Wednesday, December 25, 2013

'गधों का मेला' के मंचन के साथ 9 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह का समापन

कोर्ट मार्शल
-पुंजप्रकाश

डोंगरगढ़, 21 से 23 दिसंबर 2013। संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार और डोंगरगढ़ इप्टा के सहयोग से विकल्प, डोंगरगढ़ द्वारा 3 दिवसीय 9 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह के तीसरे और आखिरी दिन कुल तीन नाट्य प्रस्तुतियों का मंचन किया गया । पहली प्रस्तुति थी प्रसिद्ध नाटककार स्वदेश दीपक लिखित नाटक कोर्ट मार्शल, जिसे इप्टा, गुना के कलाकारों ने अनिल दुबे के निर्देशन में प्रस्तुत किया । सामंती मानसिकता को बड़ी ही खूबसूरती से  मानवीयता और सत्य के कटघड़े में खड़ा करती यह प्रस्तुति समारोह की सार्थक नाट्य प्रस्तुतियों में से एक थीं । प्रस्तुति के विभिन्न चरित्रों में अनिल दुवे, कल्याण सिंह लोधी, सुमित बुनकर, शुभम भार्गव, पंकज दीक्षित, शुभम पाठक आदि अभिनेताओं ने अभिनय किया । ज्ञात हो कि कोर्ट मार्शल हिंदी के चर्चित व बहुमंचित नाटकों में से एक है ।

इत्यादि
अंतिम दिवस दूसरी प्रस्तुति इत्यादि थी । वर्त्तमान समय में हिंदी के प्रतिष्ठित कवि राजेश जोशी की एक कविता ‘इत्यादि’ पर आधारित, आधुनिक रंगमंच की प्रयोगशीलता को अपने अंदर समेटे डोंगरगढ़ बाल इप्टा की इस प्रस्तुति का निर्देशन पुंज प्रकाश ने किया था । डोंगरगढ़ के दर्शकों के लिए यह प्रस्तुति एक नई नाट्यानुभूति थी । इत्यादि में प्रतिज्ञा, राशि पांडे, अनिता गुप्ता, सानिका जैन, अनुष्कस बक्शी, मुस्कान सिंग आदि बाल कलाकारों ने अभिनय किया था ।

समारोह की तीसरी और आखिरी प्रस्तुति थी गधों का मेला, जिसे नाट्य विभाग, खैरागढ़ विश्विद्यालय के अभिनेता डॉ योगेन्द्र चौबे के निर्देशन में प्रस्तुत कर रहे थे । वर्त्तमान सामाजिक परिदृश्य की विभीषिकाओं को हास्य-व्यंग्य के माध्यम से पेश करती तौकीर अल हाकिम लिखित इस नाटक का हिंदी अनुवाद प्रसिद्ध रंगकर्मी देवेन्द्र राज अंकुर ने किया था । हास्य-व्यंग से सरबोर लोक व पारम्परिक नाट्य रूपों व शैलियों को आधुनिक सन्दर्भ में प्रयोग करते इस शानदार नाट्य प्रस्तुति में घनश्याम साहू, सौरव बुराडे, भुवनेश्वर महिलाने, शुभम, राकेश कुमार, काजोल मुस्कान, गौरव चौहान आदि अभिनेताओं ने विभिन्न भूमिकाओं को बड़ी ही अदा से पेश किया।

गधों का मेला
इससे पूर्व आयोजन के दूसरे दिन प्रसिद्ध  नाटककार  बादल सरकार लिखित हास्य नाटक ‘बल्लभपुर की रूपकथा’ का सफल मंचन विवेचना रंगमंडल, जबलपुर के कलाकारों ने चर्चित रंग निर्देशक अरुण पाण्डेय के निर्देशन में किया ।

ज्ञात हो कि सन 1963 में लिखा बादल सरकार का यह परिस्थिति जनक हास्य नाटक अंग्रेजी फ़िल्म ‘यूं आर नो  एंजल्स’ पर आधारित है। प्रस्तुतिकरण में हास्य प्रचुरता एवं अभिनेताओं की ऊर्जा व हास्य-बोध ने उपस्थित नाट्य प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन किया।

