Sunday, August 6, 2017

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के 25 वर्ष : दिल्ली में 3 दिवसीय नाट्य समारोह


10 अगस्त, 2017 : नाटक "गर्भ" शाम 6.30 बजे “मुक्तधारा ऑडिटोरियम” (गोल मार्किट , भाई वीर सिंह मार्ग नई दिल्ली -1)य में होगा !

नाटक “गर्भ” मनुष्य के मनुष्य बने रहने का संघर्ष है.नाटक मानवता को बचाये रखने के लिए मनुष्य द्वारा अपने आसपास बनाये (नस्लवाद,धर्म,जाति,राष्ट्रवाद के) गर्भ को तोड़ता है. नाटक समस्याओं से ग्रसित मनुष्य और विश्व को इंसानियत के लिए, इंसान बनने के लिए उत्प्रेरित करता है ..क्योकि खूबसूरत है ज़िन्दगी !

11 अगस्त, 2017 : नाटक “अनहद नाद - अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स ” शाम 6.30 बजे का “मुक्तधारा ऑडिटोरियम” में मंचन

नाटक “अनहद नाद - अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स ” कलात्मक चिंतन है, जो कला और कलाकारों की कलात्मक आवश्यकताओं,कलात्मक मौलिक प्रक्रियाओं को समझने और खंगोलने की प्रक्रिया है। क्योंकि कला उत्पाद और कलाकार उत्पादक नहीं है और जीवन नफा और नुकसान की बैलेंस शीट नहीं है इसलिए यह नाटक कला और कलाकार को उत्पाद और उत्पादिकरण से उन्मुक्त करते हुए, उनकी सकारात्मक,सृजनात्मक और कलात्मक उर्जा से बेहतर और सुंदर विश्व बनाने के लिए प्रेरित और प्रतिबद्ध करता है ।

कलाकार :अश्विनी नांदेडकर, योगिनी चौक, सायली पावसकर,कोमल खामकर,तुषार म्हस्के

12 अगस्त, 2017, नाटक :“न्याय के भंवर में भंवरी” का सुबह 11 बजे म ल भारतीय ऑडिटोरियम (Alliance Francaise de Delhi,लोधी रोड़) में मंचन

नाटक “न्याय के भंवर में भंवरी” शोषण और दमनकारी पितृसत्ता के खिलाफ़ न्याय, समता और समानता की हुंकार है !
कलाकार : बबली रावत

लेखक और निर्देशक : मंजुल भारद्वाज
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काल को चिंतन से गढ़ा और रचा जाता है.चिंतन आपके भीतर से सृजित होकर वैश्विक क्षितिज को पार कर विश्व में जीता है.कला मनुष्य को मनुष्य बनाती है. कलात्मक चिन्तन ही मनुष्य के विष को पीने की क्षमता रखता है.1990 के बाद का समय दुनिया के लिए ‘अर्थहीन’ होने का दौर है.ये एकाधिकार और वर्चस्ववाद का दौर है.विज्ञान के सिद्धांतों का तकनीक तक सीमित होने का दौर है. आज खरीदने और बेचने का दौर है. मीडिया का जनता की बजाए सत्ता की वफ़ादारी का दौर है.ऐसे समय में ‘जनता’ को अपने मुद्दों के लिए ‘चिंतन’ और सरोकारों के एक मंच की जरूरत है. ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ रंग सिद्धांत 12 अगस्त,1992 से जनता के सरोकारों का ‘चिंतन मंच’ बनकर कर उभरा है और आज अपने ‘रंग दर्शन’ के होने के 25 वर्ष पूर्ण कर रहा हैं. इन 25 वर्षों में ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ ने गली, चौराहों, गावों, आदिवासियों, कस्बों और महानगरों से होते हुए अपनी वैश्विक उड़ान भरी है और वैश्विक स्वीकार्यता हासिल की है.
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के सिद्धांत
1. ऐसा रंगकर्म जिसकी सृजनशीलता विश्व को मानवीय और बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो ।
2. कला , कला के लिए ना होकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करे । लोगों के जीवन का हिस्सा बने ।
3. जो मानवीय जरूरतों को पूरा करे और अपने आप को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में उपलब्ध कराये ।
4. जो अपने आप को बदलाव के माध्यम के रूप में ढूंढे । अपने आप को खोजे और रचनात्मक बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाये ।
5. ऐसा रंगकर्म जो मनोरंजन की सीमाएँ तोड़कर जीवन जीने का ज़रिया या पद्धति बने ।
(“थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत का सूत्रपात सुप्रसिद्ध रंगचिंतक, "मंजुल भारद्वाज" ने 12 अगस्त 1992 में किया और तब से उसका अभ्यास और क्रियान्वयन भारत और वैश्विक स्तर पर हो रहा है।)

