Tuesday, October 9, 2012

प्रगतिशील आन्दोलन के महत्वपूर्ण स्तम्भ श्री रामशरण शर्मा 'मुंशी' का अवसान

डॉ. रामविलास शर्मा के भाई और प्रगतिशील आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ श्री रामशरण शर्मा 'मुंशी' का अवसान...

 ४ अक्टूबर की सुबह हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ श्री रामशरण शर्मा'मुंशी ने दुनिया को अलविदा कहा. ९० वर्ष की आयु में भी वे जितनी उत्कट जिजीविषा से भरे हुए थे, उसे पिछली २२ जुलाई को दिल्ली के साहित्य अकादमी हाल में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित 'रामविलास शर्मा जन्मशती' के अवसर पर उपस्थित कई पीढ़ियों के साहित्यानुरागियों और संस्कृति-प्रेमियों ने साक्षात देखा था. अस्वस्थ होने के बावजूद बेटे बहू के साथ कार्यक्रम में पहुंचकर उन्होंने हमें सुखद रूप से चौंका दिया था. अपने जीवन के सर्वोत्तम वर्ष उन्होंने कम्यूनिस्ट पार्टी को दिए, पूर्णकालिक तौर पर, बीमारी और अभाव में रह कर भी. हाल-हाल तक भी उन्हें देखकर और सुनकर कोई जान सकता था की सादगी, विनम्रता और विचारों में दृढ़ता कम्यूनिस्ट मूल्य हैं जिन्हें वे जीते थे. साम्राज्यवाद और सामंतवाद का आजीवन विरोध उन्होंने एक सच्चे कम्यूनिस्ट देशभक्त की तरह किया और इन अर्थों में वे सर्वाधिक रामविलास शर्मा के सहोदर थे. वे भारत के कम्यूनिस्ट आन्दोलन और साहित्य में प्रगतिशील आन्दोलन के जीवंत यादों के चलते-फिरते कोष थे जिससे अचानक वंचित हो जाना सभी वाम संस्कृतिकर्मियों की भारी क्षति है. कल रात रामविलास जी के सुपुत्र श्री विजयमोहन जी बता रहे थे कि १० अक्टूबर को दिल्ली में होनेवाले 'रामविलास शर्मा जन्मशती आयोजन' को लेकर वे खूब उत्साह में थे. क्यों न होते? रामविलास शर्मा के भाई तो थे ही, उनके वैचारिक और रचनात्मक सहयोगी भी थे और उनके न रहने के बाद 'रामविलास शर्मा' फौन्डेशन और शर्मा परिवार के अभिभावक भी. लेकिन कुछ दिन पहले ही वे गिर पड़े थे और फिर स्वस्थ न हो सके.

रामशरण शर्मा 'मुंशी' उन विलक्षण लोगों में थे जिन्होंने कम्यूनिस्ट आन्दोलन और प्रगतिशील साहित्य में अपना योगदान ज़्यादातर नेपथ्य में रहकर किया , जबकि 'इप्टा' में नाटकों में वे नेपथ्य में रहकर नहीं, खुले मंच पर अभिनय करते थे. इप्टा, प्रगतिशील लेखक संघ , कम्यूनिस्ट पार्टी से निकलनेवाले पत्र 'जनयुग' के सम्पादन और पी.पी.एच. के ज़रिए प्रगतिशील साहित्य के नियमित प्रकाशन में उन्होंने जो जिम्मेदारियां निभाईं, वे उनके समय के किसी भी रचनाकार से कम प्रतिभा और प्रतिबद्धता की मांग नहीं करती थीं. शंकर शैलेन्द्र तो शायद उनके सबसे घनिष्ठ मित्र थे ही , लेकिन शमशेर, नरोत्तम नागर, नागार्जुन भी कम आत्मीय न थे. निराला जी की 'राम की शक्तिपूजा' का पाठ , लोगों का कहना है कि मुंशी जी लगभग वैसा ही करते थे जैसा उन्होंने निराला से सुना होगा. केदार नाथ अग्रवाल , अमृतलाल नागर, राहुल, यशपाल से लेकर राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह तक न जाने कितने तब के प्रगतिशील लेखकों से उनका काम-काज का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा, बाद की पीढी के विश्वनाथ त्रिपाठी, नित्यानंद तिवारी, मुरली बाबू , मैनेजर पाण्डेय , रविभूषण आदि उनके स्नेह के सदा ही पात्र रहे.

