Monday, January 23, 2017

दस्तक पटना का नाट्योत्सव 'रंग दस्तक 2017' 24 जनवरी से

पटना। नाट्य दल 'दस्तक' द्वारा तीन दिवसीय नाट्योत्सव  "रंग-दस्तक -2017" का आयोजन 24 जनवरी से किया जा रहा है। इस उत्सव में दस्तक के तीन नाटकों का मंचन किया जाएगा। धूमिल की लंबी कविता पटकथा का मंचन प्रेमचंद रंगशाला, पटना में 24 जनवरी 2017 को संध्या 6:30 बजे होगा।  भूख और किराएदार नामक नाटकों  का मंचन क्रमशः 25 व 26 जनवरी 2017 को कालिदास रंगालय, पटना में संध्या 6:30 बजे से किया जाएगा।

पटकथा हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित लंबी कविताओं में से एक है जो भारतीय आम अवाम के सपने, देश की आज़ादी और आज़ादी के सपनों और उसके बिखराव की पड़ताल करती है। देश की आज़ादी से आम आवाम ने भी कुछ सपने पाल रखे थे किन्तु सच्चाई यह है उनके सपने पुरे से ज़्यादा अधूरे रह गए। अब हालत यह है कि अपनी ही चुनी सरकार कभी क्षेत्रीय हित, साम्प्रदायिकता, तो कभी धर्म, भाषा, सुरक्षा, तो कभी लुभावने जुमलों के नाम पर लोगों और उनके सपनों का दोहन कर रही है। इस कविता के माध्यम से धूमिल व्यवस्था के इसी शोषण चक्र को क्रूरतापूर्वक उजागर किया है और लोगो को नया सोचने, समझने तथा विचारयुक्त होकर सामाजिक विसंगतियो को दूर करने की प्रेरणा भी देते हैं। कहा जा सकता है कि पटकथा प्रजातंत्र के नाम पर खुली भिन्न – भिन्न प्रकार के बेवफाई की बेरहम दुकानों से मोहभंग और कुछ नया रचने के आह्वान की कविता है। यह कविता बेरहमी, बेदर्दी और बेबाकी से कई धाराओं और विचारधाराओं और उसके नाम के माला जाप करने वालों के चेहरे से नकाब हटाने का काम करती है; वहीं आम आदमी की अज्ञानता-युक्त शराफत और लाचारी भरी कायरता पर भी क्रूरता पूर्वक सवाल करती है।

किरायेदार  फ़्योदोर दोस्तोव्येसकी की लंबी कहानी "रजत रातें" से प्रभावित नाटक है जो एक लड़का, एक लड़की और एक आदमी के माध्यम से प्रेम की संवेदनाओं सम्बन्धों की पड़ताल दुनियावी मान्यताओं से परे जाकर करता है। यहाँ प्रेम पाने, खोने, यथार्थवादी, आध्यात्मवादी मान्यताओं के परे जाकर एहसासों की बात करता है। यहाँ प्रेम एक मनःस्थिति है न कि खोना, पाना या हासिल करना।

नाटक भूख हाल ही की एक सच्ची घटना है जब एक महानगर में तीन बहनों ने अपने आपको घर के अंदर क़ैद कर लिया था और अपने आपको मजबूरन भूखों मरने के लिए छोड़ दिया था। इस क्रम में छोटी बहन की मौत हो गई और किसी प्रकार दो बहनों को ज़िंदा बचा लिया गया। इस पूरी घटना की पड़ताल करने पर कई पहलू निकलकर सामने आते हैं और हमें देश, समाज, सामाजिक - राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था समेत मानवता के क्रूरतम पक्ष से साक्षात्कार कराते हैं। एक ऐसे देश में जिसकी पहचान ही कृषि प्रधान देश के रूप में हो, वहां इंसानों का भूख से दम तोड़ देना एक भयानक घटना और क्रूरतम सच्चाई नहीं तो और क्या है?
सच्ची घटना पर आधारित इस नाटक का लेखन पुंज प्रकाश ने किया है। इस वृतचित्रात्मक नाटक में रेखा सिंह, अरुण कुमार, राहुल कुमार, सुजीत कुमार, मंज़र हुसैन, अमन कुमार, बादल कुमार आदि अभिनेता/अभिनेत्री काम कर रहे हैं।

नाट्य दल दस्तक के बारे में

रंगकर्मियों को सृजनात्मक, सकारात्मक माहौल एवं रंगप्रेमियों को सार्थक, सृजनात्मक, नवीन और उद्देश्यपूर्ण कलात्मक अनुभव प्रदान करने के उद्देश्य से “दस्तक” की स्थापना सन 2 दिसम्बर 2002 को पटना में हुई। दस्तक ने अब तक मेरे सपने वापस करो (संजय कुंदन की कहानी), गुजरात (गुजरात दंगे पर आधारित विभिन्न कवियों की कविताओं पर आधारित नाटक), करप्शन जिंदाबाद, हाय सपना रे (मेगुअल द सर्वानते के विश्वप्रसिद्ध उपन्यास Don Quixote पर आधारित नाटक), राम सजीवन की प्रेम कथा (उदय प्रकाश की कहानी), एक लड़की पांच दीवाने (हरिशंकर परसाई की कहानी), एक और दुर्घटना (दरियो फ़ो लिखित नाटक) आदि नाटकों का कुशलतापूर्वक मंचन किया है। दस्तक का उद्देश्य केवल नाटकों का मंचन करना ही नहीं बल्कि कलाकारों के शारीरिक, बौधिक व कलात्मक स्तर को परिष्कृत करना और नाट्यप्रेमियों के समक्ष समसामयिक, प्रायोगिक और सार्थक रचनाओं की नाट्य प्रस्तुति प्रस्तुत करना भी है।


शास्त्रीय संगीत का स्वभाव आपस की गुफ्तगू जैसा है

खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय से  मुहम्मद जाकिर हुसैन की खास बातचीत 

