Monday, August 22, 2016

एक थे परसाई

-हनुमंत शर्मा 
एक थे परसाई | उनसे यूँ तो 'फेस टू फेस' कभी मिलना नही हुआ | बस किताबों और अखबारों के मार्फ़त ही उनसे मुलाकात थी | उन्हें हाईस्कूल के दिनों में पहली बार पढ़ा तो लगा बायोलोजी की प्रयोगशाला में मेढक की जगह किसी ने समाज को रख दिया है | चीर फाड़ कर आँत अंतडिया सब बाहर बिखेर दी और बता दिया कि ये है अंदर की सच्चाई | कोई अलीबाबा था जो कहता था खुल जा सिम सिम और छुपे खजानों के दानवी दरवाजे खुल जाते थे सो हम भी जिन्दगी के पेच फसने पर परसाई की तरफ देखते और पेच मानो उल्टा घूमना शुरू हो जाता |

हमारे घर, पड़ोस ,दुकान और दफ्तर सब की शक्ल यहाँ देखी पहचानी जा सकती थी | ‘वैष्णव की फिसलन’ वाला बनिया हमारे मोहल्ले का ही पंजवानी सेठ था| ‘तट की खोज’ वाली शीला बुआ में अपने मित्र की बड़ी बहन दिखती थी | ‘ दो नाक वाले लोग’ को पढ़ता तो अपने माँ पिता की याद आने लगती और ‘ठंडा शरीफ आदमी’ तो मानो मेरा अपना ही बयां था | छोटे छोटे वाक्य छोटे छोटे वाकये और तिलमिलाती छीटांकशी वाला परसाई का अंदाज़ सब मिलकर एक बड़ा प्रभाव पैदा करते | और सच ये है कि परसाई को लिखा ढूँढ ढूँढ कर पढ़ने की एक चरसी लत सी लग चुकी थी | लेकिन दूसरे नशे जहाँ हमें बेहोशी की और के जाते हैं, यह नशा नींद और बेहोशी का दुश्मन था | उन्हें पढ़ने के बाद एक बैचनी भीतर से जकड़ लेती , नींद सी उड़ जाती | उन्हें पढ़ने के बाद वैसा रह पाना मुश्किल था जो हम पढ़ने के पहले थे | उनकी भाषा ,उनका फार्म उनके विचारों का तीव्र संक्रमण करते थे | यदि पाठक में संवेदना की ज़रा भी सम्भावना शेष है तो उसकी ‘स्थित प्रज्ञता’ टूटनी तय है' |

परसाई ने मास्टरी से क्लर्की ,क्लर्की से पत्रकारिता ,पत्रकारिता से स्वतंत्र लेखन तक कई बार पेशा बदला किन्तु उनका अंदाज़ पहले वाला ही रहा यानी कि मास्टराना | छड़ी मार हिटलरी मास्टर नहीं बल्कि कलम से चीर फाड़ कर जगत जीवन के सत्य उद्घाटित करता मेढक फाडू मास्टर | कबीर जिसे लुकाठा कहते हैं वो परसाई के यहाँ कलम है | वो अपना अंदाज़े बयां भी कबीर की परम्परा से ग्रहण करते हैं | जो उन तक भारतेंदु ,बालमुकुंद गुप्त, शिवपूजन सहाय, पाण्डेय बैचेन शर्मा उग्र और निराला से होते हुए पहुँची थी | कबीर की यह चेतना परसाई के लेखन में सहस्त्र मुख वाला विराट दर्शन देती है | किन्तु इस विराट पने के दवाब में वे दूसरे व्यंगकारों की तरह सिनिकल या दार्शनिक रूप से अस्थिर नहीं हो जाते | विचारों और सिद्धांतों की चूल से उनका लेखन कभी नहीं खिसकता |वे हर खतरे का डटकर मुकाबला करते है | कबीर की तरह कलम को लुकाठे की तरह इस्तेमाल करते हुए | “इंदिरा गांधी से एक भेंट” में वे स्वयम लिखते हैं “ मै वही कबीरदास हूँ लेकिन बीसवी सदी का |”

चेखव ने कहा था कि सुखी आदमी दुःख का साहित्य लिखता है और दुखी आदमी हास्य व्यंग्य लिखता है | परसाई ने व्यंग्य लिखा तो क्या वे दुखी आदमी थे? बेशक हाँ | किन्तु उनका दुःख चलताऊ दुःख नहीं था | वह उपरी कमाई के लिए विह्वल सरकारी बाबू या धनिये में लीद मिला रहे बनिए का दुःख भी नहीं था | वह माया से घबराये मोक्ष पिपासु भक्त का दुःख भी नहीं था | कबीर की तरह उनका दुःख भी पंचमकार में डूबे सुखिया संसार को नींद में गाफिल देखकर उपजा था | जिसके लिए अपने लेखन में वे जागते रहे और रोते रहे | उनका दुःख उन्हें निराशा ,अवसाद, या आत्मघात की और नहीं ले जाता बल्कि उल्टे उत्कट जिजीविषा से भर देता है | दुःख ही उन्हें दुःख के कारणों की तह तक ले जाता है | और व्यंग्य की निगेटिव चेतना पाजिटिव बन जाती है | ज्ञानरंजन के साथ एक बातचीत में वे इसका खुलासा करते हुए कहते हैं कि वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि वह दुखी है कि इतना बुरा क्यों हुआ | वह एक बेहतर मनुष्य, एक बेहतर समाज व्यवस्था के प्रति आस्था रखता है इसलिए जो बुराई उसे दिखती है उसे इंगित करता है |

यही वो सूत्र है जो परसाई के व्यंग्य को एक प्रतिक्रिया मात्र होने से बचाता है | वह एक नुक्ताए नज़र के रूप में आता है | उसका ढांचा साहित्यक है किन्तु वह खड़ा जिस क्षेत्र में है वो समाजशास्त्रीय है | उनके औज़ार वैज्ञानिक भौतिकवादी हैं | साहित्य , समाजशास्त्र और वैज्ञानिक भौतिकवाद यही है वो थ्री इन वन फार्मूला जिसकी सहायता से अपना रचना संसार रचते हैं | यहाँ गलदश्रु भावुकता या हास्य विलगित फूहड़ता के लिए कोई जगह नहीं है | क्रोध, करुणा ,आंसू, हास्य सभी यहाँ उदात्त रूप में हैं | वे पराजित मनुष्य की बेबसी पर नहीं हसँते अपितु करुणा के साथ उसके पक्ष में खड़े दिखते हैं | हास्य उनका धेय्य भी नहीं था | शुरुआत में जब उनका परिचय ‘फनी राइटर’ के रूप में दिया गया तो उन्होंने उसका इतना तगड़ा प्रतिवाद करते हुए कहा कि यदि मेरे लेखन को पढकर हँसी आती है तो मेरे लिए शर्मनाक है | इस प्रतिक्रिया में जब उन्हें हास्य विरोधी घोषित किया गया तो ‘ वन मानुस नहीं हँसता’ जैसे लेख लिखकर उन्हें सफाई देनी पड़ी | जिसमे वे ‘जोनाथन स्विप्ट’ के इस फलसफे से सहमत नज़र आते हैं कि जितनी देर तक आदमी हँसता है उतनी देर तक उसके मन में मैल नहीं रहता , उसका कोई शत्रु नहीं होता |इस तरह हसँना मन की निर्मलता है | पर परसाई निर्मल हँसी से हटकर इर्ष्या और द्वेष की हँसी को भी लक्ष्य करते हैं | वे इसे लकडवग्घे की हँसी कहते हैं | और ऐसी हँसी को गोली मार देने का फरमान ही उनका लेखन है| उनका समूचा लेखन समाज के अतरे खोतरे में छुपे लकड वग्घे की शिनाख्त और उसे बेनकाब करने का उपक्रम है |परसाई ने अपने आप को डी क्लास किया और अपनी वर्ग चेतना को समाज के संघर्षों से जोड़कर धारदार बनाया | वे शहर के श्रमिक आंदोलन से जुड़े| मुक्तिबोध से जुड़कर मार्क्सवाद का पाठ पढ़ा और कलम को लड़ाई का हथियार बनाया अपने लिए नहीं उत्पीडत की और से लड़ने के लिए | परसाई ने कालजयी साहित्य लिखने के स्थान पर कालम ,स्तम्भ , पूछिये परसाई से , कबीरा खड़ा बाज़ार में लिखने की राह पकड़ी | 

उनकी पक्षधरता घोषित है | वे ‘रामदास’ के साथ खड़े दिखते हैं तो इसलिए कि रामदास ने नाकामयाबी में भी सपने देखने नहीं छोड़े हैं | सपने हैं तो बदलाव की उम्मीद भी है | किन्तु ‘एक तृप्त आदमी की कहानी’ के मास्टर नंदलाल शर्मा के मध्यवर्गीय लिजलिजेपन के खिलाफ वे जलता लुकाठा लेकर पिल पड़ते हैं | वे निष्क्रिय ईमानदारों , ठंडे शरीफ आदमियों को न केवल चीन्ह लेते हैं उनकी नैतिकता , सिद्धांतवादिता ,महानता की चादर को तार तार कर देते हैं | ऐसे दुचितेपन , अवसरवादिता , काइयापन के ऊपर उनका गुस्सा आसमानी कहर की तरह टूट पड़ता है |