मुंशी जी श्रेष्ठ अनुवादक और सम्पादक थे. अनुमान किया जा सकता है कि उनके खुद के किए अनुवादों (जिनमें उनका नाम छपा है जैसे कि पी.पी.एच से प्रकाशित डायसन कार्टर की पुस्तक 'सिन एंड साइंस' का अनुवाद 'पाप और विज्ञान' आदि ) से कहीं ज़्यादा अनुवाद ऐसे होंगे जो दूसरों के नाम से निकले होंगे लेकिन ज़्यादा काम मुंशी जी का रहा होगा. राजेन्द्र यादव ने लिखा है कि फाद्येव के रूसी उपन्यास 'मोटर आफ हार्ट' का अनुवाद उन्होंने मुंशी जी के साथ बैठ कर किया था क्योंकि तब पी.पी.एच. में ये रिवाज़ था कि जिस मूल भाषा से अनुवाद किया जाना है उस मूल भाषा के जानकार के साथ बैठना ज़रूरी था. मुंशी जी के साथ इसीलिए बैठना ज़रूरी था कि वे रूसी भाषा के अच्छे जानकार थे. मुंशी जी की 'लाईमलाईट' से अलग रहने की प्रवृत्ति का एक उदाहरण था ६० के दशक में नरोत्तम नागर द्वारा संपादित 'दिल्ली टाइम्स' के अंतिम पेज पर उनके द्वारा उपनाम से लिखना ताकि सम्पादक को सुविधा रहे कि वह जब न चाहे तो न छापे और दुनिया को पता भी न चले. मुंशी जी बतौर लेखक तब भी प्रतिष्ठित नाम थे, अपने नाम से लिखते तो न छाप पाने की दशा में उनके आत्मीय सम्पादक-मित्र की किरकिरी होती.

मुंशी जी सम्पादक कैसे थे ये 'जनयुग' के तब के अंकों से ही नहीं, उनके द्वारा पुष्पलता जैन के साथ मिलकर पी.पी.एच . से निकले ' 'राहुल स्मृति' शीर्षक ग्रन्थ से ही नहीं, बल्कि सर्वाधिक उनके ही उन संस्मरणों से पता चलता है जिनमें वे बताते हैं कि ' बाल जीवनी माला' के तहत निराला पर रामविलास शर्मा, प्रेमचंद पर नागार्जुन और राहुल पर भदंत आनंद कौसल्यायन से उन्होंने कैसे कैसे लिखवाया या फिर 'जनयुग' में किन हिकमतों से वे नागार्जुन से लिखवाते थे. नागार्जुन पर उनके संस्मरणात्मक लेख से पता चलता है कि उनका आलोचना-विवेक कितना गहरा था.

मुंशी जी का परिवार भी उनके और उनकी जीवन-संगिनी धन्नो जी के संस्कारों की गवाही देता है-बेटे, बेटी, बहू सब. धन्नो जी खुद कम्यूनिस्ट आन्दोलन से जुडी रहीं. एक समय वे भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के कंट्रोल कमीशन की सदस्य रहीं, कामरेड रुस्तम सैटिन के साथ. मुंशी जी का जाना उनके परिजन , वाम आन्दोलन और तमाम जनधर्मी सांस्कृतिक आन्दोलन की भारी क्षति है.

