Friday, October 7, 2016

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के खिलाफ़ देशव्यापी प्रतिरोध का आह्वान

13 अक्टूबर 2016 को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के खिलाफ़ देशव्यापी प्रतिरोध का आह्वान


इंदौर में 02 से 04 अक्टूबर तक आयोजित इप्टा के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन के अंतिम दिन आनंद मोहन माथुर सभागृह में समापन सत्र के दौरान दक्षिणपंथी संगठनों से संबद्ध कुछ युवाओं ने सत्र की कार्यवाही को रोकने का प्रयास किया, जिसके परिप्रेक्ष्य में भारतीय जन नाट्य संघ ने अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हो रहे हमलों के विरोध में 13 अक्टूबर का दिन प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया है।

इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश ने कहा कि इप्टा के सम्मेलन के दौरान हुआ यह हमला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगातार किये जा रहे हमलों की कड़ी का ही एक हिस्सा है। इप्टा का जन्म 1943 में भारत के स्वतत्रंता संग्राम में 1943 में हुआ है। यह द्वित्तीय विष्वयुद्ध का समय भी था और अपनी शुरुआत से ही इप्टा न केवल युद्ध के विरोध में खड़ी हुई है बल्कि देश की संप्रभुता और एकता को बचाने के लिए भी मजबूती से खड़ी रही है और इसके लिए इप्टा के तमाम कार्यकर्ता ब्रिटिश शासन के दौरान जेल भी गए हैं। उन्होंने आगे कहा कि इप्टा युद्ध और आतंकवाद दोनों का ही कड़ा विरोध करती है क्योंकि दोनों ही नवउदारवादी संकट का परिणाम हैं। हम देखते हैं कि यह शासक वर्ग की वही जनविरोधी व्यवस्था है जिसमें जनता की शांति के लिए काम करने वालों की छवि देशविरोधी की छवि बनाकर प्रस्तुत की जाती है। यह हमारी  देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति हमारी प्रतिबद्धता ही है कि हम उस युद्ध का विरोध करते हैं जो दोनों ही देशों में इंसानी जिंदगियों को खत्म कर देगा। भारत के लोगों के पास अपने सैनिकों की जान दांव पर लगाकर भी पाने के लिए कुछ नहीं है। उन्होंने इप्टा की तमाम इकाइयों के साथ अन्य समानधर्मा लेखक, सांस्कृतिक व सामाजिक संगठनों से यह अपील की है कि सभी 13 अक्टूबर 2016 का दिन अभिव्यक्ति की आजादी पर हमलों के खिलाफ प्रतिरोध दिवस के रूप् में मनाएं और साम्प्रदायिक फासीवाद, आतंकवाद, युद्धोन्माद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हो रहे हमलों के विरुद्ध लोगों को एकजुट करें।


राकेश वेदा
महासचिव
भारतीय जन नाट्य संघ

Thursday, October 6, 2016

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर जारी हमलों के ख़िलाफ़ एकजुट हों!

अभिव्यक्ति की आज़ादी और आलोचनात्मक विवेक पर जारी हमलों के ख़िलाफ़ एकजुट हों!


हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय में ‘द्रौपदी’ के मंचन को लेकर खड़ा किया गया हंगामा और इंदौर में इप्टा के राष्ट्रीय सम्मलेन में तोड़-फोड़ की कोशिश — हाल की ये दोनों घटनाएं बताती हैं कि राष्ट्रवादी उन्माद फैलाकर आलोचनात्मक आवाजों को दबा देने की नीति पर आरएसएस और उससे जुड़े अनगिनत संगठन लगातार, अपनी पूरी आक्रामकता के साथ सक्रिय हैं.

हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय में विगत 21 सितम्बर को महाश्वेता देवी को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी विश्व-प्रसिद्ध कहानी ‘द्रौपदी’ का मंचन किया गया. यह कहानी कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में है और इसका नाट्य-रूपांतरण/मंचन भी अनेक समूहों द्वारा अनेक रूपों में किया जा चुका है. ‘महाभारत’ की द्रौपदी की याद दिलाती इस कहानी की मुख्य पात्र, दोपदी मांझी नामक आदिवासी स्त्री, सेना के जवानों के हाथों बलात्कार का शिकार होने के बाद उनके दिए कपड़े पहनने से इनकार कर देती है जो वस्तुतः अपनी देह को लेकर शर्मिन्दा और अपमानित होने से इनकार करना है. उसकी नग्नता उसके आत्मसम्मान का उद्घोष बनकर पूरे राज्यतंत्र को शर्मिन्दा करती है. जुलाई में दिवंगत हुईं महाश्वेता देवी को याद करते हुए इसी कहानी का मंचन हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय में किया गया. मंचन के दौरान शान्ति रही और नाटक को भरपूर सराहना मिली, लेकिन उसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के लोगों ने भारतीय सेना को बदनाम करने की साज़िश बताकर इस मंचन के विरोध में हंगामा शुरू किया. आस-पास के इलाकों में अफवाहें फैलाकर समर्थन जुटाया गया, महाश्वेता देवी को राष्ट्रविरोधी लेखिका के रूप में प्रचारित किया गया, कुलपति के पुतले फूंके गए और विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने यह मांग रखी गयी कि नाट्य-मंचन की इस ‘देशद्रोही’ गतिविधि के लिए ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए. असर यह हुआ विश्वविद्यालय ने नाटक के मंचन से जुड़े शिक्षकों पर एक जांच कमेटी बिठा दी, जबकि इस मंचन के लिए न सिर्फ विश्वविद्यालय प्रशासन से पूर्व-अनुमति ली गयी थी बल्कि वहाँ मौजूद अधिकारियों ने मंचन की भूरि-भूरि प्रशंसा भी की थी. अब अंग्रेज़ी विभाग के प्राध्यापक, सुश्री सनेहसता और श्री मनोज कुमार कार्रवाई के निशाने पर हैं और आरएसएस के आतंक का असर विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर शिक्षक समुदाय तक की किनाराकशी के रूप में दिख रहा है. दोनों शिक्षकों के खिलाफ आरएसएस का दुष्प्रचार-अभियान पूरे जोर-शोर से जारी है. ज़ाहिर है, उनकी कोशिश है कि इनके ख़िलाफ़ लोगों की भावनाएं भड़का कर इन पर दंडात्मक कारवाई के लिए विश्वविद्यालय को मजबूर किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि विश्वविद्यालय में आलोचनात्मक विवेक के लिए कोई जगह न बचे.

इसी कड़ी में 4 अक्टूबर को इंदौर में इप्टा के राष्ट्रीय सम्मलेन के तीसरे दिन हिन्दुत्ववादियों ने मंच पर चढ़कर हंगामा किया और इस पूरे आयोजन को राष्ट्रविरोधी देशद्रोही गतिविधि बताते हुए नारे लगाए. आयोजन-स्थल से खदेड़े जाने के बाद उन्होंने पत्थर भी फेंके जिससे इप्टा के एक कार्यकर्ता का सर फट गया. उनका आरोप यह था कि प्रसिद्ध फिल्मकार एम एस सथ्यू (‘गरम हवा’ के निर्देशक) ने अपने उदघाटन भाषण में पाकिस्तान में भारतीय सेना के घुसने की आलोचना करके राष्ट्र के खिलाफ काम किया है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वहाँ पिछले दो दिनों से चल रही नाट्य-प्रस्तुतियां राष्ट्रविरोधी और जातिवादी हैं. आरएसएस के मालवा प्रान्त के प्रचार प्रमुख प्रवीण काबरा ने यह बयान दिया कि ‘वे (इप्टा वाले) जन्मजात राष्ट्रविरोधी हैं.’ यह आयोजन-स्थल पर किये गए आपराधिक हंगामे का औचित्य साबित करने का तर्क था.

ये दोनों घटनाएं राष्ट्रवादी उन्माद फैलाकर आलोचनात्मक आवाजों का दमन करने की हिन्दुत्ववादी साज़िशों की ताज़ा कड़ियाँ हैं. जनवादी लेखक संघ इनकी भर्त्सना करता है और हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय के शिक्षकों तथा इप्टा के साथियों के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करता है. पिछले साल अक्टूबर और नवम्बर के महीनों में लेखकों-संस्कृतिकर्मियों ने असहिष्णुता के इस माहौल के खिलाफ अपने सृजन-कर्म से बाहर जाकर अभिव्यक्ति के अन्य रूपों का भी सहारा लिया था. पुरस्कार वापस किये गए थे, सड़कों पर उतर कर नारे लगाए गए थे, अकादमियों पर सरकारी धमकियों के बरखिलाफ अपनी स्वात्तता बहाल करने/रखने का दबाव बनाया गया था. लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों और फ़िल्मकारों की उस मुहिम का सन्देश राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर प्रसारित हुआ था. ऐसी ही मुहिम की ज़रूरत दुबारा सामने है. हम लेखकों-संस्कृतिकर्मियों से अपील करते हैं कि इस माहौल के विरोध में अपनी आवाज़ बुलंद करें और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर होने वाले हमलों का सीधा प्रतिकार करने के लिए एकजुट हों.