जाने-माने खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय 6-7 जनवरी 2017 को भिलाई-दुर्ग आए थे। महान गायक पं. कुमार गंधर्व के शिष्य होने के नाते उनकी अलग पहचान है। शास्त्रीय संगीत पर आधारित पृष्ठभूमि वाली कुछेक हिंदी-मराठी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी आवाज दी है। यहां दुर्ग के शासकीय डॉ. वामन वासुदेव पाटणकर कन्या स्नातकोत्तर कॉलेज में शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक संगोष्ठी में हिस्सा लेने आए पं. देशपांडेय से मेरी लंबी बातचीत हुई। पं. देशपांडेय को प्रख्यात पेंटर सैयद हैदर रजा के नाम पर स्थापित रजा सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। संयोग से बातचीत के दौरान इसी कॉलेज में प्रोफेसर और रजा अवार्ड प्राप्त प्रख्यात चित्रकार योगेंद्र त्रिपाठी भी मौजूद थे। बातचीत के दौरान पं. देशपांडेय ने शास्त्रीय संगीत के शिक्षण-प्रशिक्षण से लेकर रियालिटी शो और फिल्मों तक ढेर सारे सवालों के जवाब बड़े धीरज के साथ दिया। धाराप्रवाह बातचीत के दौरान उन्होंने शास्त्रीय संगीत और उसके व्याकरण पर भी बहुत कुछ कहा। इसलिए इंटरव्यू बनाने के  दौरान मैनें अपने शहर के वरिष्ठ संगीतज्ञ प्रख्यात वायलिन वादक पं. कीर्ति माधव व्यास से भी कुछ जरूरी सलाह ली। जिससे कि तथ्यात्मक गलती न जाए। इसके बाद तैयार हुआ यह पूरा इंटरव्यू-

0 शास्त्रीय संगीत की शिक्षण पद्धति कैसी होनी चाहिए,खास कर बच्चों के लिए ? 
00 आज बच्चों को शास्त्रीय संगीत के नाम पर व्याकरण ज्यादा बताया जाता है। ऐसे में हमारे बच्चे शास्त्रीय संगीत को सरलता से कैसे आत्मसात कर पाएंगे? मैं बच्चों को बताऊं कि भूप में मध्यम और निषाद वज्र्य है और तीन ताल की मात्राएं 16 हैं तो बच्चे बोर हो जाएंगे। अगर मैं राग भूप के तराने से ही शुरूआत करूं तो बेहतर होगा। दरअसल आज लोगों के पास आधे-पौन घंटे की बंदिश सुनने का भी धीरज नहीं है। इसलिए मैनें फाइव मिनिट्स क्लासिकल म्यूजिक (एफएमसीएम) का कंसेप्ट दिया हैै। 

0 तराना ही क्यों..? 
इंटरव्यू के दौरान पं. देशपांडेय और योगेंद्र त्रिपाठी के साथ 
00 मेरा मानना है कि आपकी मातृभाषा अलग-अलग हो तो भी आप तराना गा सकते हैं। मैनें पांच मिनट में शास्त्रीय संगीत (एफएमसीएम) की जो अवधारणा दी उसमें  एक-एक राग का एक-एक तराना स्कूली बच्चों को बताया जाता है। महाराष्ट्र के स्कूलों में यह प्रयोग चल रहा है। इसके लिए करीब 20 तराने मैनें गाए हैं और 30 अन्य कलाकारों से गवाए हैं। मैनें स्पिक मैके के प्रोग्राम में एक लोकप्रिय गीत 'कजरारे-कजरारे' लिया और उसे 8 मात्रा के एक चक्र के बजाए 8-8 मात्रा के दो चक्र (16 मात्रा) में गा कर बताया। इससे बच्चे भी खुश हो गए और उनकी हमारे संगीत की विविधता भी समझ में आ गई। बात सिर्फ 'कजरारे-कजरारे' की नहीं है,आप आज का कोई भी लोकप्रिय गाना लेकर आइए मैं उसे एक ताल या तीन ताल में बनाके बच्चों को बताउंगा तो उसमें बच्चे एन्ज्वाए करेंगे और संगीत को भी समझेंगे। 

0 बच्चों का शिक्षण तो ठीक है लेकिन आम जनमानस तक शास्त्रीय संगीत को पहुंचाने कलाकार का दायित्व कितना है? 
00 देखिए,हमारे शास्त्रीय संगीत में असीमित संभावनाएं हैं और वो किसी भी सच्चे कलाकार को हमेशा प्रेरित करती है। इससे कलाकार तो आनंदित होता ही है लेकिन ज्यादा से ज्यादा श्रोताओं तक पहुंचने का काम प्रतिभाशाली कलाकार कर नहीं पाते हैं। क्योंकि वो तो अपने परफ ार्मेंस और रियाज में व्यस्त रहते हैं। इसलिए सबसे बड़ी जवाबदारी अकादमिक क्षेत्र के लोगों की है। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जो लोग संगीत के शिक्षण से जुड़े हैं और आज की पीढ़ी के सीधे संपर्क में हैं, यह उनका दायित्व है कि हमारे शास्त्रीय संगीत के प्रति युवा पीढ़ी में समझ पैदा करे और ज्यादा से ज्यादा लोगों को संगीत से जोड़ें। 

0 आजादी से पहले और बाद के दौर में शास्त्रीय संगीत और कलाकारों को लेकर क्या बदलाव देखते हैं? 
आजादी से पहले संपर्क माध्यम उतने नहीं थे। ऐसे में समाज से शास्त्रीय संगीतकारों की अपेक्षाएं सिर्फ यही थी कि उसकी साधना में कोई बाधा न आए। तब कलाकार को लोकप्रिय होने की जरुरत नहीं थी। तब कलाकारों-पहलवानों को राजा-महाराजा का संरक्षण मिलता था। इसलिए जनता को खुश करने की तब नौबत नहीं आई थी। लेकिन स्वातंंत्र्य के बाद जब राजा-महाराजा का दौर खत्म हुआ तो भरण-पोषण के लिए कलाकारों का पाला जनता जनार्दन से पड़ा। ऐसे में कलाकारों ने नई तरकीबें ढूंढ निकाली। जैसे अतिगद्रुत तराने गाना या झाला बजाना। 

0 ...तो क्या शास्त्रीय संगीत आम जनता के लिए नहीं है? 
00 मेरा मानना है कि हमारे शास्त्रीय संगीत का स्वभाव आपस की गुफ्तगू जैसा है। मसलन एक कमरे में 10-20 लोग बैठे हैं और कलाकार गा या बजा रहा है तो वहां राग की बारीकियां उभर कर आएगी। अब वही कलाकार हजारों लोगों के बीच परफार्म करे तो पता नहीं कितने लोग इन बारीकियों को पकड़ पाएंगे। हमारा संगीत जनता को खुश करने के लिए नहीं है बल्कि यह बहुत हद तक स्वांत: सुखाय जैसा है। मैनें अपने जीवन में अपने गुरु पं. कुमार गंधर्व के अलावा पं. रविशंकर और पं. भीमसेन जोशी जैसे कलाकारों को सुना है तो उनका सर्वोत्तम मुझे घरेलू महफिलों में ही मिला है। 