आज विकास या विकास के नाम पर प्रकृति के विनाश के दौर में मनुष्य का मनुष्य बने रहना एक चुनौती है. नाटक “गर्भ”, “अनहद नाद – Unheard Sounds of universe” और “न्याय के भंवर में भंवरी” के माध्यम से आपको अपने अंदर के इंसान की आवाज़ सुनाने के लिए देश की सत्ता के केंद्र “दिल्ली” में 10,11 और 12 अगस्त 2017 को 3 दिवसीय ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस - नाट्य उत्सव’ का आयोजन हो रहा है. आपकी सार्थक और रचनात्मक सहभागिता की अपेक्षा. क्योंकि ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ रंग सिद्दांत के अनुसार ‘दर्शक’ पहला और सशक्त ‘रंगकर्मी’ है !

मंजुल भारद्वाज लिखित एवम् निर्देशित और अश्विनी नांदेडकर, योगिनी चौक, सायली पावसकर,कोमल खामकर,तुषार म्हस्के अभिनीत प्रसिद्ध नाटक “गर्भ” और “अनहद नाद –अनहर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स” का मंचन  क्रमशः 10 और 11 अगस्त, 2017 को शाम 6.30 बजे “मुक्तधारा ऑडिटोरियम” (गोल मार्किट , भाई वीर सिंह मार्ग नई दिल्ली -1) में होगा !
जबकि 12 अगस्त को सुबह 11.00 बजे, मंजुल भारद्वाज लिखित और निर्देशित, जानी मानी रंग अभिनेत्री बबली रावत अभिनीत नए नाटक “न्याय के भंवर में भंवरी” का प्रीमियर  म ल भारतीय ऑडिटोरियम (लोधी एस्टेट , लोधी रोड, नई दिल्ली – 3) में होगा !
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“Theatre of Relevance”-25 years of theatrical philosophy
10, 11, 12 August 2017
"3-days theatre festival in Delhi"

Epoch is created and wrought through contemplation. Contemplation, being generated from within you and crossing global horizons, survives in the world.  Art make humans human. Artistic process & reflection alone possesses the capacity of soaking human poison. The period after 1990 has been an era of “Irrelevance” for the world. This has been a period of monopoly and dictatorship. A period of limiting the principles of science to technology alone. Today is the period of buying and selling. A period where media instead of being faithful to the people, is faithful to thy masters & rulers. In these threatening times, the “people” needs ‘contemplation’ for their issues and a platform for their concerns. ‘Theatre of Relevance” theatrical philosophy’ has evolved as a ‘contemplation platform’ for public concerns since 12th August, 1992 and it is completing 25 years of its theatrical philosophy today. In these 25 years, ‘Theatre of Relevance’ has appropriated its global flight via streets, squares, villages, tribes, towns, and cities and has gained global acceptance.

Principles of Theatre of Relevance
1.    A Theatre that commits its creative excellence to make the world more “Better & Humane”.
2.    That is relevant to the context of the society and owes its social responsibility, not to Art just for the Art sake.
3.    Which caters to human needs and provide itself as a platform for             expression.
4.    Which explores itself as a medium of change/development.
5.    That comes out from the ' limits of entertainment ' to a way of living.

(“Theatre of Relevance” was conceived by famous artistic contemplator “Manjul Bhardwaj” on August 12, 1992 and since then it is practiced and implemented at Indian and at international level.)

Today in the era of the destruction of nature in the name of development, it is a challenge for humans to be human. A 3-day ‘Theatre of Relevance-Theatre festival’ is being organised at the epi-centre of power of the country , “Delhi”, on August10, 11 and 12, 2017 to connect you with  your inner human sound through the medium of the plays “Garbh”, “Anhad Naad- Unheard Sounds of Universe” and  “Nyaya ke Bhanwar me Bhawari”. Your meaningful and constructive engagement is expected. Because according to ‘Theatre of Relevance’ philosophy, audience is the first & foremost theatre person.

