Tuesday, April 18, 2017

'कॉमेडी थिएटर करना, वरना बर्फ गिरेगी!'

'कॉमेडी करना, नहीं तो बर्फ गिरेगी।' जबलपुर में 3 दिवसीय ‘दिनेश ठाकुर स्मृति नाट्य प्रसंग’ के उद्घाटन सत्र में नादिरा बब्बर उनके साथ अपनी स्मृतियों को साझा कर रही थीं। नाट्य प्रशिक्षण के दिनों में वे दिनेश ठाकुर की ‘दाढ़ी पर फ़िदा थीं’ और इसके बाद मुम्बई में उनके थिएटर पर। लिहाजा जब मुम्बई में थिएटर करने का ख्याल उनके जेहन में आया तो शुरुआती सलाह दिनेश ठाकुर से ली। दिनेश ने थिएटर में कॉमेडी की सलाह दी।

यों कॉमेडी का ख्याल बुरा नहीं है। विशुद्ध हास्य की परंपरा साहित्य में भी रही है। यह बात दीगर है कि वह कितना शिष्ट या अशिष्ट होता है। हास्य बहुधा परिस्थिति-जन्य होता है। इसमें किसी विचार की गुंजाइश हो, यह जरूरी नहीं है। पर यह परसाई का शहर है, जिसने हास्य और व्यंग्य के बीच गाढ़ी लकीर खींचने का काम किया और विचार के बगैर व्यंग्य संभव नहीं है। फिर आयोजन इप्टा (विवेचना) का था, जिसकी पहचान ही विचारधारा आधारित नाटकों की है। इसलिए यह कैसे संभव है कि कोई ग्रुप विवेचना, जबलपुर के साथ आए और महज कॉमेडी नाटक खेलकर चला जाए। ‘मोलियर’ की रचना पर आधारित नाटक ‘बीवियों का मदरसा‘ की प्रस्तुति के दूसरे दिन 15 अप्रैल 2017 को सुबह कोई ग्यारह बजे स्थानीय शहीद स्मारक परिसर में ‘नाटक में विचार तत्व’ नामक विषय पर संगोष्ठी रखी गयी।


संचालन का जिम्मा संभालते हुए हनुमंत किशोर ने संक्षिप्त पर सुस्पष्ट भूमिका रखी। कहा कि दिनेश ठाकुर कहते ही थे कि मैं नाटक मजे के लिए करता हूँ। जाहिरा तौर पर जब नाटक मजे के लिए होगा तो मुख्य तत्व ‘हास्य’ ही होगा। नाटकों के दर्शक सीमित हैं। उन्हें थियेटर की ओर खींचना है तो नाटक का रोचक होना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि मजे के लिए थियेटर करने वांले लोग ‘प्रोपेगंडा थियेटर’ करने वालों की खिंचाई करते हैं कि इनकी वजह से दर्शक थियेटर से कट गये, जबकि ‘विचारधारा आधारित थियेटर’ करने वालों का कहना होता है कि ‘हाँ! हमारे पास एक विचार है तो हमारे नाटकों में यह क्यों न हो?‘ आगे चलकर उन्होंने रघुवीर सहाय को भी उ़़द्धृत किया जो कहते हैं कि जहाँ कला बहुत अधिक होगी, वहाँ विचार नहीं होगा और जहाँ विचार बहुत ज्यादा होंगे, वहाँ कला नहीं होगी।


चर्चा की शुरूआत के लिए इन पंक्तियों के लेखक को विनम्र इंकार के बावजूद आमंत्रित किया गया तो अपना जोर महज इस बात पर था कि नाटक में विचार दाल में नमक की तरह अनिवार्य है और महत्व इसकी मात्रा का भी है। न हो तो स्वाद नहीं आयेगा और ज्यादा हो तो दर्शक के रक्तचाप के बढ़ने का खतरा।

 ‘सेतु’ बनारस के सलीम राजा ने कहा कि किसी भी नाटक में कथा-तत्व, विचार-तत्व, अभिनय तत्व, निर्देशकीय तत्व और विचार-तत्व होते हैं। विचार जितने घनीभूत होंगे, नाटक उतना ही सशक्त होगा। नाटक में मजा होना चाहिए पर वह किसी को ठेस पहुँचाकर उत्पन्न न किया जाए।

‘बिहान’ भोपाल के हेमंत ने कहा कि एक केंद्रीय विचार के बगैर नाटक संभव ही नहीं है। पर आलेख लिखे जाने के बाद निर्देशक एक तरह से नाटक की पुनर्सजना करता है तो उस केंद्रीय विचार के बहुत से उप-विचार हो सकते हैं। इसलिए एक ही नाटक भिन्न निर्देशकों द्वारा विचार-भिन्नता के साथ सामने आता है।

