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Saturday, October 8, 2016

इप्टा पर फ़ासिस्ट हमला, अधिनायकवादी प्रवृति, गुंडागर्दी है: अरुण कमल

"आज देश में इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है कि जैसे हम सोच रहे हैं, जैसे हम खा रहे हैं, पी रहे हैं वैसे ही आप सोचें। ये अधिनायकवादी प्रवृति है, गुंडागर्दी है। जिस मध्य प्रदेश के इंदौर में इप्टा के राष्ट्रीय सम्मलेन पर फ़ासिस्ट हमला हुआ, उसी मध्यप्रदेश में हरिशंकर परसाई को भी पीटा गया था। यह हमारे लिए चुनौती है कि हमें वर्गसंघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए। RSS इस देश का सबसे ख़तरनाक फ़ासीवादी गिरोह है और यह देश की सरकार को नियंत्रित करने का काम कर रहा है."

ये बातें सुप्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने इंदौर में हुए भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन पर हुए फासीवादी हमले के खिलाफ  कालिदास रंगालय में आयोजित प्रतिरोध सभा में बोलते हुए कहा।

प्रख्यात कवि आलोक धन्वा ने अपने सम्बोधन में कहा "जब हमने दूसरे विश्वयुद्ध में फासीवादी ताकतों को लड़कर पराजित किया तो अब भी क्यों नहीं लड़ सकते। इंदौर में इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन पर हमला करने वाले आर.एस.एस और उसके अनुषांगिक संगठनो की  आजादी के आंदोलन में कोई भूमिका नहीं थी, इससे जुड़े लोगों ने महात्मा गांधी की उस समय हत्या की जब वे प्रार्थना करने जा रहे थे।ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है ऐसे लोग हमारी साझी विरासत पर हमला करने जा रहे हैं।"
चर्चित डाक्टर डा सत्यजीत  ने कहा "आर.एस. इस बजरंग दल जैसे  धर्म व् देश विरोधी लोग आज देशभक्ति की बात कर रहे हैं।जिनका देश की साझी सांस्कृतिक विरासत और परम्परा का न तो कोई ज्ञान है और ना ही सदियों पुरानी इस विशिष्ट पहचान पर कोई आस्था।"

कार्यक्रम की शुरुआत में इंदौर के राष्ट्रीय अधिवेशन में शामिल प्रतिनिधियों की ऒर से तनवीर अख्तर ने पूरे घटना का विस्तार से ब्यौरा देते हुए बताया कि "सबके लिए एक सुन्दर दुनिया के संकल्प के साथ भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) का 14वां राष्ट्रीय सम्मेलन 02 अक्टूबर, 2016 से 04 अक्टूबर, 2016 तक इंदौर में आयोजित किया गया था, जिसमें देश के 22 राज्यों से 800 से अधिक प्रतिनिधि/कलाकारों ने भाग लिया। राष्ट्रीय सम्मेलन के अंतिम दिन 04 अक्टूबर, 2016 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर. एस. एस.) समर्थित भारत स्वाभिमान संगठन के कार्यकर्ताओं ने आनंद मोहन माथुर सभागृह (ए. के. हंगल रंग परिसर) में चल रहे संगठन-सत्र पर हमला कर सम्मेलन को बाधित करने का प्रयास किया। सभागृह में उपस्थित इप्टाकर्मियों के सशक्त प्रतिरोध की वजह से फ़ासिस्ट ताक़तों को वहां से भागना पड़ा।"

इस अवसर पर पूरे घटना की वीडियो क्लिपिंग भी दिखाई गयी।

वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अनिल अंशुमन ने अपने  संबोधन में कहा " आज पुरे देश में लिखने पढ़ने वालों पर हमला काफी बढ़ गया है।हमे इसके विरुद्ध एकजुटता की आवश्यकता  है।" 

र्चित साहित्यकार तैय्यब हुसैन पीड़ित ने कहा "आज देश में साम्प्रदायिक ताकतें हिटलर और मुसोलिनी की विचारधारा से प्रेरणा ले रहे हैं. इसलिए ज़रूरी हो गया है कि नाटक करने, गीत गाने , सांस्कृतिक कार्यो के अलावा हम प्रतिरोध को संगठित करें।"