0 तो शास्त्रीय संगीत फिर जनता विमुख हुआ ना?
00 देखिए, आम जनता को तो द्रुत गति का संगीत ज्यादा आकर्षित करेगा। हमारा शास्त्रीय संगीत एक अलग तबीयत का है वो बहुत ही नाजुक है और मौन की तरफ ले जाता है। आबादी बढ़ी है तो जनता को आकर्षित करने की तरकीबें भी निकाली गई हैं। जरूरी नहीं कि उससे सच्चा कलाकार भी खुश हो। मान लो मेरी महफिल हो रही है तो उसमें मैं एक हजार लोगों को खुश करूं, उससे बेहतर होगा कि मैं समझ रखने वाले 5 लोगों के लिए अपना संगीत पेश करुं। मैं ग्रेट ब्रिटेन कई बार गया हूं। वहां शेक्सपियर को पढऩे वाले लोग वहां की आबादी के हिसाब से 1-2 प्रतिशत ही होंगे। हमारी शास्त्रीय कलाएं हमेशा सीमित लोगों तक रही हैं और इसमें वो लोग खुश थे। जनता अभिमुख कला का होना ये तो आजादी के बाद आया है और ये कोई उत्कृष्टता की कसौटी नहीं है। 

0 सुगम संगीत का अपना श्रोता वर्ग है और वो शास्त्रीय संगीत की अपेक्षा कहीं ज्यादा बड़ा है? 
00 वह तो होगा ही। सुगम संगीत और शास्त्रीय संगीत में फ र्क ये है कि सुगम संगीत पूर्व निश्चित है। जैसे 'आधा है चंद्रमा रात आधी' गाना किसी सिचुएशन से बना है। अब ये गाना आपको 2017 में भी अच्छा लगता है तो मैं ईष्र्या करुंगा कि क्या खुश आदमी है ये कि इसको उसी गाने से तृप्ति मिल जाती है। लेकिन जिसकी सांगीतिक आत्मा तड़पती है तो उसको शास्त्रीय संगीत तक आना पड़ता है। हमारे शास्त्रीय संगीत में दो वैश्विक रिदम छह मात्रा का दादरा और 8 मात्रा का कहरवा है। इसके दुगुने मात्रा के ताल हमारे ख्याल संगीत में बनें। ताल का पहला आधा और दूसरा आधा ये कंसेप्ट दुनिया के किसी भी संगीत में नहीं है मैं इस संगीत को श्रेष्ठ बताने का दावा नहीं कर रहा हूं,इसकी खासियत बता रहा हूं। 

0 शास्त्रीय संगीत में खास कर गायन में किन तत्वों का समावेश होता है और श्रोता वर्ग इनसे किस हद तक प्रभावित होता है? 
00 शास्त्रीय संगीत में एक कलाकार का स्वभाव, उसके संस्कार, उसकी तालीम और उसकी तत्काल स्वस्फूर्तता जैसे तत्वों से प्रस्तुति का रूप बनता है। इसलिए हमारे संगीत की ये परंपरा रही है कि उसी गायक के उसी राग को ताल में गाए जाने वाले उसी बंदिश को सुनने के लिए वही श्रोता इस उम्मीद पर बार-बार जाते हैं कि अब कुछ नया होगा। यह बात आप दूसरे संगीत में नहीं पा सकते। हमारे संगीत का वैभव और इसकी ऊंचाई है कि हर स्तर पर किसी भी उम्र में लोग बंदिशों का आनंद ले सकते हैं। शास्त्रीय संगीत में नवनिर्माण की खासियत है और जिसको इसका चस्का पड़ जाए तो यही आनंद उसके लिए बहुत है। इसके बाद दस हजार लोगों को संगीत अच्छा लगता है कि नहीं इससे उसे क्या वास्ता...?
अपने गुरू पं. कुमार गंधर्व के साथ संगत करते हुए
0 आपके गुुरू पं. कुमार गंधर्व इस बारे में क्या सोचते थे? उनकी शिक्षण पद्धति कैसी थी? 
00 पं. कुमार गंधर्व को करोड़ों लोगों ने सुना पर उन्होंने कभी जनता के लिए समझौता नहीं किया। कोई उनकी कोई नकल करे या उनका कोई घराना बने ये उनकी इच्छा कभी नहीं थी। वो कहते थे कि मेरा सौंदर्य विचार, मेरा सांगीतिक विचार है। जब वो सिखाने बैठते थे तो हम लोगों को कोई विशिष्ट राग के साथ उससे जुड़ी परंपरा और अन्य पहलू भी समझाते थे। उसके बाद कहते थे-मैनें आपको बता दिया, अब आप अपना रास्ता ढंूढो और इसलिए ही मैं उनके श्रेष्ठ गुरू मानता हूं। उनकी जगह कोई और होता तो रटवा लेता। लेकिन उनका भी शिक्षण ऐसा ही हुआ था। हमारे पंडित जी के गुरूजी पं. बीआर देवधर जी ने भी ऐसे ही गायकी का हर रंग बताने के बाद कहा था कि-अब आप अपना गाना बनाओ। गुरूजी पं. कुमार गंधर्व का कहना था कि जब आप गाने बैठते हैं तो अष्टांग का प्रदर्शन नहीं लगना चाहिए। वे मानते थे कि गाना अष्टांग के लिए नहीं बना है कि हमें आलाप,बोल आलाप और बोलतान सब कुछ मालूम है और हम सभी का प्रदर्शन कर दें। ऐसा जरूरी नहीं बल्कि जो बंदिश आप गा रहे हैं उसमें जो अनुकूल व प्रभावशाली है, वही प्रदर्शित करें। उनका मानना था कि गायिकी किसी भी अंग की अति न करो। 

0 ऐसे में आप पश्चिमी संगीत को किस पैमाने पर रखते हैं? 
00 पश्चिमी संगीत दरअसल पूर्व निश्चित होता है। महान संगीतकार जुबिन मेहता की सिंफ नी सुनिए,वहां आप हमेशा आउटसाइडर रहेंगे। वहां सवा सौ लोगों की टीम है। जिसमें 15 वायलिन, 10 फ्ल्यूट,16 ड्रम और 20 सैक्सोफोन सहित तमाम वाद्य हंै और इन सबके मिलने से बहुत ही सुंदर सिम्फ नी बनती है लेकिन यह सब तो पूर्व निश्चित है। वो लोग स्कोर बोर्ड में लिखा हुआ पढ़ कर स्कोर बजाते हैं। मैं उनके संगीत को छोटा नहीं बता रहा हूं लेकिन वहां तत्काल में अपना कुछ देने के लिए कलाकार के पास गुंजाइश नहीं होती। इसके विपरीत हमारे यहां तो सामने कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता। यहां तो कलाकार का मूड, उसकी तालीम,उसके संस्कार और उसकी तात्कालिक समझ ये सब मिल कर हमेशा एक नई सर्जना रचते हैं। हमारे संगीत में जो क्षमताएं हैं,वो चिरंतन है। इसलिए इसको ज्यादा लोकप्रिय होने की तमन्ना कभी नहीं रही। 