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)

Wednesday, October 5, 2016

इप्टा पर हमले की निंदा

हम इलाहाबाद के नागरिक, लेखक, संस्कृतिकर्मी पिछले दिनों इंदौर में इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान हुए हमले की खबर से क्षुब्ध हैं। आर एस एस द्वारा संचालित संगठनों द्वारा किया गया यह बेशर्म हमला हमारी सांस्कृतिक विरासत पर हमला है।

सब जानते हैं कि  मुंबई में 25 मई, 1943 को इप्टा (इंडियन पीपुल्स् थियेटर एसोसियेशन) की स्थापना के पीछे देशवासियों की स्वतंत्रता, सांस्कृतिक प्रगति और आर्थिक न्याय की आकांक्षा को मूर्त रूप देना तथा कला के क्षेत्र को विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के दायरे से बाहर निकालकर मेहनतकशों का, मेहनतकशों के लिए जन-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना था। संस्कृति के क्षेत्र में इस वामपंथी हस्तक्षेप ने सांस्कृतिक कायापलट का काम किया। इस धारा ने न केवल परंपरागत कला रूपों की चुनौती दी तथा समाज की पूंजीवादी-सामंती विचार-दृष्टियों को बदला, बल्कि इस दायरे से बंधे कला सर्जकों को भी बदला। इस तरह जो सृजनशीलता सामने आयी, वह अपेक्षाकृत उन्नत संस्कृति की वाहक थी और वर्गीय संस्कृति की पक्षधर भी। इस सृजनशीलता ने मेहनतकशों की संस्कृति को रचने-गढ़ने का काम किया और स्वाधीनता संघर्ष में वामपंथी राजनीति को आम जनता के जेहन में स्थापित करने का काम भी। इस दौर में राजनीति और संस्कृति कर्म एक दूसरे की सहचर थी। इस संस्कृति कर्म ने ‘कला, कला के लिए’ के कलावादी नारे को ठुकराया और ‘कला, जनता के लिए’ के जनवादी नारे को स्थापित किया। इस विशाल सांस्कृतिक आंदोलन ने आम जनता को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सांस्कृतिक रुप से एकजुट किया। इस आंदोलन ने आम जनता की पिछड़ी हुयी चेतना को बड़े पैमाने पर झिंझोड़ा, आम जनता के पैरों में बंधी रूढ़िवाद और अंधविश्वास की बेड़ियों को तोड़ा, उसे प्रगतिशील, जनवादी चेतना से लैस किया। इसके फलस्वरूप स्वाधीनता आंदोलन के राजनैतिक संघर्ष में वह बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतरी।

हम मांग भी करते हैं कि इस हमले के लिए जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कानूनी कार्यवाही की जाय और वहां इस तरह के हमले को न रोक पाने के लिए मध्य प्रदेश की राज्य सरकार की भूमिका की न्यायिक जांच हो।

प्रलेस, जलेस, जसम

Monday, October 3, 2016

वे अपनी नस्लों के जेहन में संगीत बो रहे हैं; और हम?

"जब भी भूख से लड़ने
कोई खड़ा हो जाता है
सुंदर दिखने लगता है।"