लोक नर्तक विश्वबंधु जी ने इंदौर की घटना की घोर निंदा करते हुए कहा "मैं 1954 से ही इप्टा के जुड़ा हुआ हूँ; लेकिन इंदौर जैसी घटना जिसमे नाटक करने वालो को दबाया जाए ना कभी ऐसा देखा और ना सुना।"

वरिष्ठ रंगकर्मी जावेद अख्तर ने इंदौर के समाचार पत्र "प्रभात किरण" में प्रकाशित ख़बर "इस इप्टा से कैसे निपटा जाए" का पाठ किया और प्रतिरोध सभा में एकजुटता सम्बंधी प्रस्ताव पेश करते  हुए  कहा "हमें फासिस्स्ट ख़तरे के ख़िलाफ़ एकजुट होकर बड़ी गोलबंदी करनी होगी"।

वरीय नाटककार व निर्देशक हसन इमाम ने कहा कि यह हमला देश के प्रजातान्त्रिक मूल्यों पर हमला है। यह हमला दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, किसानों, मजदूरों पर हो रहे हमलों से अलग नहीं है. इसीलिये लेखकों , रंगकर्मियों को दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, किसानों, मजदूरों के साथ कंधा से कंधा मिला कर फासिस्ट हमलों की मुख़ालफत करनी चाहिए।
सभा को वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी कुमार अनुपम, सामजिक कार्यकर्ता रूपेश, युवा रंगकर्मी अजीत कुमार, युवा अभिनेता सुमन कुमार, सामजिक कार्यकर्ता रवींद्र नाथ राय आदि ने सम्बोधित किया।

प्रतिरोध सभा में बड़ी संख्या में रंगकर्मी, कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे। प्रमुख लोगों में अनीश अंकुर, राजन कुमार सिंह, फ़ीरोज़ अशरफ खां, मोना झा, विनोद कुमार, कुमुद कुंदन, विशाल तिवारी, रंजीत, गठन गुलाल, सरफ़राज़, उषा वर्मा, दीपक कुमार,  कथाकार  शेखर, विनय, दीपक, गुलशन, विक्रांत, अभिषेक शर्मा शामिल थें. सभा की अध्यक्षता विश्वबंधु, समी अहमद, आलोक धन्वा और अरुण कमल की अध्यक्ष मंडली ने की.

प्रतिरोध सभा में बिहार आर्ट थिएटर, नटमंडप, प्रेरणा, हिरावल, किसलय, जन सांस्कृतिक मंच, सुरांगन, अभियान, विहान सांस्कृतिक मंच, अक्षरा आर्ट्स, जनविकल्प, बिहार एप्सो,अल खैर, पुनश्च, पटना सिटी इप्टा, पटना इप्टा से जुड़े संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों ने भाग लिया। सभा का संचालन युवा रंगकर्मी जयप्रकाश ने किया।

प्रतिरोध सभा में जावेद अख़्तर खां ने पटना के संस्कृतिकर्मियों की ओर से एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि 
"इंदौर में विगत 2 अक्टूबर को शुरू हुए इप्टा के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन के अंतिम दिन यानी 4 अक्टूबर 2016 को भारत स्वाभिमान मंच नाम के एक संगठन जिसका किसी ने नाम भी न सुना होगा, के 10-12 उपद्रवी तत्वों ने हमले की कोशिश की। ये मंच पर चढ़ गए और नारेबाजी करने लगे। आयोजकों द्वारा इन्हें बाहर का रास्ता दिखाए जाने के बाद इन्होंने सम्मेलन स्थल पर पत्थरबाजी की जिसमें एक इप्टा कार्यकर्ता घायल हो गया। बाद में इन्होंने स्थानीय विजय नगर थाने पर पहुँच कर उलटे इप्टा के लोगों पर फर्जी प्राथमिकी दर्ज कराने का दबाव बनाया। स्थानीय आर.एस.एस. इकाई ने भी इप्टा सम्मेलन में कथित देश-विरोधी वक्तव्य दिए जाने का फर्जी आरोप लगाते हुए विज्ञप्ति जारी की। अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि कायराना हमला करनेवाले एक नामालूम से, लगभग रातों-रात खड़े हो गए इस संगठन का संबंध किस से है? 

