Wednesday, June 29, 2016

अमेरिकी साम्राज्यवादी साजिश के खिलाफ लैटिन अमेरिका की जनता का संघर्ष

 - विनीत तिवारी 

ब लैटिन अमेरिका के मुश्किल हालात पर बात करने के लिए और वहां की जनता  के साथ अपनी एकजुटता ज़ाहिर करने के लिए जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट ने पुणे मे सभा की तो ये एक मौका था जिसमे हम समाजवाद की मंज़िल, उस तक पहुंचने के अपने रास्ते और अपने कदमों की परख भी कर सकते थे। 

दुनिया के दूसरे गोलार्ध मे मौजूद क्रांतिकारी संघर्षरत जनता के साथ अपनी एकजुटता ज़ाहिर करने के लिए जोशी-अधिकारी इंस्टीट्यूट अॉफ सोशल स्टडीज द्वारा शंकर ब्रह्मे समाज विज्ञान ग्रंथालय के सहयोग से पुणे मे १७ जून २०१६ को एक सभा का अायोजन किया गया। लोकायत के सभागृह मे अायोजित इस सभा मे मुख्य अतिथि के तौर पर  भारत मे वेनेज़ुएला के राजदूत श्री अॉगुस्तो मोंतीएल और उनकी जीवनसाथी सुश्री मिली मोंतीएल शरीक हुए।  स्वागत किया अद्वैत पेडनेकर ने और अतिथयों का परिचय दिया विनीत तिवारी ने।  श्री अॉगुस्तो मोंतीएल और उनकी जीवनसाथी सुश्री मिली मोंतीएल को स्मृति चिन्ह भेंट किए सीपीअाई की वरिष्ठ कॉमरेड शांता रानाडे और भारतीय महिला फेडरेशन की सक्रिय कार्यकर्ता कॉमरेड लता भिसे ने। 

विषय प्रवर्तन करते हुए अर्थशास्त्री व जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट के शोध विभाग की प्रमुख डॉ जया मेहता ने कहा कि जब हम पूँजीवाद का विरोध कर रहे हैं तो ये स्पष्ट होना चाहिए कि हमारा अाशय उसके विकल्प के तौर पर समाजवादी व्यवस्था से है। सोवियत संघ जैसी अर्थव्यवस्थाओं के ढहने के बाद क्यूबा समाजवादी विचारधारा के पक्ष मे मजबूती से खड़ा हुअा और क्यूबा की ये बहुत अहम भूमिका रही है। क्यूबा के बाद वेनेज़ुएला में उगो चावेज़ ने २१वीं सदी के समाजवाद का परचम लहराया और  उससे समाजवाद के भविष्य मे नई उम्मीद और वर्तमान मे नए उत्साह का संचार किया।  वेनेज़ुएला, बोलीविया, इक्वेडोर अादि लैटिन अमेरिकी देशों में चल रहा संघर्ष साम्राज्यवादी पूँजीवादी उत्पादन के संबंधों के विकल्प में नए समाजवादी संबंधों की स्थापना की कोशिश है। जब हम समाजवाद की बात करते हैं तो केवल सत्ता पर कौन काबिज़ हुअा, उतनी ही बात नही करते बल्कि उत्पादन संबंधों मे होने वाले परिवर्तनों की बात भी करते हैं। उन्हीं अर्थों में चावेज़ ने कहा था कि हम वो नही कर सकते जो सोवियत संघ ने किया था यानी सारे उत्पादन अाधार का राष्ट्रीयकरण लेकिन हम मौजूदा पूंजीवादी अाधार को तमाम कोआपरेटिव बनाकर चुनौती दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि कोआपरेटिव्ज़ के ज़रिए पूरी समाज व्यवस्था के उत्पादन संबंध बदले जा सकते हैं। चावेज़ की ये बात मुझे समाजवाद को कामयाब बनाने के लिए बहुत कल्पनाशील लगती है और में  इसे इसलिए भी सलाम करती हूँ क्योंकि ये भारत के लिए भी बहुत प्रासंगिक है। फिलहाल इन मुल्कों को अमेरिकी साज़िशें अस्थिर करने की कोशिशें कर रही हैं। ऐसे मे हम सभी जो इंसानियत के भविष्य के लिए फ़िक्रमंद हैं, उन्हें इन देशों की समाजवादी व्यवस्थाएं और  विचारधारा बचाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। इस कार्यक्रम का मकसद भी यही है कि लोगो के सामने सच्चाई अाये और वे समझ सकें कि समाजवाद ही मनुष्यता के बचे रहने की गारंटी है। 