कलाकारों-कलमकारों का जमावड़ा है तो कुछ अलहदा तो होगा ही। आनंद मोहन माथुर हॉल में माहौल खिंचा हुआ है। सामने प्रवेश द्वार पर चित्त प्रसाद के सुप्रसिद्ध रेखांकन नजर आ रहे हैं। प्रवेश करने वाले गलियारे के दोनों और किताबों की स्टाल सजी हुई है और लोग 'कहीं खत्म न हो जाए' के भाव से अपनी पसंदीदा किताब अभी ही खरीद लेना चाहते हैं। स्टाल के बाएं कोने में सुनील जाना के फोटोग्राफ लगे हुए हैं, जो चित्त प्रसाद के रेखांकन से मानों कह रहे हों-हम भी तो वही बात कह रहे हैं। फोटोग्राफ अंदर बरामदे में भी हैं और इसके फक्कड़-अलमस्त छायाकार शाह आलम बाइसिकल में नजर आ रहे हैं। जिंदगी की जद्दोजहद में लगे आम लोगों की जिन्दा तस्वीरें हैं। यहीं सुपरिचित चित्रकार मुकेश बिजोले की पेंटिंग्स पंकज दीक्षित के कविता पोस्टरों के साथ जुगलबन्दी में लगी हुई हैं। ठीक इसी के सामने वे सीढियाँ हैं जहाँ लम्बे श्वेत बाल और इतनी ही सफेद दाढ़ियों वाला कलाकार नुमा शख्स बड़ी ही सादगी के साथ भोजन की प्लेट लेकर नीचे बैठ गया है। भिलाई के साथी यह देख परीशाँ हो उठते हैं।' अरे कामरेड! यह क्या?' वे एक कुर्सी देकर 12 राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित फिल्मकार और मौजूदा सत्र के मुख्य अतिथि आनन्द पटवर्धन को ऊपर बैठने का अनुरोध करते हैं और आनन्द 'अरे! कोई फर्क नहीं पड़ता' के भाव से अनुरोध स्वीकार कर लेते हैं। उधर सम्मेलन के बाकी प्रतिनिधि कुछ पर्चियों के सहारे भोजन की प्लेट जुटा रहे हैं और इन्हीं पर्चियों में सर्वेश्र्वर दयाल सक्सेना की ऊपर लिखी पंक्तियाँ दर्ज हैं। गोरख पाण्डेय, धूमिल वगैरह की कविताएँ भी हैं। भूख से जूझते हुए भूख की कविताएँ। आनन्द पटवर्धन भोजन को काम की तरह निपटा रहे हैं, क्योकि अभी तुरन्त बाद उन्हें प्रलेस पर बन रही एक अधपकी फ़िल्म का प्रदर्शन करना है।

फ़िल्म कच्ची है, असंपादित, ब्लेंक सीन भी हैं, पर 'ख़त का मजमून समझ आता है, लिफाफा देखकर' की तर्ज पर बनने वाली फ़िल्म की उत्कृष्टता का अंदाजा लगाया जा सकता है। यूँ भी आनन्द पटवर्धन अमूमन ऐसे विषयों पर फ़िल्म बनाते रहे हैं, जिन पर दीगर फिल्मकार सोचते भी नहीं। प्रलेस को विषय बनाना तो और भी कठिन है। फ़िल्म में जावेद सिद्दीकी बता रहे हैं कि किस तरह 1936 में प्रेमचन्द की तहरीर ने न केवल हिंदी और उर्दू के बल्कि अन्य भाषाओं के लेखकों को भी प्रगतिशीलता की धारा में बहा लिया। इप्टा के पूर्व अध्यक्ष ए. के. हंगल विभाजन के त्रासद दिनों को याद कर रहे है जब उनका परिवार पाकिस्तान में बतौर अल्पसंख्यक रह रहा है। मोहल्ले के मुस्लिमों के बीच वे अकेले हिन्दू हैं। वे खुद जेल में हैं। कुछ लोग दुर्भावना से उनके परिवार को घेरते हैं तो मोहल्ले के सारे मुस्लिम बचाव में एकत्र हो जाते हैं। कहते हैं, 'इन्हें हाथ नहीं लगाना। हम इन्हें जानते हैं। भले आदमी हैं। कम्युनिस्ट हैं!'

देश भर के कोई 22 राज्यों से एकत्र हुए कलाकारों की इंदौर शहर में भव्य रैली के बाद इस सत्र की शुरुआत हुई थी। जाती हुई बेमौसम बारिश ने भी रैली का हार्दिक अभिवादन किया। शाम को सुरों की बरसात हुई। देवास इंदौर के ऐन पड़ोस में है। औरों का नहीं पता पर कलाप्रेमी इस शहर को कुमार गन्धर्व के नाम से ही चिह्नित करते हैं। उन्हीं यशश्वी गायक कुमार साहब की सयोग्य शिष्या और सुपुत्री कलापिनी कोमकली ठेठ मालवी शैली में कबीर के भजन सुनाती हैं। कुमार साहब की वही अद्भुत शैली, जहाँ शास्त्रीयता अपना अभिजात्यपन त्याग कर ऊँची आसंदी से उतर आती है और लोक के अक्खड़पन से बेलौस-उन्मुक्त होकर मिलती है। "कौन ठगवा नगरिया लूटल हो" और "नैहरवा, हमका न भाए" जैसी रचनाएँ" अद्भुत, अवर्णनीय समाँ बाँध देती हैं। समय -सीमा की बाध्यता कलापिनी को और, और अधिक सुनने से रोकती है।