स्कूल मास्टर नंदलाल शर्मा धार्मिक , नैतिक , आत्म संतोषी हैं | वे पूरे देवता हैं |राजनीति से विरक्त | हड़ताल में भाग नहीं लेते | मेहनत से पढाते हैं |कभी कोई शिकायत नहीं करते |उन्हें कोई जगत गति नहीं व्याप्ति | किन्तु देवता होकर भी क्या वे मनुष्य हैं ? परसाई लिखते हैं “ एन. एल. मास्टर झरना है रेगिस्तान का | उसे देख लेने से ऐसा लगता है कि तीर्थ स्नान कर लिया हो | वह पूर्ण तृप्त आदमी है |उसे कोई भूख नहीं है |”
ऐसे पूर्ण तृप्त आदमी परसाई की नज़र में बीमार हैं |आवेशहीन, सम्वेदना से रहित , क्रिया प्रतिक्रिया से विमुख मात्र ‘बायोलोजिकल बीइंग’परसाई की नज़र में एक रीढ़ विहीन केचुआ है , जो पांव के नीचे आ जाता है तो वे पूछते हैं ‘वो क्या था ?’ छटपटाहट से मुक्त यथास्थ्तिवादी निष्क्रिय बुद्धिजीवी यही है |

दरअसल परसाई की वर्ग चेतना संपन्न दृष्टि ही उन्हें रोजमर्रा की मामूली बातों का बड़ा रचनाकार बनाती है |इसी के बूते वे प्रेमचन्द की परम्परा का बेटन लेकर आगे दौड़ जाते हैं | ‘महाजनी सभ्यता’ और ‘मंगलसूत्र’ से जकड़ा देहाती हिंदुस्तान परसाई तक आते आते आज़ाद तो होता है किन्तु आपातकालीन भी हो जाता है | मूल्यों की टकराहट में जहाँ नए मूल्यों का निर्माण होता है | संस्कारों , शास्त्रों और व्यवहार में गडबड झाला हो जाता है |राजनीति, धर्म ,दर्शन , शिक्षा ,कानून गोया जीवन के हर अनुशासन में टूट- फूट , बनाव- बिखराव दिखता है |इसी संधि पर खड़ा हिंदुस्तान परसाई की रचना भूमि है | वे सडांध मारती जगहों से नाक पर रुमाल रखकर गुजर जाने की जगह गंदगी को साफ़ करने में यकीन करते हैं | विद्रूपताओं पर प्रहार करते समय ज़ाहिर है उनका लहजा सख्त हो जाता है और सोंद्रयबोध भी ऐसा जो आभिजात्य को भदेस दिखाई दे | यद्यपि वो भदेस नहीं है किन्तु अंतिम छोर पर खड़े आदमी के वस्तुवादी नज़रिए से स्थितियों को देखने का सहज परिणाम है | यही कारण है कि पाखाने के मारे आदमी को सूर्य भी परमात्मा का लोटा नज़र आता है जिसे लेकर परमात्मा क्षितिज के नाले में उतर जाता है |

वस्तुत: सोंदर्य या शिल्प परसाई की चिंता के केन्द्र में नहीं है, अपितु सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन है | वे अमर होने के लिए नही लिखते ,इसलिए लिखते हैं कि मरे हुए नहीं जीना चाहते | सट्टा फिगर लगाकर शाश्वत लिखने वालों के स्थान पर उन्होंने रोज मरने वाले रोजमर्रा के विषयों को चुना क्योंकि साहित्य उनके लिए सबके साथ मुक्ति का मध्यम है | उन्होंने लिखा “जो अपने युग के प्रति ईमानदार नहीं है ,वह अनन्त ककल के प्रति क्या ईमानदार होगा |”

सो वर्तमान को ठोकना बजाना ही परसाई के भविष्य गढ़ने का तरीका है | इस ठोकने बजाने में वे तटस्थ या निस्पृह भी नहीं रहते , ना ही अपने पाठक को रहने देते हैं | वे पत्रकार की तरह सच्चाई के संवाददाता ही नहीं बने रहते अपितु लुटे पिटे आदमी के पेरावीकर्ता भी बनते हैं | और ज़रुरी हो तो अपना फैसला भी सुना देते हैं | हम चाहें तो इसे लेखक का सर्वसत्तावाद कह सकते हैं किन्तु इसकी परवाह परसाई जैसों को नही होती| वे स्वयं को कहते थे कि लेखक छोटा हूँ पर संकट बड़ा हूँ | व्यवस्था के लिए ये बड़ा संकट उन्होंने लेखन में अपनी इसी भूमिका के चलते निर्मित किया था |

राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने एक लेख में परसाई की तुलना राजकुमारों को शिक्षा देने वाले “विष्णु शर्मा” से की है | राजकुमार “ विष्णु शर्मा” की शिक्षा से राज-काज में कितने शिक्षित हुए इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता किन्तु यदि हम परसाई को पढ़ने के बाद हममें राजकाज और समाज को बदल देने की हूक नहीं उठती तो हमारे मनुष्य ना होने के लिए कोई प्रमाण आवश्यक नही है |

Monday, August 8, 2016

नागर की नगरिया किस्सों की अटरिया

. सारिका श्रीवास्तव
जुलाई 2016, इंदौर, मध्य प्रदेश।  उनका संबंध सिर्फ़ संगठन तक का संबंध नहीं था। उस दौर में संबंध वैसे होते ही नहीं थे। जो लोग एक मकसद लेकर चलते थे, वे चाहे सिनेमा में हों या कविता, कहानी, नाटक, चित्रकला या फोटोग्राफी या नृत्य या राजनीति में, उनके संबंध एक अलग धरातल पर चलते थे। बलराज साहनी, जिनकी जन्म शताब्दी अभी दो वर्ष पहले ही गुजरी है और अमृतलाल नागर, जिनका जन्म शताब्दी वर्ष अभी आरंभ हुआ है, पर आधारित भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा), इंदौर का कार्यक्रम बीते दौर को सिर्फ़ एक श्रृद्धांजलि देना भर नहीं था, बल्कि वहाँ से सीख हासिल कर अपने वक़्त में रचनात्मक हस्तक्षेप की ज़रूरत को नये संदर्भों में पूरा करना भी था। क़रीब पाँच घंटे तक चले इस कार्यक्रम का संयोजन इप्टा के कला मानकों के मुताबिक ही किया गया था। इसमें फ़िल्म थी, नाटक था, संस्मरण था और इन विभिन्न कला रूपों को एक सूत्र में पिरोता प्रगतिशील विचार था।

इप्टा का चौदहवाँ राष्ट्रीय सम्मेलन इंदौर में 2, 3 और 4 अक्टूबर को होना है। शहर में इप्टा का माहौल बनाने के लिए सालाना शिविर के अलावा इंदौर इप्टा अनेक छोटे-छोटे कार्यक्रमों को आयोजन पिछले 3-4 माह से कर रही है। अमृतलाल नागर और बलराज साहनी पर केन्द्रित 22 जुलाई 2016 का कार्यक्रम एक तरह से तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन और राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सव का पूर्वरंग था। क़रीब छः सौ दर्शकों ने चार घंटे का कार्यक्रम देखा और सराहा। इसके अलावा नागर जी की पुत्रवधू शरद नागर जी की पत्नी विभा नागर और विभाजी और शरदजी की बेटी ऋचा नागर की उपस्थिति को भी दर्शकों ने आत्मीयता से स्थान दिया।