श्री अॉगुस्तो मोंतीएल ने वेनेज़ुएला तथा अन्य लैटिन अमेरिकी देशों के वास्तविक हालात के बारे मे जानकारी दी।  पिछले दिनों वाशिंगटन पोस्ट अखबार मे संपादकीय प्रकाशित हुअा कि वेनेज़ुएला के हालात खराब हैं कि वहां विदेशी हस्तक्षेप की जरूरत है।  देखा-देखी कुछ भारत के अखबारों ने भी इसी तरह के विचार ज़ाहिर किए। ये नतीजा है ओबामा सरकार की उन लगातार कोशिशों का जो वे वेनेज़ुएला को बदनाम करने के लिए कर रहे हैं। ओबामा प्रशासन ने हाल मे एक अादेश जारी करके वेनेज़ुएला को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है। ये पहला कदम है वेनेज़ुएला के खिलाफ प्रतिबंध लागू करने का। उन्होंने विस्तार से बताया कि अमेरिकी तथा अन्य पश्चिमी देशों की साम्राज्यवादी साज़िशों के तहत तेल की कीमतों को अस्थिर कर वेनेज़ुएला मे अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की जा रही है। कॉर्पोरेट नियंत्रण वाले मीडिया के ज़रिए ये झूठ प्रचारित करने की कोशिश की जा रही है कि देश मे अराजकता का माहौल है और  उसे दुरुस्त करने के लिए बाहरी हस्तक्षेप की जरूरत है।  लेकिन सच्चाई ये है कि हाल मे अमेरिकी देशों के संघ के भीतर हुए मतदान मे वेनेज़ुएला के पक्ष मे २९ और अमेरिका के पक्ष मे सिर्फ अमेरिका, कनाडा और पैराग्वे के तीन ही मत पड़े। दुनिया के तमाम देशों की न्यायप्रिय जनता का समर्थन हमें मिल रहा है। भारत के साथ भी हमारा बहुत नजदीकी संबंध है। भारत के तेल की करीब एक तिहाई जरूरत वेनेज़ुएला से पूरी होती है।  साम्राज्यवाद इस प्राकृतिक संसाधन का इस्तेमाल दूसरों पर कब्ज़ा करने के लिए करता है जबकि हम इसे सहयोग के मौके के तौर पर देखते हैं। उन्होंने पिछले २० वर्षों मे राष्ट्रपति चावेज़ और राष्ट्रपति मादुरो के शासन के दौरान लिए गए जनहितैषी कदमों का विस्तृत ब्योरा दिया। उन्होंने कहा कि वेनेज़ुएला, बोलीविया और  इक्वेडोर ने क्यूबा की तरह ही विकास का अपना अलग नजरिया चुना जो अमेरिकी साम्राज्यवाद के हुक्म से नही चलता है। इसीलिए हमारे इस प्रयोग और कोशिश के खिलाफ अमेरिका और उसके समर्थक देशों ने विभिन्न स्तरों पर मोर्चा खोल रखा है। इनमे हमारे देशों पर अार्थिक प्रतिबंध लगाने से लेकर राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय मीडिया मे भ्रामक और तथ्यहीन झूठी जानकारी फैलाने से लेकर देश के भीतर मौजूद पूंजीवाद समर्थक दक्षिणपंथी समूहों को मदद देना भी शामिल है। उन्होंने कहा कि जैसे पश्चिम एशिया मे, इराक मे और लीबिया मे पहले उनके बारे मे भ्रम फैलाया गया और फिर  उन्हें नेस्तनाबूद  कर दिया, वैसा ही खेल वेनेज़ुएला के साथ खेलने की कोशिश की जा रही है। उनका कॉर्पोरेट मीडिया वेनेज़ुएला से बनने वाली विश्व सुंदरी के बारे में तो बताता है लेकिन ये नही बताता कि वेनेज़ुएला का संविधान शायद दुनिया का एकमात्र संविधान होगा जो महिलाओं के लिए संसद में ५० फीसदी  अारक्षण दे चुका है।  

करीब दो घंटे चले सूचनाओं और  विश्लेषण से भरे व्याख्यान के बाद डॉक्टर अभय शुक्ला ने वेनेजुएला के चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम के बारे मे बताया कि वहां चिकित्सक को केवल दवा अदि की तकनीकी शिक्षा नही दी जाती बल्कि उन्हें सामाजिक परिप्रेक्ष से भी गंभीरता से वाकिफ कराया जाता है। उन्होंने बोलीविया के हालात पर भी अपनी बात रखी। इसी तरह अर्चिष्मान राजू ने ब्राजील के भीतर हो रही हालिया उथल-पुथल पर सवाल पूछे।  

अतिथियों का स्वागत करतीं वरिष्ठ सीपीअाई नेता कॉमरेड शांता रानाडे
और मंच पर मौजूद श्री एस पी शुक्ला एवं डॉक्टर जया मेहता।
सभा की अध्यक्षता करते हुए जोशी-अधिकारी इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष और पूर्व वित्त व वाणिज्य सचिव श्री एस पी शुक्ला ने कहा कि सन २००८ से संकट मे फंसा हुअा पूंजीवाद  अब तक उबर नही सका है और वित्तीय संकट पहले की तुलना मे और  गहरा हुअा है।  बदलावकारी ताकतों को इस स्थिति को अपनी शक्ति संचयन का अवसर बनाकर इस्तेमाल करना चाहिए।  उन्होंने कहा कि वेनेज़ुएला ने हमें उम्मीद की एक राह बताई है और ये हम सभी का कर्तव्य है कि हम वेनेज़ुएला और अन्य लैटिन अमेरिकी देशों के समर्थन मे खड़े हो ताकि दुनिया के लिए बेहतर भविष्य की उम्मीद बचाई जा सके। 

सभा के अंत मे वेनेज़ुएला की क्रांतिकारी जनता के साथ एकजुटता ज़ाहिर करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया। 


परसाई जी से इप्टानामा की एक्सक्लूसिव बातचीत

रसाई जी अपने गुरु हैं। ये बात और है कि अपन कभी भी उनके शिष्य नहीं रहे। यूँ भी आदिकाल से गुणीजनों को जबरन गुरु बना लेने की परम्परा का उल्लेख अपने यहाँ विविध शास्त्रों में मिलता है। गुणीजन भी उदारता बरतते हुए इस परम्परा में हस्तक्षेप नहीं करते थे, जब तक कि मामला दक्षिणा वसूलने तक न पहुँच जाए। गुरुकुल में प्रवेश के लिए राजाओं, मंत्रियों और सामन्तों के होनहार बालकों को कड़ी परीक्षा देनी पड़ती थी और डोनेशन वगैरह देकर ही वे शिष्य की पात्रता हासिल कर पाते थे।

शिष्य बनना बहुत कठिन है और शिष्य-धर्म का निर्वाह इससे भी ज्यादा। एक प्रचलित कथा के अनुरूप गुरूजी प्री-एडमिशन टेस्ट में शिष्य पद के प्रत्याशी को शिष्य -धर्म के निर्वाह के बारे में समझा रहे थे कि यह कितना कठिन कार्य होता है। अध्ययन करना होता है, चिंतन-मनन करना होता है, श्रम करना होता है, जीविका जुटानी होती है,  परीक्षा देनी होती है, गुरु की सेवा करनी होती है-आदि। शिष्य घबरा गया। कहा, ' शिष्य धर्म का निर्वाह इतना कठिन है तो मुझे गुरु ही बना लें!'