 नाटक के विभिन्न  चरित्रों को विवेक पांडे, मनीष तिवारी, रोहित सिंह, जतिन राठौड़, अमित निमझे, सरस नामदेव, रविन्द्र मुर्हार, आशुतोष द्विवेदी, अलंकृत, अपर्णा शर्मा एवं सूरज राय आदि अभिनेताओं ने जीवंत किया । इस प्रस्तुति की सफलता में कला निर्देशक विनय अम्बर व प्रकाश परिकल्पक दिलीप झाडे का योगदान भी उल्लेखनीय है ।

वल्लभपुर की रूपकथा
दूसरे दिन की दूसरी प्रस्तुति थी हीरा मानिकपुरी निर्देशित नाटक:व्याकरण’ जिसे प्रस्तुत किया , इप्टा रायगढ़ के कलाकारों ने। जल, जंगल, ज़मीन से जुड़े वर्त्तमान ज्वलंत सवालों को अपने दायरे में समेटने का एक गम्भीर प्रयास करता यह नाटक छद्म आंदोलन की भी पड़ताल है । प्रस्तुति की गम्भीरता एवं गम्भीर नाटकों के प्रति दर्शकों के नजरिया की भी पड़ताल इस प्रस्तुति के मार्फ़त की जा सकती है।

नाटक के विभिन्न चरित्रों में अपर्णा, ब्रिजेश तिवारी,  लोकेश्वर निषाद, भारत निषाद, सुरेन्द्र बरेठ, कुलदीप दास, प्रियंका बेरिया, श्याम देवकर, विनोद बोहिदार, आदि अभिनेताओं ने अभिनय किया । एक ही दिन में दो अलग-अलग  नाटकों से  रु-ब- रु होना का एक मज़ेदार अनुभव भी देखने को   मिला ।

व्याकरण
आयोजन का उद्घाटन विख्यात हिंदी कवि पवन करण ने किया। इस अवसर पर उनके जनगीतों की एक पोस्टर प्रदर्शनी भी लगायी गयी। मनोज गुप्ता के संगीत निर्देशन में जनगीतों के सामूहिक गायन के पश्चात भिलाई इप्टा द्वारा नाटक ‘प्लेटफार्म’ और डोंगरगढ़ इप्टा द्वारा नाटक ‘बापू मुझे बचा लो’ का मंचन किया गया।

नाट्य समारोह का उद्घाटन करते हुए  पवन करण ने महोत्सव के आयोजन की बधाई देते हुए कला और समाज के अंतरसंबधों पर प्रकाश डाला। नाटक प्लेटफार्म रेलवे प्लेटफार्म पर विभिन्न पात्रों एवं घटनाओं का रोचक कोलाज है जो कई सामाजिक सवालों से भी रू-ब-रूहोता है। प्रस्तुति में नाटकीय तत्वों व घटनाओं की प्रधनता एवं अभिेनेताओं का सादगीपूर्ण प्रदर्शन इस प्रस्तुति की सार्थकता को दर्शकों तक सफलतापूर्वक संप्रेषित करती है। इस नाटक क ेलेखन व निर्देशन शरीफ अहमद ने किया था एवं राजेश श्रीवास्तव, मणिमय मुखर्जी, शैलेश कोडापे, निशु, संदीप आदि ने उल्लेखनीय अभिनय किया।