बलराज साहनीः एक दृश्य-श्रव्य प्रस्तुति
स्वागत की पारम्परिक लंबी औपचारिकता को दरकिनार करते हुए इप्टा के युवा साथियों द्वारा अतिथियों को फूल भेंट कर कार्यक्रम की शुरुआत इंदौर इप्टा की ओर से जया मेहता और विनीत तिवारी द्वारा बलराज साहनी के जीवन पर आधारित दृश्य-श्रृव्य जीवन चित्र की प्रस्तुति से हुई। करीब 50 मिनिट की इस प्रस्तुति में बलराज साहनी के जीवन और सजग राजनीतिक चेतना संपन्न कलाकार के तौर पर उनके विकास को उन्हीं की फ़िल्मों के टुकड़ों से जया मेहता ने इस तरह बुना कि वह अपने आप में एक ही फ़िल्म लगने लगी। इप्टा को आगे बढ़ाने में बलराज साहनी और उनकी पत्नी दमयंती की भूमिका, सन् 1943 में अंग्रेजों और सेठ-साहूकारों द्वारा निर्मित किए बंगाल के अकाल, किसानों की बदहाली और बदहाली से निपटने के सामूहिक उपाय जहाँ इप्टा की ख्वाज़ा अहमद अब्बास निर्देशित बलराज साहनी की पहली फिल्म ‘‘धरती के लाल’’ के ज़रिये दर्शाये गए, वहीं बिमल रॉय निर्देशित फ़िल्म ‘दो बीघा जमीन’ में उन्हीं किसानों की दुर्दशा का चित्रण तो बहुत मार्मिक और प्रभावी तरह से हुआ लेकिन अंततः बिमल रॉय का किसान हारकर निराशा के गर्त में अनिश्चित भविष्य की ओर चला जाता है जबकि इप्टा की फ़िल्म में वही किसान हालात से पूरे गाँव के लोगों की एकता कायम कर लड़ता है और जीतता है। वो भी अकेले नहीं, सबके साथ। ‘गरम हवा’ यूँ तो 1973 में मशहूर फ़िल्म निर्देशक और इप्टा के मौजूदा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एम. एस. सथ्यू की सांप्रदायिकता के ज़हर पर बनी फ़िल्म है और उसमें भी आगरा इप्टा की पूरी टीम ने ही मदद की थी लेकिन उस फ़िल्म में बलराज साहनी ने जो किरदार निभाया है वो उनकी निजी ज़िंदगी के हादसात की कहानी कहता है। 

इस प्रस्तुति में बलराज साहनी की आम लोगों के मन में ‘वक़्त’ फ़िल्म के किरदार की और लोकप्रिय गीत ‘ऐ मेरी जौहरज़बीं’ की याद तो की ही गई लेकिन साथ ही परदे के पीछे की उनकी क्रांतिकारी और वामपंथी छबि भी पुरज़ोर तरह से प्रस्तुत की गई। कम ही लोगों को यह पता होगा कि किस तरह 1946 में नाविक विद्रोह के समय बलराज साहनी ने अंग्रेजों के ख़िलाफ़ आंदोलनकारियों की मदद की भूमिका निभाई और कैसे वे अंत तक अपनी वामपंथी विचारधारा का निर्वाह पंजाब के किसानों के बीच जाकर उनके दुःख सुख में शामिल होकर भी करते रहे।

इस डॉक्युमेंट्रीनुमा प्रस्तुति की संकल्पना और निर्देशन किया जया मेहता ने और स्क्रिप्ट लिखने व कमेंट्री को अपनी आवाज़ देने की भूमिका निभाई विनीत तिवारी ने। तकनीकी सहयोग आमिर सिद्दीकी और नितिन बेदरकर का रहा। 

अमृतलाल नागरः दादाजी, शोधार्थी, लेखक और शिक्षक
इसके बाद नागरजी की पोती ऋचा नागर ने अमृतलाल नागर की जिंदगी के कुछ पहलूओं पर रोशनी डालते हुए बताया कि बंगाल के जिस अकाल ने बलराज साहनी पर गहरा असर डाला था उसने ही अमृतलाल नागर को उनका उपन्यास ‘भूख’ लिखने के लिये भी प्रेरित किया था। नागरजी और साहनीजी अच्छे दोस्त थे और नागरजी हम बच्चों से बलराज जी का ज़िक्र करते समय अक्सर कहते थे कि बलराज साहनी को वे अपने बड़े भाई की तरह मानते थे। नागरजी की पोती होने के साथ ही ऋचा स्वयं हिंदी और अंग्रेजी की अच्छी लेखिका हैं और उन्होंने अमेरिका के मिनेसोटा विश्वविद्यालय में प्रोफेसर होने के बाद भी भारत में महिलाओं के संगठनों और आंदोलनों से जीवंत रिश्ता बनाये रखा है। 

ऋचा ने रामविलास शर्माजी के एक लेख के जरिए अमृतलालजी को दर्शकों से रूबरू करवाया जिससे दर्शक और श्रोता उनके पहनावे, आदतों और एक अलहदा मौजी व्यक्तित्व से परिचित हुए। उन्होंने बताया कि गुजराती भाषी होने के साथ-साथ उन्हें हिन्दी, मराठी, तमिल, ब्रज, अवधी, बंगाली के साथ ही साथ संस्कृत और उर्दू भी बहुत अच्छी तरह से आती थी। इन बोलियों, भाषाओं के साहित्य के अलावा इतिहास और पुरातत्व में भी उनकी खासी दिलचस्पी थी। उन्होंने ”चकल्लस’’ नामक किताब जो साधारण बोलचाल की भाषा में थी, भी निकाली। नागरजी को फ़िल्म की डबिंग के काम में भारत में ‘‘पायनीयर’’ माना जाता है। अपने फ़िल्मी जीवन में उन्होंने दो रूसी फ़िल्में और एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी की तमिल फ़िल्म ‘मीरा’ की डबिंग की।

उस समय की परिस्थितियों के बारे में चर्चा करती ऋचा बताती हैं कि ऐसा नहीं है कि पूंजीवाद और उससे प्रेरित प्रतिस्पर्धा फ़िल्म इन्डस्ट्री में तब मौजूद नहीं थे, लेकिन उस वक़्त के सामाजिक संघर्ष ने सामूहिक कल्पना और सृजन के एक ज़बर्दस्त दौर को जन्म दे दिया था। इस दौर में जहाँ एक ओर अलग-अलग जगहों की ज़बानों, साहित्य, काव्य, तथा संगीत का समन्वय हो रहा था वहीं कलाकार भी आपस में एक परिवार की तरह जुड़ रहे थे। नागरजी के इस परिवार के सदस्यों में बलराज साहनी के अलावा किशोर साहू, वीरेन्द्र देसाई, सरदार अख़्तर, नलिनी जयवन्त, लीला चिटनिस, राजा बढ़े, सुमित्रा नन्दन पन्त, नरेन्द्र शर्मा, एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी, उदय शंकर, अमला शंकर और उदय तथा अमला शंकर के पुत्र आनन्द शंकर शामिल थे।

ऋचा ने नागर जी के कुछ पत्रों के वाचन किया। शरद नागर की सद्यप्रकाशित संस्मरणात्मक पुस्तक ‘‘मैं और मेरा मन’’ जिसका संपादन ऋचा नागर ने ही किया है, में से उन्होंने वे अंश भी सुनाये जिनमें पत्रों के ज़रिये नागरजी ने अपने बच्चों को सिर्फ़ संस्कार ही नहीं दिये बल्कि समाज और उसकी राजनीति के सारे पहलुओं को खोलकर रखते हुए उन्हें रास्ता भी दिखाया। 

ऋचा ने अमृतलाल नागर के व्याख्यानों पर आधारित लेख ‘‘नाटक लिखने के कुछ गुर’’ के कुछ अंश लोगों तक पहुँचाते हुए अपनी बात शुरु की ‘‘नाटक की बात करने से पहले चलो हम चारपाई की बात कर लें। चारपाई बनी होती है चार पाटियों और चार पायों की और पाटियों को पायों से जोड़ने के लिये छेद यानी चूलें भी होना चाहिये नहीं तो खटिया नहीं बनेगी। फिर उसको बुनने के लिये बाँध का ताना-बाना बनाना पड़ेगा। यही चारपाई समझ लो तुम्हारा नाटक है, तुम्हारी पाटियाँ हैं तुम्हारे पात्र। अब वो पाटियाँ पाये में बँधेंगी क्योंकि जब तक उनको धरातल नहीं मिलेगा पाटियाँ बेकार हैं। तो पाया है कथावस्तु, यानि नाटक का तत्व। जब तक चूल से चूल बराबर नहीं बैठेगी तो बात कैसे बनेगी? ऐसे ही पात्र भी पात्र के साथ जुड़ने चाहिये। सबसे पहले पात्रों का स्वरूप होने का आधार चाहिये यानि ‘थीम’ या कथावस्तु चाहिये ताकि पात्र एक दूसरे से वैसे ही जुड़ जायें जैसे चूल से चूल जुड़ती है--क्योंकि अगर चूलें आपस में सही ढंग से न जुड़ सकीं तब तो खटिया एक तरफ से ऊँची दूसरी तरफ से नीची रह जायेगी। इसलिए खटिया एक सी होनी चाहिये। ताकि जहाँ उसे बिछाओ वह सलोतर बैठे। ऊँची-नीची न हो। इसी तरह पात्रों को भी समतल दो ताकि नाटक जमे।’’

