरोप है कि उक्त संबंध में कुछ भी पूछने पर प्रशासन द्वारा कोई भी जानकारी नहीं दी जा रही है, जिसे लेकर शहर के समस्त कलाकारों में रोश व्याप्त है। उनके साथ नगर के साहित्यकार, नाटककार, लेखक, पत्रकार, एवं बुद्धिजीवी भी शामिल हैं। उधर इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार रवीन्द्र मंच के प्रबंधक का कहना है कि निर्माण कार्य पूरी तरह से परियोजना के नियमों के तहत हो रहा है इसलिये एकतरफा कार्रवाई जैसी कोई बात नहीं है।

रवीन्द्र मंच की पृष्ठभूमि :  रवीन्द्र मंच की परिकल्पना देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की थी। पंडित नेहरू और तत्कालीन संस्कृति मंत्री हुमायूँ कबीर ने सभी राज्यों की राजधानी में रवीन्द्र मंच का खाका तैयार किया था। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि प्रत्येक रवीन्द्र मंच के पास अपनी एक व्यावसायिक रंगमंडली हो जो निरंतर और नियमित रूप से नाटकों का प्रदर्शन कर सके।

जयपुर के रवीन्द्र मंच का इतिहास : जयपुर के रवीन्द्र मंच का खाका राजस्थान के लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता श्री परमानंद गजारिया ने तैयार किया था। इसका उद्घाटन 1963 में हुआ था। प्रस्ताव यह था कि इससे जुड़ी हुई इसकी अपनी एक रंगमंडली होगी पर प्रशासनकि अड़चनों की वजह से यह संभव नहीं हो सका। पहले यह शिक्षा विभाग के अधीन था, जिसका कलाकारों ने विरोध किया और मुख्यमंत्री सुखाड़िया साहब ने आदेश दिया कि इसे राजस्थान संगीत नाटक अकादमी को सौंप दिया जाये। तब यह एक स्वतंत्र निकाय बन गया था पर 1970 में श्री देवीलाल समर जब इसके अध्यक्ष बने तो उन्होंने इसे अपने पास रखने से इंकार कर दिया। नतीजतन, मंच को राजस्थान ललित कला अकादमी को सौंन दिया गया। आगे चलकर एक सोसयटी का निर्माण किया गया और तब से रवीन्द्र मंच इस सोसायटी के अधीन है। पहले माध्यमिक शिक्षा स्कूलों के अध्यापकों को इसका अध्यक्ष बनाया जाता था। आगे चलकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) के अधिकारी इसके प्रबंधक बनने लगे और कभी भी ऐसे लोग यहाँ पर नहीं आ सके जो थियेटर को जानते-समझते हों। इस मंच के साथ इरफान खान, ओम शिवपुरी, इला अरूण और भानू भारती जैसे कलाकार-निर्देषक विभिन्न रूपों में जुड़े रहे।