बापू मुझे बचा लो
समारोह की दूसरी प्रस्तुति राधेश्याम तराने निर्देशित नाटक बापू मुझे बचा लो थी, जिसका आलेख दिनेश चौधरी ने लिखा है व संगीत निर्देशन मनोज गुप्ता है। नाटक भ्रष्टाचार रूपी त्रासदी  को  महात्मा गांधी के मेटाफर के साथ व्यंग्य और हास्य के मार्फत प्रस्तुत करते हुए सामाजिक -आर्थिक-राजनीतिक प्ररिस्थितियों को कठघरे में खड़ा करता है। नाटक का तीखा व्यंग्य एक तरफ जहाँ आलेख की खूबसूरती है, वहीं प्रेक्षकों और अभिनेताओं के ‘‘सेफ जोन’’ का अतिक्रमण भी। नाटक में मतीन अहमद, नुरूद्दीन जीवा, राजेश कश्यप, महेन्द्र रामटेके, निश्चय व्यास, दिनेश नामदेव, राधेकृष्ण कनौजिया, गुलाम नबी ने अभिनय किया। उद्घाटन समारोह में सुभाष मिश्रा, संजय अलंग, जयप्रकाश, आनंद हर्षुल, योगेन्द्र चौबे और पुंजप्रकाश भी मौजूद थे।

प्लेटफार्म


 

Sunday, December 22, 2013

डोंगरगढ़ में 9 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह का शुभारंभ

डोंगरगढ़। संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार और डोंगरगढ़ इप्टा के सहयोग से विकल्प, डोंगरगढ़ द्वारा 3 दिवसीय 9 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह का शुभारंभ स्थानीय बमलेश्वरी मंदिर प्रांगण में हुआ। आयोजन का उद्घाटन विख्यात हिंदी कवि पवन करण ने किया। इस अवसर पर उनके जनगीतों की एक पोस्टर प्रदर्शनी भी लगायी गयी। मनोज गुप्ता के संगीत निर्देशन में जनगीतों के सामूहिक गायन के पश्चात भिलाई इप्टा द्वारा नाटक ‘प्लेटफार्म’ और डोंगरगढ़ इप्टा द्वारा नाटक ‘बापू मुझे बचा लो’ का मंचन किया गया।

नाट्य समारोह का उद्घाटन करते हुए देश के चर्चित कवि पवन करण ने महोत्सव के आयोजन की बधाई देते हुए कला और समाज के अंतरसंबधों पर प्रकाश डाला। नाटक प्लेटफार्म रेलवे प्लेटफार्म पर विभिन्न पात्रों एवं घटनाओं का रोचक कोलाज है जो कई सामाजिक सवालों से भी रू-ब-रूहोता है। प्रस्तुति में नाटकीय तत्वों व घटनाओं की प्रधनता एवं अभिेनेताओं का सादगीपूर्ण प्रदर्शन इस प्रस्तुति की सार्थकता को दर्शकों तक सफलतापूर्वक संप्रेषित करती है। इस नाटक क ेलेखन व निर्देशन शरीफ अहमद ने किया था एवं राजेश श्रीवास्तव, मणिमय मुखर्जी, शैलेश कोडापे, निशु, संदीप आदि ने उल्लेखनीय अभिनय किया।

समारोह की दूसरी प्रस्तुति राधेश्याम तराने निर्देशित नाटक बापू मुझे बचा लो थी, जिसका आलेख दिनेश चौधरी ने लिखा है व संगीत निर्देशन मनोज गुप्ता है। नाटक भ्रष्टाचार रूपी त्रासदी  को  महात्मा गांधी के मेटाफर के साथ व्यंग्य और हास्य के मार्फत प्रस्तुत करते हुए सामाजिक -आर्थिक-राजनीतिक प्ररिस्थितियों को कठघरे में खड़ा करता है। नाटक का तीखा व्यंग्य एक तरफ जहाँ आलेख की खूबसूरती है, वहीं प्रेक्षकों और अभिनेताओं के ‘‘सेफ जोन’’ का अतिक्रमण भी। नाटक में मतीन अहमद, नुरूद्दीन जीवा, राजेश कश्यप, महेन्द्र रामटेके, निश्चय व्यास, दिनेश नामदेव, राधेकृष्ण कनौजिया, गुलाम नबी ने अभिनय किया।

उद्घाटन समारोह में सुभाष मिश्रा, संजय अलंग, जयप्रकाश, आनंद हर्षुल, योगेन्द्र चौबे और पुंजप्रकाश भी मौजूद थे।


Friday, December 13, 2013

Jurrat : Aurat maange azaadi, inkar karan ki azaadi...