0 आपने महज तीन चुनिंदा फिल्मों में पाश्र्वगायन किया। इसकी क्या वजह थी? 
00 क्योंकि इन तीनों फि ल्मों में शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर आधारित ही प्रसंग था। फि र वो लोग मुझे जानते भी थे। इसलिए उन्होंने मुझे चुना तो मुझे हट के कुछ नहीं करना पड़ा। शशि कपूर की 'विजेता' फि ल्म में रेखा ''भीनी-भीनी भोर आई'' गीत में अपने उस्ताद से संगीत सीख रही है। वहीं फिल्म 'लेकिन' में हेमा मालिनी के मुजरे के दौरान ''झूठे नैना बोले सांची बतिया'' गीत में उस्ताद जी भी साथ दे रहे हैं। ये 'झूठे नैना' वाली बंदिश मेरी ही तैयार की हुई थी। इन दोनों गीतों में मैनें आशा भोंसले के साथ पाश्र्वगायन किया। वहीं 1996-97 में आई मराठी फि ल्म 'हे गीत जीवनाची' भी शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर बनी थी। जिसमें मैनें लता मंगेशकर के साथ पाश्र्वगायन किया। इसके बावजूद फिल्मों में गाना मेरे लिए कोई बहुत ''ग्रेट'' चीज नहीं है। 

0 शास्त्रीय संगीत के बहुत से कलाकार फि ल्मों से दूर रहना पसंद करते हैं, इसकी क्या वजह है? 
00 पहली बात तो अब ऐसी फि ल्में नहीं बनती जिसमें हमारे शास्त्रीय संगीत के लिए ठीक-ठाक भी गुंजाइश हो। फि र जिसे एक मुक्त इंप्रोवाइजेशन का चस्का लग जाए यानि कि आप एक रटा हुआ फ ार्मूला पेश नहीं कर रहे हैं और अपने संगीत को हर बार अलग-अलग ढंग से पेश कर रहे हैं तो आपको फिल्मों के ऐसे पूर्व निश्चित 3-4 मिनट के गाने में रूचि नहीं रहेगी। किशोरी अमोणकर को भी तो ऐसे मौके आए थे पर उनका मन नहीं लगा। मुझे भी नहीं लगता कि मैं किसी प्रोड्यूसर के पास जाउं या उनको बुलाऊं या उनसे संबंध रखूं, जिससे वो मुझे भी प्लेबैक दें। प्लेबैक से मुझे कोई फ र्क नहीं पड़ता। मैं अपनी बात नहीं कहता। हर शास्त्रीय संगीत के कलाकार को फिल्मों का आकर्षण होता ही नहीं है। 

0 लेकिन फिल्मी गायन को लेकर आप जैसे कलाकारों में इतनी तल्खियां क्यों है ?
00 हमारे यहां फिल्मों में आज कल जो चेहरे दिखते हैं उन पर तो भले आदमियों की आवाज सूट नहीं होगी। मैं नाम नहीं लूंगा लेकिन फि ल्मी संगीत में जो आज के दौर में हैं, ऐसे लोगों की जीवन शैली में ही संगीत नहीं है। आज विडम्बनाएं बहुत सी हैं। मेरे मित्र सुरेश वाडेकर कितना सुरीले गाने वाले हैं लेकिन आज उनको कोई काम नहीं है। ये अलग बात है कि सुरेश वाडेकर अपना विद्यालय चलाते हैं और संगीत शिक्षण में व्यस्त हैं। उनका आनंद इसी में है। 

0 टेलीविजन चैनलों पर संगीत के रियालिटी शो को आप किस नजरिए से देखते हैं? 
सैयद हैदर रजा के हाथों रजा सम्मान प्राप्त करते हुए
00 मेरी समझ में नहीं आता कि इन रियालिटी शो में बैठे ज्यादातर निर्णायकों को ऐसा क्यों लगता है कि गाना यानि किसी की हू ब हू नकल करना है। होना तो ये चाहिए कि अगर रफ ी साहब या लता जी का गाना है तो उसे आप प्रतियोगी के तौर पर कैसे गाते हैं। अब जो जज बैठे होते हैं वे भी कहते हैं कि लता जी की तरह उसने अच्छा गाया। ये तो नकल की बात हुई ना,आपकी अपनी बात कहां आई इसमें? ऐसा इसलिए है कि ये जो जज बनाए गए हैं, वे इन प्रतियोगियों से उम्र में ज्यादा और थोड़े बेहतर हैं। इसके अलावा क्या है इनके पास? जरूरी नहीं कि ये उन प्रतियोगी बच्चों से ज्यादा टैलेंटेड हों। 

0 लेकिन टेलीविजन चैनल भी तो श्रोताओं तक पहुंचने का माध्यम है? 
00 बिल्कुल है और मैं इन चैनलों की भूमिका से इनकार नहीं कर रहा हूं। मैं दरअसल रियालिटी शो की रियालिटी पर बात कर रहा था। वैसे मैं बताऊं अढ़ाई महीना पहले ठीक दीवाली के दिन जब लोग पटाखों और रोशनाई में वक्त बिताना चाहते हैं, तब 'जी मराठी' ने मेरे डेढ़ घंटे के दो सेशन टेलीकास्ट किए। इसके बाद मुझे हजारों लोगों की प्रतिक्रियाएं आई। सोशल मीडिया में बधाई मिली। तो मैं मानता हूं कि सैटेलाइट चैनल भी श्रोताओं तक पहुंचने का बड़ा माध्यम है। 

0 अपने अब तक के संगीत जीवन को किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे? कुल जमा हासिल और आगे की चाहत? 
00 महान संगीतकार पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने अपना गायन प्रदर्शन छोड़ कर शास्त्रीय संगीत के प्रचार कार्य के लिए खुद को समर्पित कर दिया था। लेकिन हमारी पीढ़ी के लोग ऐसा नहीं कर पाए। हम लोगों ने अपने तरीके से शास्त्रीय संगीत को पल्लवित करने में योगदान दिया। मैं संगीत पर कुछ लिख पाया हूं। खुद को अभिव्यक्त करने मैनें संगीत को माध्यम बनाया। मैं कुछ प्रमुख रागों की रचना कर पाया हूं, जिसे मेरे समकालीन और नई पीढ़ी के लोग गाते हैं। ये अच्छी बात है कि वे लोग मेरी नकल नहीं करते हंै। मेरा मानना है कि हमारी बंदिशों में वो गुण होना चाहिए कि आप उसे अपने तरीके से गा सकें। उम्र के इस पड़ाव में भी मैं वही राग फिर से गाऊं और उसमें मुझे कुछ नया दिखता है, तो मैं गाता रहूंगा और जिस दिन मुझे नई बात नहीं दिखेगी तो नहीं तो गाना बंद कर दूंगा। 

