Wednesday, April 12, 2017

'उन्मत्त' मस्त कवि हैं, पागल तो जमाना है

- दिनेश चौधरी

रेलवे की मजदूर बस्ती में कोई एक शाम थी। कॉमरेड लॉरेंस के आग्रह पर हम नुक्कड़ नाटक खेलने गए थे। सफ़दर हाशमी के 'मशीन' को हमने 'रेल का खेल' नाम से बदल दिया था। इम्प्रोवाइजेशन से नाटक बेहद रोचक बन पड़ा था और चूँकि नाटक सीधे उन्हीं को सम्बोधित था, जो समस्याएं झेल रहे थे, इसलिए उन्हें कहीं गहरे तक छू रहा था। नाटक के बाद देर तक तालियाँ बजती रहीं और चीकट गन्दे प्यालों में आधी-आधी कड़क-मीठी चाय पीकर हम लोग वापसी के लिए गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगे। छोटा स्टेशन होने के कारण वोटिंग हाल नहीं था, इसलिए रेलवे गार्ड के बड़े-बड़े बक्सों को इकठ्ठा कर हम लोगों ने आसन जमा लिया। तभी कॉमरेड लॉरेंस एक कविनुमा शख़्स के साथ नमूदार हुए जो आगे चलकर सचमुच ही कवि निकला। कवि का नाम वासुकि प्रसाद 'उन्मत' था।

उन्मत ने नाटक से ज्यादा मेरे लिखे शीर्षक गीत की तारीफ़ की। जब कोई आपकी किसी रचना की कुछ ज्यादा ही तारीफ़ करे तो आपको फौरन इस बात का अंदेशा हो जाना चाहिए कि तारीफ़ करने वाला भी रचनाकार है। 'आप भी लिखते हैं?' मैंने शिष्टता के साथ पूछा। जवाब में उन्होंने 'अर्ज करता हूँ' की औपचारिकता निभाए बगैर एक कविता अर्ज कर दी। कविता मारक थी। मुकर्रर वगैरह हुआ तो उन्होंने कहा कि जितनी देर में कविता दोहराऊंगा, उतने समय में एक नई कविता हो जायेगी। उन्होंने दूसरी कविता सुनाई, फिर तीसरी, फिर चौथी। इसके बाद संख्या याद नहीं रहे। बक्से में बैठे-बैठे अधप्याली चाय का एक दौर और हुआ और 'उन्मत्त' का काव्य-पाठ तब तक चलता रहा जब तक की गाडी आकर खड़ी नहीं हो गई।

इसके बाद के कुछ पल संकट और जोखिम वाले थे। रेलगाड़ी के गार्ड ने सिटी बजाकर झंडी लहराना शुरू कर दिया था। बाकी सारे साथी गाड़ी में सवार हो गए थे। गाड़ी छूटने को थी और छूट चुकी कविता अपने आधे मुकाम पर थी। गाड़ी छूटती तो अगली गाड़ी के आने में लम्बा अंतराल था और कविता को छोड़ता तो कवि का अपमान होता। मैंने विदा के लिए हाथ बढ़ाया तो उन्होंने हाथों को मजबूती से पकड़ लिया। कविता बदस्तूर जारी थी। गाड़ी के पहिए घूमने शुरू हो गए थे। मैंने अपना बायाँ हाथ उनके कन्धों पर डाला और कविता सुनते-सुनते ही थोड़े बल के साथ उन्हें गाड़ी की दिशा में धकेला। चूंकि इस कार्रवाई से कविता-वाचन और श्रवण की प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं आ रही थी, इसलिए उन्होंने भी अपना पूरा सहयोग बरता। कविता की अंतिम पंक्ति खत्म होते न होते मैं थोड़ी गति पकड़ चुकी गाड़ी मैं सवार हो चुका था और हाथ हिलाते हुए मैं 'बाय-बाय' की जगह 'वाह-वाह' कर था।

'उन्मत्त' से मेरी यह पहली हाहाकारी मुलाक़ात थी। इसके बाद कुल जमा दो बार और मिला। 'उन्मत्त' भिलाई के लोको शेड में फीटर का काम करते थे। पता नहीं अभी नौकरी में हैं या नहीं। एक अरसे से उनसे भेंट नहीं हुई। कोई सम्पर्क सूत्र भी नहीं है। उनकी कविताएँ सीधे दिल पर चोट करती थीं। भाषा और शिल्प चाहे जो हो, बात बिल्कुल खरी कहते थे। अफ़्रीकी क्रन्तिकारी अश्वेत कवि बेंजामिन मोलाइस की फाँसी पर उनकी लिखी कविता साधारण श्रोता को भी दहला देती थी। वे काली लाशों का पहाड़ खड़ा कर देने पर भी न झुकने, न टूटने की बात कहते थे। यह कविता अब मेरे पास नहीं है। किसी एक कैसेट में रिकॉर्ड है पर वह शायद ही चल पाए।

'उन्मत्त' अक्खड़ थे। जमाना कवियों को थोड़ा पागल समझता है तो अपना उपनाम 'उन्मत्त' रख लिया -'लो, कहते रहो हमें पागल!' जमाने को ठेंगे पर रखते थे। रेलवे में छुटभैये अफसरों का स्वागत भी धार्मिक रीति-रिवाज से होता है ताकि तलुए चाटने की महान परम्परा में कोई दाग न लग जाए। किसी छोटे अफसर की मत मारी गई थी जो उसने 'उन्मत्त' को स्वागत-गान लिखने कह दिया। 'उन्मत्त' ने स्वागत-गान ऐसा लिखा कि आइन्दा स्वागत-समारोह तो दूर, उन्हें किसी बिदाई समारोह में भी नहीं बुलाया गया। एक-दो और कविताएँ है। हनुमान की भक्ति का भक्तों ने केवल महिमा-मण्डन किया है। 'उन्मत्त' उसे किसी और नजरिए से देखते हैं। कुत्तों वाली कविता उन कुत्तों पर है, जिनकी शक्लें इंसानी हैं पर जिह्वां और दुम में रत्तीभर भी फर्क नहीं है!

2 comments:

  1. कुत्ते जिनके पट्टे
    केसरिया

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  2. उम्नत्त जी की और कवितायें साझा कीजिये
    एक कवि के साथ रोचक संस्मरण...

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