Aurat maange azaadi, inkar karan ki azaadi... the call rang loud at the launch of 'Jurrat', the week-long campaign to mark one year of the Delhi gang-rape. Two groups, Swaang and Majma, with the help of other artistes and groups like IPTA from JNU, kick-started the initiative, saluting Nirbhaya's fight through protest songs, sketches and plays. 

Activist and lawyer Vrinda Grover's speech took guests to episodes where a woman was harassed or assaulted, but justice wasn't meted out. The Mathura rape case and the Bhanwari Devi rape case were also discussed. Protest songs by groups, "an alternative to Yo Yo Honey Singh", according to the host and member of Swaang, actress Swara Bhaskar, followed. "He'd faced a lot of backlash when it came to light last year that he'd sung songs like Balatkari, but Honey Singh's back, asking us to do Lungi Dance," she said. 

What froze the audience in the auditorium was the 10-minute sketch presented by former DU student Mallika Taneja. Her act began with Mallika in nothing but her underwear, with heaps of clothes around her. One by one, she wore each piece of clothing, one over the other, describing how the society thinks that it's important for a girl to dress 'properly' in order to save herself from sexual harassment. 

Rasika Agashe's Museum... Of Species In Danger, a play in Hindi with women impersonating Sita, Surpanakha, Kunti and a commoner, brought the curtains down. The campaign is on the streets now. "We're going into bastis and communities, trying to break the language barrier, so that it is not confined to just the English-speaking audience," said Swara. "It's very encouraging how people have come together. It's a massive movement that we're launching, and we hope to make Jurrat an annual feature. Our main event is the mobile concert on the 16th, when we'll have Sona Mohaptra, Rabbi Shergill and Swanand Kirkire with us," she added. Jurrat will end with a final concert at the JNU convention centre on December 16. 

-Bohni Bandyopadhyay and Alina Sayeed in mumbaimirror.com
(http://www.mumbaimirror.com/Entertainment/Art-Theatre/Marking-one-year-of-Delhi-gang-rape/articleshow/27239757.cms)

Monday, December 9, 2013

JURRAT : A Campaign on Violence Against Women

On 16th December 2013 one year would have passed since the shameful, horrific and brutally inhuman gang-rape of a 23 year old girl in Delhi on one of the most traffic and people infested roads of the national capital.

Swaang (a Mumbai based theatre and protest music group) and Majma (a Delhi based cultural group) are organizing on 16th December 2013 Jurrat: Aazaad Chalo, Bebaak Chalo - a show of strength by the citizens of Delhi, women and men, to claim back the streets of Delhi.

Jurrat is envisaged as a mobile music concert. It will be performed on a moving trailer through the streeets of Delhi on 16th Dec 2013. A moving kaaravaan or caravan, it will comprise of an open trailer, atop which artists will perform protest music and which will be trailed by volunteers and citizens on motorbikes and cycles. On 16th December 2013 this caravan will chart Jyoti's route of that night. It will make performance stops at Saket Select City Walk Mall, where Jyoti and her friend left to go home, Mehrauli Bus Depot, Munirka Flyover, and finally reach Mahipalpur Crossing close to where Jyoti's brutalised body was thrown out of the bus.

At each spot renowned artists namely Rabbi, Sona Mahapatra, and Swanand Kirkire, and Swaang will sing songs of protest.

Jurrat, is a ‘show of strength’, it is the cry of our conscience against our own complacency. It is an effort to prevent ourselves from slipping into a comfortable inertia, now that the perpetrators have been convicted and a sentence pronounced. It is a reminder to the citizenry that the battle against gender violence is arduous and long but is our responsibility as well. And that it must be fought. Jurrat is the decision that from now on there shall be no more victims, only survivors. Jurrat is a promise by “We the Citizens”, unto ourselves and our world, that “We shall fight”. Jurrat is the collective cry of “No more!”