तमाम लेखक उनके बारे में समय समय पर लिखते हुए यह लिखना नहीं भूले है कि वे रामविलास शर्मा के भाई थे. रामविलास जी भले ही अपने बड़े भाई से भावनात्मक रूप से सर्वाधिक जुड़े हुए थे, लेकिन उनके वैचारिक 'संगतकार' तो 'मुंशी' जी थे. ये सिर्फ कयास लगाने की ही बात है कि खुद रामविलास जी के बनने में मुंशी जी की क्या भूमिका रही होगी. याद आती है मंगलेश डबराल की कविता 'संगतकार' जिसके सभी आशयों/अभिप्रायों में मुंशी जी और रामविलास जी का सम्बन्ध भले ही संगत न हो, लेकिन कुछ आशयों में ज़रूर ही ऐसा है-

मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती
वह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य
या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार
मुख्य गायक की गरज़ में
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से


तारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला
प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ
आवाज़ से राख जैसा कुछ गिरता हुआ
तभी मुख्य गायक को ढाढस बँधाता
कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर

कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ
यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है
और यह कि फिर से गाया जा सकता है
गाया जा चुका राग
और उसकी आवाज़ में जो एक हिचक साफ़ सुनाई देती है
या अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की जो कोशिश है
उसे विफलता नहीं
उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।



जन संस्कृति मंच मुंशी जी के अवसान के दुःख में उनके परिजन और तमाम प्रगतिशील जमात के साथ है, इस मनुष्यद्रोही युग में उनके समाजवादी जीवन-मूल्यों को आगे लेते जाने के लिए कृतसंकल्प है.

मुंशी जी को लाल सलाम!

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी) 

Saturday, October 6, 2012

संस्कृतिकर्म के खतरे उठाने ही होंगे - फीरोज़ अशरफ खां


"आज के बाजारवादी दौर में जनवादी संस्कृति की पूरी अवधारणा और संस्कृतिकर्म पर सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं और इन सवालों के बीच जनता हमारी भूमिका हमारे हस्तक्षेप की तलाश कर रही उनकी साड़ी उम्मीद हम संस्कृतिकर्मियों पर टिकी है. इसलिए हमें संस्कृतिकर्म के खतरे उठाने ही होंगे और जनता की आशाओं को पूरा भी करना होगा. बेहतर संस्कृतिकर्म के प्रदर्शन के लिए बेहतर रंगशाला और कलाकारों को शिक्षण-प्रशिक्षण की विश्वविद्यालय स्तर तक की व्यवस्था हम संस्कृतिकर्मियों की मांग हैं."

15 सितम्बर 2012 को इप्टा के छपरा इकाई के नगर सम्मलेन का उद्घाटन करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव डा. फीरोज़ अशरफ खां ने उक्त बातें कहीं. डा. फीरोज़ ने बिहार सरकार के संस्कृति नीति को जनता के सामने रखने की मांग को दोहराते हुए कलाकारों-संस्कृतिकर्मियों से साझा आन्दोलन का आह्वान किया. दो दिवसीय सम्मलेन में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करते हुए बिहार विधान परिषद् के उप-सभापति सलीम परवेज़ ने बेहतर सांस्कृतिक माहौल के निरंतर सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन पर जोर दिया और कहा कि कलाकारों की मांगें बिलकुल जायज़ है और यह सरकार का नैतिक दायित्व है कि वह बेहतर संस्कृतिकर्म को प्रोत्साहित करे. बिहार के विकास में इप्टा के योगदान की चर्चा करते हुए उप-सभापति ने कहा कि इप्टा प्रेमचंद की उस उक्ति का अक्षरश: पालन कर रही हैं कि संस्कृति राजनीत के आगे की मशाल है. मैं इप्टा के देश के विकास में सतत प्रगतिशील रहें इसकी शुभकामना देता हूँ. इस अवसर पर छपरा इप्टा के नगर सम्मलेन की स्मारिका का विमोचन बिहार विधान परिषद् के उप-सभापति सलीम परवेज़ एवं अन्य अतिथियों द्वारा किया गया. उदघाटन सत्र का संचालन अमित रंजन और अध्यक्षता लाल बाबू यादव ने किया.