Famous plays “Garbh” and “Anhad Naad-Unheard Sounds of Universe” written and directed by Manjul Bharadwaj and starring Ashwini Nandedkar, Yogini Chowk, Sayali Pawaskar, Komal Khamkar, Tushar Mahske would be staged on 10 and 11th of August, 2017 respectively at 6.30 pm at “Muktadhara Auditorium” (Gol Market, Bhai Vir Singh Marg, New Delhi-01).

While on 12 August at 11.00 am, a new play “Nyaya ke Bhanwar me Bhawari” written and directed by Manjul Bharadwaj and starring well-known theatre actress Babli Rawat would be premiered at “M L Bhartia Auditorium”(Lodhi Estate, Lodhi Road, New Delhi -03).

Friday, August 4, 2017

ग़ज़ल दो संस्कृतियों का मिलन है

- हरेराम समीप 
'विकल्प' साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था, फरीदाबाद द्वारा महाकवि तुलसीदास और महान कथाकार प्रेमचन्द जयंती के अवसर पर पुस्तक लोकार्पण, चर्चा का आयोजन 'आर्य समाज सेक्टर 7 के सभागार में किया गया, जिसकी अध्यक्षता अलवर से पधारे हिन्दी के प्रख्यात आलोचक एवं कवि डाक्टर जीवन सिंह 'मानवी' ने की. श्री हरेराम समीप की दो पुस्तक- 'समकालीन हिन्दी ग़ज़लकार एक अध्ययन' तथा 'आँखें खोलो पार्थ' दोहा संग्रह के लोकार्पण के उपरांत अलवर से पधारे गजलकार व समीक्षक श्री विनय मिश्र ने अपने बीज वक्तव्य की शुरुआत दोहा संग्रह के शीर्षक दोहे की विस्तृत व्याख्या से की, दोहा था-

कुरुक्षेत्र है ये नया फिर है नया यथार्थ 
शत्रु खड़ा है सामने आँखें खोलो पार्थ 

इसके बाद पिछले चालीस वर्षों में हुए हिन्दी ग़ज़ल के विकास और हिंदी ग़ज़ल आलोचना के महत्वपूर्ण बिन्दुओं और उपलब्धियों का उल्लेख किया जिसमें अस्सी के दशक में प्रकाशित 'शब्द कारखाना पत्रिका' के ग़ज़ल विशेषाक में नचिकेता जी के ४२ पृष्ठीय आलेख को ऐतिहासिक और एक मील का पत्थर बताया, जिसकी टिप्पणियाँ आज भी प्रासंगिक हैं. ग़ज़ल आलोचना की महत्वपूर्ण पुस्तकों में डा शिवशंकर मिश्र की एक प्रमाणिक पुस्तक 'हिंदी ग़ज़ल की भूमिका' के महत्व की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उससे अच्छी किताब अभी दूसरी नहीं है. उन्होंने श्री ज्ञानप्रकाश विवेक की दो आलोचना पुस्तकों- हिन्दी ग़ज़ल की विकास यात्रा और हिन्दी ग़ज़ल-दुष्यंत के बाद और डॉ. सायमा बानो के शोधग्रन्थ 'हिन्दी ग़ज़ल पहचान और परख' के योगदान का भी उल्लेख किया . श्री नचिकेता के सम्पादन में आये ग़ज़ल संग्रह 'अष्टछाप' तथा पिछले वर्ष आए ''अलाव' पत्रिका के समकालीन ग़ज़ल आलोचना विशेषांक का भी ज़िक्र किया और लोकार्पित पुस्तक 'समकालीन हिन्दी ग़ज़लकार एक अध्ययन' के महत्व पर बात की. उन्होंने कहा कि इस ग्रन्थ में हिन्दी के 25 चर्चित ग़ज़लकारों की रचनाधर्मिता पर विस्तार से अध्ययन किया गया है साथ ही यह सलाह भी दी कि इन ग़ज़लों की समीक्षा के साथ यदि इन्हीं ग़ज़लकारों की दस दस ग़ज़लों का संग्रह भी आए तो एक समग्र जानकारी पाठकों के सामने उपलब्ध हो जाएगी .