जयपुर के रवीन्द्र मंच की मौजूदा कहानी :  यूपीए सरकार के दौरान एक योजना बनायी गयी थी कि सभी राज्यों में आधुनिक सुविधाओं के साथ सभी रवीन्द्र मंच का पुनर्निर्माण किया जाये ताकि वे सांस्कृतिक केंद्रों या ‘कल्चरल हब’ के रूप में विकसित हो सकें। विशेषज्ञ सलाह के लिये राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के वरिष्ठ रंगकर्मियों को नियुक्त किया गया। सरकार द्वारा गठित समिति ने जयपुर का दौरा किया और उन्हें प्रमोद जैन द्वारा बनाया गया नक्शा दिखाया गया। उनके नक्शे को मंजूरी मिल गयी पर इस बीच योजना समाप्त हो चुकी थी। इसके बाद केंद्र और राज्य, दोनों जगहों पर भाजपा की सरकार आयी और योजना को नये सिरे से प्रारंभ किया गया। इस योजना के तहत रिनोवेषन का 60 फीसदी खर्च केंद्र और 40 फीसदी खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। राजस्थान के संस्कृति मंत्रालय ने इस कार्य के लिये विषेशज्ञों और अधिकारियों की कोई स्थानीय समिति गठित नहीं की। राजस्थान आवास विकास इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड द्वारा एक आर्किटेक्ट को काम पर नियुक्त किया गया। उन्होंने चार ऐसी एजेंन्सियों से आवेदन मंगाये, जिनमें से तीन भारत सरकार के आर्किटैक्ट अधिनियम 1972 के अधीन न तो आर्किटैक्ट कांउसिल के सदस्य हैं और न ही आर्किटैक्ट हैं। यह अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि आवेदनकर्ता को आर्किटैक्ट काउंसिल का सदस्य होना चाहिये और यदि कोई फर्म दो साझेदारों द्वारा चलायी जा रही हो तो दोनों साझेदारों को आर्किटैक्ट होना चाहिये। इस तरह नियुक्ति के मामले में प्रारंभ से ही गड़बड़ी देखी जा सकती है। साथ ही नये नक्शे को मंजूरी के लिये राष्ट्र के ीय नाट्य विद्यालय के समक्ष नहीं भेजा गया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि रिनोवेशन का कार्य किसके आदेशअथवा दिशानिर्देशों के तहत प्रारंभ किया गया।  सबसे ज्यादा सदमे की बात तो यह है कि श्री अल्काजी द्वारा डिजाइन किये गये ओपन एयर थियेटर और इसके विशाल रंगमंच को मटियामेट कर दिया गया जो एक बड़ी सांस्कृतिक धरोहर थी। निर्माण कार्य अब जिस तरीके से किया जा रहा है उसमें रवीन्द्र मंच पर नाटकों की प्रस्तुति एक टेढ़ी खीर होगी।

जयपुर के कलाकारों-रंगकर्मियों की मांग : 1. निर्माण कार्य पर अविलंब रोक। 2. ऐसा आर्किटैक्ट जिसे थियेटर डिजाइन की कोई समझ न हो उसे तुरंत हटाया जाये। 3. उक्त मनमानी, ध्वंस और सार्वजनिक धन की बर्बादी के लिये जिम्मेदारी तय करने हेतु एक समिति गठित की जाये और जो भी नुकसान हुआ हो उसकी क्षतिपूर्ति की जाये। 4. जो कुछ भी मरम्मत का कार्य करना हो लोक निर्माण विभाग के तहत उनके अभियंताओं द्वारा कराया जाये और प्राचीन थियेटर की सेवाओं को बहाल किया जाये ताकि यहां पर रंगकर्म संभव हो सके और रंगमंच समाज की सेवा में प्रस्तुत रहे। 5. रवीन्द्र मंच एक स्वतंत्र निकाय होना चाहिये। इसके लिये एक समिति गठित हो जिसका अध्यक्ष वरिश्ठ कलाकार हो और इसके सदस्य अन्य कलाकार और नामी आर्किटैक्ट हों। समिति को इस बात का अधिकार हो कि वह सभी कलात्मक गतिविधियों के साथ आवष्यक मरम्मत या सुधार कार्यों की देखरेख कर सके।

Thursday, July 23, 2015

प्रश्नों के घेरे में रंगमंच - 4

यह परिचर्चा "कल के लिये" पत्रिका के लिये आयाेजित की गयी थी, जिसमें रणबीर सिंह, नूर जहीर, पुंज प्रकाश, मंजुल भारद्वाज, वेदा राकेश आैरजितेन्द्र रघुवंशी ने भाग लिया था। इसका पुनर्प्रकाशन इप्टानामा के वार्षिक अंक में भी किया गया है। आपकी सुविधा केे लिये हम यहां पर प्रतिदिन एक प्रतिभागी के विचार प्रकाशित कर रहे हैं। इस पोस्ट में मंजुल भारद्वाज के  विचार:

1. आज के समय में हिंदी रंगकर्म के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
हिंदी रंगमंच की सबसे बड़ी चुनौती हैं खुद हिंदी रंगकर्मी जो दृष्टी, दिशा , मकसद विहीन रंगकर्म का ढोंग कर रहे हैं। दूसरी बड़ी चुनौती है सरकारी नौकरी करते हुए प्रायोजित ‘नीम हकीम खतरा - ए - जान’ रंग आलोचक। ये दोनों चुनौतियां हिंदी रंगकर्म की दीमक हैं, जो हिंदी रंगकर्म का आमूल बंटाधर करने में लगी हुई हैं।