परकाया प्रवेश नाटक का मूल है इस पर अमृतलाल नागर कहते हैं कि नाटककार के रूप में अभिनय तुमको नहीं करना है लेकिन दिमाग़ में जब तक तुम खुद अभिनय नहीं करोगे तब तक अभिनेता कैसे करेगा? इसलिए नाटककार पहले अभिनय भी करता है। ‘कैरेक्टर’ की खू़बियाँ-ख़ामियाँ अपने मन में इकट्ठा करेगा तभी ‘कैरेक्टर’ ज़िन्दा होगा। अगर तुम पात्र में डूबे नहीं तो तुमको क्या मिला? यदि तुम पात्र के अनुरूप नहीं बोले तो पात्र स्वाभाविक नहीं लगेगा। जब तुम उसके अनुरूप बोलोगे तो पाओगे कि ‘डायलॉग्स’ तुम्हारे दिमाग़ के नहीं रह जायेंगे बल्कि खुद-ब-खुद पात्र के दिमाग़ के हो जायेंगे। किन्तु पराये मन में प्रवेश तुम तभी कर सकोगे जब तुम अपना ‘आब्ज़रवेशन’ बढ़ाओगे। ‘क्रियेटिव माइण्ड’ का नाम ही है ‘क्रियेटिव ईगो’। ‘क्रियेटिव ईगो’ जितनी मज़बूत होगी उतना ही अच्छा तुम्हारा लेखन होगा।

अमृतलाल नागर भारतीय जन नाट्य संघ(इप्टा) के अध्यक्ष मंडल के सदस्य ही नहीं रहे बल्कि इप्टा के लिए अनेक नाटक लिखे और निर्देशन भी किया। रज़िया सज्जाद ज़हीर ने 1953 में प्रेमचंद की कहानी ‘‘ईदगाह’’ का नाट्य रूपांतर किया था और नागर साहब ने निर्देशन। इसी नाटक के प्रदर्शन पर इप्टा के स्थानीय लोगों को तीन साल तक मुकदमा झेलना पड़ा। बाद में उच्च न्यायालय ने न केवल आयोजकों को बरी किया बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगाने वाले अंग्रेजों के बनाए काले कानून को ही खारिज कर दिया।


नागर की नगरिया, किस्सों की अटरिया
इस दिन की तीसरी प्रस्तुति थी हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार पद्म भूषण श्री अमृतलाल नागर की तीन कहानियों ‘शकीला की माँ’, ‘क़ादर मियाँ की भौजी’ और ‘मोती की सात चलनिया’ को एक में पिरोकर बनाए नाटक ‘‘नागर की नगरिया, किस्सों की अटरिया’’ पर मुम्बई परख समूह के कलाकारों की नाट्य प्रस्तुति। यह नाटक नागरजी के प्रति, खासतौर पर उनके शताब्दी वर्ष में उनके रचनात्मक जीवन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है। करीब एक घंटे की अवधि के इस नाटक को निर्देशित किया नाट्य लेखक और नाट्य निर्देशक तरूण कुमार ने।

नाटक में 60-70 बरस पुराना लखनऊ है जिसका माहौल रचने में निर्देशक तरुण कुमार कामयाब रहे। लखनऊ की बोलचाल का खास लहजा, जिसमें उर्दू के साथ अवधी का मीठा मिश्रण और फिर उस लहजे में लच्छेदार बातें करने वाले किरदार। नाटक के पात्रों की सधी हुई लखनवी बोली के साथ ही साथ सधे हुए अभिनय ने लोगों को अपनी जगह से हिलने का मौका भी ना दिया। हर पात्र की अपनी कहानी, उसका दर्द और तकलीफ को कलाकारों ने बखूबी निभाया। उस दौर के बाजार का दृश्य जिसमें खोमचे वाले, फेरी वाले सामान बेच रहे हैं या भौजी के घर में पान खाते कादिर मियाँ या तांगेवाले की किस्सागोई सब कुछ रोचक और जीवंत था।

तीनों ही कहानियों की बुनावट अलग-अलग महिला पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है। ‘शकीला की माँ’ जमीलन हो, ‘कादर मियाँ की भौजी’ में भौजी हो या ‘मोती की सात चलनिया’ की डॉ. निगार जैसी पढ़ी-लिखी महिला समाज के तानों-बानों में उलझी हैं। उनकी घुटन और छटपटाहट की पीड़ा को अपने अभिनय से बखूबी पेश किया उन किरदारों को निभाने वाले कलाकारों क्रमशः लीना बलोदी, मीनू शर्मा और सोहनी नियोगी ने। इसके अलावा शहजादी के किरदार में अनामिका, मोहम्मदी के किरदार में रैना, कादिर मियाँ के मनोज सिंह और इशरत के किरदार में शुभम चाँदना ने अपने किरदार को जीवन्त कर दिया और अन्य किरदारों का अभिनय भी सहज रहा। सोहनी के गायन ने नाटक की छोटी-मोटी खामियों को भी भुला दिया।

तरूण कुमार ने तीनों कहानियों को रंगमंचीय तत्वों के साथ इस तरह से गूंथा कि लखनऊ की जीवंतता, किरदारों की तमाम रंगतें, उनके बदलते रिश्ते और उनमें छिपी मानवीय करूणा संगीत के सही जगह पर इस्तेमाल से सामने आई। खास दृश्यों की सघनता को बढ़ाने के लिए प्रकाश समंजन ने दृश्यों को बेहतरीन बनाया।

आनंद मोहन माथुर सभागृह में आयोजित इंदौर इप्टा के इस कार्यक्रम में शहर के गणमान्य नागरिकों के साथ-साथ रंगमंच एवं कला की तमाम विधाओं से जुड़े कलाकारों ने शिरकत की और सभी को कार्यक्रम बेहद पसंद आया। 

इंदौर इप्टा के संरक्षक वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद मोहन माथुर स्वयं भी इस कार्यक्रम में उपस्थित रहे। पेरिन दाजी, वसंत शिंत्रे, सरोज कुमार, तपन मुखर्जी, सुशील जौहरी, अनन्त श्रोत्रिय, उत्पल बैनर्जी, जितेन्द्र वेगड़ और इंदौर के अलग-अलग नाट्य समूहों के रंगकर्मी भी मौजूद रहे। कार्यक्रम को कामयाब बनाने में प्रमोद बागड़ी, अशोक दुबे, अरविंद पोरवाल, पूजा सेरोके, राज, साक्षी, एस. के दुबे, आनंद मोहन माथुर, अब्दुल भाई, चुन्नीलाल वाधवानी, संजय वर्मा, अभय नेमा, आबिद आदि का विशेष योगदान रहा।

Saturday, August 6, 2016

प्रेमचंद जयंती पर प्रलेस इंदौर ने किया नाटक और परिचर्चा का आयोजन

- अभय नेेमा

इंदौर। प्रेमचंद की कहानियों का रचनाकाल कोई 70 साल पहले का है और उनकी कहानियां आज भी समीचीन हैं। प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में सांप्रदायिक सद्भाव और दलित उत्पीड़न के जिस मसले को उठाया था वह आज भी समाज में मौजूद हैं। प्रेमचंद ने अपने समय में दलितों की सामाजिक और आर्थिक बदहाली का जिक्र किया था वह आजादी के बाद भी न केवल बनी हुई है अब उसे और पुख्ता करने का प्रयास किया जा रहा है। यह बात प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य और स्वतंत्र पत्रकार जावेद आलम ने महान उपन्यासकार और कहानीकार तथा प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक प्रेमचंद की जयंती पर 31 जुलाई को आयोजित कार्यक्रम में कही। प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई ने वर्चुअल वोयेज कालेज के सहयोग से प्रेमचंद की कहानियों के नाट्य रूपांतरण और प्रेमचंद के कृतित्व पर परिचर्चा आयोजित की थी।

वर्चुअल वोयेज कालेज में आयोजित इस कार्यक्रम में जावेद आलम ने कहा कि पंचपरमेश्वर में सांप्रदायिक सदभाव की मिसाल मिलती है तो कफन और ठाकुर का कुआं जैसी कहानियों में तत्कालीन समय में दलित समुदाय की दुर्दशा का वर्णन मिलता है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि समाज की विसंगतियों के देखने के लिए उन्हें गांव जाना चाहिए और हमारे देश की बुनियादी समस्याओं को समझने के लिए उन्हें प्रेमचंद के साहित्य का पठन जरूर करना चाहिए जो कि इंटरनेट पर उपलब्ध है।

कहानीकार रवींद्र व्यास ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियां व्यक्ति विशेष का दर्शन नहीं है, बल्कि उस वक्त की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी है। प्रेमचंद अपने कथा संसार में बड़े रचनात्मक ढंग से प्रगतिशील विचार का प्रतिफलन करते हैं। कफन में वे जमींदारी और सामंतवादी व्यवस्था में एक दलित व्यक्ति का अमानवीयकरण देखते हैं। इसी तरह से पंच परमेश्वर में वे न्याय प्रक्रिया को जाति और धर्म के बरक्स देखते हैं। पंच की कुर्सी पर बैठने वाला किस तरह से किसी जाति और धर्म का न होकर सिर्फ न्यायाधीश रह जाता है आज के संदर्भ में प्रेमचंद द्वारा यह सत्ता द्वारा न्यायिक व्यवस्था का इस्तेमाल करने पर तीखी टिप्पणी है। इसी तरह से ईदगाह नामक कहानी में एक बच्चे का बाजार के प्रति प्रतिरोध दिखाई देता है। उसे बाजार के सारे प्रलोभन खिलौने, मिठाइयां, कपड़ों, झूलों के बजाए अपनी दादी के हाथ जलने का ख्याल आता है और वह उनके लिए चिमटा खरीदता है। प्रगतिशील मूल्य प्रेमचंद की रचनाओं में नारे की तरह नहीं बल्कि नेरेशन में आते हैं। उनकी कहानियों उपन्यासों में नियंत्रित, संयमित करुणा व्यक्त हुई है।