कथा सुनकर परसाई जी हँस पड़े और मुझे प्रश्न पूछने की इज़ाज़त दे दी। उनसे हुई बातचीत के संपादित अंश इस प्रकार हैं:

मौजूदा सरकार के दो साल गुजर जाने को आप किस तरह देखते हैं?
एक ही बात हुई है और वही सबसे महत्वपूर्ण है।राजनैतिक शक्तियों का बँटवारा पहली बार सिद्धांतों के आधार पर हुआ है। यह पहले होना था। राजनीति सीधी दो खेमों में बँट गयी है-एक खेमा है, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता का और दूसरा है, संप्रदायवाद और फासिस्टवाद का। बिल्कुल साफ़ बंटवारा है। हर सोचने-समझने वाले आदमी को अब पक्ष ले लेना होगा। तटस्थ कोई हो नहीं सकता।

खाद्यान्न की कीमतें आसमान छू रही हैं। विरोधियों का कहना है कि सरकार महंगाई पर नियंत्रण नहीं रख पा रही है। बुन्देलखण्ड में लोग भूख से मर रहे हैं।
अब इस समस्या का हल निकल आया है। गुजरात में एक जड़ी खोजी गयी है, जिसे खाने से हफ़्तों भूख नहीं लगती। पता लगाया है कि हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि इसी को खाकर भूख को तुष्ट करते थे और तपस्या करते थे। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने सारे भूखों के दमन की शिक्षा दी थी। भूख का दमन करते थे, तो खाद्य-समस्या पैदा नहीं होती थी। वल्कल पहिनते थे तो कपड़े की समस्या नहीं उठती थी। यौन-भूख का दमन करते थे, तो शादी की समस्या पैदा नहीं होती थी। अब हम खाना भी चाहते हैं, कपड़े भी पहिनना चाहते हैं। इसलिए अनाज की समस्या भी पैदा होती है और कपड़े की भी।

अब सारी केंद्र और राज्य सरकारें कीमतों पर नियंत्रण करने की जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती हैं।कोई जरूरत नहीं है कि सरकार अनाज का व्यापार अपने हाथ में ले।आगामी मुख्यमंत्री सम्मेलन में यह तय करना चाहिए कि हर राज्य की जमीन में इस भूख-हरण बूटी को खोजा जाय। तमाम जंगलों में साधु, फकीर और गुनिया को भेजकर इस बूटी का पता लगाना चाहिये। इसके लिए हर राज्य में एक अलग 'भूख - हरण बूटी विभाग' खोल लिया जाय और एक अलग 'भूख -हरण मंत्री' हो। यह विभाग अपने राज्य की सारी जड़ी-बूटी इकठ्ठी कर ले।

यौन-भूख के दमन की बात आपने कही। योगी आदित्य नाथ तो बच्चे पैदा करने के लिए पोर्न देखने की सलाह दे रहे हैं।
कांग्रेस ने कहा था-पहला बच्चा अभी नहीं, दो के बाद कभी नहीं। मगर जनसंघ का नारा है- पहला बच्चा अभी-अभी, दो के बाद कभी-कभी। पहला बच्चा अभी पैदा कर लो। देरी मत करो। फिर दो के बाद कभी-कभी पैदा करो। इस तरह 7-8 तो कर ही लो। माँ और बेटी एक साथ बच्चा दें, यह आदर्श स्थिति है।ज्यादा बच्चे पैदा करने के पीछे एक ठोस तर्क है- हम हिन्दुओं की संख्या बढ़ानी है।

ये 7-8 बच्चे जो होंगे वे क्या होंगे? भूखे मरेंगे, पूरे कपड़े नहीं होंगे। शिक्षा नहीं होगी। ये हिन्दू नहीं, नाली के बिलबिलाते कीड़े होंगे। ऐसे मनुष्यनुमा कीड़ों से ही कोई जाति ताकतवर और श्रेष्ठ होती है? इसलिए ऐसी आदर्श जाति भाई पैदा करते जाओ!

डॉ. स्वामी ने कहा है कि वे वित्त मंत्री होते तो एक दिन में काला धन ले आते।
कहा जाता है - ताल में भोपाल ताल और सब तलैया। इसी तरह स्वामियों में डॉ. स्वामी। ये जनसंघ के अर्थशास्त्री हैं। योगी, स्वामी वगैरह इस देश में बहुत हैं। इन दिनों से ये विदेशी मुद्रा कमाने के लिए अच्छी जिन्स हो गए हैं। मगर इन सबके ऊपर हैं हमारे ये बिना दाढ़ी- केश के पैदायशी स्वामी।जब बोलते हैं, अमृत झरता है।इतना प्यारा ऊल-जलूलपन, इतना खूबसूरत उचक्कापन, इतनी मोहक गैर-जिम्मेदारी कम मिलती है।बड़ा आत्मविश्वासी आदमी है यह। आत्मविश्वास कई तरह का होता है- धन का, बल का, बुद्धि का। मगर सबसे ऊँचा आत्मविश्वास मूर्खता का होता है।

अन्ना हजारे ने अपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में कारपोरेट भ्रष्टाचार का सवाल नहीं उठाया था। इस आंदोलन का लाभ उठाकर सता में आयी सरकार सरमायेदारों के हाथों खेल रही है। करप्शन और कॉरपोरेट के अन्तर्सम्बन्धों को आप किस तरह देखते हैं?
जब कोई चीज खूब हो जाती है, तब सरकार का काम है उसे नियमित करना, जिससे सबको उसका लाभ मिल सके। गेंहूँ की फसल आती है तो सरकार उसके वितरण को नियमित करती है, जिससे सबको गेंहूँ मिल सके। शक्कर के वितरण की भी नियमित व्यवस्था है। इसी तरह भ्रष्टाचार भी हमारी जनता के उपयोग के लिए देश में काफी पैदा होता है, पर नियमित वितरण न होने के कारण जनता के एक बड़े भाग को उसका लाभ नहीं मिल पाता।