2. बड़ी पूंजी के आगमन ने अन्य संचार माध्यमों की तरह क्या रंगकर्म और उसके सरोकारों काे भी प्रभावित किया है?
जी , क्योंकि पूंजी सबसे पहले अक्ल को खाती है, उसके बाद प्रतिबद्धता को डसती है और लूट-खसोट की मानसिकता पैदा कर, सीमित और नियंत्रित “धन” के ऊपर आश्रित करती है। इसके बाद वह ‘सीमित और नियंत्रित धन’ की बंदरबांट में बचे-खुचे प्रतिबद्ध रंगकर्मियों को बर्बाद करने का काम करती है। इसलिए हिंदी में कहावत है “‘उधार के घी से पहलवान नहीं बनते और अगर बन जाते हैं तो जिन्दगी भर घी खिलाने वाले की चैकीदारी के लिए”। इसलिए रंगकर्म अपने आप जन-सहभागिता और सहयोग से खड़ा हो तो बेहतर है।

3. क्या ‘अच्छे दिनों’ का राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य रंगकर्मियों के लिये‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाने’ का आह्वान नहीं कर रहा है?
 बिना ‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाये” किया गया रंगकर्म भी कोई रंगकर्म है? प्रतिबद्ध और प्रगतिशील रंगकर्म वही है जो ‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाये” पर अपने को विवादित कर बेचने के लिए नहीं  बल्कि सांस्कृतिक चेतना का निर्माण कर सांस्कृतिक क्रांति के लिए। हाँ, ‘अच्छे दिनों’ का राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य प्रतिबद्ध रंगकर्मियों के लिए जानलेवा साबित होगा।

4. आधुनिक नाटकों में किये जाने वाले अधिकाधिक प्रयोगों ने क्या नाटक और दर्शक के बीच की खाई को और अधिक बढ़ा दिया है?
 अधिकाधिक प्रयोगों ने नहीं , बिना मकसद और दृष्टी से हुए प्रयोगों ने .औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित और जिम्मेदारी से विहीन पूंजीवादी सोच के रंगकर्मियों की वजह से ऐसा हुआ ह,ै  क्योंकि दर्शक अपने आप को जब मंच पर नहीं देखता है तो वो नहीं जुड़ता है और “थिएटर अॉफ़ रेलेवंस’ रंग-सिद्धांत के अनुसार दर्शक सबसे बड़ा और शक्तिशाली रंगकर्मी है। पूंजीवादी कलाकार कभी भी अपनी कलात्मक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं लेते इसलिए ‘कला-कला’ के चक्रव्यहू में फंसे हुए हैं और भोगवादी कला की चक्की में पिस कर ख़त्म हो जाते हैं। सच्ची कला और कलाकार अपनी कलात्मक सामाजिक जिम्मेदारी समझते हैं, निभाते हैं और जीवन को बेहतर और शोषण मुक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध और समर्पित होता हैं। सही दृष्टी, सही रंग-दृष्टी से किये गए प्रतिबद्ध रंग-प्रयोग  “दर्शक” को जोड़ते हैं।

5. बड़े शहरों का रंगकर्म छोटे शहरों और कस्बों में होने वाले रंगकर्म की तरह जनोन्मुख क्यों नहीं है।
 बड़े शहर जनसरोकारों वाले विकास के मॉडल पर नहीं खड़े अपितु  बड़े शहर औपनिवेशिक और पूंजीवादी सोच के विकास मॉडल हैं तो स्वाभाविक है कि रंगकर्म जन सरोकारों की बजाय  औपनिवेशिक और पूंजीवादी सोच से लैस मध्यमवर्ग केन्द्रित होगा और है।