संपर्क:
09425558442

Tuesday, December 27, 2016

‘हमारे समय में’ का मंचन 28 दिसम्बर को

इप्टा रायगढ़ के तेइसवें नाट्य समारोह के चौथे दिन बहरूप आर्ट ग्रुप दिल्ली द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘हमारे समय में’ का मंचन किया जाएगा। इस नाटक के लेखक हैं शाहिद अनवर और निर्देशक हैं के. एस. राजेन्द्रन।

‘हमारे समय में’ एक आधुनिक त्रासदी है। ‘हमारा समय’ आज बहुदलीय मिलीजुली राजनीति की अनिश्चितताओं, वैचारिक खोखलापन, सैटेलाइट चैनल्स जो आज खबरों का उत्पादन कर रहे हैं उदारीकरण/बाज़ारकेन्द्रित अर्थव्यवस्था और करोड़ो डॉलर के आध्यात्मिक उद्योगों का साक्षी है। इस राजनैतिक पृष्ठभूमि पर एक युवा उग्र मार्क्सवादी के अस्तित्ववादी असमंजस को नाटक में चित्रित किया गया है। इसतरह का नाटक अपने अभिनेताओं से विचारों की तीव्रता एवं स्पष्टता की अपेक्षा रखता है। यह नाटक आज के एकरेखीय विश्व के पतन को रेखांकित करता है। इसतरह के विश्व में वैकल्पिक अस्तित्व के लिए सभी संभावनापूर्ण दृष्टियाँ खो जाती हैं। जब प्रतिरोध की परम्परा छीजती जा रही हैं, ऐसे समय में सपनों और आशाओं को किसतरह बचाकर रखने की कोशिश की जाती है।

उल्लेखनीय है कि बहरूप आर्ट ग्रुप प्रसिद्ध लेखक शाहिद अनवर की ही नाट्य संस्था है। इप्टा रायगढ़ के लोकप्रिय नाटक ‘बी थ्री’ के लेखक शाहिद अनवर ही हैं। शाहिद अनवर के दुखद निधन के बाद 17 से 20 नवम्बर 2016 को उनकी स्मृति में दिल्ली में बहरूप आर्ट ग्रुप द्वारा उनके लिख हुए चार नाटकों का समारोह आयोजित किया था, जिसमें इप्टा रायगढ़ ने भी ‘बी थ्री’ का मंचन किया था।

नाटक पॉलिटेक्निक ऑडिटोरियम में शाम सात बजे से आरम्भ होगा। प्रवेश निःशुल्क है।



चर्च पंसद हैं मुझे

-राजकुमार सोनी 

यह तब लिखा था जब बंसत तिमोथी जिंदा थे। बंसत तिमोथी कौन है क्या है इसका जिक्र आगे करूंगा।
फिलहाल यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि मुझे चर्च पंसद है। बहुत ज्यादा पंसद है। देवदार और पलाश के बड़े-बड़े पेड़ों की वजह से चर्च मुझे हमेशा से आकर्षित करते रहे हैं।


चर्चों के प्रति मेरे आकर्षण की एक वजह यह भी रही है कि भिलाई सेक्टर छह की एक चर्च में मेरा दोस्त अलीवर जैकब हर संडे कांगो बजाने जाया करता था। अलीवर की वजह से मैं यह जान पाया था कि कैसे आरडी बर्मन बिस्किट के खाली डिब्बे, खाली बोतलें और कंघी के उपयोग से संगीत पैदा कर दिया करते थे। अपने पिता के रिकार्ड प्लेयर से गाना सुन-सुनकर मैं थोड़ा बहुत गाने लगा था। संगीत में आरडी का प्रभाव पैदा करने के लिए मैने और अलीवर ने स्कूल की लगभग हर टेबल और कुर्सी को ठोंक-बजाकर कांगों में तब्दील कर दिया था। हम दोनों ऐसी टेबल पर बैठते थे जिसमें बूम-बूम-धूम-धूम की आवाज निकलती थी। जैसे ही आधी छुट्टी होती मैं और अलीवर चालू हो जाते थे। मुझे अलीवर की दोस्ती इसलिए भी पंसद थीं क्योंकि पूरे स्कूल में वहीं एक था जो हर रोज बोरोलीन लगाकर आता था और मैं बोरोलीन की खूशबू के पीछे पागल था। अलीवर अपने टिफिन बाक्स में मेरे लिए कुछ न कुछ तो लाता ही था। कई बार कागज में छिपाकर बोरोलीन भी ले आता था।

चर्च के प्रति एक आकर्षण की दूसरी वजह हिंदी फिल्म देवता भी थीं। संजीव कुमार, शबाना आजमी और डैनी के अभिनय से सजी इस फिल्म का एक गीत- चांद चुराके लाया हूं... मुझे बेहद पंसद था। अब भी है। मुझे लगता था शबाना से मिलने-जुलने का संजीव कुमार ने बढिय़ा ठिकाना खोजा है। बाग-बगीचों में प्रेम की बात करने वाले नौजवान लड़के-लडकियों को डरा-धमकाकर पैसे वसूलने वाली पुलिस चर्च के पीछे तो जा ही नहीं सकती क्योंकि सामने ईशु खड़े होंगे जो उन्हें रोक लेंगे।

एक रोज मैंने अलीवर से कहा कि चर्च देखना है। हमने एक योजना बनाई। हम स्कूल जाने के लिए साथ निकले लेकिन स्कूल न जाकर विजय और बंसत टाकीज में फिल्मों के पोस्टर देखने चले गए। हमारी योजना थीं कि हम फिल्मों के पोस्टरों को देखने के बाद चर्च आएंगे और फिर घर जाकर कह देंगे स्कूल से आ गए।

हम चर्च पहुंचे। चर्च में प्रवेश करते ही मैं ठीक वैसे ही चिल्लाने लगा जैसे फिल्म मधुमति में दिलीप कुमार- सुहाना सफर ये मौसम हंसी... गाने के पहले हे.. हो.. हो करके चिल्लाता है। मैं चिल्लाता रहा और आवाज टकराकर मुझ तक पहुंचती रही, लेकिन थोड़े ही देर में मेरी यह खुशी काफूर हो गई। फिल्म अमर-अकबर-अंथोनी में अभिताभ बच्चन को समझाने वाला एक फादर जैसा फादर हमारे सामने खड़ा था। फादर ने हमें समझाया कि जब कोई प्रार्थना में लीन हो तो उसे डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए।