इस अवसर पर वर्चुएल वोयेज के पर्फार्मिंग आर्ट विभाग के विद्यार्थियों ने प्रेमचंद की कहानी कफन और पंच परमेश्वर पर नाटक प्रस्तुत किया।विद्यार्थियों ने कफन और पंच परमेश्वर कहानी के मर्म को आत्मसात करते हुए अपने शानदार अभिनय, संवाद से लोगों का दिल जीत लिया। नाटकों का निर्देशन परफार्मिंग आर्ट विभाग के प्रमुख गुलरेज खान ने किया। नाटक का पार्श्व संगीत व कास्ट्यूम दर्शकों का ध्यान खींचने में सफल रहा।

कार्यक्रम में प्रगतिशील लेखक संघ इंदौर के सचिव अभय नेमा, रामआसरे पांडे, उपाध्यक्ष चुन्नीलाल वाधवानी, हुकमतराय, सुरेश उपाध्याय, तौफीक, पीयूष भट्ट, भारत सक्सेना उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन इप्टा की इंदौर से जुड़ी सारिका श्रीवास्तव ने किया। आभार मानते हुए रामआसरे पांडे ने वर्चुअल वोयेज कालेज के प्रबंधन और विद्यार्थियों को सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।

संपर्क : 9977446791

Monday, July 18, 2016

कला की दुनिया के 'मेंडलीफ' और राजेश जोशी के 70 साल

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' के मंचन का एक दृश्य 
- बादल सरोज 
गुजरे चार पांच दिनों में बहुत तेजी के साथ फैलाई जा रही अफ़वाह यह है कि राजेश जोशी 70 के हो गए हैं । अफ़वाह को तथ्यात्मक बनाने के लिए भाई लोग 1946 की 18 जुलाई का हवाला इस तरह दे रहे हैं जैसे राजेश न हों प्रतीत्य समुत्पाद या अगर धुंआ है तो फिर आग भी वहीँ होगी मार्का अनुभवजन्य प्रमाण का कोई उदाहरण हों या चरक का कोई आसव हों । अब इन रयुमरमॉंगर्स को कौन बताये कि इस तरह के सरलीकरण के बारे में निदा साब लिखकर और जगजीत सिंह से गवा कर छोड़ गए हैं कि "दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है / सोच-समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला !!"

हम जिन राजेश जोशी को जानते हैं वे 70 के तो हरगिज नहीं हैं । हद्दतन 7 और 17 के बीच कहीं के हैं । पॉपुलर साहित्य की उपमाओं में कहें तो हमे वे मार्क ट्वेन के टॉम सायर और हक्लबेरी फिन के जोड़, जे के रोलिंग के जेम्स पॉटर-सिरियस ब्लैक-रेमुस लुपिन त्रयी के किशोरवय लुपिन, कुछ कुछ मराठी बालसाहित्य के बनास फास्टर फैणे, सत्यजित बाबू की फेलुदा के तोपेश उर्फ़ टोप्से, मालगुडी डेज के स्वामी और कई बार तो लोकप्रिय कार्टूनस्ट्रिप् डेनिस द मीनेस के प्रश्नाकुल डेनिस अधिक लगते हैं । 

ब्लॉन्डी सीरीज के डैगवूड बमस्टेड की तरह घर में सोफे पर बैठे दोनों हाथ ऊंचे कर अंगड़ाई लेकर "अरे यार , कहीं आने जाने की मत कहो, हमे तो घर में ही मजा आता है" कहते दिखने में आलसी से नजर आते , किन्तु इसी के साथ पूरी चैतन्यता के साथ शरलॉक होम्स की तरह साहित्य की भरीपूरी दुनिया में विचरते और खूब मेहनत से न जाने क्या क्या ढूंढ कर पढ़ते छानते राजेश । एलटीसी टूर में दिल्ली एअरपोर्ट से टिकिट कैंसल करवाके फ़टाफ़ट घर लौटते यात्राभीरु मगर किताबों में डुबकी लगाते जेर, जबर, पेश और नुक्तों की सही जगह तलाशने की फ़िक्र में डूबे राजेश । 

मुमकिन है 70 की उम्र राजेश जोशी हो गयी हो- राजेश जोशी तो 70 के नहीं हुए ।

जो अपने बचपन को सहेज कर रखते हैं, अपने अंदर के बच्चे को रोज नहला धुलाकर उसके बालों में करीने से कंघी करके तैयार करते हैं । मगर साथ ही उसे मोहल्ले की अमराइयों से आम और अमरुद तोड़ने तथा गली क्रिकेट के छक्कों चौकों से खुर्राट आंटी की खिड़कियों के कांच तोड़ने से नहीं रोकते, बल्कि उकसाते हैं । उसे चुपके से यूँही चलते फिरते अपना होमवर्क निबटाने के बाद धमाल करने से नहीं रोकते और कक्षा में फर्स्ट आने पर बजाय इठलाने के शर्म से लाल हो जाते हैं वे ही राजेश जोशी बन पाते हैं । जो भूगोल की किताब में लिखी पृथ्वी से सूरज की दूरी पर पूरी तरह यकीन करने के पहले उसे एक बार खुद नाप लेने की जुगत भिड़ाते रहते हैं वे ही राजेश जोशी बन पाते हैं ।

कविता की आलोचना अपना डिपार्टमेंट नहीं है । इसलिए उनकी कविताओं की शल्यक्रिया वे करें जो इसमें पारंगत हैं । वे हमारे प्रिय कवि, नाटक लेखक, गल्पकार और कहानीकार हैं । (यूं तो वे बाकायदा प्रशिक्षित चित्रकार भी हैं मगर मरदूद कला की दुनिया के मेंडलीफों ने उन्हें कवि के खांचे में बाँध कर रख दिया है ।) एक पाठक के रूप में हमें राजेश जोशी की कवितायें बहुत अच्छी लगती हैं । तय नहीं कर पाते कि उस कविता विशेष की मारकता ज्यादा भायी या शिल्प ज्यादा रुचिकर लगा । तड़का बढ़िया था या पौष्टिकता !!

मुक्तिबोध : बकलम कनक तिवारी -1

-कनक तिवारी 
मुक्तिबोध को सबसे पहले 1958 में साइंस काॅलेज रायपुर के प्रथम वर्ष के छात्र के रूप में मैंने देखा सुना था। मुक्तिबोध 1958 में ही राजनांदगांव के दिग्विजय महाविद्यालय में मुदर्रिसी करने आ गए थे। अजीज़ दोस्त विलास खरे का मित्र होने के नाते उनके ज्येष्ठ पुत्र रमेश से मेरी अंतरंगता हो गई। बाद में रमेश का विवाह विलास की बहन से होने के कारण वे मेरे बहनोई हो गए। अंगरेज़ी साहित्य में एम.ए. करने के दौरान मुझे कई बार इस कवि से मिलने का अवसर तलाशना पड़ा। वह लेकिन औपचारिक वार्तालाप के आगे नहीं बढ़ा। मैं 1963 में दिग्विजय महाविद्यालय राजनांदगांव में अंगरेज़ी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त होकर उनका सहकर्मी बना। यादों का कबाड़ तक मूल्यवान होता है। ऐसा पारचून इतिहास का प्राथमिक ड्राफ्ट भी होता है। साहित्यिक दुनिया में तब तक मुक्तिबोध की प्रायोजित, प्रचारित या सुपात्रित वह ख्याति नहीं थी जिसका बवंडर उनकी मृत्यु के बाद अचानक उठा। सादे कपड़ों, गंभीर मुद्रा और धीमी गति से अपने घर की सीढ़ियां उतरकर शिक्षकों के स्टाफ रूम में पड़ी दो आराम कुर्सियों पर बख्शीजी और मुक्तिबोध के बैठने से उन्हें ही इन दोनों साहित्य-अध्यापकों का बोझ सबसे ज़्यादा उठाना पड़ा।