6. क्या कहानी के रंगमंच ने हिंदी में पहले से ही दुर्लभ नाट्य लेखन की परंपरा को और क्षीण किया है?
 कहानी का रंगकर्म करने वालों को ये बताना होगा की “कहानी” के मंचन से वो क्या हासिल करना चाहते थे ? क्या उनका मकसद “कहानी” का मंचन कर कहानीकारों को नाटक लिखने के लिए प्रेरित करना था? या अपनी एक अलग रंग-पहचान” बनाने के लिए कहानी का मंचन किया गया। जवाब आपको मिल जाएगा।दरअसल नाट्य-लेखन की प्रक्रिया को ध्वस्त किया है औपनिवेशिक और पूंजीवादी सोच वाले “निर्देशकीय व्यक्ति’ के उदय ने। “ थिएटर अॉफ़ रेलेवंस “ रंग-सिद्धांत के अनुसार रंगकर्म ‘निर्देशक और अभिनेता’ केन्द्रित होने की बजाय “दर्शक और लेखन’ केन्द्रित हो। नाट्य लेखन के साथ बड़ी विडम्बना यह है की जिसने एक नाटक नहीं लिखा वह बताता है नाटक किस प्रकार लिखा जाए उसका रूप क्या हो? भरत मुनि इसके सबसे बड़े उदाहारण हैं ( चूँकि वह मिथकीय हैं ..अगर वो हुयें हैं तो) और आजकल फुल टाइम सरकारी नौकर और पार्ट टाइम रंगालोचक दिन रात “नवोदित नाटककारों” की लेखन प्रतिभा का गर्भपात कराने पर उत्तारू हैं। ऐसे भयावह रंग-वातावरण में कौन नाटक लिखकर फजीहत कराये, इसलिए कहानी लिखने तक सीमित हो गया हो “नाटककार” !


7. रंगकर्म को लेकर सरकार की सांस्कृतिक नीति क्या होनी चाहिये?
 रंगकर्म विद्रोही कला है और सरकार कभी भी विद्रोह नहीं चाहती। सरकार दमन चाहती है। सत्ता हमेशा कलाकार से डरती है -चाहे वो सत्ता तानाशाह की हो या लोकतान्त्रिक व्यस्था वाली हो। तलवारों ,तोपों या एटम बम का मुकाबला ये सत्ता कर सकती है पर कलाकार, रचनाकार, नाटककार , चित्रकार या सृजनात्मक कौशल से लबरेज़ व्यक्तित्व का नहीं, क्योंकि कलाकार मूलतः विद्रोही होता है , क्रांतिकारी होता है और सबसे अहम बात यह है कि उसकी कृति का जनमानस पर अद्भुत प्रभाव होता है। इसलिए “कलाकार” को काटा या सत्ता के पैरों से रौंदा नहीं जा सकता। सत्ता ने कलाकार से निपटने के लिए उसकी प्रखर बुद्धि, चेतना और गजब के आत्मविश्वास की पहचान कर उसके अन्दर के भोगी व्यक्तित्व को शह, लोभ, लालच और प्रश्रय देकर उसे राजाश्रित बनाया और सबसे बड़े षड्यंत्र के तहत सदियों से उसके समयबद्ध कर्म करने की क्षमता पर प्रहार किया और जुमला चलाया “अरे भाई ये क्रिएटिव काम है” और क्रिएटिव काम समयबद्ध नहीं हो सकता ...क्रिएटिव काम के समय निर्धारण नहीं हो सकता ..पता नहीं कब पूरा हो, वगैरह। मज़े की बात है की सत्ता के इस षड्यंत्र को “कलाकार वर्ग” समझ ही नहीं पाया और ऐसा शिकार हुआ है कि बड़े शान से इस जुमले को दोहराता है  “अरे भाई ये क्रिएटिव काम है”। इस जुमले को सुनकर, बोलकर आनन्दित और आह्लादित होता है बिना किसी तरह का विचार किये? इसलिए “रंगकर्म” की सरकार नीति नहीं “जन नीति“ हो जो स्वयं अपने आप को आत्मसंशोधित करने में सक्षम हो !

8. क्या राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थान और वहाँ से प्रशिक्षित एक बड़ी जमात ने देशभर में चल रहे शौकिया रंगमंच को नकारने का काम किया है?
 राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थान “रंगकर्म” के उत्थान के नाम पर सबसे बड़े कलंक हैं।  दूनिया में कहीं ऐसा उदाहरण कोई बताये कि खेत में गेहूं के बीज बोये और बबूल उगे। कुछ अपवादों को छोड़कर इन संस्थानों से निकले लोग हीन भाव से ग्रसित होते हैं और जो व्यक्ति अल्प ज्ञान , रंग-दृष्टी विहीन , संकुचित व्यक्तित्व व झूठे आत्मविश्वास से ग्रसित होगा वो संस्थान से बाहर निकलने के बाद दूसरों को नकारने के अलावा और क्या करेगा ? इससे ज्यादा यह संस्थान और उससे निकले दिग्भ्रमित छात्र किसी टिप्पणी के योग्य नहीं हैं।

