Tuesday, May 12, 2015

जितेंद्र के बिना आगरे का अर्थ बदल गया है

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सुधीर विद्यार्थी
इस बार दिल्ली से मुंबई जाती ट्रेन आगरा राजा मंडी पर देर तक रुकी तो सब कुछ सूना और भारी लग रहा था। सात मार्च की वह मनहूस तारीख मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी, जिस दिन हमने स्वाइन फ्लू में जितेंद्र रघुवंशी को खोया था। पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ और घनश्याम अस्थाना की अनुपस्थिति के चलते उस शहर का अर्थ पहले जैसा नहीं रहा। रामविलास शर्मा दिल्ली में रहने लग गए थे, फिर भी लगता था कि वे आगरा के ही हैं। राजेंद्र यादव भी मेरे लिए बाद तक आगरे के ही बने रहे। राजेंद्र रघुवंशी नहीं रहे तब इस शहर के साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल में और भी सन्नाटा पसर गया। वे ‘इप्टा’ के संस्थापक सदस्यों में थे। उन्होंने और बिशन खन्ना ने मिल कर एक मई 1942 को ‘आगरा कल्चरल स्क्वाड’ की स्थापना की थी। ‘बंगाल कल्चरल स्क्वाड’ से पे्ररित होने का यह प्रतिफल था जिसकी रोशनी दूर तक गई। बाद में राजेंद्र के पुत्र जितेंद्र रघुवंशी ने ‘इप्टा’ का मोर्चा बेहद कर्मठता से संभाला।
आगरा स्टेशन पर उनकी स्मृति ने फिर से आंखों को गीला कर दिया। अट्ठाईस जून 2013 को मैं केंद्रीय कारागार आगरा में रहे क्रांतिकारियों के नाम पर बैरकों के नामकरण और उनके शिलापट्टों को लगवाने के सिलसिले में वहां गया था। व्यस्तता के चलते मैं जितेंद्र के पास नहीं पहुंच पाया। फोन पर बताया तो वही बिना देर किए मुझसे मिलने आ गए। देर तक हमारी बातें होती रहीं। उन दिनों वे वामंपथी सांस्कृतिक आंदोलन की छीजती स्थितियों पर विशेष तौर पर चिंतित थे। फिर भी उन्होंने कहा कि सामाजिक बदलाव में कला की एक सीमित भूमिका होती है। बड़ा दायित्व तो सामाजिक और राजनीतिक समूहों का ही होता है।
मेरा वहां पहुंचना सभी इस अर्थ में दुर्लभ मान रहे थे कि वे शहीद प्रतिमाएं वर्षों पहले वहां स्थापित कर दी गई थीं, पर उनके नीचे उनका नाम-परिचय अंकित नहीं था। लोग उनके विषय में नहीं जानते थे। मैंने थोड़ी ही देर में सभी प्रतिमाओं की शिनाख्त कर दी, जिसे कागज पर दर्ज कर लिया गया। जितेंद्र का आग्रह था कि मैं आगरा में भगतसिंह पर एक व्याख्यान दूं जो हर बार टल जाता था।
स्वतंत्रता संग्राम के दौर में आगरा क्रांतिकारियों का प्रमुख केंद्र था और यह जितेंद्र की चेतना में गहराई तक समाया हुआ था। जितेंद्र मुझे इसलिए भी बहुत प्रिय थे। उम्र में मुुझसे दो वर्ष बड़े थे, पर वे मुझे ही बड़ा भाई मानते थे। आगरा की ‘इप्टा’ इकाई में जितेंद्र की मां अरुणा रघुवंशी भी काम करने लगी थीं। वे आगरा में रंगमंच से जुड़ने वाली पहली महिला थीं। उन्होंने पे्रमचंद की कृति ‘गोदान’ पर आधारित नाटक में धनिया की भूमिका निभाई थी। 1952 में कलकत्ता में इसकी सफल प्रस्तुति विशाल जन समुदाय के बीच हुई थी। जितेंद्र तब एक साल से कुछ अधिक के रहे होंगे। इस तरह, वे रंगमंच के बीच ही पले-बढ़े। उनके संस्कार यहीं बने-ढले। उनका पूरा परिवार रंगमंच को समर्पित था।
पिता राजेंद्र रघुवंशी के न रहने के बाद जितेंद्र ने उस विरासत को जिस तरह संभाला, उस पर गर्व किया जा सकता है। आगरा में ‘लिटिल इप्टा’ का काम तो और भी प्रशंसनीय है। जितेंद्र अंतरराष्ट्रीय बाल रंगमंच दिवस को पूरे देश में मनाना चाहते थे। सही अर्थों में उनकी दृष्टि बुनियाद पर थी, जिसके ऊपर किसी मजबूत इमारत का निर्माण किया जाता है। वे हिंदी पट्टी सहित विभिन्न प्रदेशों में गठित की जाने वाली थियेटर की इकाइयों में लोक कलाकारों को जोड़ने की जरूरत पर अधिक जोेर देते थे। उन्होंने हमेशा याद रखा कि रंगकर्मी को पहले अपनी आजीविका पर ध्यान देना होगा। रोजगार के लिए छोटे शहरों से पलायन को वे इस अर्थ में भी देखते थे कि इससे कई जगहों की कला बाहर जा रही है।
आगरा में और भी कुछ परिवार थे जो रंगकर्म से जुड़े थे। बिशन खन्ना का परिवार था। वे राजेंद्र रघुवंशी के घनिष्ठ मित्र थे। बाद में वे फिल्मों में भी गए और ‘गांधी’ फिल्म में भी काम किया। उनके बड़े भाई श्रीकृष्ण खन्ना भी अच्छे कलाकार थे। उनके पुत्र अजय खन्ना बाद में सितारवादक के रूप में मशहूर हुए। अजय ने 1950 में ‘लिटिल इप्टा’ की पहली प्रस्तुति ‘डाकघर’ में काम किया था। इस शहर में उन दिनों महिलाओं का भी एक संगठन ‘विप्टा’ (वीमेंस इप्टा) भी खूब सक्रिय था। रमा, श्यामा और चंद्रलेखा ने ‘विप्टा’ की पहली प्रस्तुति अमृता प्रीतम की ‘पांच बहनें’ में काम किया था। इसमें सभी स्त्री पात्र थे। आगरा के मदनसूदन का पूरा परिवार ही ‘इप्टा’ से जुड़ा था। उन्होंने ‘अदाकार’ (कलकत्ता), सत्यजित राय के टीवी सीरियल और रेडियो में भी काम किया था। कुछ और परिवार थे, जिनका सांस्कृतिक क्षेत्र में अविस्मरणीय योगदान रहा। पर जितेंद्र के बिना तो आगरे का अर्थ मेरे लिए बिल्कुल बदल गया है।
जनसत्ता से साभार

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