Thursday, November 20, 2014

40 साल बाद फिर रिलीज हुई 'गर्म हवा'

भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म 'गर्म हवा' को शुक्रवार को दोबारा रिलीज हुई। गर्म हवा वर्ष 1973 में बनी यह फिल्म आगरा के मुस्लिम परिवार की दास्तान को बयान करती है। मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की कहानी को कैफी आजमी और शमा जैदी ने पटकथा में बदला। बलराज साहनी ने मुख्य किरदार सलीम मिर्जा की भूमिका निभाई। ए.के. हंगल चरित्र भूमिका में दिखे। फिल्म के निर्माण में इप्टा के आगरा स्थित रंगकर्मियों और स्थानीय कलाकारों ने सक्रिय सहयोग दिया। प्रगतिशील विचारों से प्रेरित यह फिल्म समानधर्मी कलाकारों और तकनीशियनों का सामूहिक प्रयास थी। अपने समय में गर्म हवा हिंदी सिनेमा के मुख्यधारा से अलग बनी थी।

फिल्म का हुआ पुन: निर्माण
फिल्म फायनेंस कॉरपोरेशन के सहयोग से बनी ‘गर्म हवा’ आजादी के बाद पहली बार विभाजन के दुष्प्रभाव को  प्रस्तुत करती है। 1973 सीमित बजट में बनी ‘गर्म हवा’ आज के दौर के इंडेपेंडेट फिल्मकारों जैसी ही पहल कही जा सकती है। इप्टा मे सक्रिय एम.एस. सथ्यू ने समान विचार के तकनीशियनों और कलाकारों को जोड़ कर यह फिल्म पूरी की थी। दस लाख की लागत से बनी फिल्म को डिजिटली रिस्टोर करने में तकरीबन डेढ़ साल का वक्त लगा और दस गुना ज्यादा खर्च हुआ।

फिल्म के निर्देशक एमएस सथ्यू ने बताया कि फिल्म के निगेटिव खराब हो गए थे। ऐसे में उसे डिजिटली स्टोर करना जरूरी हो गया था। साउंड क्वालिटी को लॉस एंजिलिस के स्टूडियो में ठीक किया गया। उनके मुताबिक सच्चाई पर आधारित इस फिल्म के किरदार के बारे में जानते ही बलराज साहनी काम करने को तैयार हो गए थे।
फिल्म को तकरीबन चार दशक बाद रिलीज करने के सवाल पर सथ्यू ने कहा कि वह चाहते हैं कि आज की पीढ़ी भी इसे देखे। उन्होंने पुरानी अच्छी फिल्मों को फिर रिलीज करने की भी सलाह दी। हालांकि, उन्होंने आज की फिल्मों को लेकर नाखुशी जाहिर की। सथ्यू अगले साल एक क्लासिकल म्यूजिकल फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं।

फिल्म की कहानी
1973 में आई एम एस सथ्यू की ‘गर्म हवा’ का हिंदी सिनेमा के इतिहास में खास महत्व है। यह फिल्म बड़ी सादगी और सच्चाई से विभाजन के बाद देश में रह गए मुसलमानों के द्वंद्व और दंश को पेश करती है। यह आगरा के मिर्जा परिवार की कहानी है।


हलीम मिर्जा और सलीम मिर्जा दो भाई हैं। दोनों भाइयों का परिवार मां के साथ पुश्तैनी हवेली में रहता है। हलीम मुस्लिम लीग के नेता हैं और पुश्तैनी मकान के मालिक भी। सलीम मिर्जा जूते की फैक्ट्री चलाते हैं। सलीम के दो बेटे हैं बाकर और सिकंदर। एक बेटी भी है अमीना। अमीना अपने चचेरे भाई कासिम से मोहब्बत करती है। विभाजन की वजह से उनकी मोहब्बत कामयाब नहीं होती। हलीम अपने बेटे को लेकर पाकिस्तान चले जाते हैं। कासिम शादी करने के मकसद से आगरा लौटता है, लेकिन शादी की तैयारियों के बीच कागजात न होने की वजह से पुलिस उन्हें जबरन पाकिस्तान भेज देती है। दुखी अमीना को फूफेरे शमशाद का सहारा मिलता है, लेकिन वह मोहब्बत भी शादी में तब्दील नहीं होती। दूसरी तरफ सलीम मिर्जा आगरा न छोड़ने की जिद्द पर अमीना की आत्महत्या और पाकिस्तानी जासूस होने के लांछन तक अड़े रहते हैं। संदेह और बेरूखी के बावजूद उनकी संजीदगी में फर्क नहीं आता। उन्हें उम्मीद है कि महात्मा गांधी की शहादत बेकार नहीं जाएगी। सब कुछ ठीक हो जाएगा।