पता नहीं क्यों मुक्तिबोध ने एक दिन शोध परीक्षा के गाइड की तरह मुद्रा बनाकर मुझसे कहा कि मैं नरेश मेहता को पढ़ूं। नगरपालिका के पुस्तकालय से ‘वह पथ बंधु‘ था‘ लाकर मैंने पढ़ने की कोशिश की। उनसे पूछा कि क्या नरेश मेहता की सभी रचनाएं इसी तरह भारीभरकम होंगी। मुक्तिबोध से नरेश मेहता उम्र में पांच वर्ष छोटे थे। देश के कई बौद्धिक आज़ादी के पहले वामपंथी विचारधारा के चुंबकत्व के लिए लोहे के कण ही थे। उनमें से कुछ को चुंबकत्व बांधे नहीं रख सका। वे मध्यममार्गी, दक्षिणपंथी या आज़ाद ख्याल के भी हो गए। नरेश मेहता और निर्मल वर्मा कई नामों में दो बड़े नाम हैं जिन पर वामपंथ से छिटककर छद्म दक्षिणपंथी होने के आरोप तक लगाए गए। इन दोनों की भारतीय संस्कृति की अकाट्य समझ का लोहा वे चुंबक भी मानते हैं जो भारतीय ज्ञानशास्त्र के वांग्मय में पसरे पड़े हैं। अल्प अध्ययन के बावजूद मैंने मार्क्स को कभी खारिज नहीं किया। मुझे यह जानकर अचरज होता है कि बीसवीं सदी की दुनिया को ज्ञान की अलग अलग विधाओं के ज़रिए मूल्यगत तथा ढांचागत स्तर पर जिन चार महान बौद्धिकों ने बनाया है वे चारों यहूदी ही निकले। कार्ल मार्क्स फ्रेडरिक नीत्शे, सिग्मंड फ्रायड और अलबर्ट आइंस्टाइन के बिना बीसवीं सदी का इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता। नरेश मेहता का मुक्तिबोध पर लिखा गया ‘मुक्तिबोधः एक अवधूत कविता‘ वाला निबंध संस्मरणात्मक होते हुए भी कई अनछुए आयाम अनावृत्त करता है।

जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी‘ को लेकर मुक्तिबोध की रचनात्मकता उत्तेजित होती रहती। ‘कामायनी‘ नाम से मैं परिचित भर था। प्रसाद में प्रसाद-गुण खोज लेने की मुक्तिबोध की कशिश का मैं चक्षुदर्शी गवाह बना। वे अपनी नज़र से ‘कामायनी‘, फिर महाकाव्य के चश्मे से मानवेंद्रियों के गुंफित अंतर्लाेक की यात्रा के पथप्रदर्शक बने। उन्हें एक अदद पथप्रदर्शित यात्री की ज़रूरत महसूस होती रही होगी, जिसे वे प्रसाद के साहित्यिक राजप्रासाद का अवलोकन करा सकें। व्यावसायिक पर्यटन के गाइड अक्सर ग्रामोफोन के रिकाॅर्ड की तरह पुनरावृत्त बयानों की जुगाली करते हैं। मुक्तिबोध वह गाइड थे जो प्रतिदिन किसी धारावाहिक कथा के अगले परिच्छेद या पड़ाव तक आगे चलकर कुछ नया अहसास भरते। मुझ श्रोता की आश्वस्त-उपस्थिति के बाद हर रात प्रसाद से मुठभेड़ या साक्षात्कार करके स्टाफ रूम आते। रोज एक नया सिरा पकड़कर ‘कामायनी‘ का अलग चेहरा दिखाते। एकालाप की शैली के वार्तालाप को बख्शीजी स्मित हास्य के उस अतिरिक्त श्रोता की तरह सुनते होते जिसने गाइड को फीस नहीं दी है। मुक्तिबोध के कामायनी-निर्वचन से सहसा संकेतित मैं विद्वता बघारने के लिए अंगरेज़ी के महाकवि जाॅन मिल्टन के ‘पैराडाइज़ लाॅस्ट‘ को परोसने लगता। उसे बरस भर पहले ही मैंने परीक्षोपयोगी नोट्स के सहारे पढ़ा था। मिल्टन के नाम से भी उन्मादित मुक्तिबोध ‘पैराडाइज़ लाॅस्ट‘ और उसकी टीकाओं को उपलब्ध कराने कहते। मैं रायपुर के विज्ञान महाविद्यालय का छात्र था। वहां ताज़ा खुले अंगरेज़ी विभाग का पुस्तकालय बहुत विपन्न था। संस्कृत महाविद्यालय में संयोगवश सरकारी अनुदान के कारण अंगरेज़ी साहित्य की पढ़ाई बरायनाम होने पर भी किताबों का अच्छा खासा क्रय किया गया था। मैं थैले भर भरकर किताबें मुक्तिबोध के लिए लाने लगा। उनमें से कई किताबें पहली बार पढ़ी जा रही थीं। मुक्तिबोध को इससे कोफ्त होती क्योंकि अंकित पुस्तक विवरण के अनुसार वे कुछेक वर्षों पहले खरीदी गई थीं। संस्कृत काॅलेज के पुस्तकालय नियमों के अनुसार अन्य महाविद्यालय के प्राध्यापक को पुस्तकें ले जाने की अनुमति नहीं थी। उसी महाविद्यालय के अंगरेज़ी विभाग के सहायक प्राध्यापक मित्र श्यामकिशोर श्रीवास्तव के नाम पर वे पुस्तकें बिना पंजीकृत आवंटन के थैले भर भर लाई जातीं। श्यामकिशोर पढ़ाकू थे। उन ले जाई गई पुस्तकों की सूची देखकर ही मुक्तिबोध के मानस की पड़ताल करते पुलकित होते रहते।

दिग्विजय महाविद्यालय के स्टाफ रूम में ‘कामायनी‘ पर एकाध सप्ताह बाद मेरा रिफ्रेशर कोर्स शुरू हुआ। अब मैं जाॅन मिल्टन और जयशंकर प्रसाद के महाकाव्यों के बीच मुक्तिबोध-सेतु पर चलने का इकलौता यायावर यात्री था। मुझ अज्ञानी को सूचना नहीं थी कि मुक्तिबोध की अंगरेज़ी साहित्य में भी गहरी पैठ है। उन्होंने ‘पैराडाइज़ लाॅस्ट‘ का उल्था किया। वैसा तो मेरे कक्षा-गुरुओं ने सोचा, बताया या बूझा नहीं था क्योंकि उन्होंने प्रसाद को कतई नहीं पढ़ा होगा। कविता भूगोल और इतिहास, भाषा और संस्कृति, धर्म और रूढ़ियों की परस्परता, विभिन्नता और उदासीनता के परे जाकर एक एक चरित्र के माध्यम से अंततः मनुष्य और संभावित मनुष्य को भी तो रचती है। यह तिलिस्म साहित्य की उन गैरपेशेवर कक्षाओं में महीनों तक सीखने को मिला। अंगरेज़ी के आलोचकों वाली किताबों के हाशियों पर मुक्तिबोध ने पेंसिल से बहुत कुछ लिखा। पुस्तकें वापस करने के पहले रबर से उन्हें मिटा दिए जाने के निर्देश भी उन्होंने दिए। सोचता हूं कि जीवन में एक गैरइरादतन अपराध मैंने क्यों नहीं किया। उनकी आज्ञा मानकर वे इबारतें मिटाने का गुनाह लगातार कचोटता रहता है। बख्शी जी भी कई किताबें मंगाकर पढ़ते। वे कभी कभी प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, रामकुमार वर्मा वगैरह को लेकर मुक्तिबोध से ज़िरह करते। छब्बीस वर्ष के नवयुवक ने स्वनामधन्य पत्रिका ‘सरस्वती‘ का संपादन किया था। छायावाद अथवा स्वछंदतावाद के बड़े हस्ताक्षरों को संपादित, प्रकाशित या अस्वीकृत करने का उनका अपना अनुभव था। उनसे कई बार मतभेद होने पर मुक्तिबोध अपने जिरहनामे की मेरी क्लास लेते। लगता कि यह कवि ‘डूबते को तिनके का सहारा‘ वाले मुहावरे की उलटबांसी कर रहा है। शाब्दिक अर्थ है कि डूबता हुआ व्यक्ति तिनके को सहारा समझकर उसे पकड़ता है, लेकिन बेचारा डूब ही तो जाता है। मुक्तिबोध-प्रसंग में अर्थ यह है कि वे संवेदनाओं के गहरे अतल में डूबने के बाद मुझ जैसे श्रोता को तिनके का सहारा समझकर उसमें से बाहर आना चाहते। मैंने मुहावरे वाले तिनके की भूमिका का अनादर या नकार नहीं किया। वे मेरा सहारा पाकर ऊपर नहीं आ सकते थे। लिहाज़ा और डूबते जाते।

"दिग्विजय महाविद्यालय के परिसर में अपने जिस पहले मकान में वे रहे थे, ठीक उसके पीछे बूढ़ासागर की पथरीली पटरियों पर बैठकर उस वक्त के शीर्षक ‘आशंका के द्वीपः अंधेरे में‘ वाली कविता का एकल श्रोता बनना मेरे नसीब में आया। वह कविता उनके मुझ युवा श्रोता-शिष्य में घबराहट, कोलाहल, आक्रोश और जुगुप्सा भरती गई थी। मुक्तिबोध का वह अविस्मरणीय काव्यपाठ तब तक चलता रहा, जब तक सूरज पूरी तरह बूढ़ासागर में डूब नहीं गया। एक अमर कविता के अनावृत्त होने के रहस्य को देखना कालजयी क्षण जीना था। मैं कविता का अमर श्रोता बना दिया गया। मैं एक साथ हतप्रभ, आतंकित और भौंचक था। बूढ़ासागर का वह रहस्यमय रचना-परिप्रेक्ष्य पूर्वजन्म की घटना या उपचेतन के विस्फोट की तरह मुक्तिबोध की यादों में गूंजता रहता है।"