सत्र में पारित प्रस्ताव में भिखारी ठाकुर की १२५वी जयंती के अवसर पर सारण प्रमंडल मुख्यालय में एक सुसज्जित प्रेक्षागृह के निर्माण की सरकार के मांग की गई.

भोजपुरी के महान रचनाकार महेंद्र मिश्र की प्रतिनिधि कवितायों का विमोचन जय प्रकाश नारायण विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण के अध्यक्ष के डा० विरेंद्र नारायण यादव के द्वारा किया गया. महेंद्र मिश्र को याद करते हुए श्री यादव ने कहा की भोजपुरी क्षेत्र के लोक कवी महेंद्र मिश्र के गीत समाज को संवेदनशील एवं जागरूक बनाते हैं. उनके गीतों ने भोजपुरिया समाज के मन-मिजाज़ को खूब झकझोरता है. सम्मलेन के अवसर पर वरिष्ठ इप्टाकर्मी दुर्गेश नारायण को प्रथम इप्टा सारण शिखर सम्मान से विभूषित किया गया.

स्थानीय हबीब तनवीर रंगमंच (महेंद्र मंदिर, ज्योति सिनेमा), छपरा के प्रेक्षागृह में आयोजित उदघाटन सत्र में इप्टा के जनवादी गीतों और भोजपुरी की लोकरचना 'बटोहिया' के गायन से सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत हुई. छपरा इप्टा के लोक कलाकारों ने बटोहिया गायन को बिहार की अस्मिता के साथ जोड़ कर प्रस्तुत किया. इस अवसर पर 'बिटिया आई' नाटक की मार्मिक प्रस्तुति की गई. कश्मीरा सिंह के निर्देशन में ज्योति म्हाप्सेकर के मूल मराठी नाटक का बसंत देव द्वारा हिंदी अनुवाद को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया. साथ ही कलाकारों ने प्रेमचंद की चर्चित कहानी पर आधारित नाटक "नमक का दारोगा" का मंचन अमित रंजन के निर्देशन में किया. इप्टा की सुतिहार इकाई के इन्द्रदीप कुमार साथियों द्वारा इस अवसर पर भोजपुरी लोकगीत प्रभावी प्रस्तुति की गई. यशवंत कुमार ने राष्ट्रीय गीत पर एवं बाल कलाकार शिवानी ने साक्षरता गीत पर भावपूर्ण नृत्य प्रस्तुत किया. सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन कंचन बाला और उमा शंकर साहू ने किया.

 इसके पूर्व छपरा इप्टा के अध्यक्ष डा लाल बाबू यादव ने ए० के० हंगल नगर, सारण अकादमी में इप्टा का ध्वजारोहण कर दो दिवसीय नगर सम्मलेन का आगाज किया. इस अवसर पर इप्टा गीत 'तू जिंदा है...' की प्रस्तुति की गई.

सम्मलेन के दूसरे दिन 16 सितम्बर 2012  संगठन सत्र में छपरा इकाई के सचिव अमित रंजन ने संगठन का वार्षिक लेखा जोखा प्रस्तुत किया और वर्तमान सन्दर्भ में इप्टा कि गतिविधियों और सांस्कृतिक चुनौतियों पर चर्चा की. सम्मलेन में इप्टा इकाई ने अगले सत्र के लिए नयी कार्यकारिणी का निर्वाचन भी किया. श्री लाब बाबू यादव छपरा इप्टा का अध्यक्ष और अमित रंजन को सचिव निर्वाचित किया गया. इस अवसर पर बिहार इप्टा की ओर से राज्य पर्यवेक्षक डा० फीरोज़ अशरफ खान भी उपस्थित थें.

- अमित रंजन