यह घटना संघ समर्थक ताकतों द्वारा लेखकों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों पर लगातार हो रहे हमलों की शृंखला की ताजी कड़ी है। केंद्र की मोदी सरकार और भाजपा शासित राज्य सरकारों के शासन में गाय, देश और धर्म का नाम लेकर अभिव्यक्ति की आजादी, विवेक, समता और सांप्रदायिक सौहार्द्र की संस्कृति पर तथा दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले करनेवाले उन्मादी तत्वों के हौसले बढ़े हुए हैं। लेकिन इन हमलों का प्रतिरोध भी हर कहीं हो रहा है। इप्टा के सम्मेलन पर हमला देश की सांस्कृतिक विरासत के प्रगतिशील पहलुओं पर बढ़ते फासिस्ट हमलों का ही एक और बदतरीन उदाहरण है। 

इप्टा के आंदोलन को जिन महान कलाकारों, फिल्मकारों, चित्रकारों, लेखकों-बुद्धिजीवियों ने खून-पसीना एक कर खड़ा किया, उन्होंने देश ही नहीं दुनिया की मानवतावादी और प्रगतिशील संस्कृति को आगे बढ़ाया है। हम पटना के कलाकार, संस्कृतिकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन पर हुए हमले की कठोर भर्त्सना  करते हुए हमलावरों और साजिशकर्ताओं की गिरफ्तारी और घटना में मध्य प्रदेश की राज्य सरकार की भूमिका की न्यायिक जाँच की मांग करतें हैं."

Saturday, June 20, 2015

संस्कृति की वर्चस्ववादी समझ : विष्णु नागर


भारतीय फिल्म एवं टेलिविजन संस्थान(एफटीआइआइ) के नये अध्यक्ष और उसकी सोसायटी के चार भाजपाई-संघी सदस्यों की नियुक्ति के विरोध में इस लेख के लिखने तक हड़ताल चल रही थी। कहने की जरूरत नहीं कि इसके नये अध्यक्ष गजेंद्र चौहान की प्रसिद्धि और इस माध्यम की समझ महाभारत और कुछ छोटेमोटे सीरियलों में काम करने तक सीमित है और इस पद तक उनकी पहुँच का आधार उनका पिछले 11 साल से भाजपा से जुड़ा होना है,जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में हरियाणा में चुनाव प्रचार भी किया था।। उनके चार भाजपाई सहयोगियों की-जिन्हें संघ और भाजपा से अपने रिश्तों को लेकर किसी तरह की कोई झिझक नहीं है- मशहूरियत तो महाभारत जैसे सीरियल में काम करने जितनी भी नहीं है। जाहिर है कि ये देश के इस प्रतिष्ठित संस्थान का भविष्य तो क्या ही तय करेंगे, उसे बर्बाद ही करने ही लाये गये हैं ताकि सरकार के स्तर से जो भी र जितना भी उदार सांस्कृतिक दृष्टि को समर्थन देने के अब तक प्रयास हुए हैं, वे हमेशा के लिए मटियामेट हो जाएँ और अंततः इन संस्थाओं का कोई उसी तरह कोई अर्थ न रह जाए, जैसे कि मध्य प्रदेश की सरकार पोषित विभिन्न संस्थाओं के साथ हुआ है। आज इनकी राष्ट्रीय या राज्यस्तर पर कोई साख नहीं बची है, इसलिए उनकी अच्छीबुरी कैसी भी कोई चर्चा भी कहीं नहीं है। यही अंततः अखिल भारतीय स्तर पर भी होना है ताकि न बाँस रहेगा, न बाँसुरी बजेगी। दरअसल मोदी सरकार के राज में संस्कृति का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जहाँ विवादास्पद और उस क्षेत्र के लगभग अनाम-अनपहचाने-महत्वहीन लोगों की थोक में नियुक्तियाँ नहीं हो रही हों, जो संस्थान आज बचे भी हैं वहाँ भी ऐसी तैयारियाँ जोरों पर हैं। चाहे वह फिल्म सेंसर बोर्ड हो ( जो अब फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड के रूप में जाना जाता है।) ललित कला अकादमी हो, राष्ट्रीय संग्रहालय हो, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास हो या तमाम अकादमिक क्षेत्र की संस्थाएँ हों, इनमें ऐसे लोगों को भऱ दिया गया है या भरा जा रहा है जिनकी प्राथमिक योग्यता संघी-भाजपाई विचार का होना ही नहीं है, बल्कि उनका भरोसेमंद सदस्य होना भी है। जिन सांस्कृतिक संस्थानों में अभी तक सीधे हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं बनी है, वहाँ उनकी स्वायत्ता को धमकियों-चेतावनियों के जरिये नष्ट करने की कोशिशें जारी हैं। शायद इसीका नतीजा है कि साहित्य अकादमी जैसी सबसे कम विवादास्पद और सबसे अधिक स्वायत्त संस्था को भी प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान के समर्थन में कविता पाठ कराना पड़ा है और अब संगीत नाटक अकादमी के नेतृत्व में अन्य अकादमियाँ सहयोग कर रही हैं योग दिवस ही नहीं, योग सप्ताह जोरशोर से मनाने की । इससे पहले कि किसी सरकार ने अपने गैरसांस्कृतिक एजेंडे को इन संस्थाओं के जरिये लागू करवाने की जुर्रत नहीं की थी।क्या यह इन संस्थाओं को पूरी तरह सरकार के सांस्कृतिक-प्रशासनिक संरक्षण में लेने की तैयारी है? क्या इनकी स्वायत्ता का अंततः उसी तरह मजाक बनेगा, जिस तरह प्रसार भारती बोर्ड से जुड़े दूरदर्शन और आकाशवाणी का बन चुका है?