गोष्ठी का आधार वक्तव्य सुप्रसिद्ध रंग-समीक्षक संगम पाण्डेय ने रखा। आपने कहा कि नाटक में विचार न्यूनतम होनें चाहिए। संज्ञान विचार की प्रारंभिक अवस्था है, जबकि विचारधारा परिपक्व होती है। पर कोई विचारधारा ही विचार नहीं है। इनका आपस में घाल-मेल नहीं होना चाहिए। भारतीय परम्परा विचार की नहीं, भाव की है। भरतमुनि ने त्रासदी को खारिज कर दिया था जबकि ग्रीक नाटकों की शुरुआत ही इससे होती है। अपने यहाँ की परम्परा भावमयी है और इसका केंद्रीय तत्व लय है। लय भारतीय बहुत अच्छे से पकड़ते हैं। तर्क हमारी परम्परा में नहीं है क्योंकि चीजों को हम सहज ही स्वीकार कर लेते हैं। तर्क के बिना विचार नहीं हो सकता। पर जब विचार की बात हो तो वह अथेंटिक होना चाहिए, ठोस होना चाहिए। माइक्रो और मेक्रो रियलिटी में फर्क समझना चाहिए।

समर सेनगुप्त ने कहा कि सभी चीजों के मूल में अर्थनीति है और इसे नियंत्रित राजनीति करती है। मुख्य सवाल यह होता है कि राजनीति किसके पक्ष में है? अगर वह जनतांत्रिक नहीं है तो नहीं चाहती कि नाटक कोई सवाल उठाए। बस, मजे लो और घर जाओ!

वरिष्ठ रंगकर्मी अरुण पाण्डेय ने कहा कि किसी नाटक को करने से पहले यह विचार होता है कि यह नाटक क्यों करना है? बगैर विचार के हमने कोई नाटक किया ही नहीं और विचारहीन नाटक करना व्यर्थ है। आज का संकट यह है कि नई पीढ़ी अध्ययन से दूर है। इन्हें किताबों के साथ जोड़ने की जरूरत है।

रंगकर्मी आशीष पाठक ने कहा कि चीजों को उलझाने के बदले सीधी-सीधी बात की जानी चाहिए। स्व-अनुभूत को व्यक्त करना ही कला है। किसी भी अभिनेता के लिए चरित्र-निरूपण सबसे गम्भीर मसला होता है जो विचार से ही उपजता है। अब तो जो समय है उसमें स्वयं को वामपंथी कहना ही बड़े साहस का काम है।

विवेचना के सचिव हिमांशु राय ने 'अंक' के साथ अपनी सम्बद्धता का स्मरण किया और यह भी प्रकाश डाला कि चर्चा के लिए यही विषय क्यों चुना गया। उन्होंने कहा कि दिनेश ठाकुर अक्सर कहा करते थे कि 'मैं पॉपुलर थिएटर नहीं कर रहा हूँ, बल्कि थिएटर को पॉपुलर कर रहा हूँ।' हिमांशु ने कहा कि कई बार नाटक में बड़ी चकाचौंध होती है। उम्दा सेट होता है, लाइटिंग होती है, धुआँ होता है; देखकर बड़ा अच्छा लगता है पर आखिर में यह ख्याल आता है कि नाटक देखकर क्या मिला? यहाँ विचार की जरूरत महसूस होती है।

'अंक' के निर्देशक अशोक मिश्र ने कहा कि हम थिएटर वाले यह क्यों समझते हैं कि हम समाज के ठेकेदार हैं। नाटक का यह उद्देश्य नहीं होता कि वह कुछ दे ही। क्या सिर्फ मनोरंजन काफी नहीं है। फिर प्रस्तुति-परिकल्पना में निर्देशकीय विचार तो होता ही है। उन्होंने 'जिन लाहौर नहीं देख्या' की प्रस्तुति का उदाहरण देते हुए कहा कि कैसे दिनेश ठाकुर ने एक नए विचार के साथ इसे प्रस्तुत किया जो हबीब साहब की प्रस्तुति से बिल्कुल भिन्न थी। प्रीता माथुर ने इसी के विस्तार में कहा कि नाटक में मनोरंजन भी एक तरह की थेरेपी है। खुद मनोरंजन भी एक विचार है जो अच्छे विचारों को जन्म देता है।

सच है कि हँसना कतई कोई बुरी बात नहीं है। यह आज के तनावयुक्त प्रदूषण वाले माहौल में देह-दिमाग में थोड़ी-सी ताज़ी हवा भरने के लिए मुफीद है। सवाल फिर भी यह रह जाता है कि हँसा किस पर जा रहा है? विचारहीनता लाचारी, कमजोरी, बेबसी को अपनी हँसी का शिकार बनाती है और अगर वह 'थ्री इडियट्स' या 'लाफ्टर शो' हो तो गरीबी को भी। वह सॉफ्ट-टारगेट चुनती है और इसके लिए अक्सर परम्परा की आड़ लेती है। अपनी परम्परा में जो 'ताड़न के अधिकारी' हैं वही हँसी के सर्व-सुलभ पात्र भी हैं। तानाशाह पर हँसना सबसे जोखिम का काम होता है, क्योंकि इसके लिए विचार की जरूरत होती है और विचार को ही ख़ारिज कर देना जोखिम लेने की तुलना में आसान, गुणकारी और फायदेमंद होता है।

- दिनेश चौधरी








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