मैं और अलीवर उस जगह पहुंच गए, जहां बड़ी सी मोमबत्ती जल रही थी। वहां गहरे कत्थे रंग का स्कार्फ पहने हुए एक बूढ़ी औरत और हल्का गुलाबी फ्राक पहनी हुई एक खूबसूरत लड़की प्रार्थना कर रही थी। अलीवर और मैं उस बूढ़ी औरत के बगल में घुटनों के बल बैठ गए। अलीवर ने तो प्रार्थना की मुद्रा अख्तियार कर ली, लेकिन मैं यह सोचकर हाथ नहीं जोड़ पा रहा था कि घर में पता चलेगा तो क्या होगा? मां ने हर फोटो के सामने अगरबत्ती घुमाना सिखाया था तो मन मोमबत्ती देखकर थोड़ा हिचक रहा था। इसी हिचक के चलते मैं कभी सुलभा देशपांडे के समान दिखने वाली बूढ़ी औरत को देखता रहा तो कभी निरमा वाशिंग पाउडर के चित्र जैसी नजर आने वाली लड़की को। लड़की कुछ बुदबुदा रही थी। मैंने अलीवर से पूछा- लड़की क्या बोल रही है। उसने बताया- ईशु से कुछ मांग रही है। मैंने चर्च में अपने देवी-देवताओं का आह्वावान किया। जितने भगवानों को अगरबत्ती लगाने के दौरान जानता था उन सबसे मैंने कहा- बुढिय़ा और ये लड़की ईशु से जो कुछ मांग रहे हैं तुम उन्हें दे देना।

इसके बाद जब कभी भी मुझे अवसर मिलता मैं चर्च जरूर जाता रहा। यहीं पर मैंने कांगो-बांगो, मरकस, एकार्डियन, सेक्सोफोन और वायलिन के साथ समूह में 'प्रभु ईशु आया मेरा जीवन बदला.. यहां पाप नहीं यहां पुण्य नहीं जैसा गीत सुना था। एक रोज मुझे - जो क्रूस पे कुरबां है वह मेरा मसीहा है, हर जख्म जो उसका है वह मेरे गुनाहों का है। इस गीत ने परेशान कर दिया। काफी दिनों तक मैं यह सोचता रहा कि क्या ईशु सचमुच हमारे गुनाहों की वजह से क्रूस पर चढ़े थे? काफी खोजबीन के बाद यह पता चला कि गीत की धुन को छत्तीसगढ़ के बंसत तिमोथी नामक शख्स ने तैयार किया था। तिमोथी जी जबरदस्त वायलिन बजाते थे। छत्तीसगढ़ में आने से पहले तिमोथी जी जबलपुर की प्रसिद्ध मसीही संस्था स्वर संगम प्रभात में काम किया करते थे। यह संस्था रेडियो सीलोन के लिए कार्यक्रम बनाया करती थी। देश- दुनिया के चर्चों में आज भी तिमोथी जी के संगीतबद्ध किए गए गीत बज रहे हैं।

दोस्तों चर्च जाता हूं तो बहुत कुछ याद आता है। बचपन याद आता है। अलीवर जो अब इस दुनिया में नहीं है.. वह याद आता है। तिमोथी जी भी नहीं है लेकिन वंदना करते हैं हम... रेडियों सीलोन में सुबह-सुबह बजने वाली प्रार्थना याद आती है। हर साल २५ दिसम्बर को चर्च जरूर जाता हूं। पिछले साल अपने एक अजीज दोस्त के साथ रायपुर से बाहर जंगल में था तब हमने एक कैंडल जलाकर ईशु को याद किया था। चर्च में मोमबत्ती लगाते हुए लोग मुझे अच्छे लगते हैं। वहां दिखने वाले बच्चों को देखकर लगता है देश- दुनिया में बहुत सी चीजें खराब है, लेकिन उम्मीद अब भी खूबसूरत ही है और वह बच्चों के रुप में हमारे आसपास मौजूद हैं। चर्च जाकर मैं बचपन में लौट जाता हूं। एक अजीज दोस्त का कहना है कि मैं अब भी बच्चा हूं। दोस्त को क्या मालूम कि मैं अपने भीतर के बच्चे को बचाकर रखने के लिए भी हर रोज जानबूझकर चर्च के सामने से गुजरता हूं


Saturday, October 8, 2016

इप्टा पर फ़ासिस्ट हमला, अधिनायकवादी प्रवृति, गुंडागर्दी है: अरुण कमल

"आज देश में इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है कि जैसे हम सोच रहे हैं, जैसे हम खा रहे हैं, पी रहे हैं वैसे ही आप सोचें। ये अधिनायकवादी प्रवृति है, गुंडागर्दी है। जिस मध्य प्रदेश के इंदौर में इप्टा के राष्ट्रीय सम्मलेन पर फ़ासिस्ट हमला हुआ, उसी मध्यप्रदेश में हरिशंकर परसाई को भी पीटा गया था। यह हमारे लिए चुनौती है कि हमें वर्गसंघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए। RSS इस देश का सबसे ख़तरनाक फ़ासीवादी गिरोह है और यह देश की सरकार को नियंत्रित करने का काम कर रहा है."

ये बातें सुप्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने इंदौर में हुए भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन पर हुए फासीवादी हमले के खिलाफ  कालिदास रंगालय में आयोजित प्रतिरोध सभा में बोलते हुए कहा।

प्रख्यात कवि आलोक धन्वा ने अपने सम्बोधन में कहा "जब हमने दूसरे विश्वयुद्ध में फासीवादी ताकतों को लड़कर पराजित किया तो अब भी क्यों नहीं लड़ सकते। इंदौर में इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन पर हमला करने वाले आर.एस.एस और उसके अनुषांगिक संगठनो की  आजादी के आंदोलन में कोई भूमिका नहीं थी, इससे जुड़े लोगों ने महात्मा गांधी की उस समय हत्या की जब वे प्रार्थना करने जा रहे थे।ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है ऐसे लोग हमारी साझी विरासत पर हमला करने जा रहे हैं।"
चर्चित डाक्टर डा सत्यजीत  ने कहा "आर.एस. इस बजरंग दल जैसे  धर्म व् देश विरोधी लोग आज देशभक्ति की बात कर रहे हैं।जिनका देश की साझी सांस्कृतिक विरासत और परम्परा का न तो कोई ज्ञान है और ना ही सदियों पुरानी इस विशिष्ट पहचान पर कोई आस्था।"