मेरे जीवन में वह शाम यादध्यानी योग्य है जो मुक्तिबोध की प्रसिद्धि का डंका नहीं बजने के पहले किसी अव्यक्त बानगी का शिकार हो गई होती। दिग्विजय महाविद्यालय के परिसर में अपने जिस पहले मकान में वे रहे थे, ठीक उसके पीछे बूढ़ासागर की पथरीली पटरियों पर बैठकर उस वक्त के शीर्षक ‘आशंका के द्वीपः अंधेरे में‘ वाली कविता का एकल श्रोता बनना मेरे नसीब में आया। वह कविता उनके मुझ युवा श्रोता-शिष्य में घबराहट, कोलाहल, आक्रोश और जुगुप्सा भरती गई थी। मुक्तिबोध का वह अविस्मरणीय काव्यपाठ तब तक चलता रहा, जब तक सूरज पूरी तरह बूढ़ासागर में डूब नहीं गया। एक अमर कविता के अनावृत्त होने के रहस्य को देखना कालजयी क्षण जीना था। मैं कविता का अमर श्रोता बना दिया गया। मैं एक साथ हतप्रभ, आतंकित और भौंचक था। बूढ़ासागर का वह रहस्यमय रचना-परिप्रेक्ष्य पूर्वजन्म की घटना या उपचेतन के विस्फोट की तरह मुक्तिबोध की यादों में गूंजता रहता है। वह कविता मैंने ‘चांद का मुंह टेढ़ा है‘ के संग्रह में शमशेर बहादुर सिंह की टिप्पणी के साथ कई बार पढ़ी। वह वाकई ‘गुएर्निका इन वर्स‘ ही है। उस कविता का मुझ पर इतना प्रभाव हुआ है कि मैं उसे किसी भी समाजचेता कविता का टचस्टोन (कसौटी) बनाता रहता हूं। मुझे पहली बार लगा था कि कविता हमारे पूरे अस्तित्व को न केवल झकझोर सकती है, बल्कि वह हमें अपनी वंशानुगत और पूर्वग्रहित धारणाओं तक की सभी मनःस्थितियों से बेदखल भी कर सकती है। पाठक या श्रोता का व्यापक मनुष्य समाज में गहरा विश्वास हो जाए और खुद उसमें किसी अणु के विस्फोट का संसार बन जाए-यह मुक्तिबोध की उस कविता का बाह्यांतरिक भूचाल है। 
कनक तिवारी 

वस्तुतः ‘अंधेेरे में‘ आंतरिक उजास की कविता है। यह कविता भारतीय जनता का लोकतांत्रिक घोषणापत्र है। उसकी अभिव्यक्ति, निष्पत्ति और उपपत्ति सभी कुछ उन तानोंबानों से बुनी है जो एक मनुष्य को दूसरे से अविश्रृंखलित मानव तारतम्यता से जोड़ती है। यह एक आंशिक और अपूर्ण लेकिन आत्मिक-लयबद्धता का ऐलान है। उसके पौरुष के उद्घाटन का वक्त हिन्दुस्तान की लोकशाही में जनता की यंत्रणा भोगती अनुभूतियों में न जाने क्यों उग नहीं रहा है! मुक्तिबोध संभावित जनविद्रोह की निस्सारता से बेखबर नहीं थे। इसलिए इस महान कविता में लाचारी का अरण्यरोदन नहीं उसकी हताशा की कलात्मक अनुभूति है। पराजित, पीड़ित और नेस्तनाबूद हो जाने पर भी आस्था और उद्दाम संभावनाओं की उर्वरता के यौगिक बिखेर देना भी कविता की रचनात्मक ज़िम्मेदारी होती है। यह तयशुदा पाठ इस विद्रोही कवि का ऐसा उद्घोष है जिसे जनसमर्थन तो चाहिए लेकिन जनआकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के लिए वह प्रतीक्षा करने की स्थिति में नहीं है। ‘अंधेरे में‘ को जितनी बार और जितनी तरह से पढ़ा जाए उसकी दृश्यसंभावनाओं, नाटकीयता और अतिरेक लगती संभाव्यता में मुक्तिबोध की कलम की बहुआयामिता का अनोखा और अकाट्य साक्ष्य गूंजता रहता है।

जारी ...

लेखक की फेसबुक वाल से साभार

प्रेमचंद जयंती समारोह : इप्टा पलामू द्वारा लघु कथाओं का पाठ

प्रेमचंद जयंती समारोह के तहत इप्टा की पलामू इकाई ने लघु कथाओं के पाठ का आयोजन किया । जिसमे जिले के कई साहित्यकारों व लेखको ने हिस्सा लिया । तमाम लोगो ने अपनी स्वरचित लघु कथा सुनाकर उपस्थित श्रोताओं को सोचने पर विवश कर दिया । समाज को आईना दिखाता हुआ और वर्तमान राजनितिक-सामाजिक मुद्दों पर आधारित चंद शब्दों में अभिव्यक्ति की गयी कहानियों को काफी सराहा गया । इस मौके पर लोगो ने यह भी चर्चा किया की आखिर कहानियाँ क्यों पढ़ी जाये । वहीँ कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद और उनकी कहानियों को याद करते हुए तमाम लोगो ने इस बात को सिददत से महसूस किया की वर्त्तमान समय में प्रासंगिक कहानी और लघुकथाओं का लिखा जाना और पढ़ा जाना बेहद जरुरी है । लघु कथाएं पाठको को सोचने पर विवश करती है  और यही एक लेखक की सफलता है ।

       इस अवसर पर उर्दू के अमनपसंद शायर मिर्ज़ा खलील बेग ने शायराना अंदाज़ में लघु कथा का पाठ किया।  अमन चक्र ने अपनी कहानी साक्षर और जीवन बनाम मृत्यु का पाठ किया।  चन्दन ने बेटी बचाओ शीर्षक से कहानी सुनाई।  वरिष्ठ साहित्यकार हरिवंश प्रभात ने आदमी और पशु व रक्षाबंधन नामक कहानी पढ़कर सुनाया।  वरिष्ठ लेखक श्रीधर जी ने बूढ़ा भिखारी और उमेश कुमार पाठक रेणु ने असली पुरस्कार शीर्षक से कहनियों का पाठ किया।  इसके अलावे प्रो के डी झा और उपेंद्र मिश्र ने भी कई लघु कथा सुनाएं।

        कार्यक्रम का संचालन करते हुए साहित्यकार प्रो डॉ कुमार वीरेंद्र ने कहा की पहले कहानियाँ पढ़ी जाती थी, अब समझी और समझाई जाती है. लघु कथाओं  के पाठ का आयोजन सराहनीय प्रयास है। इससे लिखने वालों का मनोबल बढ़ेगा और कहानियाँ लिखी जाती रहेंगी।  कार्यक्रम की अद्यक्षता प्रेम भसीन ने किया।

  इस आयेजन के बारे में बताते हुए इप्टा के महासचिव उपेंद्र मिश्र ने  कहा की कार्यक्रम  दूसरी कड़ी में 24 जलाई को प्रेमचंद की कहानी ठाकुर का कुआं का पाठ और 31 जुलाई प्रेमचंद जयंती के दिन बृहद विचारगोष्ठी  का आयोजन किया गया है ।

    मौके पर ललन कुमार, शब्बीर अहमद, नुदरत नवाज, गणेश रवि, अजित, दिनेश, भूपेश, शशि पांडेय समेत अन्य लोग बतौर श्रोता उपस्थित थे।     

Monday, July 4, 2016

दुनिया भर में क्यों फैल रही है कट्टरता?