मंजुल भारद्वाज
पूर्णकालिक रंगकर्मी। ‘थियेटर आॅफ रेलेवंस’ नामक रंग-सिद्धांत पर आधारित नाटकों के लेखन व प्रदर्शन में संलग्न। मुंबई में ‘एक्सपेरिमेंटल थियेटर फाउंडेशन’ की स्थापना व इसका संचालन। संपर्क-09820391859

Wednesday, July 22, 2015

प्रश्नों के घेरे में रंगमंच -3

पिछले जाड़े से पहले की कोई दोपहर थी। जितेन्द्र जी ने फोन पर कहा कि ‘‘जयनारायण बुधवार जी ‘कल के लिये’ पत्रिका निकालते हैं और रंगमंच पर एक परिचर्चा प्रकाशित करना चाहते हैं। ये काम आप ही देख लें।’’ मैंने हामी भर दी तो कहा कि जयनारायण जी आपको फोन करेंगे। उनका फोन अगले दिन आया। कहा, ‘‘ मैंने जितेन्द्र जी से आग्रह किया था पर उन्होंने आपका नाम सुझाया है। सवाल भेज दें तो एक बार उन्हें देख लूंगा।’’ 

बाद में मालूम हुआ कि परिचर्चा आयोजित करना कुछ-कुछ साहूकारी वाला काम है। संयोजक साहूकार की तरह तगादे पर तगादा करता है और प्रतिभागी कर्जदार की तरह मोहलत पर मोहलत मांगता जाता है। इस प्रक्रिया में कुछ को स्थायी रूप से कर्ज मुआफी जैसी देनी पड़ती है और वे बाअदब, बाआबरू परिसंवाद से बाहर भी निकल जाते हैं। हालात कुछ ऐसे बने कि जितेन्द्र जी के ही जवाब आखिर तक नहीं मिल पा रहे थे। कहा कि, ‘आगरे में इस बार ठंड बहुत पड़ रही है। लिखना नहीं हो पा रहा है।’ मैंने कहा, ‘‘मैं तो मुनीम हूँ, आप सेठ जी से बात कर लें।’’ कोई दस मिनटों मे ही उनका फोन आया और कहा कि जयनारायण जी ने मोहलत दे दी है। बाद में उन्होंने क्षमायाचना के साथ प्रश्नों के उत्तर भेजे और यह भी जोड़ा कि, ‘‘ जो ठीक न लगे उसे बेदर्दी से संपादित कर लें।’’ इस पोस्ट में पढ़ें जितेन्द्र जी के विचार :

1. आज के समय में हिंदी रंगकर्म के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
मेरी नजर में हिंदी रंगमंच के सामने सबसे बड़ी चुनौती निरंतरता और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँच की है। एक साथ सार्थकता और कलात्मकता-दोनों को साधने  की है।

2. बड़ी पूंजी के आगमन ने अन्य संचार माध्यमों की तरह क्या रंगकर्म और उसके सरोकारों काे भी प्रभावित किया है
बड़ी पूंजी ने विभिन्न संचार-माध्यमों को तो लगभग कब्ज़ा ही लिया है। पूरी सांस्कृतिक गतिविधि को कथित मनोरंजन उद्योग की परिधि में समाहित करने की कोशिश हो रही है। नवीनतम तकनीक से सज्जित चकाचैंध भरे तरह-तरह के ‘शो’ दर्शकों की अभिरुचि को भ्रष्ट कर रहे हैं; बड़ी लागत या ‘स्टार कास्ट’ वाले नाटक भी रंग-प्रस्तुतियों का ऐसा मॉडल पेश करते हैं कि कम साधनों वाला रंगमंच फीका लगे। इसका एक हद तक  रंगकर्म और उसके सरोकारों पर असर तो हो रहा है। ग्लैमर की चाह कुछ को तो खींच कर ले ही जाती है।