कार्यक्रम की शुरुआत में इंदौर के राष्ट्रीय अधिवेशन में शामिल प्रतिनिधियों की ऒर से तनवीर अख्तर ने पूरे घटना का विस्तार से ब्यौरा देते हुए बताया कि "सबके लिए एक सुन्दर दुनिया के संकल्प के साथ भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) का 14वां राष्ट्रीय सम्मेलन 02 अक्टूबर, 2016 से 04 अक्टूबर, 2016 तक इंदौर में आयोजित किया गया था, जिसमें देश के 22 राज्यों से 800 से अधिक प्रतिनिधि/कलाकारों ने भाग लिया। राष्ट्रीय सम्मेलन के अंतिम दिन 04 अक्टूबर, 2016 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर. एस. एस.) समर्थित भारत स्वाभिमान संगठन के कार्यकर्ताओं ने आनंद मोहन माथुर सभागृह (ए. के. हंगल रंग परिसर) में चल रहे संगठन-सत्र पर हमला कर सम्मेलन को बाधित करने का प्रयास किया। सभागृह में उपस्थित इप्टाकर्मियों के सशक्त प्रतिरोध की वजह से फ़ासिस्ट ताक़तों को वहां से भागना पड़ा।"

इस अवसर पर पूरे घटना की वीडियो क्लिपिंग भी दिखाई गयी।

वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अनिल अंशुमन ने अपने  संबोधन में कहा " आज पुरे देश में लिखने पढ़ने वालों पर हमला काफी बढ़ गया है।हमे इसके विरुद्ध एकजुटता की आवश्यकता  है।" 

चर्चित साहित्यकार तैय्यब हुसैन पीड़ित ने कहा "आज देश में साम्प्रदायिक ताकतें हिटलर और मुसोलिनी की विचारधारा से प्रेरणा ले रहे हैं. इसलिए ज़रूरी हो गया है कि नाटक करने, गीत गाने , सांस्कृतिक कार्यो के अलावा हम प्रतिरोध को संगठित करें।"

लोक नर्तक विश्वबंधु जी ने इंदौर की घटना की घोर निंदा करते हुए कहा "मैं 1954 से ही इप्टा के जुड़ा हुआ हूँ; लेकिन इंदौर जैसी घटना जिसमे नाटक करने वालो को दबाया जाए ना कभी ऐसा देखा और ना सुना।"

वरिष्ठ रंगकर्मी जावेद अख्तर ने इंदौर के समाचार पत्र "प्रभात किरण" में प्रकाशित ख़बर "इस इप्टा से कैसे निपटा जाए" का पाठ किया और प्रतिरोध सभा में एकजुटता सम्बंधी प्रस्ताव पेश करते  हुए  कहा "हमें फासिस्स्ट ख़तरे के ख़िलाफ़ एकजुट होकर बड़ी गोलबंदी करनी होगी"।

वरीय नाटककार व निर्देशक हसन इमाम ने कहा कि यह हमला देश के प्रजातान्त्रिक मूल्यों पर हमला है। यह हमला दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, किसानों, मजदूरों पर हो रहे हमलों से अलग नहीं है. इसीलिये लेखकों , रंगकर्मियों को दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, किसानों, मजदूरों के साथ कंधा से कंधा मिला कर फासिस्ट हमलों की मुख़ालफत करनी चाहिए।
सभा को वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी कुमार अनुपम, सामजिक कार्यकर्ता रूपेश, युवा रंगकर्मी अजीत कुमार, युवा अभिनेता सुमन कुमार, सामजिक कार्यकर्ता रवींद्र नाथ राय आदि ने सम्बोधित किया।

प्रतिरोध सभा में बड़ी संख्या में रंगकर्मी, कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे। प्रमुख लोगों में अनीश अंकुर, राजन कुमार सिंह, फ़ीरोज़ अशरफ खां, मोना झा, विनोद कुमार, कुमुद कुंदन, विशाल तिवारी, रंजीत, गठन गुलाल, सरफ़राज़, उषा वर्मा, दीपक कुमार,  कथाकार  शेखर, विनय, दीपक, गुलशन, विक्रांत, अभिषेक शर्मा शामिल थें. सभा की अध्यक्षता विश्वबंधु, समी अहमद, आलोक धन्वा और अरुण कमल की अध्यक्ष मंडली ने की.

प्रतिरोध सभा में बिहार आर्ट थिएटर, नटमंडप, प्रेरणा, हिरावल, किसलय, जन सांस्कृतिक मंच, सुरांगन, अभियान, विहान सांस्कृतिक मंच, अक्षरा आर्ट्स, जनविकल्प, बिहार एप्सो,अल खैर, पुनश्च, पटना सिटी इप्टा, पटना इप्टा से जुड़े संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों ने भाग लिया। सभा का संचालन युवा रंगकर्मी जयप्रकाश ने किया।

प्रतिरोध सभा में जावेद अख़्तर खां ने पटना के संस्कृतिकर्मियों की ओर से एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि 
"इंदौर में विगत 2 अक्टूबर को शुरू हुए इप्टा के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन के अंतिम दिन यानी 4 अक्टूबर 2016 को भारत स्वाभिमान मंच नाम के एक संगठन जिसका किसी ने नाम भी न सुना होगा, के 10-12 उपद्रवी तत्वों ने हमले की कोशिश की। ये मंच पर चढ़ गए और नारेबाजी करने लगे। आयोजकों द्वारा इन्हें बाहर का रास्ता दिखाए जाने के बाद इन्होंने सम्मेलन स्थल पर पत्थरबाजी की जिसमें एक इप्टा कार्यकर्ता घायल हो गया। बाद में इन्होंने स्थानीय विजय नगर थाने पर पहुँच कर उलटे इप्टा के लोगों पर फर्जी प्राथमिकी दर्ज कराने का दबाव बनाया। स्थानीय आर.एस.एस. इकाई ने भी इप्टा सम्मेलन में कथित देश-विरोधी वक्तव्य दिए जाने का फर्जी आरोप लगाते हुए विज्ञप्ति जारी की। अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि कायराना हमला करनेवाले एक नामालूम से, लगभग रातों-रात खड़े हो गए इस संगठन का संबंध किस से है? 