This is an independent event with no political leaning nor any kind of political sponsorship. This is an effort of artists and students and citizens of India. It is an effort to remember Jyoti's fight and not allow it to fade into the oblivion of a statistical record or a number in a list of crimes that were committed in a particular year in a particular city.

WE INVITE YOU AND YOUR FRIENDS TO BE PART OF JURRAT. To get out on the streets of Delhi on 16th December 2013, to fight, to resist, to protest and to pledge against gender based and sexual violence.

To discuss details, know how you can be part of this endeavour and plan the procession; pls join Swaang and Majma on Sunday, 8th December 2013 at 3pm at the AMPHITHEATRE in the INDIA HABITAT CENTRE, Lodi Road, New Delhi.



Bring friends and do pass the word and share this email with everyone and on all the mailer lists you know.

Hope to see you this Sunday and then on 16th Dec on the streets of Delhi!


Contact:
Swara Bhaskar: 0091-9987-307-361
Pritpal Randhawa: 9868304626

In Solidarity
Manish Shrivastava
Gen. Secy. IPTA Delhi State

Saturday, December 7, 2013

मंडेला : अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आवाज

-लाल्टू

अमांडला अंवेतू!’ - सत्ता किसकी, जनता की! यह नारा अस्सी और नब्बे के दशकों में दुनिया के सभी देशों में उठाया जाता था। हमारे अपने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसा ही यह नारा अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आवाज थी।

जब नेलसन मंडेला 1 मई 1990 को जेल से छूटे, बाद के सालों में जब वे कई देशों के दौरे पर आए, हर जगह यह नारा गूंजता। कोलकाता में आए तो सिर्फ ईडेन गार्डेन में भूपेन हजारिका के साथ ही नहीं, सड़कों पर आकर लोगों ने ‘मंडेला, मंडेला’ की गूंज के साथ यह नारा उठाया। और यह शख्स जिसने सारी दुनिया को अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ उठ खड़े होने को प्रेरित किया, 27 साल तक अमानवीय परिस्थितियों में दुनिया की सबसे खतरनाक जेलों में से एक रॉबेन आइलैंड में सड़ रहा था। उसी जेल में रहे दक्षिण अफ्रीकी कवि डीनस ब्रूटस ने कमीज उतार कर दिखलाया था कि कैसे सामान्य नियमों के उल्लंघन मात्र से उनको गोली मारी गई थी, जो सीने के आर-पार हो गई थी।

नेलसन रोलीलाला मंडेला बीसवीं सदी का अकेला ऐसा व्यक्ति था, जिसने अपने जीवन काल में समूची धरती पर अन्याय के खिलाफ लोगों को, खास कर युवाओं को सड़कों पर उतर आने को प्रेरित किया था। गांधी जी ने 1894 में दक्षिण अफ्रीका के भारतीय व्यापारियों को संगठित कर नेटाल इंडियन कांग्रेस बनाई। इसी से प्रेरित होकर सभी अश्वेतों के अधिकारों की रक्षा के लिए अफ्रीकन नेटिव नेशनल कांग्रेस 1912 में बनी, जो बाद में अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) बन गई। सदी के आखिरी दशकों तक मंडेला और एएनसी एक दूसरे के पर्याय बन गए। इसके पीछे 1962 में आजीवन कारावास में जाने से पहले दो दशकों तक उनका जमीनी काम था।