भ्रष्टाचार को रोकना उसी तरह है जैसे गेंहूँ की फसल को नष्ट करना।इसे रोकने का इरादा ही गलत है।वास्तव में उसे सुनियोजित कर लेना चाहिए। व्यवसायी और उद्योगपति वर्ग से इसमें काफी सहयोग मिल सकता है। सरकार के विभिन्न मंत्रालय नीलाम हो जाने चाहिए। जो सबसे बड़ी बोली लगाए, उसी का काम वह मंत्रालय करे। जब अर्थ, तेल, वाणिज्य, निर्यात, उद्योग, बिजली आदि महकमे नीलाम हो जाएंगे तो सारा काम एक सुनियोजित ढंग से चलेगा। जो उद्योगपति उद्योग विभाग खरीद लेगा, उसी के उद्योग चलेंगे। दूसरे उद्योगपतियों से वह खुद महसूल लेकर उन्हें कारखाने खोलने देगा।

डिसक्लेमर - यह बातचीत उसी तकनीक से रिकॉर्ड की गयी है, जो दिमाग में केमिकल लोचा उत्पन्न हो जाने की वजह से विकसित होती है।

Thursday, June 23, 2016

कला एवं शिल्प महाविद्यालय की गरिमा बचाने के लिए हस्तक्षेप करें राज्यपाल

"पटना कला एवं शिल्प महाविद्यालय राज्य का एकमात्र कला एवं शिल्प महाविद्यालय है और राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत का साक्षी है. कॉलेज के विद्यार्थियों के साथ हुए दुर्व्यवहार, उनको नुकसान पहुंचाने का कृत्य दुःखद और शर्मसार करने वाला है. हम पटना के कलाकार-रंगकर्मी-संस्कृतिकर्मी और 30 नाट्य संस्थाएं महामहिम राज्यपाल से माँग करते हैं कि पटना कला एवं शिल्प महाविद्यालय की गरिमा बचाने के लिए अविलम्ब हस्तक्षेप करें". पटना कला एवं शिल्प महाविद्यालय के विद्यार्थियों के 52 दिनों से  चले आ रहे आंदोलन और उनकी माँगों के समर्थन में आयोजित "जनसंवाद यात्रा-सह-सांस्कृतिक प्रतिरोध मार्च" को सम्बोधित करते हुए बिहार इप्टा के महासचिव एवं वरिष्ठ रंगकर्मी तनवीर अख्तर ने यह बातें कहीं. 

पटना की 30 नाट्य संस्थाओं ने 21 जून, 2016 को एन.आई.टी. मोड़ से "जनसंवाद यात्रा-सह-सांस्कृतिक प्रतिरोध मार्च" 
निकाला और 'तू ज़िन्दा है.......', 'ये वक़्त की आवाज़ है.......', 'हमें ज़िन्दगी का वो गीत गाने नहीं  देतें.....', 'वे सारे हमारी क़तारों में शामिल......' आदि गीत गाते व 'इंक़लाब ज़िंदाबाद', 'कलाकारों की एकजुटता ज़िंदाबाद', 'कला एवं शिल्प महाविद्यालय के छात्रों का आंदोलन ज़िन्दाबाद', आदि नारे लगाते हुए रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों ने राजभवन की ओर कूच किया. कारगिल चौक (गांधी मैदान) के पास जिला प्रशासन ने राजभवन की ओर प्रतिरोध मार्च कर रहें रंगकर्मियों-संस्कृतिकर्मियों को रोक दिया. प्रशासन के द्वारा रोके जाने पर कलाकारों ने वहीं जनसभा की और आंदोलनरत विद्यार्थियों के समर्थन में राज्यपाल के नाम सम्बोधित 6 सूत्री माँग का ज्ञापन प्रशासन के प्रतिनिधि को सौपा. पटना की 30 नाट्य संस्थाओं ने राज्यपाल से माँग की कि 
  1. पटना कला एवं शिल्प महाविद्यालय के विद्यार्थियों के आन्दोलन को अविलंब समाप्त कराते हुए सम्मानजनक समझौता सुनिश्चित किया जाय;
  2. पटना कला एवं शिल्प महाविद्यालय के निलबिंत विद्यार्थियों का निलंबन वापस लेते हुए उन्हें परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी जाय;
  3. विद्यार्थियों के बेखौफ परीक्षा में शामिल होना सुनिश्चित किया जाय;
  4. पटना कला एवं शिल्प महाविद्यालय में प्रभारी प्राचार्य के द्वारा विद्यार्थियों के साथ दुर्व्यवहार की घटना, छात्रों को प्रताड़ित किये जाने तथा कुलपति के अंगरक्षकों द्वारा की गई फायरिंग, आदि की घटनाओं की निष्पक्ष जाँच एक स्वतंत्र टीम से कराई जाय, जिसमें छात्र प्रतिनिधि भी हों और दोषियों की पहचान करते हुए उनके विरूद्ध कड़ी कार्रवाई की जाय;
  5. गिरफ्तार छात्रों के विरूद्ध मुकादमा वापस लेते हुए उनकी अविलंब रिहाई सुनिश्चित की जाय;
  6. बिहार और झारखण्ड के एकमात्र पटना कला एवं षिल्प महाविद्यालय की गरिमा और विरासत को ध्यान को रखते हुए महाविद्यालय में कला एवं शिल्प प्रक्षेत्र के विषेषज्ञ व अनुभवी प्राचार्य की नियुक्ति की जाय।
जनसभा को रविकांत, सनत कुमार आदि ने भी सम्बोधित किया. सांस्कृतिक प्रतिरोध मार्च में वरिष्ठ रंगकर्मी सुरेश कुमार
हज्जू, हसन इमाम, अजीत कुमार, रणधीर कुमार, मृत्युंजय शर्मा, सजीना राहत, बिज्येंद्र टांक, जितेंद्र कुमार चौरसिया, मिथिलेश सिंह, सुबन्ति बनर्जी, वीरचन्द्र, आदि शामिल हुए.

"जनसंवाद यात्रा-सह-सांस्कृतिक प्रतिरोध मार्च"  का आयोजन अक्षरा आर्ट्स, अजीत गांगुली एक्टिंग इंस्ट्टीयुट, अनहद, अदब, बिहार आर्ट थियेटर, भंगिमा, डिवाईन, एच.एम.टी., जोगांजलि, हिरावल, इप्टा पटना, इप्टा पटना सिटी, कला जागरण केन्द्र, कोरस, लोक पंच, निर्माण कला मंच, नट मंडप, प्रवीण सांस्कृतिक मंच, प्रयास, प्रागंण, प्रेरणा, रंगमाटी, राग, रंगमार्च, रंगकर्म, रंगसृष्टि, सदा दानापुर, सुरागंन, सूत्रधार खगौल, विश्वा, विहान सांस्कृतिक मंच के संयुक्त तत्वावधान में किया गया.