यह घटना संघ समर्थक ताकतों द्वारा लेखकों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों पर लगातार हो रहे हमलों की शृंखला की ताजी कड़ी है। केंद्र की मोदी सरकार और भाजपा शासित राज्य सरकारों के शासन में गाय, देश और धर्म का नाम लेकर अभिव्यक्ति की आजादी, विवेक, समता और सांप्रदायिक सौहार्द्र की संस्कृति पर तथा दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले करनेवाले उन्मादी तत्वों के हौसले बढ़े हुए हैं। लेकिन इन हमलों का प्रतिरोध भी हर कहीं हो रहा है। इप्टा के सम्मेलन पर हमला देश की सांस्कृतिक विरासत के प्रगतिशील पहलुओं पर बढ़ते फासिस्ट हमलों का ही एक और बदतरीन उदाहरण है। 

इप्टा के आंदोलन को जिन महान कलाकारों, फिल्मकारों, चित्रकारों, लेखकों-बुद्धिजीवियों ने खून-पसीना एक कर खड़ा किया, उन्होंने देश ही नहीं दुनिया की मानवतावादी और प्रगतिशील संस्कृति को आगे बढ़ाया है। हम पटना के कलाकार, संस्कृतिकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन पर हुए हमले की कठोर भर्त्सना  करते हुए हमलावरों और साजिशकर्ताओं की गिरफ्तारी और घटना में मध्य प्रदेश की राज्य सरकार की भूमिका की न्यायिक जाँच की मांग करतें हैं."

Friday, October 7, 2016

श्रद्धांजलि : रंग गुरु एच कन्हाईलाल

नई दिल्‍ली: भारतीय रंगमंच के अप्रतिम निर्देशक ओझा हेस्नाम कन्हाईलाल का गुरुवार दोपहर निधन हो गया. वे फेफड़े के कैंसर से पीड़ित थे. इसी वर्ष उन्हें पद्म भूषण सम्मान दिया गया था. उन्हें पद्म श्री (2003) और संगीत नाटक अकादमी अवार्ड (1985) भी मिल चुका है. वे संगीत नाटक अकादमी के फेलो भी थे.

सावित्री हेस्नाम उनकी पत्नी हैं जो विख्यात रंगमंच अभिनेत्री हैं और उनके पुत्र हेस्नाम तोम्बा उभरते हुए निर्देशक हैं. मणिपुर के कन्हाईलाल ने भारतीय रंगमंच की विविधता को समृद्ध किया. उनकी रंगभाषा में पुर्वोत्तर का शरीर, मानस और वहां की लोक परंपराओं के साथ वहां की जनता का संघर्ष और प्रतिरोध भी शामिल है.

उनकी रंगभाषा में पूर्वोत्तर की ध्वनियों का खेल भी था जो उसे गहराई देता था. उनकी प्रस्तुतियां देश विदेश में मंचित हुईं और सराही गईं. कन्हाईलाल ने मणिपुर में कलाक्षेत्र रंगमंडल की स्थापना की थी और इसके साथ वे काम करते रहे. उन्होंने देश विदेश की विभिन्न संस्थाओं में अभिनेतों को प्रशिक्षण भी दिया. ‘मेमायर्स आफ अफ्रीका’, ‘कर्ण’, ‘पेबेट’, ‘डाकघर’, ‘अचिन गायनेर गाथा’, ‘द्रोपदी’ इत्यादि उनकी चर्चित नाट्य प्रस्तुतियां हैं.

महाश्वेता देवी की कहानी पर आधीरित उनकी प्रस्तुति 'द्रौपदी' अत्यंत प्रशंसित और विवादित रही. इसमें उनकी पत्नी सावित्री का बेमिसाल अभिनय था. प्रस्तुति के बीच एक ऐसा क्षण आता है जब वे मंच पर अनावृत होती हैं. कहा जाता है कि मनोरमा देवी के रेप और अपहरण के खिलाफ महिलाओं ने नंगे होकर आसाम राइफल्स के विरोध में जो प्रदर्शन किया था उसकी प्रेरणा इस प्रस्तुति से ही मिली थी. उनका निधन से भारतीय रंगमंच का एक युगांत हो गया है.

एनडीटीवी इंडिया से साभार

श्रद्धांजलि : रंग गुरु एच कन्हाईलाल

जीवन और रंगमंच में मेरे लिए यह आदर्श जोड़ी रही है - एच कन्हाईलाल और सावित्री माँ। चाहे वो रंगमंच का मंच हो या जीवन की तपती ज़मीन - ये दोनों हमेशा ही एक दूसरे के कंधे से कन्धा मिलाकर मजबूती के साथ खड़े दिखे। मैंने जहाँ भी इन्हें देखा (चाहे वो क्लास हो या जीवन)- साथ में ही देखा; और सदा मनीषी मुद्रा में ही देखा।

दोनों एक दूसरे के पूरक - हर ख़ुशी, ग़म, कला, जीवन संघर्ष, स्नेह, फटकार सब एक साथ। एक थियरी हैं तो दूसरा प्रैक्टिकल, एक जिस्म तो दूसरा दिमाग, एक दिल तो दूसरा धड़कन। ऐसी आदर्श जोड़ी विरले ही होती हैं। ऐसे ही स्नेह के लिए तो जीता है - एक इंसान। कन्हाईलाल और सावित्री माँ ने भारत के न जाने कितने कलाकारों को प्रेरित किया, उन कइयों में से एक मैं भी हूँ। उनकी सादगी और कला का कुछ अंश हम जैसों के भीतर सदा साँस लेती रहेंगीं।

अपने कर्मों के आधार पर एक पीढ़ी दूसरे पीढ़ी के भीतर जीवित रहती हैं। कन्हाईलाल जी का देहावसान की पीड़ा विशाल है लेकिन उनकी विरासत की ज़िम्मेवारी भी तो है, इसे सहेजना ज़रूरी है।

पुंज प्रकाश

Call for resistance against attack on freedom of expression

Call for resistance against attack on freedom of expression on 13th October 2016

Indian Peoples Theatre Association has given a call for resistance against attack on freedom of expression in relation to the attack on IPTA conference by some youths connected with the right wing who tried to disrupt the concluding session of 14th National Conference of IPTA on 4th October 2016 at Anand Mohan Mathur Sabhagrah, Indore.

The General Secretary of IPTA, Rakesh said in a statement that this attack is in the continuation of attacks on freedom of expression by RSS and its allies. He further stated that IPTA was born during freedom struggle in 1943 in the period of ongoing Second World War and IPTA since its inception not only stood against the war but also as a crusader in defense of national sovereignty and integrity and various of its activists throughout the country went to jails fighting the colonial rule. He reiterated that IPTA is firmly against war and terrorism as well since both are the manifestation of imperialist crisis. We observe that it is notorious design of ruling class that those who have been working for the peace of the mankind are portrayed as anti-nationals. It is our patriotism and our nationalist commitment which impels us to talk against war which will destroy human lives in both the countries. People of India have nothing to gain by sacrificing the lives of our soldiers. He has appealed to all IPTA units and to all like-minded writer’s, cultural and other social organizations to observe 13th October 2016 as a day of resistance and rally the people in the fight against communal fascism, terrorism, war mongering and continuous attacks on freedom of expression.

Rakesh Veda
General Secretary
Indian Peoples Theatre Association (IPTA)