विभाजन पर बनी हैं कई फिल्में
एम एस सथ्यू की ‘गर्म हवा’ पहली बार विभाजन के दर्द और स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ पर्दे पर पेश करती है। हिंदी फिल्मों में इसके पहले भी विभाजन के संदर्भ मिलते हैं, लेकिन कोई भी निर्देशक सतह से नीचे उतर कर सच्चाई के तल तक जाने की कोशिश नहीं करता। देश के विभाजन और आजादी के बाद ‘लाहौर’ (1949), ‘अपना देश’ (1949), ‘फिरदौस’ (1950), ‘नास्तिक’ (1959), ‘छलिया’ (1960), ‘अमर रहे तेरा प्यार’ (1961) और ‘धर्मपुत्र’ (1961) में विभाजन के आघात से प्रभावित चरित्र हैं। इनमें से कुछ में अपहृत महिलाओं की कहानियां है तो कुछ में सिर्फ जिक्र है। दशकों बाद गोविंद निहलानी के धारावाहिक ‘तमस’ और डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के ‘पिंजर’ में फिर विभाजन की पृष्ठभूमि मिलती है। ‘पिंजर’ में डॉ. द्विवेदी ने अपहृत पारो के प्रेम और द्वंद्व को एक अलग संदर्भ और निष्कर्ष दिया, जो मुख्य रूप से ‘पिंजर’ उपन्यास की लेखिका अमृता प्रीतम की मूल सोच पर आधारित है।

साल 2000 में अनिल शर्मा की ‘गदर’ में भी विभाजन का संदर्भ है, लेकिन यह फिल्म भारत के वर्चस्व से प्रेरित अंधराष्ट्रवादी किस्म की है। ‘गदर’ अतिरंजना से बचती तो सार्थक फिल्म हो सकती थी। हिंदी फिल्मों में देश के विभाजन पर फिल्मकारों की लंबी चुप्पी को ‘गर्म हवा’ तोड़ती है। इस फिल्म में लेखक-निर्देशक ने विभाजन की पृष्ठभूमि में आगरा के सलीम मिर्जा और उनके परिवार के सदस्यों के मार्फत मुसलमानों की सोच, दुविधा, वास्तविकता और सामाजिकता को ऐतिहासिक संदर्भ में संवेदनशील तरीके से समझने और दिखाने की कोशिश की।
सत्यजित राय ने ‘गर्म हवा’ के बारे में लिखा है, ‘विषयहीन हिंदी सिनेमा के संदर्भ में ‘गर्म हवा’ ने इस्मत चुगताई की कहानी लेकर दूसरी अति की। यह फिल्म सिर्फ अपने विषय की वजह से मील का पत्थर बन गई, जबकि फिल्म में अन्य कमियां थीं। सचमुच, इस फिल्म में तकनीकी गुणवत्ता और बारीकियों से अधिक ध्यान कहानी के यथार्थ धरातल और चित्रण पर दिया गया। 1973 में प्रदर्शित हुई अन्य हिंदी फिल्मों की तुलना में ‘गर्म हवा’ छोटी फिल्म कही जा सकती है, जिसमें न कोई पॉपुलर स्टार था और न हिंदी फिल्मों के प्रचलित मसाले।’

साभार : हिंदुस्तान

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