अखबारों की कतरन 
दैनिक भास्कर, पटना दिनांक 22.06.2016 
Hindustan Times, Patna dtd. 22.06.2016
हिन्दुस्तान, पटना दिनांक 22.06.2016

राष्ट्रीय सहारा, पटना दिनांक 22.06.2016

Tuesday, June 21, 2016

इंदौर इप्टा के ग्रीष्मकालीन शिविर का समापन

. सारिका श्रीवास्तव

इंदौर, 14 जून 2016, मंगलवार, इंदौर (म.प्र.)। हर वर्ष की तरह इस साल भी श्रमिक क्षेत्र में 6 मई 2016 से भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की ग्रीष्मकालीन कार्यशाला आयोजित की गई। 6 मई से 6 जून तक निरंतर चली कार्यशाला में करीब 40 बच्चों ने शिरकत की। 

इस कार्यशाला में योग, संगीत और नाट्य विद्या से जुड़े विविध व्यायाम, जेस्चर-पोस्चर, मिरर, पिरामिड, कोलाज बनाना, किसी विषय पर छोटे-छोटे नाटक बनाना, एकल अभिनय और जनगीत का रियाज बच्चों को शिक्षाप्रद के साथ-साथ मनोरंजक भी लगता था। इस बार शिविर लगाने की जगह की भी समस्या खड़ी हो गई। बस्ती का ही एक सरकारी मिडिल स्कूल जो पहले इस गतिविधि के लिए आसानी से मिल जाता था, इस बार स्थानीय नेतागिरी के चलते वो नहीं मिल पाया। वैकल्पिक जगह एक निजी व्यायामशाला थी जिसकी दीवार से देशी शराब की दुकान भी लगी हुई थी। बच्चों के लिए खासकर लड़कियों के लिए वो काफी मुश्किल जगह थी। लेकिन अंत तक कुछ दुर्घटना नहीं हुई। इससे संख्या में कमी आई। तमाम विषम परिस्थितियों का सामना करते ये नन्हें कलाकार डटे रहे और इसे बंद नहीं होने दिया। इस बार की कार्यशाला का अधिकांश दारोमदार पुराने बच्चों ने ही संभाला। महिमा, पूजा, राज, मुस्कान, नेहा, साक्षी और नीपाजी का विषेष सहयोग रहा और कार्यशाला अच्छे से चल सकी।

बच्चों के प्रिय मोगली, लालबुझक्कड़, शेखचिल्ली, मुल्ला नसरुद्दीन के साथ-साथ बच्चों के खेलने की जगह पर हो रहे कब्जे, शिक्षा व्यवस्था, किसानों और बच्चों में पढ़ाई और कैरियर को लेकर लगातार बढ़ती आत्महत्याएँ, महिलाओं पर लगातार बढ़ती हिंसात्मक घटनाएं, गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, मंहगाई, पर्यावरण प्रदूषण इत्यादि पर अनेक कहानियाँ और चर्चाओं के बाद रोज ही इन विषयों पर एक नई स्क्रिप्ट और अपनी-अपनी टीम के साथ हर रोज एक नया नाटक रहता।

इस बीच में ही इन बच्चों की हौसलाफजाई करने कॅामरेड जया मेहता, पेरिन दाजी, विनीत तिवारी, नितिन बेदरकर, प्रमोद बागड़ी, सागर प्रगतिशील लेखक संघ से दीपा भट्ट, इप्टा इंदौर अध्यक्ष विजय दलाल, आयुष तिवारी, आशी तिवारी भी शरीक हुए। कॉमरेड चुन्नीलाल वाधवानी के सौजन्य से प्रोजेक्टर से ‘‘जंगल बुक’’ और ‘‘कुंगफू पांडा’’ फिल्मों का भी बच्चों ने आनंद लिया।

14 जून 2014 को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय में इप्टा की इस कार्यशाला का समापन किया जिसमें विशेष रूप से शरीक होने उज्जैन से प्रगतिशील लेखक संघ के साहित्यकार साथी शशिभूषण, कविता और उनकी नन्हीं बिटिया भी शामिल हुईं। सीपीआई जिला सचिव रुद्रपाल यादव, ओमप्रकाष खटके, भारत सिंह, चुन्नीलाल वाधवानी, एस.के. दुबे, बुलढाना महाराष्ट्र के साथी प्रशांत, इप्टा के साथी जया मेहता, विजय दलाल, सचिव अषोक दुबे, विनीत तिवारी, नेहा दुबे, नितिन बेदरकर, आमिर खान, महिमा, पूजा, राज, साक्षी, मुस्कान, अंशुल, निशांत, कार्तिक, कार्तिक तिवारी, अनुराधा तिवारी, आस्था तिवारी, आकांक्षा, काव्य, पूजा, शारदा बहन, सौरभ, रितिका, दीपिका और सारिका श्रीवास्तव भी इस समापन में उपस्थित रहे।

बच्चों ने कव्वाली, जनगीत और कुछ छोटे-छोटे नाटकों की प्रस्तुति दी। शशिभूषण ने ‘‘शिकारी आता है जाल फैलाता है हमें इस जाल में नहीं फंसना चाहिए’’ की बहेलिया और तोतों की कहानी के जरिए बच्चों को समझाया कि पढ़ाई केवल रटने से नहीं होती, हमें सोच-समझकर उसका अपनी जिंदगी में अर्थ समझना चाहिए तथा बाज़ार और धर्म के जाल में फँसने के बजाय मानवीय मूल्यों और विवेक व तर्क को अपनाना चाहिए। कॅामरेड विजय दलाल और कॅामरेड विनीत तिवारी ने गीत सुनाये। कार्यक्रम के अंत में भागीदार बच्चों को प्रमाणपत्र का वितरण किया गया।