वैसे भाजपा के नेतृत्व में देश में या राज्यों में जब भी कोई सरकार आती है, वह संघ के सांस्कृतिक एजेंडे को लागू करने को अपनी प्राथमिकता के रूप में देखती है, जबकि गैरभाजपाई सरकारों की लगभग कोई सांस्कृतिक समझ नहीं है और जितनी भी है, उसे लागू करने का उनमें साहस और संकल्प नहीं है जबकि अटलबिहारी सरकार की मिलीजुली सरकार के जमाने में भी प्रेमचंद जैसे बड़े लेखक को पाठ्यक्रम से हटाकर भाजपा के महिला मोर्चे की एक नेत्री का उपन्यास पाठ्यक्रम में रख दिया गया था। आज की तरह तब भी राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद में तानाशाही और अपारदर्शी माहौल बनाते हुए संघ का एजेंडे लागू करने जैसे अनेक शैक्षिक- सांस्कृतिक प्रयास हुए थे। अब तो केंद्र में भाजपा की बहुमतवाली सरकार है जिसका प्रधानमंत्री स्वयं संघ का एक स्वयंसेवक होने के नाते संस्कृति की उतनी ही समझ रखता है जितनी कि संघ देता है, फिर भी जिस पर संघ पूरी तरह हावी है, इसलिए धर्मनिरपेक्षता की कसम खाते हुए मोदी सरकार तत्परतापूर्वक संघी सांस्कृतिक एजेंडा को लागू कर रही है।