1944 में एएनसी में शामिल होने के बाद वकालती करते हुए अपने साथी वकील आॅलिवर तांबो के साथ मिलकर वे बरतानवी उपनिवेशवाद से ताजा आजाद हुए अपने मुल्क में नस्लवादी व्यवस्थाओं के खिलाफ जनांदोलनों में पार्टी के झंडे तले जी-जान से काम करते रहे। वे युवाओं के लिए पार्टी की शाखा उमखोंतो वे सिजवे (राष्ट्र की बरछी) के प्रमुख संस्थापकों में थे। 1948 में जब नस्लभेदी व्यवस्था ‘अपार्थीड’ औपचारिक रूप से देश की शासन-व्यवस्था बन गई और अलग-अलग नस्ल के लोगों के लिए भिन्न कानून बना दिए गए , एएनसी और दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी ने मिलकर जोरों से विरोध शुरू किया। जल्द ही मंडेला और साथी पकड़े गए और उन पर देशद्रोह का मामला चला। चार सालों के बाद निकले, पर तभी कुछ समय बाद ही शार्पविले में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की गई और 69 लोग मारे गए। इसके बाद मंडेला के नेतृत्व में एएनसी ने ‘अपार्थीड’ के खिलाफ युद्ध की घोषणा की। मंडेला जल्द ही पकड़े गए और पहले मौत की सजा की संभावना होने के बावजूद आखिरकार उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली। एएनसी को विश्व स्तर पर सभी लोकतांत्रिक ताकतों से समर्थन मिलता था। गुट निरपेक्ष आंदोलन की सदस्यता उन्हें मिली थी। भारत जैसे कई देशों ने अपने नागरिकों को उस जघन्य देश दक्षिण अफ्रीका में जाने से रोक लगा दी थी जहां वे अपनी पहचान के साथ नहीं, बल्कि ‘आॅनररी वाइट’ बनकर ही जा सकते थे। वहां 11 नस्लें परिभाषित थीं।

सत्तर के दशक में एएनसी ने दक्षिण अफ्रीका की सरकार को कमजोर बनाने के लिए सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से आग्रह किया कि वे उस देश पर आर्थिक प्रतिबंध (एंबार्गो) लगाएं। हर साल भारत और अन्य देश संयुक्त राष्ट्र संघ में आर्थिक नाकेबंदी का प्रस्ताव लाते और सोवियत रूस के समर्थन के बावजूद सुरक्षा परिषद में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश वीटो का इस्तेमाल कर इसे रद्द कर देते। इन मुल्कों की सरकारों पर उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबाव था, जो दक्षिण अफ्रीका के साथ व्यापार कर करोड़ों कमा रहे थे। पर धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता गया और खास कर अमेरिका के अफ्रीकी मूल के नागरिकों और दूसरे प्रगतिशील लोगों के पुरजोर विरोध के सामने उनकी न चली। विश्वविद्यालयों में छात्रों ने, शहरों की पौर-सभाओं में कर्मचारियों ने लगातार विरोध करना शुरू किया और अंतत: पश्चिमी सरकारों ने दक्षिण अफ्रीका में व्यवस्था परिवर्तन के लिए दबाव डालना शुरू किया। एक मई 1990 में मंडेला जेल से छूटे। 1994 में दक्षिण अफ्रीका में पहली सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करती लोकतांत्रिकसरकार बनी। 1999 तक सरकार में राष्ट्रपति के पद पर रहकर मंडेला ने राजनीति से संन्यास ले लिया। इसके बाद से उन्होंने अपना पूरा वक्त विश्व-शांति के लिए लगा दिया। साल भर वे गुट निरपेक्ष आंदोलन के मुख्य सचिव भी रहे।

आखिरी वर्षों में मंडेला का दुनिया को सबसे अनोखा उपहार नोबेल शांति विजेता रेवरेंड डेसमंड टूटू के साथ मिलकर सोचा गया ‘ट्रुथ ऐंड रीकंसीलिएशन कमीशन (सत्य और समझौता समति)’ है। पुरानी बीमार मानसिकता वाली नस्लवादी व्यवस्था के अधिकारियों को सजा न देकर उनको अपना अपराध मान लेने को कहा गया। पुलिस की गोली खाकर मरे बच्चों की मांओं के साथ उन पुलिस अधिकारियों को बैठाया गया जिन्होंने गोलीबारी के आदेश दिए थे। दोषियों ने सच्चे दिल से अपना अपराध कबूल किया और पीड़ितों को राहत दी गई। मानवता का ऐसा आदर्श संसार के इतिहास में पहली बार देखा गया। मानव अधिकारों के हनन से जूझने का यह तरीका दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुए न्यूरेंबर्ग पेशियों की तुलना में अधिक सफल माना गया और कई देशों में ऐसे ही प्रयास होने लगे। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गरीबी दूर करने और एड्स के बारे में जागरूकता फैलाने और उसके उपचार के लिए व्यापक कोशिशों को बढ़ावा देने के लिए मंडेला ने काफी काम किया।