Thursday, June 16, 2016

मुद्रा जी ने कलम को बुलेट की तरह इस्तेमाल किया : जसम




भी सत्ताओं को ललकारने और अपने प्रखर विचारों के लिए जाना जाने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार,, संस्कृतिकर्मी व चिन्तक व हमारे अत्यन्त प्रिय साथी मुद्राराक्षस के निधन से हमने एक ऐसे योद्धा को खो दिया है जिसके होने से पूंजीवाद, सामंतवाद, ब्राहमणवाद के खिलाफ सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करने वालों को प्रेरणा मिलती थी। उनका निधन 13 जून 2016 को लखनऊ में हुआ। दूसरे दिन विद्युत शवदाह गृह में ‘मुद्राराक्षस अमर रहे’, ‘मुदा्रराक्षस को जयभीम व लाल सलाम के नारों के साथ उन्हें अन्तिम विदाई दी गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में लोकतांत्रिक, सामाजिक व सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़े लोग उपस्थित थे।

पिछले काफी अरसे से मुद्रा जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। शरीर साथ नहीं दे रहा था। कही आ व जा नहीं पा रहे थे। उनके रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ जाती। रक्तचाप भी सामान्य नहीं रहता। अर्थात मौत दरवाजे पर लगातार दस्तक दे रही थी। पर मुद्रा जी उससे हार मानने को तैयार नहीं दिखते। दो-दो हाथ करने व उसे पटकनी देने के मूड में रहते। उसके साथ भी उनका जंग उसी तरह था जिस तरह वह प्रतिगामी विचारों से लड़ते थे। पिछले महीने मई की बात है। मौत जिद कर बैठी थी। बलरामपुर अस्पताल के डाक्टरों ने जवाब दे दिया। उन्हें मेंडिकल कॉलेज लाया गया। लगा मुद्रा जी बचने वाले नहीं। मुद्रा जी की हालत बहुत खराब हो गयी थी। वे अचेत थे। उनसे कुछ भी नहीं लिया जा रहा था। कमजोरी शरीर पर हावी थी। लगा इस बार मौत परास्त करके ही मानेगी। पर दूसरे दिन से मुद्रा जी चैतन्य होने लगे और चार दिनों के अन्दर घर आ गये। लेकिन इस बार वे मेडिकल कॉलेज भी नहीं पहुंच पाये। रास्ते मे ही....।.

मुद्रा जी की इस महीने की 21 तारीख को 83 वां जन्मदिन था। उनका जन्म लखनऊ के पास बेहटा गांव में 21 जून 1933 को हुआ। उनका मूल नाम सुभाष चन्द्र आर्य था। मुद्राराक्षस नामकरण के पीछे भी वैचारिक प्रतिरोध की बड़ी रोचक कहानी है। लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने एम ए किया। छात्र जीवन से ही वामपंथी आंदोलन व साहित्य व संस्कृति से जुड़ गये। वे नक्सलबाड़ी आंदोलन और लोहिया के विचारों से भी प्रभावित थे। 1955 से 1976 तक वे कोलकता व दिल्ली में ‘ज्ञानोदय’ व ‘अणुव्रत’ जैसी पत्रिका में काम किया। बाद में वे आकाशवाणी, दिल्ली में नौकरी की। वहां उन्होंने पहला मजदूर संगठन बनाया। इस दौरान प्रसारण संस्थान में कलाकारों, लिपिकों, चतुर्थ श्रेणी व तकनीकी कर्मचारियों की मांगों को लेकर आंदोलन चलाया। ये इमरजेन्सी के दिन थे। 1976 में वे लखनऊ आ गये और तब से यह शहर ही उनकी कर्म भूमि बन गया। यहां के सांस्कृतिक, सामाजिक व राजनीतिक आंदोलनों में उनकी अगुआ की भूमिका थी।

मुद्राराक्षस ने 50 के आसपास से लिखना शुरू किया था। कहानी, उपन्यास, कविता, आलोचना, पत्रकारिता, संपादन, नाट्य लेखन, मंचन, निर्देशन जैसी विधाओं में सृजन किया। दलित व साम्प्रदायिकता जैसे जवलन्त सवालों पर तथा ब्राहमणवाद जैसे विषयों पर चर्चित व विचारोत्तेजक लेखन किया। धर्म ग्रन्थों की मीमांसा के साथ शहीद भगत सिंह के जीवन पर उन्होंने रचनाएं की। चित्रकला, मूर्तिकला एवं संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। अनेक नाटकों, वृतचित्रों का निर्माण और निर्देशन उन्होंने किया। आला अफसर, शान्तिभंग, हम सब मंसाराम, तेन्दुआ, तिलचट्टा, मरजीवा, कालातीत, दण्डविधान, नारकीय, हस्तक्षेप जैसी अनगिनत कृतियों की उन्होंने रचना की है। इनके केन्द्र में युद्धरत आदमी है जिसके अन्दर बदलाव की उत्कट आकांक्षा है। दुबले पतले और छोटी कद काठी वाले मुद्रा जी के अन्दर जिस आग और ताकत का हम अनुभव करते, वह इसी आदमी की है। इस जांबाज योद्धा सर्जक के पास जबरदस्त मेधा और मजबूत कलेजा था जो ‘दांत या नाखून या पत्थर‘ और ‘मुठभेड़‘ जैसी कहानियांें का सृजन ही नही करता बल्कि सत्ता और समय से मुठभेड़ भी करता है। भारतीय सत्ता के जितने भी मॉडल हैं, नेहरू से लेकर मोदी तक, मुद्रा जी ने इसका क्रिटिक रचा। प्रलोभनों को मुद्रा जी ने ठेंगा दिखायां। उन्होंने पुरस्कारों की परवाह नहीं की और हमेशा मुक्तिबोध के शब्दों में ‘सत्य के साथ सत्ता का युद्ध’ में वे सत्य के लिए जनता के पक्ष में अडिग रहे। उन्हें केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी सम्मान, शूद्र महासभा द्वारा शूद्राचार्य तथा अम्बेडकर महासभा द्वारा दलित रत्न सम्मान प्रदान किया गया।