जाहिर है कि संघ का एक खास सांस्कृतिक हिंदूवादी एजेंडा है जिसमें और तो और हिदुओं की उदारवादी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं तक के लिए जगह नहीं है तो मिलीजुली संस्कृति की सुदीर्घ परंपरा को सम्मान देने के लिए कहाँ हो सकती है,जो भारतीय संस्कृति का मूल है। सच तो यह है कि संघ की तथाकथित सांस्कृतिक समझ का भारत और उसके लोगों से कोई संबंध नहीं है। उसका लोकसंस्कृति,लोक परंपराओं, शास्त्रीय और आधुनिक की कलाओं तथा साहित्य से दूर-दूर तक कोई लेनादेना नहीं है। वह अपने मूल में भारतीय है भी नहीं , भले ही इसका ढिंढोरा पीटने पिटवाने में सबसे आगे है। उसका एक राजनीतिक –सांस्कृतिक एजेंडा है जिसके बारे में यहाँ विनम्रता से इतना ही कहना काफी होगा कि उसका लोकतंत्र समझ से कोई संबंध नहीं है। वह एक संकीर्ण हिंदू वर्चस्ववादी एजेंडा है जिसका बहुत कुछ संबंध उन ताकतों से है जिन्हें अंततः दूसरे विश्व युद्ध में पराजय का मुँह देखना पड़ा था और जिससे हुई भारी बर्बादी के बाद दुनिया ने राहत की सांस ली थी। लेकिन यह भी सही है कि संघ अनुशासित भाजपाई सरकारें ही अपने तथाकथित संकीर्ण और घातक सांस्कृतिक एजेंडे को गंभीरता से लेती हैं और उसे प्राथमिकता से लागू करती हैं।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मोटेतौर पर जो पार्टियाँ इस देश में उदारवादी राजनीतिक समझ रखनेवाली हैं, उनके शीर्ष नेतृत्व की संस्कृति में लगभग कोई दिलचस्पी और समझ नहीं है, इसलिए उनकी प्रथमिकताओं में इसकी कोई जगह भी नहीं है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जरूर ऐसे थे जिनकी इतिहास और संस्कृति की गहरी और वैज्ञानिक समझ थी और जिन्होंने उस संस्कृति के विकास की आजाद भारत में गहरी नींव रखी। उसके बाद इंदिरा गाँधी हैं जिनकी इस मामले में सक्रिय दिलचस्पी थी। उसके बाद अगर कोई नाम याद आता है तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह का। इस मामले में पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के दोनों मुख्यमंत्रियों को भी किंचित श्रेय दिया जा सकता है, हालांकि उनका हस्तक्षेप राज्य की सीमा के भीतर ही अधिक रहा है, उसके बाहर उन्होंने कभी गहरी और सक्रिय दिलचस्पी नहीं ली और यहाँ तक कि आजादी के बाद धीरे-धीरे कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी संस्कृति में दिलचस्पी लेना लगभग बंद कर दिया। कुछ और ऐसे प्रधानमंत्रियों- मुख्यमंत्रियों के नाम संभवतः इस सूची से छूट गए हों मगर पहली नजर में कोई और नाम याद नहीं आ रहा। बाकी गैरभाजपाई प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के लिए संस्कृति लगभग एक अवांछित या कहें उपेक्षित विषय रहा है और उन्होंने हद से हद सांस्कृतिक पहल का उपयोग या कहें दुरुपयोग अपने नजदीकियों के भी नजदीकियों को उपकृत करने के लिए किया है। इस बहाने उन्हें अगर थोड़ा- बहुत राजनीतिक लाभ मिलता दिखा है तो उसे हासिल करने में उन्होंने संकोच भी नहीं किया है। मोटेतौर पर गैरहिंदूवादी राजनीतिक दलों की समझ यह रही है कि संस्कृति के क्षेत्र में पहल करने से चूँकि वोट नहीं मिलते, इसलिए जो सहज रूप से नाममात्र के बजट से हो सकता है, उसे या तो होने दिया जाए या हिंदूवादियों का दबाव पड़ जाए तो न होने दिया जाए।राममंदिर आंदोलन के बाद खासतौर से कांग्रेसी सरकारें हिंदूवादी एजेंडे की आक्रामकता से भयभीत रही हैं और उन्होंने बार-बार समर्पण किया है।