कार्यक्रम का संचालन करते हुए कोटा से पधारे प्रसिध्द संस्कृतिकर्मी एवं गीतकार श्री महेंद्र नेह ने हिन्दी ग़ज़ल की जनधर्मिता और वर्तमान परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा करते हुए श्री हरेराम समीप के जीवन और लेखन की जानकारी दी और उनकी कुछ चर्चित रचनाओं से उपस्थित श्रोताओं को परिचित कराया और उनके रचनात्मक सरोकारों को उजागर किया. गाज़ियाबाद से पधारे श्री अवधेश कुमार सिंह ने लोकार्पित दोहा संग्रह 'आँखें खोलो पार्थ' पर अपनी समीक्षा पढ़ी और डाक्टर भावना शुक्ल ने समीप के रचनाकर्म पर अपनी बात रखी.

वरिष्ठ और चर्चित कवि श्री लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने दोहा संग्रह के अनेक दोहे पढ़ते हुए कहा कि इस संग्रह में जीवन से जुड़े अनेक विषय हैं, समीप की नजर बार बार पिछड़े और दुखीजनों की तरफ जाती है -

बचपन में जिसकी कलम वक्त ले गया छीन
बाल पेन वह बेचता बस में 'दस के तीन'

इसके बाद श्री बाजपेयी जी ने समकालीन ग़ज़ल परिदृश्य पर बहुत सार्थक विचार रखे. दुष्यंत के समय से अब तक हिंदी ग़ज़लकारों के सामने आती रहीं चुनौतियों पर स्वयं अपने अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी ग़ज़लें कहते हुए तब उन्हें उर्दू शायरों और हिन्दी कवियों की भीषण उपेक्षा मिलती थी, उनसे बेतुके सवाल किये जाते थे. इसके बावजूद हिंदी ग़ज़ल ने इतने कम समय में जो अपनी पुख्ता जमीन तैयार की है वैसी दुनिया के साहित्य की किसी विधा ने नहीं बनाई है . दुष्यंत की ग़ज़लों के प्रभाव से अब उर्दू ग़ज़ल का भी चेहरा बदल रहा है . ग़ज़ल की भाषा का भी कोई मसला नहीं रह गया है . उन्होंने कहा कि अब हिन्दी ग़ज़ल का एक ही लक्ष्य है और वह है हिन्दी ग़ज़ल की साहित्यिक मान्यता पाना. उन्होंने सवाल किया कि जब पंजाबी, गुजराती, मराठी और अन्य भाषाओँ में लिखी जाने वाली ग़ज़ल को भरपूर मान्यता मिल रही है तब हिंदी में ही उसकी उपेक्षा क्यों हो रही है, यह विचारणीय है.

समीप के दोहा संग्रह पर बात करते हुए जयपुर से पधारे प्रखर आलोचक श्री शैलेन्द्र चौहान ने कहा कि वही रचनाकार समाज में बढ़ती विरूपता का पर्दाफाश कर सकता है जिसके सरोकार समाज के वंचित, शोषित, दलित वर्ग के प्रति हैं वरना लेखन एक पाखंड से कम नहीं है. समीप अपनी रचनाओं में लगातार उन पर बात करने वाले रचनाकार हैं, इस दोहा संग्रह में भी उन्होंने संघर्षरत आमजन की बात की है और उसकी यूँ उम्मीद बंधाये रखी है-

उजड़ जाए तो गम नहीं उसको नहीं मलाल
चिड़िया अपना घोंसला बुन लेती हर साल

वरिष्ठ गजलकार व सम्पादक श्री रामकुमार कृषक ने तुलसी जयंती पर स्मरण करते हुए उनके रचना संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि जैसे कबीर ने समाज में प्रत्यक्ष संघर्ष करते हुए रचनाकर्म किया उसी तरह तुलसी ने लोकधर्मिता को अपने महाकाव्य के माध्यम से पुनर्स्थापित व पुनर्संस्कारित किया ठीक उसी तरह प्रेमचंद ने भी अपने समय के समाज का चित्रण करते हुए हमें सन्देश दिया कि रचनाकार में प्रतिरोध की चेतना मौजूद रहना बहुत जरुरी है और आज यह परम्परा कवि श्री हरेराम समीप तक जाती है जो अपनी रचनाओं में समय से प्रतिरोध करते हैं . हिन्दी ग़जल में उपस्थित इस प्रतिरोध के सन्दर्भ में वे दुष्यंत के एक मशहूर शेर का हवाला देते हैं - 

"तू किसी रेल सी गुजरती है ,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ" 

यह हवाला देते हुए वे कहते हैं कि लोग इस शेर को प्रेम के संदर्भ में देखते हैं जबकि यह कोई स्त्री या नारी नहीं है बल्कि दुष्यंत के रचनाकाल को देखें तो यह रेल वास्तव में तत्कालीन व्यवस्था है जो आम इंसान को जिसके संकट का अहसास करा रही है, पुल सा थरथराना यही है. इस तरह हिंदी ग़जल आज प्रतिपक्ष की भूमिका में अपने समय के सभी खतरे उठाने के लिए तैयार है. अर्थात हम कह सकते हैं कि भगतसिंह हिंदी ग़ज़ल की चेतना में मौजूद है. विकास के बीच गाँवों का जो क्षय हुआ है वहाँ बच्चे शहर आकर यहां झुग्गियों में रह रहे हैं, स्त्रियों पर अत्याचार , बाजारीकरण आदि ग़ज़ल के विषय बने हैं. राष्ट्रवाद का जो बाजारीकरण हुआ है वह भी ग़जल का विषय है. इस विडम्बनापूर्ण समय में हिन्दी ग़जल की जो आलोचना यात्रा शुरू हुयी है इसमें समीप शामिल हैं इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं .

कृषक जी के वक्तव्य के बीच सभा में उपस्थित कुछ विद्वानों ने प्रश्न उठाये कि साहित्यिक चर्चा में राजनीतिक विषय नहीं उठाने चाहिए थे, तभी अपने अध्यक्षीय भाषण में अलवर से पधारे आलोचक डॉ. जीवन सिंह ने इसी विषय पर केन्द्रित जो प्रभावपूर्ण और धाराप्रवाह वक्तव्य दिया कि सौ से अधिक उपस्थित श्रोता मंत्रमुग्ध हो कर तालियों से उनका समर्थन करने लगे. डॉ. जीवन सिंह ने कहा कि साहित्य जीवन की व्याख्या करता है और राजनीति उससे कभी अलग नहीं रही है. यह केवल नजरिये की बात है कि आप चीज़ों को किस तरह देखते हैं. उन्होंने तुलसीदास के एक दोहे से कहा कि जिस तरह के लोगों के बीच वह उसी तरह समझ लिया जाता है . साहित्य और राजनीति के अन्तर्सम्बन्धों पर उद्धरण देकर समझाते हुए आपातकाल में बाबा नागार्जुन की कविताओं का उल्लेख किया और कहा कि राजनीति कोई बुरी चीज़ नहीं है . अगर बुरी होती तो महात्मा गाँधी राजनीति में क्यों आते ? और भी लोग क्यों आते ? हिन्दी ग़ज़ल के बारे में उन्होंने कहा कि हिन्दी ग़ज़ल अपने समय से संवाद है . जो अन्तर्विरोध रहे हैं, जो परेशानियाँ रही हैं, जो दिक्कतें रही हैं ... ग़ज़ल उनसे सम्वाद करती है . ग़ज़ल तो दो संस्कृतियों का मिलन है, सामासिक संस्कृति का प्रतीक है... इस्लाम और हिन्दू धर्म मिला तो ग़ज़ल की रचना हुई. इसलिए यह बहुत बड़ी विधा है जो सामासिक संस्कृति से निर्मित हुई है .

अंत में हरेराम समीप और संस्था के सदस्यों ने प्रमुख विद्वानों का शाल उढ़ाकर अभिनन्दन किया और सभी का आभार व्यक्त किया . इस तरह कार्यक्रम में आज की हिन्दी ग़ज़ल तथा आधुनिक दोहा विधा पर एक सार्थक विमर्श सम्पन्न हुआ जिसमें श्री नीरज जी ( गजल शोध ग्रन्थ के प्रकाशक) भावना प्रकाशन दिल्ली , जबलपुर, नोएडा, दिल्ली और फरीदाबाद नगर के अनेक कवि कथाकार और लेखकों ने शिरकत की.
प्रस्तुति-
हरेराम समीप 
9871691313