मुद्रा जी ने कलम को बुलेट की तरह इस्तेमाल किया। वे अक्सरहां कहते कि यह ऐतिहासिक पाप होगा, अगर हम चुप रहे। बदलाव का इतिहास रचने के लिए लड़ाई में उतरना जरूरी है। हमें इसलिए लिखना है ताकि जो लड़ रहे हैं, उनका भरोसा न टूटे। सामाजिक बदलाव की जो लड़ाई है, मुद्रा जी इसके विशिष्ट रचनाकार रहे, कलम के योद्धा। उनका लेखन और संस्कृति कर्म शोषितों, दलितों, वंचितों के पक्ष में प्रतिबद्धता और सृजनात्मक संघर्ष का अप्रतिम उदाहरण है। उनकी वैचारिकी इसी संघर्ष से निर्मित हुई है। यह बदलाव की लड़ाई एक बेहतर समाज व्यवस्था की लड़ाई है। अपनी बेबाक राय के लिए वे मशहूर रहे। उन्होंने ‘सामाज, संस्कृति व राजनीतिक सत्ता’, स़़्त्री-दलित और जातीय दंश, धर्म बनाम अंध विश्वास’, भारतीय संस्कृति के चित्र, भारतीय संस्कृति व वामपंथ जैसी पुस्तकें लिखी जो उनकी वैचारिक के उदाहरण है। कई बार वे प्रगतिशीलता के पारम्परिक चिन्तन से टकराते तथा आलोचना करते हुए दखते हैं। इस प्रक्रिया में वे जो नया गढ़ते हैं, हमारी उनसे असहमति हो सकती है लेकिन इस वैचारिकी से प्रगतिशील चिन्तन के क्षितिज को नया विस्तार मिला। अपनी इन्हीं खूबियों की वजह से मृद्राराक्षस जन प्रतिपक्ष के ऐसे बुद्धिजीवी हैं जो हमारे लिए न सिर्फ महत्वपूर्ण थे बल्कि जरूरी भी। हमारी उनसे खूब बहसें होती, मतभेद भी उभरते पर हम सभी उन्हें बेहद प्यार करते और उससे भी ज्यादा उनका स्नेह हमें मिलता। दुर्विजय गंज की वह गली जहां मुद्रा जी का निवास है, बीते एक साल से हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गई थी। याद आता है उनका वह कामरेडाना अन्दाज कि हम जब भी उनके घर पहुंचते वे आगे बढ़कर अभिवादन करते, पूरे जोश से हाथ मिलाते। उस वक्त उनके चेहरे पर गजब का उत्साह, अदभुत चमक देखी जा सकती। विदा करते समय का साथीपन की भरपूर उष्मा से भरा भाव - उनका गेट तक आना और प्यार से लबरेज बंधी मुट्ठी के साथ दहिना हाथ उठाना जैसे लाल सलाम कर रहे हो- तो भूलता ही नहीं।

अपने प्रिय साथी, सहयोद्धा मुद्राराक्षस को जन संस्कृति मंच याद करता हैं, उन्हें लाल सलाम करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करता है और मुद्रा जी की जीवन संगिनी इन्द्रा जी, उनके दोनों बेटे - रोमी व रोमेल और उनके परिजनों के प्रति गहरी संवेदना जाहिर करता है।

कौशल किशोर, अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश की ओर से जारी
लखनऊ, 15 जून 2016
मो -- 8400208031

Tuesday, June 14, 2016

मुद्राजी की अनंत यात्रा

- वीरेन्द्र यादव 
भी कुछ ही देर पहले मुद्राराक्षसजी के पार्थिव शरीर को शवदाह गृह की विद्युत् भट्ठी में गुडुप होते देखकर लौटा हूँ. इस अवसर पर लेखक, नाट्यकर्मी , सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता , दलित संगठनों के प्रतिनिधि और मुद्राजी के पाठक-प्रशंसक जिस भारी संख्या में उपस्थित थे वह मुद्राजी की लोकप्रियता का परिचायक था. यह देखकर आश्वस्ति हुयी कि युवाओं का दल मुद्राजी की वैचारिकता के अनुकूल साम्प्रदायिक फासीवाद और साम्राज्यवाद विरोधी नारे लगाता हुआ उनके इस अंतिम प्रयाण को भी एक मुहिम की शक्ल दे रहा था. मुद्राजी के व्यक्तित्व में मार्क्सवाद और आम्बेदकरवाद का जो सम्मिश्रण था उसकी भरपूर बानगी इस अवसर को यादगार बना रही थी . दृश्य मगहर में कबीर की भी याद दिला रहा था क्योंकि जहाँ मुद्राजी के मार्क्सवादी मित्र और प्रशंसक उनकी नास्तिकता के अनुकूल बिना किसी कर्मकांड के उन्हें अंतिम विदा देना चाहते थे वहीं कुछ दलित बुद्ध अनुयायी बौद्दिक रीति का भी निर्वहन करना चाहते थे और उन्होंने किया भी. इस तरह अपने अंतिम प्रयाण में भी 'लाल -सलाम' और 'जय-भीम' के उद्घोष केबीच मुद्राजी लाल और नीले की एकता का सूत्र पिरोकर गए. 

यह भी दिलचस्प था कि अभी मुद्राजी का पार्थिव शरीर पूरी तरह अग्नि को समर्पित भी न हो पाया था कि कई शोक सभाओं की घोषणा अलग अलग बैनरों के तले की जा रही थी. इस सबके पीछे अधिग्रहण भाव न होकर मुद्राजी की व्यापकता और स्वीकार्यता का सम्मान ही अन्तर्निहित था. अपने समूचे जीवन में मुद्राजी सत्ता-प्रतिष्ठान के सतत विरोधी रहे कभी उन्होंने झुकना नही जाना. लेकिन उनकी अंतिम विदाई के समय प्रदेश की समाजवादी सत्ता ने उन्हें राजकीय सम्मान देकर उनके पार्थिव शरीर को अंतिम विदाई दी. सैनिकों ने शस्त्र झुकाए और शोक बिगुल बजाया.