शाम के इस सत्र का संचालन आयोजन की भाग-दौड़ में लगे-थके विनीत तिवारी के हाथों में है। इप्टा के इस 14 वें राष्ट्रीय सम्मेलन की स्वागत समिति के अध्यक्ष आनंद मोहन माथुर की आवाज 90 वर्ष की आयु में भी कड़क और बलंद है। वे कहते हैं कि मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ की इप्टा का सम्मेलन यहां हो रहा है। जो काम आप पहले कभी आप कर रहे हों, वही काम आगे की दो -तीन पीढियां करती नजर आएं तो बड़ी तसल्ली होती है। 22 राज्यों से 700 से भी ज्यादा कलाकार यहां आए हैं। बाज़ार ने कला को मनोरंजन तक सीमित करने का प्रयास किया पर सथ्यू साहब व आनन्द पटवर्धन जैसे लोगों ने बाजार के सामने घुटने नहीं टेके। यही अपेक्षा आप सब से भी देश करता हैं। क्यूबा और वेनेजुएला के प्रतिनिधियों ने यहां आकर हमें इज्जत बक्शी है। छोटे-छोटे देश किस तरह आत्म सम्मान के सामने खड़े हैं, यह प्रेरक है।

श्री माथुर ने कहा कि हम केवल संस्कृति कर्मी नहीं है। हम राजनीतिक चेतना से लैस हैं। कश्मीर को लेकर जिस तरह हिंदुस्तान और पाकिस्तान राजनीति क्र रहे हैं, उनसे किसी का भला नहीं होगा। हमें मखदूम की ये पंक्तियाँ याद आती हैं कि " जाने वाले सिपाही से पूछो, वो कहाँ जा रहा है।"

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री रणवीर सिंह ने कहा कि आज का माहौल पूरी तरह अंधकारमय है। मुझे याद आती है, शेक्सपियर के नाटक मैकबेथ के चौथे अंक के तीसरे दृश्य की यह स्पीच: "मुझे लगता है हमारा देश जंजीरों के नीचे दबा जा रहा है; यह रो रहा है, इससे खून बह रहा है और हर दिन इसके घावों में वृद्धि होती जा रही है।' उन्होंने सवाल किया कि क्या हम इन अँधेरे दिनों के खिलाफ़ मूक दर्शक बने रहेंगे या अपने पुरोधाओं से सबक लेकर अपने आंदोलन की धार और तेज करेंगे, अपने नाटकों को और पैना करेंगे, उन्हें जनता के बीच ले जाकर उन्हें लामबंद करेंगे। उन्होंने कहा कि हमारा अस्तित्व थिएटर की वजह से है और थिएटर का अस्तित्व हमारी वजह से। इस रिश्ते को और अधिक सघन और आत्मीय बनाए जाने की जरूरत है।
 
सत्र में क्यूबा और वेनेजुएला के राजदूतों की मौजूदगी प्रेरक और हौसला बढ़ाने वाली रही। क्यूबा के राजदूत ने जहाँ थोड़े संकोच के साथ अपनी बात कही, वहीं वेनेजुएला के प्रतिनिधि ने पूरे भावाभिनय के साथ अपनी बातों को विस्तार दिया। एक फ़िल्म उन्होंने दिखाई जो चौंकाती है, प्रेरित करती है, विचार करने के लिए बाध्य करती है। संगीत को उनके मुल्क ने आंदोलन बना दिया है। कोई 5 लाख से भी ज्यादा बच्चे संगीत सीख रहे हैं, सिखा रहे हैं। किसी के हाथ में गिटार है, किसी के हाथ में वायलिन तो कोई ट्रम्पेट जैसे वाद्य में सुरों से खेल रहा है। यह अपने मुल्क के उन लोगों के लिए विचार का मुद्दा हो सकता है-हालांकि वे कभी करेंगे नहीं-जो अपने बच्चों के हाथों में लाठी और त्रिशूल जैसी चीजें थमा रहे हैं।

कबीर कला मंच की साथी शीतल साठे को सुनना एक अलग, अलहदा अनुभव था । इस पर विस्तार से फिर कभी।