3. क्या ‘अच्छे दिनों’ का राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य रंगकर्मियों के लिये‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाने’ का आह्वान नहीं कर रहा है?
‘अच्छे दिनों’ के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य ने एक के बाद एक ट्रेजिकोमिक स्थितियों की ऐसी कतार लगा दी है कि नाटकों के लिए वर्ण्य-विषयों की कोई कमी नहीं। अब यह सब बोलेंगे-दिखायेंगे तो जिन पर चोट करेंगे, वे चुप रहने वाले नहीं हैं। सफ़दर की कुर्बानी का जो असर हुआ, उससे सत्ता सावधान ज़रूर हो गयी है। फिर भी जोखिम और खतरे तो उठाने ही होंगे। हाँ,अकारण ‘‘आ बैल,मुझे मार’’ वाली स्थिति पैदा करने से बचना चाहिए। सबको मिल कर मांग करनी होगी कि नाट्य-प्रदर्शन अधिनियम 1876 रद्द हो। इक्का-दुक्का राज्यों में यह लागू नहीं है, बाक़ी देश में अलग-अलग रूपों में प्रभावी है। सत्ताधारियों के पास इस हथियार का होना खतरनाक है।

4. आधुनिक नाटकों में किये जाने वाले अधिकाधिक प्रयोगों ने क्या नाटक और दर्शक के बीच की खाई को और अधिक बढ़ा दिया है?
हाँ,प्रयोग के नाम पर दर्शक को चमत्कृत करने के दुराग्रह से संप्रेषणीयता प्रभावित होती ही है और कथ्य पीछे छूट जाता है। दर्शक के हाथ कुछ नहीं आता। ऐसे कलाकार आत्ममुग्ध होते रहें,उन्हें मुबारक!

5. बड़े शहरों का रंगकर्म छोटे शहरों और कस्बों में होने वाले रंगकर्म की तरह जनोन्मुख क्यों नहीं है।
बड़े शहरों की जीवन-शैली भिन्न है-भागमभाग और ‘आनंद’ के लिए ढेरों विकल्प। उन्हें रंगशाला में खींच कर लाना मुश्किल काम है। तो एक ख़ास समूह ही हर नाट्य-प्रदर्शन में दिखता है। इस ‘ख़ास’ को ही नाटक संबोधित होने लगता है। कस्बों में आबादी का बड़ा हिस्सा और गांवों के लगभग सारे ही लोग नाटक के प्रति आकर्षित होते हैं। छोटे शहरों और मौहल्लों-बस्तियों में भी ऐसा ही माहौल मिलेगा। जनोन्मुखता को इसी से ताक़त मिलती है। लेकिन बड़े शहरों में सब जन-विमुखी होता है-यह सोच ठीक नहीं।

6. क्या कहानी के रंगमंच ने हिंदी में पहले से ही दुर्लभ नाट्य लेखन की परंपरा को और क्षीण किया है?
आम भारतीयों को सदियों से कहानी कहना-सुनना अच्छा लगता है। कहानी,कविता,संस्मरणों,पत्रों आदि विभिन्न साहित्यिक विधाओं की कृतियों के रंगमंच ने नाट्यालेख-रंगालेख के संसार को समृद्ध किया है, उसे विस्तार और गहनता देने में योगदान दिया है।

7. रंगकर्म को लेकर सरकार की सांस्कृतिक नीति क्या होनी चाहिये?
रंगकर्म को लेकर किसी सरकारी सांस्कृतिक नीति की दरकार हमें नहीं है। हाँ, सरकार द्वारा वित्तपोषित संस्थानों के संचालन के बारे में अवश्य स्पष्ट नीति होनी चाहिए- जैसे, अकादमियां, क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र, नाट्य विद्यालय, आदि ... श्री सीताराम येचूरी की अध्यक्षता वाली संसद की प्रवर समिति ने चुनाव से पहले इस सम्बन्ध में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कर दी थीं. इस रिपोर्ट को संसद के पटल पर रखा जाय और उस पर बहस हो. हमारी एक मांग तो यह है कि इन संस्थाओं का सञ्चालन सम्बंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों के हाथ में हो.

8. क्या राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थान और वहाँ से प्रशिक्षित एक बड़ी जमात ने देशभर में चल रहे शौकिया रंगमंच को नकारने का काम किया है?
इनमें से कुछ प्रशिक्षितों से हिंदी के शौकिया रंगमंच को मदद मिली है। ज्यादातर अपने करियर की उलझनों में ही फंसे रहते हैं।