मुझे पूरा भरोसा है कि यदि मुद्राजी यह सब जानने-सुनने की स्थिति में होते तो वे मेरा हाथ पकड़कर यह जरूर कहते कि "चलो यार, यहाँ से चुपचाप खिसक लें और कहीं अलग चाय पियें".

Wednesday, June 8, 2016

मध्य प्रदेश के इंदौर में होगा इप्टा का 14वां राष्ट्रीय सम्मेलन-सह-जन संस्कृति महोत्सव

भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) का 14वां राष्ट्रीय सम्मेलन-सह-जन संस्कृति महोत्सव का आयोजन 02 अक्टूबर , 20 16  से 04 अक्टूबर, 2016 तक मध्य प्रदेश के इंदौर में होगा। कैफ़ी आज़मी इप्टा सांस्कृतिक
केंद्र (बिहार इप्टा कार्यालय), पटना में 29 मई, 2016 को इप्टा के राष्ट्रीय सचिव मंडल की विस्तारित हुई और बैठक में 14वें इप्टा राष्ट्रीय सम्मेलन-सह-जन संस्कृति महोत्सव के कार्यक्रम की रूपरेखा को गहन विचार-विमर्श के उपरांत अंतिम रूप दिया गया। बैठक की अध्यक्षता वरिष्ठ रंगचिंतक व इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणबीर सिंह ने की। बैठक में सीताराम सिंह (उपाध्यक्ष), राकेश (महासचिव), अमिताभ चक्रवर्ती (सचिव), तनवीर अख्तर (सचिव), प्रमोद भुइंया, उषा वी. आठले, फीरोज अशरफ खां, मनीष श्रीवास्तव (सभी संयुक्त सचिव), इन्द्र भूषण रमण 'बमबम', उपेन्द्र कुमार मिश्र, शैलेन्द्र, संजय कुमार सिन्हा (सभी राष्ट्रीय समिति सदस्य), समी अहमद एवं विनीत तिवारी (आमंत्रित सदस्य) ने शिरकत की। बैठक की शुरुआत वरिष्ठ संगीतज्ञ व बिहार इप्टा के कार्यकारी अध्यक्ष सीता राम सिंह के गायन से हुई। 

फिल्मकार एम. एस. सथ्यू और आनंद पटवर्द्धन करेंगे उद्घाटन 
बैठक में राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सांस्कृतिक चुनौतियों से मुकाबला करने की रणनीति पर विमर्श किया गया और निरंतर बदलते सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिवेश में सांस्कृतिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए सांगठनिक सुदृढ़ीकरण पर जोर दिया गया। बैठक में निर्णय लिया गया कि इप्टा के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन वरिष्ठ फिल्मकार व इप्टा के उपाध्यक्ष एम. एस. सथ्यू और राष्ट्रीय जन संस्कृति महोत्सव का उद्घाटन चर्चित फिल्मकार आनंद पटवर्द्धन करेंगे। इस अवसर पर सम्मेलन परिसर का नामकरण इप्टा के दिवंगत अध्यक्ष ए. के. हंगल की स्मृति में ‘ए. के. हंगल जननाट्य परिसर’ और सांस्कृतिक मंच का नामकरण दिवंगत राष्ट्रीय महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी की स्मृति में ‘जितेन्द्र रघुवंशी सांस्कृतिक मंच’ करने का निर्णय लिया गया। बैठक में राष्ट्रीय सम्मेलन में लिये जाने वाले संकल्पों/ प्रस्तावों का प्रारूप तैयार करने के लिए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शमीक बन्द्योपाध्याय की अध्यक्षता में प्रारूपण समिति का गठन किया गया। 

पहली अक्टूबर से ही इंदौर बनेगा मिनी इंडिया
14वें इप्टा राष्ट्रीय सम्मेलन-सह- जन संस्कृति महोत्सव में भाग लेने के लिए पूरे देश से इप्टा प्रतिनिधियों एवं
कलाकारों का जत्था पहली अक्टूबर की शाम तक इंदौर पहुँच जाएंगा और अगले तीन दिनों तक इंदौर में भारत की सांस्कृतिक विविधता की झांकी देखने को मिलेगी। रोजाना शाम में राष्ट्रीय जन संस्कृति महोत्सव में राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकरों एवं दलों की चुन्निदा प्रस्तुतियां की जायेंगी। राष्ट्रीय सम्मेलन में जनसंगीत, नृत्य एवं रंगमंच की चुनौतियों पर गहन विमर्श किया जायेगा। साथ ही, सम्मेलन में ‘आज का सांस्कृतिक संकट’ विषय पर परिचर्चा और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर ‘न्यू मीडिया का हस्तक्षेप’ विषय पर विशेष चर्चा आयोजित की जायेगी। 02 अक्टूबर को देश भर से आएं इप्टाकर्मी व कलाकार ‘सबके लिए एक सुन्दर दुनिया’ के नारे के साथ इंदौर में जन सांस्कृतिक मार्च निकालेंगे। 
जनसंस्कृति के लिए चलेगा सघन सांस्कृतिक अभियान 
14वें राष्ट्रीय सम्मेलन-सह-जन सांस्कृतिक महोत्सव को सफल बनाने व इसके स्वरुप को व्यापक करने के मकसद से देश भर में इप्टा की इकाईयां/सम्बद्ध समूह विशेष अभिनंदन समारोह आयोजित करेंगे। इसके तहत इप्टा की  इकाईयां/सम्बद्ध समूह स्थानीय  स्तर पर जनगीतों, नाटकों, आदि की प्रस्तुति करेंगी और केन्द्र सरकार की साम्प्रदायिक एवं जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आम जन को लामबंद किया जायेगा।

‘इप्टा प्लैटिनम जुबली राष्ट्रीय समारोह’ पटना में
इप्टा की स्थापना के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य पर बिहार इप्टा पटना में ’इप्टा प्लैटिनम जुबली राष्ट्रीय समारोह‘ का आयोजन करेगा। इप्टा के 75वें स्थापना वर्ष समारोह में राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय जनसंस्कृति का पटना में जमघट होगा।  बैठक में इस आशय के निर्णय को संपुष्ट करते हुए वर्ष 2017-18 के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने का निदेश बिहार इप्टा राज्य परिषद् को दिया गया।