Sunday, October 2, 2016

वे गोली चलाएंगे, हम एक नाटक खेलेंगे

इंदौर, 2 अक्टूबर 16। स्थानीय आनन्द मोहन माथुर सभागृह में इप्टा के 14 वें राष्ट्रीय सम्मेलन की शुरूआत पारम्परिक रूप से झंडोत्तोलन के साथ हुई। झंडोत्तोलन इंदौर के सुपरिचित संस्कृति कर्मी औए पूर्व सांसद होमी दाजी की पत्नी ने किया। इसके बाद भिलाई इप्टा ने मणिमय मुखर्जी के संगीत निर्देशन में एक जनगीत 'हमने ली कसम' की प्रस्तुति दी।

मप्र इप्टा के अध्यक्ष हरिओम राजोरिया का स्वागत भाषण दिया।इप्टा के महासचिव राकेश ने कहा की चार्ली चैपलिन कहा करते थे कि कला जनता के नाम एक प्रेम पत्र है। हमने इसमें यह जोड़ने की हिमाकत की कि यह शाषकों के  विरुद्ध,  साम्राज्यवाद के विरुद्ध, शोषण और असमानता के विरुद्ध अभियोग पत्र भी है। उन्होंने कहा कि आज देश में युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है।हम युद्ध के खिलाफ हैं क्योंकि युद्ध समस्याओं की समाप्ति नहीं शुरुआत है। हम भगत सिंग की विरासत को लेकर चलते हैं। एक समय उन्हें भी आतंकवादी कहा गया था। हम अपने सांस्कृतिक औजारों से उनकी लड़ाई को आगे बढ़ाएंगे। हम यद्ध और आतंकवाद से एक साथ लड़ेंगे।

इसके पश्चात् इप्टा के पूर्व अध्यक्ष ए. के.हंगल, पूर्व महासचिव जितेंद्र रघुवंशी, पंडित रविशंकर, ओ. एन करूप, कामरेड ए. बी. बर्धन, रवि नागर, जुगल किशोर, जोहरा सहगल महाश्वेता देवी, राजेन्द्र यादव, रविन्द्र कालिया, नेल्सन मण्डेला, पीट सीगर, आर के लक्ष्मण, मन्नाडे, भूपेन हजारिका, जसपाल भट्टी, सतपाल डांग आदि दिवंगत साथियो-कलाकारों-जन नेताओं को श्रद्धांजलि दी गई।

गर्म हवा के लिए चर्चित फिल्मकार और इप्टा के उपाध्यक्ष साथी एम. एस. सथ्यू ने उद्घाटन भाषण देते हुए कहा कि वे 1960 में इप्टा में आए जब वे मुम्बई इप्टा की रिहर्सल देखा करते थे।

मौजूदा हालात का ज़िक्र करते हुए आपने कहा कि लड़ना आसान है पर शांति से बर्ताव करना मुश्किल है। टेकनोलॉजी के उपयोग से अब लड़ाई और भी  आसान हो गयी है है, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह गांधी का देश है। आज की सरकार शान्ति के आवरण को फाड़कर फेंक रही है। हमारी जिम्मेदारी बड़ी है। समाजवाद सबको बराबरी का मौका देता है, इसलिए हमें साम्प्रदायिकता के साथ-साथ जातिवाद से भी लड़ना है।  थिएटर दुनिया को बदल नहीं सकता पर यह इसके लिए प्रेरित कर सकता है।

मुझे उद्घाटन भाषण देने के लिए बुलाया गया। अच्छा होता कि मुझे भाषण देने के बदले नाटक करने के लिए बुलाया गया होता तो मैं अपनी बात बेहतर ढंग से रख पता।

राजेन्द्र राजन, महासचिव, प्रलेस  ने खा कि जब इप्टा का गठन नहीं हुआ था तब भी सांस्कृतिक जागरण का काम हम करते थे। प्रेमचन्द रंगशाला को मुक्त करने के लिए एक लम्बी लड़ाई हमने बिहार में लड़ी। लाठियाँ भी खाईं। लड़ाई की इस विरासत से जुड़े होने के कारण मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूँ। हम सर्जिकल ऑपरेशन में नहीं निदान में भरोसा करते हैं। प्रलेस दिशा देने का काम करता है। इस धारा को कुंद करने के प्रयास पिछले दिनों खूब हुआ। हम उनके लिए एक बेहतर दुनिया चाहते हैं जो भूखे सोते हैं। निश्चय ही उसमें अम्बानी अडानी शामिल नहीं हैं। हम एनजीओ कल्चर के विरुद्ध हैं। अनुदान कला के धार को भोंथरा कर रहा है। इप्टा और प्रलेस को मिलकर इन चुनौतियों का सामना करना है। लेखक और कलाकार को संगठित होकर लड़ाई लड़नी है। जब कबीर कहते थे कि 'दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवै' तो वह दरअसल उनका रोना नहीं होता था। वह विद्रोह का आह्वान करते थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि लडाई के गीत अब भी रचे जाएंगे और यह काम इप्टा के साथी ही कर सकते हैं।