इंदौर में प्रगतिशील लेखक संघ ने दुनिया भर में फैल रही कट्टरता पर आयोजित की परिचर्चा

इंदौर। प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई ने पाकिस्तान में सूफी कव्वाल अमजद साबरी की हत्या और बांग्लादेश में पिछले दिनों में ब्लाॅगरों, लेखक व पत्रकारों की हत्या की निंदा करते हुए एक परिचर्चा का आयोजन अनंत थिएटर सुखशांति नगर इंदौर में किया। इसमें भारतीय उपमहाद्वीप में कट्टरपंथी ताकतों के उभार पर वक्ताओं ने अपनी बात रखी। इस मौके पर इंदौर के नाट्य समूह सबरंग ने नाटक 'अजातघर' पेश किया। यह नाटक दंगे और सांप्रदायिकता की पृष्ठभूमि में आम आदमी की विचार प्रक्रिया और उसके द्वारा उठाए गए सवालों के बारे में था।  परिचर्चा में वक्ताओं ने कहा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में सूफी कव्वाल और ब्लागरों की हत्या के बाद भी इंसानियत का पैगाम देना रुकेगा नहीं। कट्टरपंथी विचारधारा के खिलाफ प्रतिरोध जारी रहेगा।

प्रगतिशील लेखक संघ के उपाध्यक्ष कामरेड चुन्नीलाल वाधवानी ने पाकिस्तान में अपने संपर्कों के हवाले से कहा कि अमजद साबरी पाकिस्तान में सूफियाना परंपरा के कव्वाल थे। वे नात गाते थे। जिसमें पैगंबर की प्रशंसा होती है। वे भगत कंवर राम की परंपरा के थे। भगत कंवर राम सिंध के थे। 1935 में उनकी भी हत्या कर दी गई थी। कंवर राम के भजन इतने मधुर होते थे कि उन्हें सुनने आसपास के गांवों के लोग तक आते थे। वे भजन के बाद अपनी झोली फैलाते थे। इसमें जो कुछ भी इकट्ठा होता था उसे वे वहां भजन सुनने आए गरीबों और जरूरतमंदों में बांट दिया करते थे। इसमें से भी ज्यादातर मुस्लिम गरीब किसान होते थे। कंवर राम की हत्या इसलिए कर दी गई थी क्योंकि वे समाज में भाईचारा बढ़ा रहे थे। अमजद साबरी भी पाकिस्तान में कम से कम 250 परिवारों का पालन-पोषण करते थे उनके संरक्षक थे। उनके वालिद गुलाम फरीद भी सूफी कव्वाल थे। अमजद साबरी के परिवार वालों का कहना है कि उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। फिर साबरी को किसने मारा यह सवाल लोगों की जुबान पर है। पाकिस्तान में सुन्नी बहुल मस्लिम हैं। अमजद भी सुन्नी थे। लेकिन सुन्नियों में वे बरेलवी थे। बरेलवी सुन्नी दरगाह, मजार पर जाते हैं,  संगीत के जरिए आराधना में विश्वास रखते हैं, वहीं कट्टरपंथी दरगाह, संगीत आदि में यकीन नहीं रखते हैं। वे कहते हैं कि सिर्फ एक ही अल्लाह है उसी के आगे सिर झुकाना चाहिए। अमजद साबरी के श्रोताओं में हिंदू-मुसलमान और सिख भी हैं। ये सभी दरगाहों और मजारों पर भी जाते थे। कट्टरपंथी एसा मानते हैं कि बरेलवियों से इस्लाम खतरे में पड़ता है। इसलिए पाकिस्तान में बाबा फरीद की मजार, अब्दाल शाह गाजी की मजार पर बम फेंकने की घटनाएं भी हो चुकी हैं।

कट्टरपंथियों के अनुयायी पाकिस्तान के फाटा यानी कि फेडरल एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियास के मदरसों में पनप रहे हैं। फाटा में वजीरिस्तान, मालकंड, चित्राल, स्वात, डीर शहर आते हैं। ये जनजातीय कबीलों के स्वायत्त इलाके हैं। 1948 में पाकिस्तान की एक संधि के तहत फाटा के इलाकों को विशेष दर्जा मिला है। यहां पर शिक्षा व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। मदरसों में बच्चों को पढ़ाया जाता है। उन्हें सिर्फ मजहबी शिक्षा दी जाती है। पाकिस्तान में परिवार नियोजन नहीं हैं। वहां के मुसलमान और हिंदुओं के घर में पांच-पांच बच्चे पैदा होना आम बात है। बड़े परिवारों में बच्चों की सही परवरिश न होने और अशिक्षा के चलते सभी बच्चे मदरसों का रुख करते हैं और यहां उन्हें कट्टर बनाया जाता है। इन्हें यही बताया जाता है कि उनके धर्म का शासन ही दुनिया में कायम रखना है।  

प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई के सचिव अभय नेमा ने बांग्लादेश पर अपनी बात केन्द्रित की। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में 2013 से अब तक 30 ब्लागरों, लेखकों, संपादकों की हत्या की जा चुकी है। इनमें अनीश्वरवादी, धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के साथ ही वे धर्मनिरेपक्ष मुसलमान भी शामिल हैं जो बांग्लादेश मे कट्टरपंथियों का समर्थन नहीं करते।  इनसे कट्टरपंथी इसलिए नाराज हैं कि ये लोग `मुक्त मन' नामक वेबसाइट पर लिखते हैं। इस साइट पर लेखकों ने धार्मिक आस्था समेत सभी तरह की आस्थाओं पर, धर्म की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। बांग्लादेश में अवामी लीग की नेता शेख हसीना की सरकार है। वहीं विपक्ष में बेगम खालिदा जिया की बांगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी है। आवामी लीग 1971 में स्वाधीनता मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान की ओर से बांग्लादेश की मुक्ति के खिलाफ लड़ने वालों पर एक-एक कर युद्ध अपराध के मुकदमों में सजा सुना रही है। बांग्लादेश की बहुसंख्यक आबादी सजा के समर्थन में है। अब तक आधा दर्जन से ज्यादा को मौत की सजा या उम्रकैद हो चुकी है। जिन्हें सजा मिली है वे कट्टरपंथी हैं और कई जमात-ए-इस्लामी के नेता हैं। उन्हें बीएनपी का समर्थन है। बीएनपी को जमात-ए-इस्लामी का भी समर्थन है। बीएनपी शेख हसीना को सत्ता से बाहर करने के लिए कट्टरपंथियों का समर्थऩ कर रही है। इन राजनीतिक हालात के कारण इस वक्त बांग्लादेश की हालत विकट है।

इसके अलावा भारत में भी कलबुर्गी, पानसरे और दाभोलकर की हत्या में कट्टरपंथियों का हाथ होने की बात जांच में सामने आ रही है। कट्टरपंथी नहीं चाहते कि कोई प्रगतिशील विचारधारा पनपे और फैले। इस तरह भारतीय उपमहाद्वीप में कट्टरपंथी रुझान हावी होने की कोशिश की जा रही है। यह भारतीय उपमहाद्वीप तक ही यह सीमित नहीं है। योरप में भी दक्षिणपंथी रुझान नजर आ रहा है। आस्ट्रिया, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, इटली में दक्षिणपंथी रुझान हावी होते नजर आ रहे हैं। ब्रेक्सिट में योरपीय संघ से ब्रिटेन का अलग होना भी इसी रुझान को इंगित करता है। योरप के लोग नहीं चाहते कि वे समाज के प्रतिफल को सीरिया के शरणार्थियों के साथ बांटे। अपने कर की राशि से शिक्षा-चिकित्सा, रोजगार और कल्याणकारी राज्य की तमाम सुविधाएं वे शरणार्थियों के साथ बांटना नहीं चाहते हैं। अमेरिका में भी राष्ट्रपति पद की दावेदारी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप मुस्लिम विरोधी बयान इसी दक्षिणपंथी मानसिकता के तहत दे रहे हैँ।

प्रगतिशील लेख संघ के अध्यक्ष एस के दुबे ने कहा कि भारत में जातियों के बीच संघर्ष हो रहे हैं। गुजरात में पाटीदार और हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन इसका उदाहरण है। इसके पीछे आर्थिक सवाल हैं। नौकरियां नहीं है। असल मुद्दों को न छूते हुए गैर जरूरी मुद्दे लेकर देश में आंतरिक हिंसा हो रही है। हमारे सामाजिक ताने-बाने को खत्म किया जार रहा है। इसके पीछे यहां की कट्टरपंथी ताकतें हैं।


इस अवसर पर नाट्य संस्था सबरंग द्वारा दंगों और साम्प्रदायिकता के विषय पर केंद्रित रामेश्वर प्रेम लिखित नाटिका 'अजात घर' का मंचन भी हुआ। इस नाटक को रामेश्वर प्रेम ने लिखा है।  प्रांजल श्रोत्रिय द्वारा निर्देशित नाटक में सर्वश्री शाकिर हुसैन और श्रवण गढ़वाल ने भावप्रवण अभिनय किया। नाटक में दो आम आदमियों की मनः स्थिति का चित्रण हैं जो दंगों में जान बचाने के लिए एक घर में छिपे हैं। इस दौरान उनके बीच जातिगत और सांप्रदायिक मसलों को लेकर रोचक संवाद होता है। कहानी इस बात पर खत्म होती है कि दंगों में सब डर छिप रहे हैं तो फिर मार कौन रहा है। निर्देश श्रोत्रिय ने सुविचारित ढंग से दंगे की मानसिकता को उघाड़ा।  गोष्ठी में सबरंग से जुड़े रंगकर्मियों सहित सर्वश्री अनन्त श्रोत्रिय,एस के दुबे, संजय वर्मा,सारिका श्रीवास्तव,ब्रजेश कानूनगो,सुरेश पटेल,केसरीसिंह चिडार आदि भी उपस्थित थे।

-विनीत तिवारी