इसके बावजूद संस्कृति के क्षेत्र में निजी और सार्वजनिक पहल की ऐसी सुदीर्घ और मजबूत परंपरा है कि आज संस्कृति की दुनिया में ऐसा एक भी उल्लेखनीय नाम याद नहीं आता, जिसका संघ-भाजपा परिवार की सांस्कृतिक समझ से कोई अंतर्भूत नाता-रिश्ता हो। कुछ व्यक्तिगत विचलन के उदाहरण हो सकते हैं और अवसरवादियों की कभी भी कोई कमी नहीं रही है तो ब क्यों होगी मगर इसके बावजूद संस्कृति की रचनात्मक दुनिया में आज तक उदारवादी विचारों का ही वर्चस्व है और रहेगा भी। इसकी बुनियादी वजह यह है कि संस्कृति की दुनिया में वही व्यक्ति और संस्था कुछ सार्थक और रचनात्मक कर सकती है-हालांकि इसकी कोई गारंटी नहीं है- जो बुनियादी रूप से संस्कृति की उदारवादी-व्यापक समझ से जुड़ी हुई हो। आज तक कोई बड़ा और सार्थक नाम ऐसा भूले से भी याद नहीं आता, जो संस्कृति की संकीर्ण हिंदूवादी या इस्लामवादी धारा से बुनियादी रूप से जुड़ा हुआ हो और यह स्थिति मोदी सरकार के दौरान भी तमाम उसकी हताश और विध्वंसकारी कोशिशों के बीच बनी रहेनवाली है। कुछ राजनीतिक विचलन इस मायने में देखने को समय-समय पर मिलते रहेंगे कि कुछ कलाकार –लेखक इस सरकार से भी कुछ पाने की आशा में कई मामलो में चुप रहेंगे या अपने कलावादी बाने में घुसकर अराजनीतिक होने का नाटक करेंगे या जो राजनीतिक-वामपंथी होने के आरोप से बचकर अपनी छवि दूर-दूर तक सरकार विरोधी नहीं बनने देना चाहते। वे यह कहना पसंद करेंगे कि हमें राजनीति से क्या मतलब, हम तो संस्कृति की दुनिया में अपना काम अपने चुपचाप ढँग से करना चाहते हैं और यह सरकार हमसे भी कुछ चाहेगी तो हम नि-संकोच करेंगे क्योंकि अंततः यह सरकार भी जनता द्वारा चुनी गई सरकार है और तीन दशक बाद आई ऐसी सरकार है, जिसे संसद में पूरा बहुमत मिला है। कुछ प्रधानमंत्री या उनके मंत्रियों के नजदीक जाने का प्रयास भी कर रहे होंगे ताकि उन लाभों से वे वंचित न रहें, जो लाभ वे पहले भी उठाते रहे हैं और उन लाभों के गुलाम हो चुके हैं। इन्हीं के बूते उनका सांस्कृतिक जगत में वर्चस्व बना हुआ है। साहित्य को छोड़कर अन्य कलाओं के कलाकार बहुत हद तक सरकारी सांस्कृतिक समर्थन पर जिंदा हैं या सरकार को नाराज करने से वे कारपोरेट समर्थन से वंचित हो सकते हैं, इसलिए उन कलाओं के लोगों में यह विचलन और भय अधिक दिखना स्वाभाविक है। इसके बावजूद वे संघी विचारधारा के समर्थक कम से कम अपनी कला के जरिये बन जानेवाले नहीं हैं क्योंकि ऐसा करना अपनी रचनात्मकता से द्रोह करना होगा।, हालांकि चतुराई बहुत काम आनेवाली नहीं है क्योंकि वर्तमान केंद्र सरकार में बैठे महत्वपूर्ण और जिम्मेदार लोगों की सांस्कृतिक समझदारी बहुत हद तक संघ की ताकथित सांस्कृतिक विचारधारा के आसपास ही घूमती है और संघ अपने परिवार के ज्यादा से ज्यादा लोगों को यहाँ- वहाँ फिट करवाने की बेहद जल्दी में है, जो उसके दूरगामी एजेंडे को पूरा करने के लिए जरूरी है। अतः सरकार संस्कृति की तथाकथित गैरराजनीतिक समझ रखनेवाले संस्कृतिकर्मियों में दिलचस्पी नहीं रखती, हाँ वे राजनीतिक रूप से इस्तेमाल होना चाहें तो जरूर उसकी कीमत देकर ऐसा करेगी क्योंकि उसे राजनीति की तरह कला की दुनिया में भी यह दिखाना है कि उसकी वे बड़ी हस्तियाँ उसके साथ हैं।

वैसे भाजपा –संघ सांस्कृतिक वर्चस्व की ऐसी लड़ाई चारों तरफ लड़ रहे हैं,जिसमें उनकी राजनीतिक और अंततः सांस्कृतिक-सामाजिक जीत का वक्फा कम रहनेवाला है। उन्हें भारत के लोगों की असली ताकत का अंदाजा नहीं है, जो पिछड़े सांस्कृतिक-राजनीतिक-सामाजिक एजेंडे को लंबे समय तक कसी भ्रम में स्वीकार नहीं कर सकते।यह एक स्थायी दृश्य नहीं हो सकता, जिसमें आप आबादी के एक बड़े हिस्से को अलग-थलग कर दें, उसे जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर करें। संस्कृति की रचनात्मकता की उपेक्षा-अवहेलना करें, उसे हिंसा से दबाने का प्रयास करें और राजनीतिक हिदुत्व को देश की विचारधारा बनाने की कोशिश करें।यह इस देश के लोगों के बुनियादी स्वभाव के है।खिलाफ है, उस सांस्कृतिक विरासत के खिलाफ है जिसे हजारों साल के अनुभव के बाद हमारे पुरखों ने हमें सौंपा है, जिसे दुनियाभर के मानवतावादी –परिवर्तनवादी लोगों ने रचा है, बनाया है।

जनसत्ता से साभार