इसके बाद अशोक नगर इप्टा द्वारा वामिक जौनपुरी का एक जनगीत "जब भी नाव चलती है" प्रस्तुत किया गया ।

साथी शमीम फैजी ने कामरेड बर्धन को याद करते हुए कहा कि वे ही मुझे इस आंदोलन में लेकर आए। मुझ जैसे कई युवा उनके ही कारण आंदोलन से जुड़े। वे सही मायनो में बहु-आयामी थे। अनेक आंदोलनों से जुड़े। साढ़े ग्यारह साल जेल में रहे। कोई 3 साल भूमिगत रहे। वे विचारों को बेहद सरल भाषा में रखते थे। वे आर्ट और कल्चर के साथ भी उतनी ही शिद्दत से जुड़े थे, जितने अन्य संघर्षो से। इसीलिए इप्टा से उनका जुड़ाव समझ में आता है। इसके सम्मेलनों में शिरकत की बागडोर मुझे सौंपते हुए हुए उन्होंने एक बार विनोद में कहा की मैं संस्कृति की बागडोर एक गैर सांस्कृतिक आदमी को सौंप रहा हूँ। साथी शमीम के वक्तव्य के बाद ए. बी. बर्धन के भाषण का एक अंश परदे पर दिखाया गया और उत्पल बेनर्जी ने फैज की एक नज्म 'हम देखेंगे' का गायन किया।

इप्टा के पूर्व महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी को याद करते हुए राकेश ने कहा कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दोस्त, एक साथी की चर्चा इस तरह से करनी होगी। बकौल दुष्यंत,"उखड़ गया है एक बाजू जबसे, और ज़्यादा वज़्न उठाता हूँ। अब ये दायित्व हम पर है कि उनकी अनुपस्थिति में ज्यादा जिम्मेदारी से काम करें। 57 में दिल्ली में पूर्व गठित इप्टा का आखिरी सम्मेलन हुआ था । 60 में इप्टा बिखरी। 85 में हम आगरा में मिले और कैफ़ी के नेतृत्व में ये कारवां जितेंद्र ने आगे बढ़ाया। बकौल राजेन्द्र यादव वे बड़े कथाकार हो सकते थे, वे बड़े अनुवादक हो सकते थे पर उन्होंने इप्टा के संघठन का जिम्मा चुना। इप्टा दरअसल उन्हें घुट्टी में मिली थी। राकेश के वक्तव्य के बाद जितेंद्र जी पर फ़िल्म दिखाई गयी, जिसका निर्माण दिलीप रघुवंशी ने किया है।

विनीत तिवारी के संक्षिप्त परिचय के बादव्अंधविस्वास निर्मूलन समिति, सांगली, महाराष्ट्र ने एक नाटक का मंचन किया। सोचने की आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता राजसत्ता के लिए खतरा होती है, इस बात को रेखांकित करते हुए नाटककारों ने कहा, तुम गोली चलाओगे, हम एक कविता लिखेंगे। तुम गोले दागोगे, हम एक नाटक खेलेंगे!











Saturday, October 1, 2016

इप्टा का 14 वां राष्ट्रीय अधिवेशन एवं जन सांस्कृतिक महोत्सव कल से इंदौर में

इंदौर, 1 अक्टूबर 16। भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का 14 वां राष्ट्रीय अधिवेशन एवं राष्ट्रीय जन सांस्कृतिक महोत्सव का उद्घाटन कल स्थानीय आनंदमोहन माथुर सभागृह में होगा। उद्घाटन सत्र की शुरूआत प्रातः 10 बजे से सुप्रसिद्ध फिल्मकार एवं इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री एम.एस. सथ्यू के उद्घाटन वक्तव्य से होगी। जन संस्कृति महोत्सव का उद्घाटन फिल्मकार आनंद पटवर्धन करेंगे। इस अवसर पर देश-विदेश के अन्य समानधर्मा संगठनों के प्रतिनिधियों द्वारा एकजुटता संदेश प्रेषित किया जायेगा। आयोजन में क्यूबा और वेनेजुएला के राजदूतों सहित देश भर के कोई 1000 प्रतिनिधि, रंगकर्मी, कलाकार, लेखक-कवि शिरकत करेंगे।