उन्हें कम्युनिस्ट कहकर खारिज करने वालों की कमी नहीं रही, पर अपनी ईमानदारी और निष्ठा के बल पर उन्हें एक के बाद एक कोई 250 अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले, जिनमें 1993 का नोबेल शांति पुरस्कार भी शामिल है। निजी तौर पर वे बड़े विनोदी स्वभाव के व्यक्ति थे। ब्रिटेन की महारानी को न केवल उनके नाम ‘एलिजाबेथ’ से पुकारने वाले वे अकेली शख्सियत थे, उन्होंने मजाक में यहां तक कहा कि ‘एलिजाबेथ, लगता है आप कमजोर हो गई हैं’ - आखिर इसी रानी के साथ काम करने वाली ‘लोकतांत्रिक’ सरकार ने कभी कई दशकों तक नस्लवादी अपार्थीड सरकार को बचाए करने में भूमिका निभाई थी। कहीं और उन्होंने कहा कि मौत के बाद भी वे जहां भी जाएं , एएनसी का दफ्तर ढूंढ़ेंगे।

ऐसे महान शख्सियत को अलविदा कहते हुए हम कभी न भूलें कि अभी हमें ‘अमांडला अंवेतू!’ कहते रहना है। अपनी जमीन पर खड़े जहां भी धरती पर बराबरी के संघर्षों में हम शामिल हैं, उनकी याद हमारे साथ होगी।

साभार : जनसत्ता

Tuesday, December 3, 2013

इप्टा जामिया ने नाटक से किया वोटर्स को जागरूक

02 दिसंबर 2013।  “भारतीय जन नाट्य संघ, इप्टा जामिया ने मतदाताओं को जागरूक करने के लिए एक नुक्कड़ नाटक जागो वोटर जागो के नाम से किया | बटला हाउस, ओखला गाँव, मदनपुर खादर और जैतपुर जो ओखला विधानसभा क्षेत्र में आते हैं, वहां नाटक के द्वारा लोगों को शरीफ़ और ईमानदार प्रत्याशी को वोट देने की अपील की गई |

नुक्कड़ नाटक में दिखाया गया की किस तरह एक व्यक्ति के वोट न देने से गलत और भ्रष्ट नेता जीत जाते हैं और इसके साथ नाटक में दिखाया गया की इस बार वोट डालने की मशीन यानि EVM पर प्रत्याशी के नामों की फ़हरिस्त के आखिर में एक मुताबादिल इनमे सो कोई नहींऔर दूसरी तरफ़ इनतेखाबी निशान की फ़हरिस्त में सबसे नीचे अंग्रेजी में “NOTA” लिखा होगा | अगर आप
चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी में से किसी भी प्रत्याशी को अपने वोट के लायक नहीं समझते हैं तो EVM पर “NOTA” के सामने वाले बटन को दबाकर अपनी राय का इज़हार कर सकते हैं |
 विधानसभा क्षेत्र के लोगों ने भी आगे बढ़कर नुक्कड़ नाटक में अपना सहयोग किया नाटक में मुकेश मकवाना (इप्टा जामिया के सचिव), मोहम्मद वसीम (इप्टा दिल्ली के सचिव), मोहम्मद फैज़ानतौसीफ-उल-हक़, सालिम रज़ा, वारिस अहमद, फुरकान अली, ज़ीशान अहमद, सादान अली खान, ताशा जैसवाल, कमल बत्रा आदी मोजूद रहे |