जन संस्कृति महोत्सव में नृत्य, नाटक, संगीत, चित्रकला, फोटोग्राफी, माइम, नृत्य-नाटिका, कविता पोस्टर प्रदर्शनी, चित्रकला प्रदर्शनी का समावेश होगा। दृश्य-श्रव्य प्रस्तुति होगी तथा विभिन्न पुस्तिकाओं, सीडी-आदि का विमोचन होगा। देशभर के कोई 20 राज्यों से इप्टा के प्रतिनिधियों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए रवाना होने की खबर है।

सम्मेलन में जो नामचीन शख्सियतें हिस्सा ले रही हैं, उनमें एम.एस. सथ्यू और आनंद पटवर्धन के अलावा रणबीर सिंह, वेदा-राकेश, अंजन श्रीवास्तव, नूर जहीर, सुमंगला दामोदरन, कुमार अंबुज, अली जावेद, पवन करण आदि के नाम भी शामिल हैं। कई सालों बाद इप्टा के पूर्व महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी की कमी इस अधिवेशन में खलती रहेगी। उन्हीं के कुछ दिनों बाद रंगचिंतक-अभिनेता जुगलकिशोर भी चल बसे थे। जितेंन्द रघुवंशी को श्ऱ़द्वांजलि स्वरूप उन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म प्रदर्शित की जायेगी और जुगलकिशोर की याद में उनके द्वारा निर्देशित नाटक ‘बह्म का स्वांग’ लखनऊ इप्टा द्वारा खेला जायेगा।

अधिवेशन का पूरा कार्यक्रम इस प्रकार है:  































































































































































इप्टा का 14 वां राष्ट्रीय अधिवेशन एवं जन सांस्कृतिक महोत्सव कल से इंदौर में

इंदौर, 1 अक्टूबर 16। भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का 14 वां राष्ट्रीय अधिवेशन एवं राष्ट्रीय जन सांस्कृतिक महोत्सव का उद्घाटन कल स्थानीय आनंदमोहन माथुर सभागृह में होगा। उद्घाटन सत्र की शुरूआत प्रातः 10 बजे से सुप्रसिद्ध फिल्मकार एवं इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री एम.एस. सथ्यू के उद्घाटन वक्तव्य से होगी। जन संस्कृति महोत्सव का उद्घाटन फिल्मकार आनंद पटवर्धन करेंगे। इस अवसर पर देश-विदेश के अन्य समानधर्मा संगठनों के प्रतिनिधियों द्वारा एकजुटता संदेश प्रेषित किया जायेगा। आयोजन में क्यूबा और वेनेजुएला के राजदूतों सहित देश भर के कोई 1000 प्रतिनिधि, रंगकर्मी, कलाकार, लेखक-कवि शिरकत करेंगे।

जन संस्कृति महोत्सव में नृत्य, नाटक, संगीत, चित्रकला, फोटोग्राफी, माइम, नृत्य-नाटिका, कविता पोस्टर प्रदर्शनी, चित्रकला प्रदर्शनी का समावेश होगा। दृश्य-श्रव्य प्रस्तुति होगी तथा विभिन्न पुस्तिकाओं, सीडी-आदि का विमोचन होगा। देशभर के कोई 20 राज्यों से इप्टा के प्रतिनिधियों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए रवाना होने की खबर है।

सम्मेलन में जो नामचीन शख्सियतें हिस्सा ले रही हैं, उनमें एम.एस. सथ्यू और आनंद पटवर्धन के अलावा रणबीर सिंह, वेदा-राकेश, अंजन श्रीवास्तव, नूर जहीर, सुमंगला दामोदरन, कुमार अंबुज, अली जावेद, पवन करण आदि के नाम भी शामिल हैं। कई सालों बाद इप्टा के पूर्व महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी की कमी इस अधिवेशन में खलती रहेगी। उन्हीं के कुछ दिनों बाद रंगचिंतक-अभिनेता जुगलकिशोर भी चल बसे थे। जितेंन्द रघुवंशी को श्ऱ़द्वांजलि स्वरूप उन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म प्रदर्शित की जायेगी और जुगलकिशोर की याद में उनके द्वारा निर्देशित नाटक ‘बह्म का स्वांग’ लखनऊ इप्टा द्वारा खेला जायेगा।

अधिवेशन का पूरा कार्यक्रम इस प्रकार है: